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'तरुण सागर के नंगेपन से भी ज्यादा नंगई है ये'

Valson-Thampu-Ibnliveवाल्सन थम्पू लेखक और शिक्षक हैं. धार्मिक और आध्यात्मिक मसलों पर लिखते हैं. दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रतिष्ठित कॉलेज सेंट स्टीफंस के प्रिंसिपल रह चुके हैं. ये आर्टिकल उन्होंने अंग्रेजी में डेली ओ वेबसाइट के लिए लिखा था. हम इसे हिंदी में ट्रांसलेट कर आपको पढ़ा रहे हैं.


 

मैं तरुण सागर से मिला हूं. उनके आश्रम पर लगभग एक घंटा बिताकर आया हूं. वहां पुरुष और औरतें मौजूद थे. मेरे दिमाग में ये नहीं आया कि मुनि को एक नंगे व्यक्ति की तरह देखा जाए. मुझे लगता है कि वहां मौजूद किसी भी व्यक्ति ने ऐसा सोचा होगा.

नंगापन इंसान के दिमाग में होता है. खासकर उस इंसान के, जो शरीर से ज्यादा कुछ भी नहीं है. वो बिना दिमाग का इंसान होता है, जो सिर्फ एक शरीर होता है, और शारीरिक इच्छाओं से भरा हुआ होता है. ऐसे लोग हर चीज में नंगापन खोज लेते हैं. ये नहीं जानते कि कपड़े न पहनने का असल मतलब क्या होता है.

समस्या यही है, जैन मुनि का नंगापन नहीं.

मैं इस बात पर विश्वास रखता हूं कि कपड़े पहनना, आपको कपड़े न पहनने से ज्यादा शर्मिंदा कर सकता है. कपड़े छिपाते हैं, नंगापन दिखाता है.

लेकिन कपड़े हमारे लिए बहुत जरूरी हैं. आखिर हम अपने कपड़ों के बिना हैं ही क्या.

मैं एक इंसान के तौर पर जितना गरीब होऊंगा, उतने महंगे मेरे कपड़े होंगे. अगर मैं इंसानियत का एक अच्छा नमूना नहीं हो सकता, मैं एक दर्जी के लिए सजा-धजा पुतला बन जाता हूं.

नंगापन भी एक समस्या बन सकता है. वहीं नंगापन दूसरी तरफ एक धार्मिक ड्रेस कोड बन सकता है, जो अध्यात्म के गतिहीन होकर सड़ने का प्रमाण बन जाता है. जैसे किसी राजा के कपड़े. नंगापन कभी-कभी लाखों रुपये महंगे कपड़ों से ज्यादा चमकदार दिखता है.

मुझे नहीं लगता कि मुनि तरुण सागर को उनका शरीर देखने के लिए हरियाणा विधानसभा में बुलाया गया था. उन्हें बुलाया गया था उनके व्यक्तित्व के लिए. अगर मैं कहीं नंगा घूमने लगूं, आप मुझे विधानसभा में बोलने के लिए नहीं बुलाएंगे, बुलाएंगे क्या? आप मेरा मुंह बंद करवा देंगे. करवाना भी चाहिए.

उनको बुलाते समय सभी को पता था, उनका ड्रेस कोड क्या है. जो सवाल काम का था, वो ये कि उनकी बातें सुनने लायक थीं या नहीं.

लेकिन इस बारे में कोई बात मेरे कानों में पड़ ही नहीं रही है!

ये भी एक नंगई है. दिमाग की नंगई. आत्मा की नंगई. लेकिन ये नंगई तरुण सागर के शरीर के नंगेपन से अलग है. तरुण सागर का नंगापन वैसा ही है, जैसे आसमान का होता है.

हो सकता है कि मैं इस मान्यता में विश्वास न रखता होऊं. बल्कि, मैं विश्वास नहीं ही रखता हूं. लेकिन इस मान्यता का सम्मान करने में मेरा कुछ नहीं घटता. हर चीज में गलतियां खोजते रहना, जिससे उसे बुरा कहा जा सके, आत्मा के साथ छल करने जैसा है.

अगर आध्यात्मिक नजरिये से देखें, तो आखिर नंगापन होता क्या है?

ये कपड़ों का मसला नहीं. मैं अगर खुद को सबसे महंगे और मोटे कपड़ों में लपेट लूं, मैं फिर भी नंगा हो सकता हूं. ये आपकी फैसले लेनी की क्षमता पर निर्भर करता है. अगर आप शक्लों और शरीरों के पार नहीं देख सकते, जिसे हम आध्यात्मिक अंधापन मान सकते हैं, तो मैं सेफ हूं. लेकिन अगर आप पार देख सकते हैं तो भगवान मेरा भला करे.

एक मुनि नंगा क्यों घूमता है? क्या कपड़े पहनने से उसका अध्यात्म कम हो जाता है?

नंगापन तो सपाट चीजों का होता है. गहराई का कोई नंगापन नहीं होता. अगर आप महज एक सपाट सतह हैं बिना किसी की गहराई के, तो आप नंगे हैं, और इस नंगेपन को कोई नहीं छिपा सकता, एक दूसरे लोगों की न देखने के इच्छा के अलावा. इस नंगेपन को आप कपड़ों की चादर से नहीं ढक सकते.

ये हमें मसले की तह तक लाता है. और इस सवाल के जवाब पर लाता है, कि अध्यात्म और नग्नता में क्या संबंध है.

हम कहते हैं कि सतह, गहराई का कपड़ा है. इस बात पर ये मसला खतम हो सकता है. पर केवल निर्जीव चीजों के बारे में कहा जा सकता है. इंसान निर्जीव नहीं होते.

जीवन गतिशील होता है. गतिशील की परिभाषा को ध्यान में रखते हुए, सतह और गहराई के बीच का रिश्ता रहस्यमई हो जाता है. क्या समुद्र की सतह उसकी गहराई को ढकती है? या उसकी सतह उसकी गहराई में घुसने का निमंत्रण होती है? सतह ढकती है, दिखाती है. छिपाती कभी नहीं.

इंसानों के केस में ये और भी रहस्यमयी हो जाता है. क्या हमारा शरीर उससे ज्यादा है, जो हम हैं–यानी सतह और गहराई का जोड़. जैसे समुद्र का सतह और गहराई होते हैं?

यहां वो बात आती है, जो बहुत साल पहले हमारी नजरों से ओझल हो चुकी है. और अब समय आ गया है कि हम उसे याद करें.

सब कुछ बातचीत का मसला है. एक दूसरे पर निर्भर होना इंसान होने का मूल सिद्धांत है. शरीर सतह है, आत्मा गहराई. या शरीर और आत्मा का रिश्ता इतना ही है?

बल्कि ‘ढंकना’ भी एक समस्या है. क्या ‘ढंकने’ और ‘छिपाने’ का अर्थ एक ही होता है?

कोई बात नहीं, शरीर और आत्मा पर वापस आते हैं. क्योंकि तरुण सागर का मसला बिना इसे सुलझाए हल नहीं होगा.

जैसा मैंने कहा, एक दूसरे पर निर्भर होना इंसानों का मूल सिद्धांत है. इसलिए कहा जाता है, दूसरों के साथ वैसा ही बर्ताव करो, जैसा तुम चाहते हो कि तुम्हारे साथ हो.

और इस सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए सोचिए, अगर शरीर आत्मा का आवरण है, तो आत्मा शरीर के लिए क्या है?

शरीर का भी आवरण होता है. वो आवरण है आत्मा. जब शरीर और आत्मा में दूरी आ जाए, तो दोनों खराब हो जाते हैं. गहराई सतह की सी हो जाती है. और सतह मात्र बाहरी दिखावा हो जाती है.

ये दूरी हमें ग़लतफ़हमी में डालती है. और हम ढंकने को छिपाना समझने लगते हैं. जब शरीर आत्मा से दूर हो जाता है, उसपर नंगेपन का बोझ आ जाता है.

सतह, आत्मा से अलग, एक अजीबोगरीब चीज होती है. हम जी-जान लगाकर मेहनत करते हैं, पैसे खर्च करते हैं, केवल इस अटपटेपन से लड़ने के लिए. और हम सोचते रहते हैं कि ऐसा कर हम दूसरों को इम्प्रेस कर रहे हैं. सोचिए कपड़ों से किसी को इम्प्रेस करना! ये बेइज्जती है.

एक आध्यात्मिक इंसान का नंगा शरीर, जिसकी सतह और आत्मा एक दूसरे के साथ होती है, हमें याद दिलाता है कि हमारा शरीर और आत्मा एक दूसरे से कितने दूर हो चुके हैं. आमतौर पर हम इसे छिपाते हैं. लेकिन बेहतर ये होगा कि हम सका सामना करें.

(नग्नता एक कानूनी मसला भी है. विधायकों को ये बात समझनी चाहिए. मुनि को विधानसभा में बुलाना एक जीनियस काम है.)

आत्मा शरीर का नूर से भरा हुआ पहनावा है. जैसे शरीर आत्मा का अपारदर्शी लिबास है.

शरीर आत्मा का लिबास है, कफ़न नहीं. जैसे थॉमस हार्डी ने कहा है, औरत का लिबास उसकी खाल है. दोनों में एक नजदीकी है.

सेक्स नंगेपन से कहीं ऊपर होता है. कोई व्यक्ति सेक्स के समय नंगा नहीं होता. लेकिन शारीरिक इच्छाएं इंसान को मात्र एक ‘दो टांगों वाली नंगई’ के रूप में देखती हैं. शारीरक इच्छा और सेक्स की पवित्रता को कोई अलग करता है, तो वो है आत्मा.

नंगेपन को दोष देकर अपने नैतिक खोखलेपन को मत दीखाइए. नग्नता को सेलिब्रेट कीजिए. अपने शरीरों को आत्मा के कपड़े पहनाइए. जिंदगी की इज्जत करते हुए आत्मा के लिबास को अपना फैशन स्टेटमेंट बना लीजिए.

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