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रिज़र्व बैंक छोड़ चुके रघुराम राजन की सत्यकथा: पार्ट 1

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मेरा नाम रघुराम राजन है. जो मैं करता हूं, वो मैं करता हूं.

हिन्दुस्तान में किसी ब्यूरोक्रेट का ऐसी लाइन बोल के बेदाग़ निकल जाना बड़ी बात है. मीडिया में आपका भूत और भविष्य दोनों दबा के खंगाला जायेगा. चार पीढ़ियों तक का इतिहास. दादाजी ने कहां कंचों के खेल में बेमंटी की थी. आप बाघ-बकरी के खेल में हर बार हार जाते थे. आज भी हार जाते हैं. कईसे आप काम कर रहे हैं, ताज्जुब है. और तो और, आपकी गर्लफ्रेंड भी थी. आउर आप काम कर रहे हैं.

रघुराम राजन सत्यकथा सीरीज का दूसरा पार्ट यहां पर पढ़ें.

पर रघुराम राजन के बारे में जितना पता किया गया, लोगों की नज़र में उनकी इज्जत बढ़ती गई. इतनी कि उनको भारतीय ब्यूरोक्रेसी का रॉकस्टार कहा जाने लगा.

4 सितम्बर 2013 को रघुराम राजन भारतीय रिज़र्व बैंक के 23वें गवर्नर बने. 3 साल के लिए. सुब्रमनियम स्वामी ने राजन पर हमला बोला. कहा वो अमेरिकन हैं. उनको वापस भेजो. पर जनता ने 50000 लोगों का सिग्नेचर इकठ्ठा किया, राजन को दो साल और रोकने के लिए. अमूल ने एक कार्टून निकाला इस बात पर. अमूल ने 2013 में राजन के आने पर भी एक कार्टून निकाला था.

promising new RBI governor
2013
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2016

राजन के आने के एक महीने बाद शोभा डे ने इकॉनमिक टाइम्स में उनके ऊपर एक आर्टिकल किया था:

The guy’s put ‘sex’ back into the limp Sensex. That makes him seriously hot.

पर राजन ने आगे काम करने से मना कर दिया है. कहते हैं मैं वापस अमेरिका टीचिंग करने जाऊंगा.

आइये रघुराम राजन के बारे में पढ़ते हैं:

राजन एंड फैमिली

रघुराम राजन का बचपन कई देशों में गुजरा. उनको लगता था कि पापा डिप्लोमेट हैं. वो तो बाद में पता चला कि पापा आईपीएस थे और उनको कई सारे मिशन पर भेजा जाता था. जेम्स बांड वाले पर नहीं. सिक्यूरिटी रिलेटेड. जानकार आदमी चाहिए था इसलिए. बाद में उनको रॉ चीफ बनने का भी मौका मिला था. पर कहा जाता है कि उसी समय बोफोर्स घोटाला लीक हो गया. राजीव गांधी अपसेट हो गए कि मैंने कुछ किया नहीं और बदनाम हो गया. इसलिए राजन के पापा को दूसरे विभाग में भेज दिया गया.

राजन के भाई अमेरिका में एक सोलर एनर्जी की कंपनी में काम करते हैं. राजन के बहनोई एक आईएएस ऑफिसर हैं. राजन ने यूपीएससी तो नहीं दिया था पर टाटा एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विसेज जरूर जॉइन की थी.

पढ़ाई-लिखाई

आईआईटी दिल्ली, आईआईएम अहमदाबाद और एमआईटी. किसी को जलाने के लिए काफी है. राजन बचपन से ही तेज स्टूडेंट थे. बस पढ़ाकू नहीं. हर चीज में तेज. इकोनॉमिस्ट बनना चाहते थे. पर हर ‘तेज इंडियन स्टूडेंट’ की तरह पहले आईआईटी गए. वहां ‘डायरेक्टर्स मैडल’ भी मिला. आईआईएम में भी मिला. बेस्ट आल-राउंडर परफॉरमेंस के लिए. एक इंटरव्यू में राजन ने कहा था कि इमरजेंसी के वक़्त इंडिया की इकॉनमी और सरकार की पालिसी देखकर मन में इकोनॉमिस्ट बनने का आईडिया आ गया था.

Raghuram RajanPTI
PTI

आईआईटी में पढ़ने आये तो हिंदी नहीं आती थी. कैंपस में चुनाव हारे फिर जीते. इंडियन पॉलिटिक्स का पहला व्यक्तिगत अनुभव उनको वहीं हो गया. एक लड़के ने पहले हराया फिर ‘कैंटीन से रिश्वतखोरी’ के आरोप में बेइज्जत हुआ. फिर राजन जीते. तो रघु जी को समझ तो आ ही गया होगा.

रघु जी के कारनामे

एमआईटी में 28 की उम्र में राजन ने पीएचडी कम्पलीट की. पीएचडी की थीसिस ‘एसेज ऑन बैंकिंग’ थी. इसमें उन्होंने डीरेगुलेशन, कम्पटीशन और एफिशिएंसी के बारे में बात की थी. डीरेगुलेशन यानी सरकार बात-बात में अपना दिमाग लगाना कम करेगी. इससे मार्किट फ्री होगा और कम्पटीशन बढ़ेगा. फिर कम्पटीशन बढ़ने से मार्किट की एफिशिएंसी बढ़ेगी. उस समय ये कांसेप्ट उफान पर था. सबको लगता था अब बस यही है. विकास का रास्ता. पर राजन ने ये भी कहा कि ये सारा मामला इतना सीधा नहीं है. बैंक और लेनदार का रिश्ता दिखने में क्लियर लगता है पर है नहीं. क्योंकि बैंक और मार्किट के काम भविष्य की बातों, खोने-पाने का डर और अनिश्चित खतरों से जुड़ा होता है. छोटी-छोटी बातें बैंक के बैलेंस-शीट में इकठ्ठा होती रहेंगी. राजन की ये निगाह बेहद शार्प थी. बाद में 2008 के इकनोमिक क्राइसिस में समझ आया.

उसी पेपर में राजन ने अमेरिका के एक कानून को बदलने की बात कही थी. अमेरिका में कमर्शियल बैंकिंग (रोजाना का लेना-देना, डिपाजिट, सेविंग्स, क्रेडिट आदि-इत्यादि) और इन्वेस्टमेंट बैंकिंग( लोगों के बिजनेस के लिए पैसे इकठ्ठा करने में लोगों के एजेंट की तरह का काम) दोनों अलग चीजें थीं. देखने में तो अच्छा लग रहा था. क्लियर कट काम. पर राजन के हिसाब से दोनों चीजें एक-दूसरे से जुड़ी हैं. क्योंकि इन्वेस्टमेंट बैंकिंग से खड़ा हुआ बिजनेस बाद में कमर्शियल बैंकिंग का ही तो सहारा लेगा. अगर मेरा दोस्त बैंक में है तो मैं थोड़ा सा इधर-उधर कर सकता हूँ. मैंने दोस्त कहा. नहीं है तो भी पैसा खिलाकर कर सकते हैं यार. बाद में 1999 में अमेरिका ने कानून को चेंज कर दिया.

राजन लगातार लिखते रहे. 2003 में उनकी किताब ‘Saving Capitalism from the Capitalists’ ( एक और राइटर जिंगल्स के साथ लिखी किताब) आई. इस किताब में फ्री मार्किट यानी बिना किसी रोक के बिजनेस और राजनीति-बिजनेस के रिलेशन से नये तरह के रोक, दोनों की बातें की गई थी. उस समय इस बात ने हंगामा कर दिया. लोगों को बहुत पसंद आया.

financial express
financial express

2003 में ही राजन को आईएमएफ का चीफ इकोनॉमिस्ट बना दिया गया. 40 की उम्र में. उस समय आईएमएफ में घमासान मचा हुआ था. आईएमएफ की सलाह मानने के बाद इंडोनेशिया, थाईलैंड, वियतनाम में बड़ी दिक्कतें आ गई थीं. बेइज्जती हो रही थी. बड़े-बड़े इकोनॉमिस्ट आपस में लड़ रहे थे. ऐसे में राजन ने बहुत समझदारी से मामला संभाला. टीचर थे, एकदम से पब्लिक लाइफ में आ गए और बढ़िया काम किया.

उसी साल 2005 में अरविन्द सुब्रमनियम के साथ मिलकर रिपोर्ट बनायी. इसमें फॉरेन एड पर सवाल उठाया गया. कहा गया कि कमजोर देशों को पैसा देना वहां की इकॉनमी को कमजोर बनाता है. आईएमएफ में रहते हुए ये बात करना हिम्मत का काम है. राजन की समझदारी और हिम्मत अभी तक सबको मालूम पड़ गयी थी.

इंडियन इकॉनमी से भी राजन का एक हल्का सा टच हुआ था. 1998 में. अभी केंद्र सरकार के मंत्री जयंत सिन्हा राजन के दोस्त हुआ करते थे अमेरिका में. जयंत सिन्हा के पिताजी यशवंत सिन्हा उन दिनों अटल सरकार के फाइनेंस मिनिस्टर हुआ करते थे. एक बार यशवंत सिन्हा अमेरिका बेटे के पास गए तो बेटे ने राजन को भी बुला लिया. यशवंत सिन्हा ने बात ही बात में राजन से इंडिया के ऊपर दो बातें की. राजन ने सलाह दी- इंडिया की इकॉनमी बढ़ाने के लिए इनकम टैक्स रिटर्न भरने की ‘प्रक्रिया’ को एक सीधा सादा काम बनाया जाए. लोगों को घर खरीदने के लिए मोटीवेट किया जाए. अगले बजट में इनकम टैक्स रिटर्न एक पेज का हो के आया. होम लोन पर रियायत दी गयी. उसके बाद राजन से कई बार सलाह ली गयी आरबीआई और सेबी के मामलों में.

2005- राजन की भविष्यवाणी

अगस्त 2005 में यूएस फ़ेडरल रिज़र्व के चेयरमैन एलन ग्रीनस्पैन 18 साल चेयरमैन रहने के बाद रिटायर हो रहे थे. अमेरिका की इकॉनमी बूम-बूम कर रही थी. इमोशनल मोमेंट था. ग्रीनस्पैन की वाह-वाह हो रही थी. अमेरिका दुनिया में टॉप पर रहा था. मजे ही मजे. उस समय राजन ने जिस पेपर पर बात की वो था- ‘Has Financial Development Made the World Riskier?’ इसमें उन्होंने ये बताया कि ये सारा जो मायाजाल फैला हुआ है न, एक दिन ले डूबेगा. क्योंकि अंधाधुंध रिस्क लिया जा रहा है. शार्ट-टर्म फायदे के लिए लम्बे समय का नुकसान बटोरा जा रहा है.

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हंगामा हो गया. होना ही था. चाणक्य रिटायर हो रहा है. और आप बताते हो कि चरस बो के जा रहा है. मुंह पे बोल रहे हो. पर 2008 में ये बात सच साबित हुई . रिस्क इतना ज्यादा ले लिया गया था कि बिना पूछे किसी को भी पैसा दे दिया जाता था. पैसा वापस हुआ नहीं. भट्टा बैठ गया.

अपनी किताब ‘Fault Lines’ में राजन कहते हैं कि तुरंत पैसा देना एक उपाय जरूर है कमजोर लोगों को आगे बढ़ाने के लिए, पर इसकी अति ‘इकनोमिक सिस्टम’ को रगेद देगी. पैसा वापस ही नहीं आएगा तो किसी की मदद नहीं हो पाएगी.

2006: इंडिया से नया नाता

2006 के बाद राजन इंडियन इकॉनमी के बारे में लिखने लगे. ‘छात्र जीवन’ का रघु वापस आ रहा था. इंडिया की इकॉनमी इमरजेंसी से अब तक काफी आगे आ चुकी थी. ऐसे में इंटरेस्ट जागना नेचुरल था. 2008 के रिसेशन के बाद राजन का प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह से मिलना हुआ. राजन को पीएम का ‘आनरेरी इकनोमिक एडवाइजर’ बना दिया गया. 2010 में राजन को इंडिया के फाइनेंसियल सेक्टर में सुधारों पर एक रिपोर्ट बनाने का काम दिया गया. इन्होंने 200 पेज की एक रिपोर्ट ‘A Hundred Small Steps’ सौंपी. इसमें उन्होंने बात की थी इन्फ्लेशन के बारे में. जो गवर्नर बनने के बाद उनका मैं टारगेट रहा. 2012 में राजन ने सरकार को दबा के लताड़ा. बोले कि सरकारी लोग ‘रिच’ और ‘पावरफुल’ लोगों के साथ थोड़े ज्यादा आराम में हैं. ये ठीक नहीं है. इंडियन स्कूल ऑफ़ बिजनेस, हैदराबाद के एक भाषण में प्रधानमंत्री को भी लपेटे में लिया था. सरकार के फ़ूड सिक्यूरिटी प्रोग्राम को भी राजन ने नहीं बख्शा. राजन का कहना था कि सब्सिडी के बजाये सीधा अकाउंट में पैसा भेजो. जो कि अभी की सरकार कई योजनाओं में कर रही है.

Planning Commission
Planning Commission

अभी तक रघुराम राजन के बारे में सबको समझ आ चुका था. जहाँ सभी लोग पद-प्रतिष्ठा की दौड़ में लगे रहते हैं वहीं ये शख्स किसी को भी लताड़ लगाने में पीछे नहीं हटता. अपनी बात कॉन्फिडेंस से खुलेआम कहना ‘सरकारी अफसर’ की फितरत नहीं होती. पर ऐसे लोगों पर दुश्मन भी फ़िदा रहते हैं.

2013: रिज़र्व बैंक के गवर्नर

2011 के बाद इंडिया की इकॉनमी बिखरने लगी थी. 2012 आते आते रूपया डॉलर के मुकाबले रो रहा था. 60 तक पहुँच गया. लगा कि 1991 फिर से आ रहा है. सारी गलती रिज़र्व बैंक के गवर्नर की ही नहीं थी. सरकार की पालिसी, विदेशी मार्किट, अमेरिका की पालिसी सब कुछ गड्ड-मड्ड हो गया था. ऐसे में फाइनेंस मिनिस्टर चिदंबरम ने राजन को रिज़र्व बैंक के गवर्नर के लिए बुलाया.

ये आसान नहीं था. अभी तक के ज्यादातर गवर्नर आईएएस ऑफिसर थे. जो नहीं थे वो एलआईसी या रिज़र्व बैंक से ही आये थे. लगभग सबको पोलिटिकल लोग जानते थे. वो जनता में, मिनिस्ट्री में काम कर चुके थे. इंडिया के काम करने के तरीके से परिचित लोग थे. पर राजन तो बाहर के आदमी थे. इंडिया पर लिखे जरूर थे. पर लिखना अलग बात थी. इंडियन ब्यूरोक्रेसी में कभी काम किए ही नहीं थे. अच्छा करने से मतलब नहीं है. भारतीय क्रिकेट टीम का कोच सभी लोग नहीं बन सकते. इंडियन कल्चर को समझना पड़ता है. वही हाल यहां भी था.

पर राजन आये. शायद चैलेंज से भागना उनकी फितरत नहीं है.

उनके पापा ने ये बात कन्फर्म की थी. पापा ने ये भी कहा कि राजन मैराथन, स्क्वाश, टेनिस, बैडमिंटन हर खेल खेल चुके हैं. पापा ने ये भी कहा कि मेरे तीनों बेटे आईआईटी से पढ़े हैं, पीएचडी हैं पर रघु के आगे बाकी को कोई नहीं जानता. रघु का पूरा परिवार आईआईटी, आईआईएम, येल, एमआईटी से पढ़ा हुआ है.

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राजन का नाम गवर्नर के लिए आते ही मार्किट में बवाल कट गया.

सेंसेक्स उछलने लगा.

लोगों के मन में खुशियां आने लगीं. वैसा ही कुछ जैसा कलाम का नाम आने पर होता था. हम हिन्दुस्तानी हीरो की तलाश में रहते हैं. गवर्नर के रूप में एक नया हीरो मिला था. बड़ी आस से लोग देख रहे थे. ये बड़ा ही अजीब था. सरकारी अफसरों को ले के पप्पियां-झप्पियां भरना! कोई हॉट बता रहा है. कोई कह रहा है कि गवर्नर पे लड़कियां मर रही हैं. कोई जेम्स बांड बता रहा है. मीडिया ऐसा दिखा रहा था जैसे सितम्बर में आये राजन दशहरे के दिन सबको मार्स पर ले जायेंगे.

राजन ने कहा: मेरे हाथ में जादू की छड़ी नहीं है.

(the caravan और economic times से इनपुट)


(ये स्टोरी ऋषभ श्रीवास्तव ने की है.)

पढ़ें-  रघुराम राजन की सत्यकथा: पार्ट 2 

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