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जब 'जिन्न' ने हमसे पूछा, मरे हुए बच्चे की गरमा-गरम जीभ खाओगे?

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साल 2010. जनवरी का महीना था. बी.टेक का दूसरा साल खत्म होने वाला था. वो हमारी अइयाशियों का टाइम था. तीन पंटर थे. ‘द थ्री मस्कीटियर्स’. दिव्या, ज्योति और हम. और एक पक्का वाला प्रॉमिस था. ‘जिएंगे साथ, मरेंगे साथ, पाप सारे करेंगे साथ’. पहला साल ख़तम होने के बाद वार्डन ने हमारे कमरे अलग कर दिए थे. क्योंकि उस खडूस को लगता था हम तीनों एक साथरहे तो होस्टल की ‘शांति’ को खतरा है.

तो जनवरी की एक शाम ठंड बहुत ज्यादा थी. हम लोग अपने-अपने कमरे में रजाई के अन्दर थे. वार्डन हमारे हॉस्टल में ही रहती थी. रात में जल्दी से खाना खा कर अपने कमरे में बंद हो जाती थी. उसके बाद पूरे हॉस्टल पर हमारा राज होता था. उस शाम हम पढ़ाई रहे थे. शायद कोई टेस्ट वगैरह रहा होगा अगले दिन. अचानक से एक लड़की दौड़ती हुई हमारे कमरे में आई और बोली, ‘तुमको पता है इस हॉस्टल पर रूहों का साया है.’

हर हॉस्टल में एक ना एक ऐसा कैरेक्टर ज़रूर होता है. जिसको सब कुछ पता होता है. किस लड़की का कौन से प्रोफ़ेसर से अफेयर चल रहा है. या ओसामा को अमेरिका ने कैसे मारा. उसको हर बात का ‘ज्ञान’ होता है. ना भी होता होगा. लेकिन हर गॉसिप को पेश करने की एक गजब कला होती है. कि असलियत जानकर भी लोग झूठ पर यकीन कर लें.

तो हमारे हॉस्टल में भी थी एक ऐसी लड़की . नाम? अम्म्म. मान लो वैजयन्ती माला.

तो जब उस शाम 6 बजकर 53 मिनट पर वैजयन्ती माला में हमारे कमरे में ये घोषणा की. इस हॉस्टल पर रूहों का साया है. हम सबको उसकी बात सच लगी. मैंने अपने बेड पर बैठे-बैठे कॉरिडोर में आवाज़ लगाई. दिव्याsssss,ज्योतिssssss.जल्दी से मेरे रूम पर आओ. वैजयन्ती माला कुछ बता रही है.

2 मिनट के अंदर मेरे बेड पर करीब 7-8 लोग बैठे थे. मेरी रूममेट्स और दिव्या, ज्योति की रूममेट्स भी आ गई थीं. उस वक़्त वैजयन्ती माला का चेहरा देखने लायक था. मतलब ख़ुशी और गर्व से जो चमक आ गई थी न उसके गालों पर. आहाहा. हम सबको पता था. वो कोई नया किस्सा सुनाने वाली है. सबको पता था की उसकी बातों में सच्चाई होने की संभावना जीरो परसेंट है. लेकिन सब पढ़ाई से भागने का रास्ता ही खोज रहे थे. और भूतों की कहानी से अच्छे तो बास्क एंड रॉबिन्स की आइसक्रीम के 31 फ्लेवर्स भी नहीं लगते. ज्योति को भूतों से डर लगता था. वो मेरे और दिव्या के बीच में घुस कर बैठ गई.

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वैजयन्ती माला ने किस्सा शुरू किया.

‘जानते हो कल रात में क्या हुआ था. हम वॉशरूम जाने के लिए उठे. अपने रूम से  तक जा रहे थे कि लगा किसी ने हमको आवाज़ दी. हमने पलट के देखा कोई नहीं था. फिर वॉशरूम के अन्दर गए. वहां टॉयलेट के दरवाज़े अपने आप खुल-बंद होने लगे. हमको लगा हवा है. लेकिन फिर से हमको अपना नाम सुनाई दिया. और अभी शाम को हमने जो कपड़े सुखाए थे. आधे घंटे बाद बाहर देखा. वो कपड़े तार पर नहीं थे. पास में बाल्टी में पड़े थे. ठीक वैसे जैसे सुखाने से पहले थे. हम कह रहे हैं. कुछ तो है यहां. सीनियर्स भी कह रही थीं कि पहले भी ऐसा हुआ है.’

अब ज्योति की हालत खराब हो गई. हमको हंसी आ रही थी. हमने कहा ‘ये सब फर्जी की बात है. कोई या तो तुमको परेशान कर रहा है. या ये सिर्फ तुम्हारे दिमाग का वहम है.’

उस वक़्त वैजयन्ती माला का चेहरा देखने वाला था. भन्ना गई वो. जैसे हमने उससे उसकी फेवरेट चीज़ छीन ली हो. बोली, ‘तो तुमको लगता है हम मज़ाक कर रहे है? वैसे भी इस तरह की ऊपरी चीज़ों का मज़ाक नहीं उड़ाना चाहिए. बहुत बुरा हो जाता है.’

ऐसा लगा जैसे वो हमको धमकी दे रही थी. जैसे अपनी जेब में 10-12 भूत लिए घूम रही हो. और हम उसकी बात ना मानें तो हमारे पीछे छोड़ देगी. कोई मंतर मार देगी.

भूत-प्रेतों से हमको हमेशा से बहुत प्यार रहा है. एक फेटिश है. हॉरर फिल्मों से. हॉरर कहानियों से. और जो असली कहानियां होती हैं उनकी बात ही अलग है. सुपरनेचुरल और ‘ऊपरी फेर’ के किस्से हमको बहुत ही ज्यादा पसंद रहे हैं. लेकिन वैजयन्ती माला की बात पर किसी को यकीन नहीं हो रहा था. हम और दिव्या हंस रहे थे.

खिसिया कर वैजयन्ती माला बोली. ‘तुमको पता है मेरी एक कजिन है, मीना कुमारी. पहले तुम्हारी तरह ही सोचती थी. एक बार रमजान चल रहे थे. मेरी मामी यानी उसकी अम्मी सहरी बना रही थीं. मीना कुमारी वहीँ खड़ी थी. अचानक से उसको लगा, कुछ काला-काला सा उसके बगल से गुज़रा. उसने अपनी अम्मी से पूछा कि उन्होंने कुछ देखा है क्या. अम्मी ने मना कर दिया. लेकिन उस दिन के बाद से मीना कुमारी ऐसी बीमार पड़ी कि आज तक बेड पर ही है. वेट आधा हो गया है उसका. 32 साल की हो गई है और अभी तक शादी नहीं हुई. इमाम साहब कहते हैं उसको एक जिन्न ने अपने कब्ज़े में कर लिया है. अब वो जिन्न उसको कभी नहीं छोड़ेगा. उससे शादी कर चुका है. उसको अपनी बीवी मान चूका है. इसलिए किसी और से उसकी शादी नहीं होने देगा. और डॉक्टर कहता है सब नार्मल है, कुछ नहीं हुआ है. अब हंसो दांत निकाल कर तुम लोग.’

बोलते-बोलते वैजयन्ती माला की सांस उखड़ने लगी थी. हमने उसके कंधे पर हाथ डाल कर कहा, ‘यार इट्स ओके. हम समझ रहे हैं.’

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समझ तो गए ही थे हम लोग. लेकिन अब एक और चुल चढ़ गई. वैजयन्ती माला की कजिन मीना कुमारी से मिलने की चुल. हमारी फेटिश को एक शक्ल मिल रही थी. कुछ सुपरनेचुरल सा. हमारी पहुंच के इतने करीब था.

वैजयन्ती माला ने बताया कि एक बार मीना कुमारी के पापा उसको किसी बात पर डांटने लगे. तो 56 किलो की मीना कुमारी ने अपने 128 किलो वज़न के पापा को इतनी तेज़ धक्का मारा. वो 10 फीट दूर जा कर गिरे. हमारी नज़रों के सामने भूल-भुलैया वाला सीन चलने लगा. जब विद्या बालन एक भारी पलंग उठा लेती है. खैर, हमने कुछ कहा नहीं.

हम लोग वैजयन्ती माला से जिन्नों के बारे में पूछने लगे. उसने बताया. जिन्न भी इन्सान की तरह एक प्रजाति होती है. वो लोग ज़मीन से एक फीट ऊपर चलते हैं. लेकिन इंसानों के बीच इंसानों जैसे ही रहते हैं. उनको लम्बे, काले और स्ट्रेट बाल बहुत पसंद होते हैं. कभी कोई लड़की बाल खोले उन्हें दिख जाए. तो वो उसकी तरफ अट्रैक्ट हो जाते हैं. और उसको अपनी बीवी बना लेते हैं. उसपर कब्ज़ा कर लेते हैं.’
बाय गॉड उस दिन हमको अपने छोटे, कर्ली बालों पर बहुत प्यार आ रहा था.

कुछ दिनों तक हमने और दिव्या ने इस बारे में बहुत बातें की. ज्योति इस टॉपिक के आते ही कम्बल में घुस जाती थी. एक दिन हमने कहा, ‘यार चलते हैं ना वैजयन्ती माला की मामी के घर. प्लीज. एक बार मीना कुमारी से मिलना है. यार, ये सब हकीम वगैरह लोग उनको बेवक़ूफ़ बना रहे हैं. अच्छे से सायकाइट्रिस्ट को दिखाने से शायद वो सही हो जाए.’

दिव्या ने पहले तो हमको चार भारी-भरी गालियां दीं. फिर बोली, ‘ये मदर टेरेसा बनना बंद कर दो. हो सकता है सही में कुछ ‘ऊपरी चक्कर’ हो. जिस चीज़ के बारे में नहीं पता, क्यों फालतू में अपनी नाक घुसेड़ रही हो.’ ज्योति उसकी हां में हां मिला रही थी. कम्बल के अन्दर से.
हम तो मन बना चुके थे. हमको जाना था. इसी वीकेंड पर. ज्योति चिल्ला रही थी. ‘खुद तो मरोगी, हम लोगों को भी मरवाओगी किसी दिन.’

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जब हमारे दोनों जाबांज सिपाहियों को लगा कि हम तय कर चुके हैं. और हम जा कर ही मानेंगे. हमको गालियां देते हुए वो दोनों भी रेडी हो गए. मीना कुमारी के घर जाने को.

अब वैजयन्ती माला को मनाना था. हम तीनो एक रात को उसके कमरे में पहुंचे. घर परिवार की बात करने लगे. ज्योति ने कहा, ‘यार बहुत दिनों से घर का खाना नहीं खाया. और यहां लखनऊ में तो कोई रिलेटिव भी नहीं हैं. तुम लकी हो वैजयन्ती माला. तुम्हारे मामा-मामी यहीं रहते हैं.’ फायर हो चुका था. अब बस निशाने पर लगने की देरी थी.
वैजयन्ती माला ने चश्मा उतारते हुए कहा, ‘हैं तो यार, लेकिन जा कहां पाते हैं. मामी बुलाती रह जाती हैं. सन्डे कहां ख़त्म हो जाता है पता ही नहीं चलता.’
दिव्या ने बात उठाई, ‘वैसे कहां पर रहती हैं मामी?’
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अब हमारी बारी थी. ‘अरे तो इस सन्डे चलो हम लोगों के साथ. हम लोग अमीनाबाद जा ही रहे हैं. तुम वहां से मामी के घर चली जाना. हम लोग शॉपिंग करके वापस आ जाएंगे’

थोड़ी देर वैजयन्ती माला ने कुछ सोचा फिर बोली, ‘तुम लोग भी चल लेना मामी के घर. ज्योति को घर का खाना खाना ही है. वहीँ खा लेगी’
ज्जबात. क्या प्लान बनाया था. दिल कर रहा था खुद ही को पुच्ची कर लें.

थर्सडे से सन्डे. इन 4 दिनों में ज्योति सिर्फ हमको गरियाती रही. और उस दिन को कोसती रही, जब उसने हमसे दोस्ती की थी. दिव्या को भी अब मीना कुमारी से मिलने में इंटरेस्ट आ गया था. इसलिए वो हमारी टीम में थी. और हम? इतने ज्यादा एक्साइटेड थे. ना नींद आ रही थी. ना भूख लग रही थी.

फाइनली सन्डे आया. इंजीनियरिंग चौराहे से जब टेम्पो में बैठ रहे थे, हम नर्वस थे. ज्योति हमको गरिया ही रही थी. दिव्या तटस्थ. हमेशा की तरह. लेकिन अब वैजयन्ती माला साथ में थी. इसलिए सब नार्मल रहने की कोशिश कर रहे थे.

फाइनली हम लोग मामी के घर पहुंचे. मामा शायद कहीं बाहर गए थे. हमको ऐसा लग रहा था हम लड़की देखने आए हैं. मीना कुमारी के आते ही हमारी हार्टबीट बढ़ गई. वो तो एकदम नार्मल थीं. कमज़ोर थीं. चेहरा सूखा सा था. लेकिन जो-जो बातें वैजयन्ती माला ने हम लोगों को बताई थीं. लग ही नहीं रहा था कि वो सब सच होगा. मीना कुमारी का भाई किसी काम से बाहर चला गया. छोटी बहन के बोर्ड्स थे. वो पढ़ने के लिए अन्दर चली गई. वैजयन्ती माला और मामी किचन में घुस गईं. अब कमरे में सिर्फ 4 लोग थे. हम तीन मस्कीटियर्स और मीना कुमारी.

मीना कुमारी इतने अच्छे से हमसे बातें कर रही थीं. वो जिन्न-विन्न की बातें सब बहुत बड़ा स्कैम लग रहा था हमको. अपना फिक्शन इस तरह से टूट जाने का बहुत दुःख हो रहा था.

मीना कुमारी ने हम लोगों से कहा, ‘तुम लोग आते रहा करो यार. मैं तो कहीं जाती नहीं. बोर ही हो जाती हूं. वही किताबें. वही टीवी. कोई आता है तो अच्छा लगता है. थोड़ा मन बहल जाता है.

हमारे मन में उनके लिए बहुत सारा प्यार उमड़ आया. हमने कहा. ‘हां अप्पी, बिलकुल आएंगे. अब तो आपसे भी दोस्ती हो गई है. वैजयन्ती माला नहीं भी आएगी तो हम लोग आ जाएंगे.’
हमको दिखा तो नहीं लेकिन हमारी ऐसी बातों पर दिव्या अक्सर सिर पीट लिया करती है.

हम सोफे के एक किनारे बैठे थे. और बगल कुर्सी पर मीना कुमारी. अचानक मीना कुमारी नें हमसे पूछा, ‘कुछ खाओगे तुम लोग?’
हमने कहा, ‘वो आंटी शायद कुछ लाने ही गई हैं किचन में.’

मीना कुमारी एकदम से पास आई और बोली, ‘वो सब नहीं, असली चीज़. मरे हुए बच्चे की गरम-गरम जीभ. खाओगी? मेरे कमरे में है. लाऊं?’

भाई साब! ये लिखते हुए हमको अभी भी कंपाई छूट रही है. उसकी बड़ी-बड़ी आंखें, आंखों में एक अलग सी चमक. और एकदम से हमारे मुंह में घुस कर उसका ये कहना.

हम छिटक कर पीछे हो गए. ज्योति सोफा छोड़ कर उठ गई. उसके हाथ से टकरा कर शायद फ्लावर पॉट ज़मीन पर गिर गया होगा. मीना कुमारी ने हमारा हाथ पकड़ा. बोली, तुम मुझे बहुत अच्छी लगी. आती रहना. जैसे ही उसने हाथ पकड़ा, इतनी तेज़ करंट लगा था. और उन 3 सेकंड में हमारे दिमाग में हमारे सबसे बड़े फेलियर स्लाइड शो की तरह चलने लगे. हमने उसका हाथ झटक दिया. ‘टू हेल विद यू कर्ली बाल’

फ्लावर पॉट गिरने की आवाज़ से शायद वैजयन्ती माला बाहर आ गई. हम सब की शक्लें देखीं. ज्योति को दरवाज़े के पास खड़ा देखा. मीना कुमारी से बोली, ‘अप्पी आप अन्दर चलो. इन लोगों को कुछ काम है. ये लोग जा रहे हैं.’

मीना कुमारी ने हम सबके हाथ चूमें. और चली गईं. हम लोग बस पानी पी कर निकल आए. थोड़ी देर तक सब सन्न थे. हम सड़क पर चल रहे थे. बेहोश से. हम अपना करंट लगा हुआ हाथ ही झटक रहे थे.

थोड़ी देर बात अचानक से दिव्या बोली, ‘अबे ये क्या हुआ अभी? ये सब रियल था?’ हम लोग इतने ज्यादा डरे हुए थे. हंसने लगे. सड़क किनारे, लोट लोट कर. दुःख और डर के साथ ऐसा ही है. जब फीलिंग इतनी ज्यादा बढ़ जाए की बर्दाश्त ना हो, हंसी छूट जाती है. हम लोगों के साथ तो ऐसा ही था. खूब हंसे. 10 मिनट तक. फिर बस पकड़ कर हॉस्टल आये.

वैजयन्ती माला से हमने इस बात का ज़िक्र फाइनल इयर ख़त्म होने वाले दिन किया. और उस दिन मामी के घर से बिना खाना खाए भाग आने के लिए सॉरी भी बोला. वैजयन्ती माला ने बताया. करीब 6 महीने पहले मीना कुमारी की डेथ हो गई है. दौरे इतने ज्यादा बढ़ गए थे. जिन्न उसको छोड़ ही नहीं रहा था. मीना खुद भी बहुत परेशान हो गई थी. इसलिए एक दिन सीढ़ी पर सिर पटक-पटक कर वो मर गई.
वो दिन हमारी कॉलेज लाइफ का आखिरी दिन था. और मेरी एक फैन्टैसी का भी.

मेडिकल साइंस और साइकॉलोजी से सब कुछ एक्सप्लेन किया जा सकता है. बिलकुल. इलाज भी करवाया जा सकता है. लेकिन वो दिन अभी भी इतना ताज़ा है जेहन में. जैसे मरे हुए बच्चे की गरम-गरम जीभ.

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