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क्या माओवादियों से सीआरपीएफ ही जूझेगी, सरकार क्यों नहीं ये चीजें बदल रही है

छत्तीसगढ़ के सुकमा में बड़ा माओवादी हमला हुआ है. दिन-दहाड़े हुए इस हमले में इसमें अब तक 26 जवानों के शहीद होने की खबर है. जबरदस्त फायरिंग के बीच कई जवानों की जान मौके पर ही चली गई और कम से कम 8 जवान लापता हैं. लापता जवानों में बटालियन के कंपनी कमांडर भी शामिल हैं. मौके पर सीआरपीएफ की ‘CoBRA’ बटालियन  भेजी गई है और घायलों को हेलिकॉप्टर से रायपुर ले जाया गया है.

घायल जवानों को हैलिकॉप्टर से रायपुल ले जाया गया
घायल जवानों को हेलिकॉप्टर से रायपुर ले जाया गया 

माओवादी उग्रवाद देश की वो अकेली समस्या बन गया है जिसमें सरकार लगातार बड़ा नुकसान उठा रही है. जम्मू कश्मीर में उग्रवादियों को पाकिस्तान का समर्थन है, लेकिन वो भी सेना को इस दर्जे का नुकसान बिरले ही पहुंचा पाते हैं. सेना के दो दर्जन जवानों के एक साथ किसी हमले में मारे जाने की खबर ढूंढ़ने के लिए हमें बहुत पीछे जाना पड़ेगा. इस लिहाज़ से माओवादी उग्रवाद सरकार के सामने खड़ी सबसे बड़ी चुनौती की तरह नज़र आता है. लगातार हो रहे हमलों के बाद ये लाज़मी है कि ठहर कर सोचा जाए कि सरकार की माओवादी उग्रवाद से निपटने की नीति ही कमजोर तो नहीं है. 

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इस हमले में घायल जवान

ताज़ा हमले में क्या हुआ?

23 अप्रैल को माओवादी हमले के शिकार हुए सीआरपीएफ की 74 बटालियन के जवान एक ‘रोड ओपनिंग पार्टी’ का हिस्सा थे. सुकमा में चिंतागुफा के काला पत्थर इलाके में एक सड़क बन रही है. ये जवान इस काम के दौरान सिक्योरिटी कवर देते थे. 24 अप्रैल की दोपहर को ड्यूटी के लिए 150 के करीब जवान कैंप से चले थे. दोपहर 12:25 के लगभग जवान खाना खाने के लिए रुके थे. तभी माओवादियों ने इन पर हमला कर दिया. लगभग 1 घंटे तक दोनों ओर से फायरिंग हुई. माओवादी लड़ाके संख्या में सीपारपीएफ की टीम से लगभग दोगुने थे और अलग-अलग टीम बनाकर आए थे. इसलिए सीआरपीएफ के जवान घिर गए और उन्हें ज़्यादा नुकसान उठाना पड़ा. हमले के बाद नक्सलियों ने जवानों के हथियार भी लूट लिए.

समाचार एजेंसी एएनआई से बात करते हुए एक जवान ने कहा कि नक्सलियों को उनकी पोजीशन के बारे में आस-पास के गांव वालों ने बताया. कुछ गांव वाले पहले उनकी टोह लेकर गए जिसके बाद माओवादी लड़ाके आए. मुठभेड़ में माओवादियों को भी नुकसान पहुंचा है लेकिन सीआरपीएफ ने अपनी ओर से कोई आंकड़ा जारी नहीं किया है.

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इस हमले में घायल जवान

ये 7 सालों में सबसे बड़ा हमला है

इस हमले ने 2010 में बस्तर के दांतेवाड़ा के चिंतलनार में हुए माओवादी हमले की याद दिला दी. इसमें सीआरपीएफ के 76 जवान शहीद हो गए थे. 24 अप्रैल 2017  का हमला इस हमले के बाद से सबसे बड़ा हमला है. इसलिए दिल्ली से लेकर रायपुर तक सरकारें गंभीर हैं. छत्तीगढ़ के सीएम रमन सिंह जो दिल्ली में थे, तुरंत रायपुर लौट गए. गृह मंत्रालय में एमओएस हंसराज अहीर को भी छत्तीसगढ़ भेजा गया. गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने बयान जारी कर कहा कि सरकार इस हमले को चुनौती की तरह ले रही है और जवानों की शहादत बेकार नहीं जाने दी जाएगी. प्रधानमंत्री ने भी घटना को लेकर ट्वीट किया, खेद जताया.

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इस हमले में घायल जवान

क्या सीआरपीएफ कहीं चूक रही है?

देश के 60 के लगभग ज़िलों में माओवादी उग्रवाद का असर है. इनमें से ज़्यादातर में सीआरपीएफ तैनात की गई है. इसीलिए वही माओवादियों के निशाने पर सबसे ज़्यादा रहती है. पिछले दिनों हुए हमलों पर नज़र डालने पर कुछ बातें मोटा-माटी यूं समझ आती हैंः

# ज़्यादातर हमले रोड ओपनिंग पार्टी पर हुए. रोड ओपनिंग पार्टी का मकसद ये तय करना होता है कि आवाजाही का रूट सुरक्षित हो. लेकिन यही पार्टी माओवादियों का शिकार बन जाती है.

# उग्रवादियों के असर के कम होने की लाख बातें की जाएं, लेकिन उनका लोकल लोगों पर काफी प्रभाव है. आम लोगों में से ही कुछ लोग नक्सलियों को सीआरपीएफ के मूवमेंट के बारे में जानकारी देते हैं. ये जानकारी इतनी सटीक होती है कि कई बार माओवादी सीआरपीएफ को भनक लगे बिना ही उन पर हमला कर देते हैं. ये ‘एलिमेंट ऑफ सरप्राइज़’ उनके हक में काम करता है.

# लगभग हर हमले में ये सामने आया कि उग्रवादी सीआरपीएफ की टुकड़ी से ज़्यादा संख्या में आए. कई बार वे वापस जाते हुए जवानों के हथियार तक लूट ले गए.

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इस हमले में घायल जवान

ये बातें इस तरफ इशारा करती हैं कि उग्रवादी सीआरपीएफ के काम करने के तरीके से बहुत अच्छी तरह वाकिफ हैं. इसलिए उनके हमले इतने कामयाब होते हैं. इसलिए ये सवाल उठता है कि सीआरपीएफ से चूक कहां हो रही है? ये सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यदि सीआरपीएफ से गलती नहीं हुई है तो सरकार की माओवादी उग्रवाद से निपटने की नीति कठघरे में आ जाती है. उसी ने सीआरपीएफ को वहां भेजा है.

सीआरपीएफः ट्रेनिंग पर सवाल

2010 में एक साथ 76 जवानों के मारे जाने के बाद सीआरपीएफ की ट्रेनिंग को लेकर काफी सवाल उठाए गए. बीएसएफ के रिटायर्ड डीजी ई एन राममोहन इस हादसे की इंक्वायरी कमिटी के सदस्य थे. उन्होंने कहा कि सीआरपीएफ की ट्रेनिंग लॉ एंड ऑर्डर ड्यूटी के लिए होती है, लड़ने के लिए नहीं. उन्हें दी जाने वाली काउंटर इन्सर्जेंसी ट्रेनिंग  भी उनका माइंडसेट नहीं बदल पाती. इसलिए माओवादियों के चलाए गुरिल्ला युद्ध में उन्हें इतना नुकसान उठाना पड़ता है. उनके अलावा भी कई लोगों ने कहा कि सीआरपीएफ को जो ट्रेनिंग मिलती है, और उनसे जो काम लिया जाता है, उसमें काफी फर्क है, खासकर माओवादी हिंसा से ग्रस्त इलाकों में. लेकिन सीआरपीएफ कहती रही है कि वो जवानों को मुकम्मल ट्रेनिंग देती है.

प्रतीक फोटो
प्रतीक फोटो

सरकारः एप्रोच पर सवाल

सरकार की माओवादी उग्रवाद को लेकर एप्रोच भी समस्या से मुक्त नहीं है. इसे एक सुरक्षा मामला समझा जाता है और नक्सलियों से सैन्य ताकत के बल पर जीतने की बात होती है. लेकिन इस बीच उस ‘ट्रस्ट डेफिसिट’ की बात नहीं हो पाती जिसके कारण बस्तर जैसे इलाकों के लोग सरकार से कट कर माओवादियों की तरफ मुड़ते हैं. लोगों का सरकार पर यकीन नहीं है और उन्हें लगता है कि सरकार कोयले और आयरन ओर के लिए उन्हें बेघर कर देगी. सारे तामझाम के बावजूद सरकार अपना संदेश लोगों तक पहुंचा नहीं पा रही. ऐसे में उनके इलाके को ‘सुरक्षा’ देने आए सीआरपीएफ के जवान उन्हें बाहरी लगते हैं और सरकार को चुनौती देते माओवादी उन्हें अपने लगते हैं. ये माओवादियों के प्रोपेगैंडा के साथ-साथ सरकारी प्रचार तंत्र के विफल होने का नतीजा भी है.

आंध्र प्रदेश में ऑपरेशन ‘ग्रीन हंट’ ने वहां के माओवादी आंदोलन को कुचलने में काफी सफल रहा है. वहां की ‘ग्रे हाउंड फोर्स’ के भगाए नक्सली ही छत्तीसगढ़ में जाकर छुपे हैं. लेकिन ग्रीन हंट के बाद भी यही महसूस किया गया कि यदि सरकार लोगों का भरोसा नहीं जीत पाती है तो माओवाद फिर सर उठा सकता है.

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एक वक्त था जब लगता था कि नेपाल से शुरू होकर आंध्र प्रदेश तक जाने वाला रेड कॉरिडोर देश को बांट देगा. झारखंड, ओडीशा, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश (अविभाजित), मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार और छत्तीसगढ़ के कुल 100 ज़िले माओवादी उग्रवाद की चपेट में थे. प्रधानमंत्री रहते हुए मनमोहन सिंह ने इसे देश की सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौती बताया था, जम्मू कश्मीर और पूर्वोत्तर के अलगाववाद से भी ऊपर. अब स्थिति कुछ सुधरी ज़रूर है लेकिन माओवादी अब भी भारत के लोकतंत्र को हर मोर्चे पर ललकार रहे हैं. वो सड़कें बम से उड़ा कर ‘विकास’ को रोके हुए हैं. राजनैतिक पार्टियों पर दरभा घाटी जैसे हमले करके मुख्यधारा का पॉलिटिकल नैरेटिव पनपने नहीं दे रहे हैं और सरकार के सैन्य बलों को लगातार नुकसान पहुंचा रहे हैं. सरकार से जल्द और निर्णायक पहल की उम्मीद की जाती है.

** इस लेख में ‘नक्सलवाद’ की जगह ‘माओवादी उग्रवाद’ शब्द का इस्तेमाल हुआ है. क्योंकि न्याय की मांग के साथ शुरू हुआ नक्सल आंदोलन कब का धुआं हो चुका है. उसकी जगह ले ली है भटके हुए माओवादी उग्रवाद ने. एक चुनी हुई सरकार को बंदूक के दम पर चुनौती देने वालों को नक्सली कहकर महिमामंडित नहीं किया जाना चाहिए. ये माओवादी या वामपंथी उग्रवादी हैं. इन्हें यही कहा जाना चाहिए.


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