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औरतें भी औरतों का रेप करती हैं, ये कानूनन अपराध नहीं होता

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शनिवार को एक सात साल की बच्ची के पिता ने पुलिस को फोन किया: ‘मेरी बच्ची का यौन शोषण हुआ है.’

सुनते ही आपके  दिमाग में एक तस्वीर बनी होगी. एक पुरुष की जो उस बच्ची का शोषण कर रहा होगा. मगर असल में शोषण करने वाली दो लड़कियां थीं. बच्ची के स्कूल की सीनियर. एक बीस साल की थी. और एक नाबालिग. जांच में पता चला वो बच्ची को बेहोशी की दवाई देती थीं.

लगभग दो हफ्ते पहले एक और खबर आई थी. 16 साल की एक लड़की अपने हॉस्टल के कमरे की छत से लटकी हुई मिली थी. वजह, उसका ख़राब रिजल्ट नहीं. वजह उसके प्रेम में पागल कोई लड़का भी नहीं. वजह दो लड़कियां थीं, जो उस लड़की के साथ सेक्स करना चाहती थीं.

लड़की 11वीं क्लास की स्टूडेंट थी. उसकी बड़ी बहन BA सेकंड इयर में थी. जो दो लड़कियां लड़की के सुसाइड के लिए जिम्मेदार पाई गई हैं, वो भी 11वीं क्लास और BA की क्लास में थीं. वो दोनों लड़कियां बहनें थीं. हालांकि इन दोनों बहनों को IPC के सेक्शन 306 यानी सुसाइड के लिए उकसाने के लिए धरा गया था. मगर ये सिर्फ किसी लड़की को सुसाइड के लिए उकसाना भर नहीं था.

एक लड़की को सेक्स के लिए पाने की चाह में दोनों लड़कियों ने उस लड़की की तरफ कदम बढ़ाए होंगे. शायद उससे सेक्शुअल बातें की हों, शायद उसकी ओर सेक्शुअल इशारे किए हों, शायद उसे भद्दे मैसेज भेजे हों, शायद उसके कमरे में आई हों, शायद उसका पीछा किया हो. क्या हम जानते हैं कि वो बहनें उसे किस तरह परेशान करती थीं?

लड़कियों के मां-बाप जब उन्हें गर्ल्स हॉस्टल या पीजी में छोड़कर जाते हैं, राहत की सांस लेते हैं. कि चलो बेटी दूसरी लड़कियों के साथ है. अपनी सहेलियां खोज लेगी. और सबसे बड़ी बात कि सुरक्षित रहेगी. कोई लड़का वहां नहीं होगा उसे तंग करने के लिए. जब सिंगल लड़कियां किराए का मकान ढूंढ़ने जाती हैं, मकान मालिक कहते हैं, ‘कोई रोक-टोक नहीं है, बस लड़के न आएं.’

लड़के और लड़कियां अगर अलग-अलग रहेंगे तो सुरक्षित रहेंगे, ये सोच केवल ये ही नहीं बताती कि हम लड़के और लड़कियों के एक ही छत के नीचे रहने के कितने खिलाफ हैं, बल्कि ये भी बताती है कि हमारी सोच कितनी सीमित और ‘स्ट्रेट’ है. हम असल में ये सोच ही नहीं पाते कि लड़के का लड़के के साथ या लड़की का लड़की के साथ किसी भी तरह का प्रेम संबंध हो सकता है. इसलिए उनके साथ रहने पर हमें कभी कोई ऐतराज नहीं होता.

जब हम सुनते हैं कि औरत ने औरत को हैरेस किया, हमारे दिमाग में भद्दी तस्वीर बनने में थोड़ा वक़्त लगता है. हम ये समझते हैं कि लड़कियां कमज़ोर होती हैं. और चूंकि वो पुरुषों से कमज़ोर होती हैं, वो पुरुषों सी हिंसा नहीं कर सकतीं. औरत का दूसरी औरत का यौन शोषण करना पोर्नोग्राफिक है. अगर इस बात का जिक्र पुरुषों के ग्रुप में किया जाए तो शायद वो इस पर हंसें और इसमें एक प्रकार या यौन सुख ढूंढ़ लें.

एक समाज के तौर पर ये बात हम सब की कल्पना के परे है कि जब एक औरत दूसरी औरत का शोषण करती है, उसमें शारीरिक और मानसिक हिंसा शामिल होती है. ये उस लेस्बियन पोर्नोग्राफिक फिल्म की तरह नहीं होता जब एक लड़की दूसरी को मारकर उसका रेप करे और धीरे-धीरे दूसरी उसमें आनंद लेने लगे.

मरी हुई लड़की की बहन ने बताया था कि उसने, उसके परिवार ने लगातार चल रहे इस सेक्शुअल एक्सप्लॉइटेशन की शिकायत की थी. लेकिन स्कूल वालों ने कोई कदम नहीं उठाया था. अगर उन लड़कियों की जगह कोई लड़का होता, तो शायद तुरंत उसके खिलाफ सख्त से सख्त कदम उठाए जाते. मगर एक लड़की किसी लड़की को कितना परेशान कर लेगी. गालियां देगी, दो चार बातें कहेगी, ज्यादा से ज्यादा बाल खींच लेंगी? उसके कपड़े तो नहीं उतारेंगी. उसका पीछा तो नहीं करेंगी. इसलिए स्कूल ने कुछ नहीं किया.

जिस 7 साल की बच्ची का शोषण हुआ है, वो फिर भी पीड़ित कहलाई जाएगी. क्योंकि दोनों आरोपियों को POCSO के तहत गिरफ्तार किया जाएगा. लेकिन जो लड़की मर गई, उसकी आरोपियों का अपराध मात्र उस लड़की को सुसाइड के लिए भड़काने तक सीमित रह जाएगा.

केवल औरत और औरत नहीं, पुरुष और पुरुष के बीच भी रेप के किस्से सामने आते हैं. मगर संविधान में रेप की जो परिभाषा है, वो केवल पुरुष का औरत से किये गए रेप तक सीमित है.

और बुरी से बुरी हालत में इनपर जो केस बनता है, वो सेक्शन 377 के तहत बनता है. जो अननेचुरल सेक्स के खिलाफ है. यही कानून समलैंगिक प्रेम के भी खिलाफ है. यानी लड़की को लड़की और पुरुष को पुरुष के रेप से बचाने का कोई कानून है ही नहीं हमारे पास.

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