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केमिकल अटैक झेल रहे जिन बच्चों की तस्वीरें देखी नहीं जातीं, उनका दोषी सीरिया है या कोई और?

अमेरिका ने कई बार दुनिया से झूठ बोला है. बड़े मानवीय तर्क देकर दूसरे देशों पर हमला किया है. वहां सरकारें बनाई और गिराई हैं. तो क्या रूस के लगाए गए आरोप सही हो सकते हैं?

चेतावनी: इस आर्टिकल में केमिकल अटैक झेल रहे कुछ बच्चों की तस्वीरें हैं, जिन्हें देखकर शायद कुछ लोग अच्छा महसूस न करें.

सीरिया की राजधानी है दमिश्क. उसका एक जिला है- डोउमा. सीरिया में विरोधी गुट के पास बचा आखिरी इलाका. ये इलाका इतना बड़ा है कि आठ गाजियाबाद जोड़ देने पर भी थोड़ी जगह बच ही जाएगी. 6 और 7 अप्रैल को यहां से खबर आई. केमिकल अटैक की. इल्जाम लगा सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद पर. इसके बाद अमेरिका गर्म हो गया. अमेरिका कह रहा है कि वो असद सरकार को मजा चखाएगा. सीरिया पर हमला करने की बातें हो रही हैं. उधर रूस ने केमिकल अटैक के आरोपों को फालतू बताया है. कहा है कि ये इल्जाम झूठे हैं. कोई केमिकल अटैक नहीं हुआ है. रूस ने ये भी कहा कि अगर अमेरिका सीरिया पर हमला करता है, तो उसे भुगतना होगा.

अप्रैल 2017 में भी ऐसा ही हुआ था. ट्रंप जनवरी में ही वाइट हाउस आए थे. उन्होंने सीरिया पर मिसाइल अटैक किया. कहा गया कि केमिकल अटैक में मारे गए बच्चों की तस्वीर देखकर उनको इतना गुस्सा आया कि उन्होंने मिसाइल दागने का फैसला ले लिया.
अप्रैल 2017 में भी ऐसा ही हुआ था. ट्रंप जनवरी में ही वाइट हाउस आए थे. उन्होंने सीरिया पर मिसाइल अटैक किया. कहा गया कि केमिकल अटैक में मारे गए बच्चों की तस्वीर देखकर उनको इतना गुस्सा आया कि उन्होंने मिसाइल दागने का फैसला ले लिया.

ठीक एक साल पहले भी ऐसा ही हुआ था
अप्रैल 2017 में भी ऐसा ही हुआ था. सीरिया के खान शेखुन से केमिकल अटैक की खबरें आई थीं. इसके जवाब में ट्रंप ने सीरिया पर मिसाइलें दाग दीं. तब ये माना गया कि अमेरिका ने असद सरकार को चेतावनी दी है. ताकि आगे से कभी रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल न हो. रूस असद का साथी है. सीरिया में असद सरकार की तरफ से लड़ रहा है. इसीलिए उस समय भी अमेरिका और रूस के बीच युद्ध शुरू होने की नौबत आ गई थी. दोनों ने हॉटलाइन कनेक्शन काट दिया था.

सीरिया में दोनों पक्षों के हाथों पर खून है. दोनों अपने-अपने फायदे और मुनाफे के लिए लड़ रहे हैं. फायदे के ही हिसाब से टीम बंटी है. वहां जो हो रहा है, वो गंभीर युद्ध अपराध है. लेकिन सीरिया अकेला नहीं. जहां ये सब हो रहा है.
सीरिया में जो हो रहा है, वो अक्षम्य युद्ध अपराध है. मास्क लगाकर सांस लेने के लिए संघर्ष कर रहे, आंख मलकर बिलखते छोटे बच्चों की तस्वीरें आई हैं. मगर क्या सच में इसके पीछे असद का ही हाथ है? अगर हां, तो क्यों? इसका उन्हें कोई फायदा तो होगा नहीं. बल्कि बहुत नुकसान होगा. तो क्या उन्होंने अपने नुकसान के लिए ये किया है? या बात कुछ और है.

केमिकल अटैक से असद को रत्तीभर भी फायदा नहीं होगा
तमाम आरोपों और उनके जवाबों के बीच ये एक सवाल जरूरी है. केमिकल अटैक करके असद को मिलेगा क्या? रूस और ईरान की मदद से असद ने लगभग पूरा सीरिया वापस जीत लिया है. सीरिया में एक ही साथ अलग-अलग मोर्चों पर लड़ाई चल रही थी. मसलन ISIS को हराने की जंग. ईरान और इजरायल की लुकाछिपी. इन सबके बीच सबसे अहम थी असद सरकार बनाम विरोधी गुट की लड़ाई. अब ISIS को हराया जा चुका है. विरोधी गुट के पास सिवा डोउमा के और कुछ नहीं बचा. बहुत जल्द डोउमा भी जीत लिया जाएगा.

असद सरकार लगातार विरोधी गुट के इलाकों पर बमबारी कर रही है. रोजाना खूब सारे लोग इसमें मरते हैं. इसके अलावा ‘नाकेबंदी करो, भूखा रखो’ की रणनीति है ही. असद को जो हासिल करना है, वो हासिल कर ले रहे हैं. झोल यहीं पर है. जब इतनी आसानी से जीत मिल रही है, तो फिर असद रासायनिक हमला क्यों करेगा? जबकि वो जानता है कि ऐसा करने पर अमेरिका को उसके ऊपर हमला करने का मौका मिल जाएगा! असद सरकार पिछले छह सालों से जंग लड़ रही है. अब जब ये जंग कुछ दिनों में खत्म होने वाली है, तो फिर वो इसमें अमेरिका को घुसने का न्योता क्यों देगी? क्यों इस लड़ाई को और बढ़ाएगी? इन्हीं सवालों की वजह से केमिकल अटैक के आरोपों पर शक होता है.

2003 में अमेरिका और ब्रिटेन ने इराक के तानाशाह सद्दाम हुसैन पर आरोप लगाया. कि वो विनाशक हथियार बना रहे हैं. इसी नाम पर दोनों देशों ने इराक पर हमला कर दिया. बाद में मालूम चला कि इराक के पास कोई विनाशक हथियार नहीं था. इराक तब से अस्थिर है. अमेरिका और ब्रिटेन को झूठ बोलने की कोई सजा नहीं हुई. जॉर्ज बुश और टोनी ब्लेयर, दोनों पर कोई जिम्मेदारी तय नहीं हुई.
2003 में अमेरिका और ब्रिटेन ने इराक के तानाशाह सद्दाम हुसैन पर आरोप लगाया. कि वो विनाशक हथियार बना रहे हैं. इसी नाम पर दोनों देशों ने इराक पर हमला कर दिया. बाद में मालूम चला कि इराक के पास कोई विनाशक हथियार नहीं था. इराक तब से अस्थिर है. अमेरिका और ब्रिटेन को झूठ बोलने की कोई सजा नहीं हुई. जॉर्ज बुश और टोनी ब्लेयर, दोनों पर वॉर क्राइम नहीं चले.

अमेरिका पर शक करने के लिए पूरा इतिहास है
अपना फायदा. बरसों से ये दो शब्द अमेरिका की विदेश नीति में रीढ़ की हड्डी का काम करते आ रहे हैं. ऐसा नहीं कि बाकी देश अपना नफा-नुकसान नहीं देखते. सब देखते हैं. मगर अमेरिका अपनी बेशुमार ताकत और असर की वजह से अपने इरादे पूरे भी कर लेता है. ऐसे कई मौके हैं, जब वॉशिंगटन ने बस अपने फायदे के लिए दूसरे देश के अंदरूनी मामले में टांग अड़ाई. सरकारें गिराईं. सरकारें बनवाईं. खुद लोकतंत्र है, लेकिन चुनी हुई सरकारों को गिराया. तानाशाहों को गद्दी पर बिठाया. झूठे आरोप लगाकर देशों पर हमला किया. अफगानिस्तान में सोवियत संघ से लड़ने के लिए अमेरिका ने तालिबान को बनाया. उसे मजबूत किया. फिर 9/11 के बाद उसी तालिबान से लड़ने के लिए अफगानिस्तान पर हमला किया. वो लड़ाई आज तक खत्म नहीं हुई है. क्यूबा में फिदेल कास्त्रो को हटाने के लिए अमेरिका ने क्या नहीं किया. हजार तरीकों से उसे मारने की कोशिश की. यहां तक कि एक बार CIA ने प्लान बनाया. कि खुद ही अमेरिका में कई जगहों पर आतंकी हमले करवाते हैं और इसका इल्जाम क्यूबा पर लगा देंगे. फिर लोग नाराज होंगे और क्यूबा पर हमला करने का बहाना मिल जाएगा.

इराक-ईरान युद्ध के दौरान अमेरिका ने पहले सद्दाम हुसैन की मदद की. फिर 2003 में उसी इराक पर हमला करके सद्दाम को पकड़ा. कहा कि इराक विनाशक हथियार बना रहा है. हमला हुआ, इराक बर्बाद हुआ, सद्दाम को युद्ध अपराधों की सजा के तौर पर फांसी मिली. सब हुआ, लेकिन वो विनाशक हथियार कहीं नहीं मिले. ये कुछ घटनाएं आप जानते हैं. हम आपको ऐसी कुछ मिसालें गिनवा रहे हैं, जिनके बारे में कम बातें होती हैं. इनमें से ज्यादातर का संबंध लोकतंत्र की हत्या से है. एक मामला तो बिल्कुल सीरिया की फोटो कॉपी है.

वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला कर दिया. इसी अमेरिका ने कोल्ड वॉर के समय सोवियत के खिलाफ लड़ने के लिए मुजाहिदीनों को खड़ा किया. उन्हें ट्रेनिंग दी, हथियार दिए.
वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला कर दिया. इसी अमेरिका ने कोल्ड वॉर के समय सोवियत के खिलाफ लड़ने के लिए मुजाहिदीनों को खड़ा किया. उन्हें ट्रेनिंग दी, हथियार दिए.

1. मार्च 1949, सीरिया में तख्तापलट: सीरिया अभी जैसा है, वैसा हमेशा से नहीं था. पूरे अरब मुल्कों में सीरिया पहला ऐसा देश था, जिसने यूरोप (फ्रांस) की गुलामी से खुद को आजाद किया. शुक्री अल-कुवतली राष्ट्रपति बने. ये सीरिया की लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई पहली सरकार थी. 30 मार्च, 1949 को सीरिया के सेना प्रमुख हुस्नी अल-ज़ाइम ने बगावत की और खुद गद्दी पर बैठ गए. इस तख्तापलट की स्क्रिप्ट CIA ने लिखी थी. 1947 में बना था CIA. ये तख्तापलट उसके सबसे शुरुआती कोवर्ट ऑपरेशन्स में से था. उस समय सीरिया की राजधानी दमिश्क में CIA के प्रमुख थे माइल्स कोपलैंड. कोपलैंड ने बाद में कई किताबें लिखीं. कोपलैंड की किताबों में आपको अमेरिका के किए-धरे का पूरा ब्योरा मिलेगा. एक और बात बता दें. ये ही अमेरिका बशर अल-असद को तानाशाह कहकर उसका विरोध करता है. ये ही अमेरिका वहां लोकतंत्र न होने का रोना रोता है.

2. 1954, ग्वाटेमाला तख्तापलट: इसके पीछे भी अमेरिका था. CIA ने एक खुफिया ऑपरेशन किया. तब ग्वाटेमाला के राष्ट्रपति थे जैकब अरबेन्ज. जनता के हाथों चुनी हुई सरकार थी. CIA ने तख्तापलट करके जैकब को हटवाया. उनकी जगह कार्लोस कैस्टिलो अर्मास को गद्दी पर बिठाया. कार्लोस कौन थे? सैनिक तानाशाह. जैकब को देश निकाला दे दिया गया. 19 अक्टूबर, 2011 को ग्वाटेमाला के तत्तकालीन राष्ट्रपति अलवारो कोलोम ने जैकब अरबेन्ज के बेटे जुआन जैकब से माफी मांगी. कहा कि जैकब को हटाना बहुत बड़ा अपराध था. कोलोम ने पूरे ग्वाटेमाला की तरफ से जुआन से माफी मांगी थी. उन्होंने कहा कि उस दिन जैकब को सत्ता से हटाकर ग्वाटेमाला ने खुद अपनी बर्बादी लिख ली. उसके असर से आज तक मुल्क आजाद नहीं हो पाया. ग्वाटेमाला में दखलंदाजी करने, उसे अपने हिसाब से इस्तेमाल करने का तो अमेरिका ने रेकॉर्ड बनाया हुआ है.

CIA अमेरिका की खुफिया एजेंसी है. जैसे हमारे यहां रॉ बाहर के देशों में होने वाली चीजें देखती-संभालती है, वैसा ही CIA अमेरिका के लिए करता है. वो तो अच्छा हो कि अमेरिका में एक तय समय के बाद आकर सीक्रेट फाइल्स डिक्लासिफाई हो जाती हैं. अगर ऐसा न होता, तो शायद दुनिया को पता ही नहीं चलता कि अपने फायदे के लिए अमेरिका दूसरे देशों के अंदर क्या-क्या करता और करवाता है.
CIA अमेरिका की खुफिया एजेंसी है. जैसे हमारे यहां रॉ बाहर के देशों में होने वाली चीजें देखती-संभालती है, वैसा ही CIA अमेरिका के लिए करता है. वो तो अच्छा हो कि अमेरिका में एक तय समय के बाद आकर सीक्रेट फाइल्स डीक्लासिफाई हो जाती हैं. अगर ऐसा न होता, तो शायद दुनिया को पता ही नहीं चलता कि अपने फायदे के लिए अमेरिका दूसरे देशों के अंदर क्या-क्या करता और करवाता है.

3. कॉन्गो, पैट्रिस लुमुंबा: जैसे हिंदुस्तान ब्रिटेन का गुलाम था. वैसे ही कॉन्गो बेल्जियम की कॉलोनी था. उसने आजादी के लिए लड़ाई लड़ी. फिर बना रिपब्लिक ऑफ कॉन्गो. इसके पहले प्रधानमंत्री थे पैट्रिस लुमंबा. 1960 में कॉन्गो के अंदर संकट पैदा हुआ. बेल्जियम का सपोर्ट पाकर कॉन्गो के एक प्रांत कटांगा ने खुद की आजादी का ऐलान कर दिया. लुमुंबा ने अमेरिका से मदद मांगी. UN से मदद मांगी. दोनों ने इनकार कर दिया. फिर लुमुंबा ने सोवियत संघ से मदद मांगी. लुमुंबा का मकसद बस अपने देश को गुलामी से आजाद करना था. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. सोवियत के आने से कॉन्गो कोल्ड वॉर का अड्डा बन गया. कटांगा के विद्रोहियों ने लुमुंबा की हत्या कर दी. कहते हैं कि इसमें अमेरिका ने उनकी मदद की. 2001 में बेल्जियम कमीशन की एक रिपोर्ट आई. इसके मुताबिक, अमेरिका और बेल्जियम ने लुमुंबा को जहर देकर मारने का प्लान बनाया था. कहते हैं कि विद्रोहियों के हाथों लुमुंबा को पकड़वाने से लेकर उनकी हत्या तक, CIA लगातार उन हत्यारों के संपर्क में था. हम फिर ये याद दिलाते हैं. अमेरिका खुद को लोकतंत्र और मानवाधिकार का मसीहा कहता है.

बाईं तरफ की तस्वीर में जो बच्चा है, वो सीरिया का है. दाहिनी तरफ वाला बच्चा यमन का है. कोई इंसानियत की बात करे, तो कैसे कहेगा कि उसे एक बच्चे के लिए दर्द होता है और दूसरे के लिए नहीं.
बाईं तरफ की तस्वीर में जो बच्चा है, वो सीरिया का है. दाहिनी तरफ वाला बच्चा यमन का है. कोई इंसानियत की बात करे, तो कैसे कहेगा कि उसे एक बच्चे के लिए दर्द होता है और दूसरे के लिए नहीं. सीरिया में मरने वाले बेगुनाहों और यमन में मरने वाले, बर्बाद होने वाले बेगुनाहों की तकलीफ में कोई फर्क है? फिर ऐसा क्यों कि अमेरिका और उसके दोस्त सीरिया पर तकलीफ जताते हैं, लेकिन यमन का जिक्र तक नहीं करते? इसलिए कि यमन में वो खुद मारने वालों का साथ दे रहे हैं. खुद के किए पर आंखें मूंदने में सहूलियत होती है.

4. यमन गृह युद्ध: अमेरिका और ब्रिटेन सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद पर बेगुनाहों के कत्ल का इल्जाम लगाते हैं. यकीनन, बेगुनाह मर रहे हैं. मगर, सीरिया से करीब 2,300 किलोमीटर दूर यमन में भी तो यही हो रहा है. यमन और सीरिया की स्थितियां कमोबेश एक सी हैं. सीरिया में असद सरकार विद्रोहियों से लड़ रही है. असद शिया है, विद्रोही सुन्नी हैं. ऐसे ही यमन में सरकार विद्रोहियों से लड़ रही है. सरकार सुन्नियों की है, विद्रोही हूती शिया हैं. सीरिया में असद की फौज रिहायशी इलाकों में आम लोगों पर बम गिराती है. उधर यमन में यही काम सऊदी कर रहा है. इसमें उसके साथ है अमेरिका. सारे हथियार अमेरिका और ब्रिटेन बेच रहे हैं. वहां भी तो बेगुनाह मर रहे हैं. लेकिन यमन में हो रही अमानवीयता पर नाटो देश चुप रहते हैं. यमन में भी बच्चे मर रहे हैं. मौत से भी ज्यादा बुरी हालत, यानी भुखमरी में हैं. पेंसिल से हाथ-पांव, हांडी सा निकला पेट. तस्वीरें भरी पड़ी हैं इंटरनेट पर. लेकिन अमेरिका और उसके दोस्तों को उन बच्चों पर तो तरस नहीं आता. कभी नहीं कहते कि बेगुनाहों की खातिर ही सही, बमबारी बंद करो.

अमेरिका और रूस की लड़ाई नहीं हो सकती. भड़काने वाली बातें हो सकती हैं, बयानबाजी हो सकती है, धमकियां दी जा सकती हैं. ये सब होगा, लेकिन आमने-समाने की जंग नहीं लड़ी जाएगी. ऐसा इसलिए कि इन दो सबसे बड़े परमाणु हथियार वाले देशों की लड़ाई से दुनिया खत्म हो जाएगी. कोई भी मसला इतना बड़ा नहीं कि पूरी दुनिया के खत्म होने का जोखिम उठाया जा सके.
अमेरिका और रूस की लड़ाई नहीं हो सकती. भड़काने वाली बातें हो सकती हैं, बयानबाजी हो सकती है, धमकियां दी जा सकती हैं. ये सब होगा, लेकिन आमने-सामने की जंग नहीं लड़ी जाएगी. कोई भी मसला इतना बड़ा नहीं कि पूरी दुनिया के खत्म होने का जोखिम उठाया जा सके.

अमेरिका है, लेकिन फिर रूस भी तो है
और भी घटनाएं हैं. इतनी कि पोथा लिखा जा सकता है. अमेरिका इतना ताकतवर है कि उससे जुड़े मामलों में UN का होना, न होना, बराबर है. UN बस है. एक किस्म के अखाड़े के तौर पर बना हुआ है. सीरिया में जो कथित केमिकल अटैक हुआ, उसकी जांच कराए जाने के वादे पर भी इसीलिए एतबार नहीं होता. हां, अगर कोई स्वतंत्र संस्था जांच करे और कुछ ठोस निकलकर आए, तो कार्रवाई की जानी चाहिए. मगर अंतरराष्ट्रीय मामलों में ऐसी स्वतंत्र और  निष्पक्ष जांच पहले कब हुई है कि अब होने का भरोसा जगे? यहां तो बस जिसका जोर है, उसकी ही चलती है. और जोर किसके पास है? अमेरिका के पास? बेशक. मगर अकेले अमेरिका के पास नहीं है. रूस के पास भी खूब जोर है. इतना कि उसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता. न ही उससे भिड़ा जा सकता है. और रूस असद के साथ है. मतलब कुल मिलाकर ये होगा कि घुड़कियां दी जाएंगी. शायद थोड़ी-बहुत कार्रवाई भी हो जाए. मगर बड़ा कुछ नहीं होगा. अंग्रेजी में जिसको ‘स्टेलमेट’ कहते हैं, वैसा ही हाल है फिलहाल.


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