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क्या एक मर चुके रोबॉट के लिए ईरान पर हमला कर देगा अमेरिका?

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इस खबर की हेडिंग हमारी ऑरिजनल नहीं है. मैं ‘द डेली बीस्ट’ की एक स्टोरी पढ़ रही थी. उस आर्टिकल की हेडिंग थी- विल अमेरिका अटैक ईरान ओवर वन डेड रोबॉट? इस हैडिंग में कुछ ऐसा था कि मुझे ये हमेशा याद रहेगी.  


जंगी विमान आसमान में था. जहाज बिल्कुल तैयार थे. मिसाइल दागने की तैयारी भी बिल्कुल पूरी हो चुकी थी. मगर फिर तभी ऊपर से आदेश आया कि हमला रोक दिया गया है.

न्यू यॉर्क टाइम्स के मुताबिक, 20 जून को वाइट हाउस ईरान पर हमला करते-करते रह गया. सारी चीजें फाइनल हो चुकी थीं. ये ट्रंप प्रशासन का किसी विदेशी ठिकाने पर तीसरा हमला होने वाला था. पहला- 2017 में सीरिया. दूसरा- 2018 में फिर से सीरिया. ईरान और अमेरिका के बीच तब से तनाव है, जब से ट्रंप राष्ट्रपति बने हैं. मतलब पिछले ढाई साल से. अभी खबर आई कि अमेरिका करीब सवा लाख सैनिक मिडिल-ईस्ट भेजेगा. ताकि अगर ज़रूरत पड़े, तो ईरान से जंग में इस्तेमाल किए जा सकें.

भारत से उत्तर-पश्चिम की तरफ बसा है ईरान. PoK के रास्ते ये हमारे और करीब है (गूगल मैप्स)
भारत से उत्तर-पश्चिम की तरफ बसा है ईरान. PoK के रास्ते ये हमारे और करीब है (गूगल मैप्स)

कहां पर है ईरान?
हमारा पड़ोसी है. इसका पूरा भूगोल समझ लीजिए. पाकिस्तान हमसे सटा हुआ है. और पाकिस्तान के पार है ईरान. ये अफगानिस्तान से भी लगता है. ईरान एक तरफ है और दूसरी तरफ हैं UAE, क़तर, बहरीन, कुवैत. इन सबके बीच है गल्फ ऑफ ओमान और फारस की खाड़ी. ईरान का एक हिस्सा इराक से, एक हिस्सा अरमेनिया से और एक भाग तुर्कमेनिस्तान से भी मिलता है.

लाल घेरे में दिख रही है होरमुज़ जलसंधि. दुनिया के तेल कारोबार का सबसे व्यस्त, सबसे अहम रूट है ये. ईरान के साथ तनाव से इस रूट को भी खतरा है. इसका असर किसी एक देश तक तो नहीं रहेगा (गूगल मैप्स)
लाल घेरे में दिख रही है होरमुज़ जलसंधि. दुनिया के तेल कारोबार का सबसे व्यस्त, सबसे अहम रूट है ये. ईरान के साथ तनाव से इस रूट को खतरा है . यहां तनाव होने का असर पूरी दुनिया पर होगा (गूगल मैप्स)

ईरान की लोकेशन में और क्या खास है?
होरमुज़ जलसंधि समंदर के रास्ते होने वाले तेल के कारोबार का सबसे अहम रूट है. ये अरब की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच में है. कुवैत, सऊदी, बहरीन, कतर और UAE की तरफ से आने वाले पानी के जहाज इसी से गुजरकर ओमान की खाड़ी और फिर आगे अरब सागर के रास्ते जाते हैं. इस पॉइंट के ठीक ऊपर ईरान का होरमुज़ द्वीप पड़ता है. और नीचे पड़ता है ओमान का सुदूर उत्तरी प्रांत कुमज़ार.

अभी क्यों बढ़ी हैं टेंशन?

इमिडिएट यानी एकदम ताज़ा-ताज़ा दो घटनाक्रम हैं-

पहला, 13 जून: दो टैंकर समुद्र की अंतरराष्ट्रीय सीमा में थे. इनमें से एक सऊदी अरब से सिंगापोर जा रहा था. दूसरा, क़तर से ताइवान जा रहा था. इन्होंने होरमुज़ जलसंधि पार ही की थी कि इनमें जोर का धमाका हुआ. दोनों में से एक टैंकर ‘फ्रंट ऐल्टेर’ की मालिक नॉर्वे की एक कंपनी ‘फ्रंटलाइन’ है. कंपनी का कहना है कि धमाके की ठीक-ठीक वजह पता नहीं. मगर ये किसी मशीनी या इंसानी गड़बड़ी से नहीं हुआ, ये तय है. दूसरा टैंकर ‘कोकुआ करेजियस’ जापान की एक फर्म- कोकुआ सांग्यो का है. उनके मुताबिक, तीन घंटे के भीतर टैंकर में दो धमाके हुए. फर्म को लगता है कि किसी उड़ती हुई चीज ने टैंकर पर हमला किया. इस हमले की किसी ने जिम्मेदारी नहीं ली है. मगर अमेरिका और बाकी कई को ईरान पर शक है. इससे पहले मई में भी चार टैंकरों पर हमला हुआ था.

दूसरा, 20 जून- 20 जून को ईरान की इस्लामिक रेवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) का बयान आया. कि उन्होंने तड़के सुबह अमेरिका का एक ‘जासूसी’ ड्रोन गिरा दिया. उनका कहना था कि ये ड्रोन उनकी सीमा में घुस आया था. इसके बाद ईरान की तरफ से कहा गया ड्रोन गिराना अमेरिका के लिए चेतावनी है. कि ईरान की सीमा रेड-लाइन है और वो इसे पार करने की कोशिश न करे. इसके बाद अमेरिकी सेना की पुष्टि आई. कि US नेवी का एक सर्विलांस एयरक्राफ्ट ईरान ने गिराया तो है. मगर अमेरिका के मुताबिक, उनका ड्रोन होमरुज़ जलसंधि के ऊपर अंतरराष्ट्रीय हवाई सीमा में था. इससे पहले इसी हफ़्ते ईरान ने एक और अमेरिकी ड्रोन गिराने की कोशिश की थी.

ट्रंप का ट्वीट
20 जून को सुबह सवा सात बजे डॉनल्ड ट्रंप का ट्वीट आया- ईरान ने बहुत बड़ी ग़लती की है. इस ट्वीट से लोगों को लगा, कुछ तो बड़ा होने वाला है. शायद हमला. आलोचकों ने कहा, ईरान के ड्रोन गिराने ने अमेरिका को हमले का बहाना दे दिया. कि उसे जो ये मौका मिला है, वैसा मौका तो वो कब से खोज रहा था. बाद में जब ट्रंप से गिराये गए अमेरिकी ड्रोन पर सवाल पूछा गया, तो उनका जवाब अलग था. कुछ यूं कि शायद किसी ने ग़लती से वो ड्रोन गिराया. जिस वक़्त उन्होंने ये बयान दिया, कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो उनके साथ थे. ट्रंप ने कहा- मुझे लगता है कि ये किसी से ग़लती से हुआ. तब साफ हुआ कि वो उनका ट्वीट धमकी नहीं थी. वो सच में कह रहे थे कि जो हुआ, शायद भूल से हुआ. मगर ट्वीट से जो मेसेज गया, तो धमकी वाला ही था. हो सकता है ईरान ने इसे सही मानकर अपनी तरफ से लड़ाई की कोई पहल कर दी होती. कुछ बुरा हो गया होता.

पुराना पंगा क्या है?
पहले ईरान-अमेरिका दोस्त थे. तब वहां राजशाही थी. अमेरिका की ही मदद से ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम शुरू हुआ. फिर 1979 में हुई ईरान की इस्लामिक क्रांति. अमेरिकी समर्थक शाह के हाथ से निकलकर सत्ता शिया कट्टरपंथियों के पास चली गई. तब से ही ईरान और अमेरिका के बीच पक्की दुश्मनी शुरू हो गई. अमेरिका का आरोप था, ईरान सीक्रेटली न्यूक्लियर हथियार बना रहा है. मिडिल-ईस्ट को डिस्टर्ब कर रहा है. दोनों के बीच इधर-उधर के चैनलों से लड़ाई चलती रही.

मगर कई ऐसे मौके भी आए, जब लगा अब सीधे भिड़ जाएंगे. जैसे- 3 जुलाई, 1988. एक अमेरिकी जंगी जहाज ने ईरान के एक सिविलियन विमान ‘एयर फ्लाइट 655’ को गिरा दिया. विमान में बैठे सभी 290 लोग मारे गए. इनमें 66 बच्चे थे. अमेरिका ने माफ़ी मांगने की बजाय इसका दोष ईरान पर ही मढ़ने की कोशिश की. कि वो वित्तीय एयरलाइन्स के लिए तय रूट के बाहर चल रहा था. ईरान ने इंटरनैशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (ICJ) में अमेरिका पर केस ठोक दिया. 1996 में ये केस खत्म हो गया. कोर्ट के बाहर दोनों पक्षों ने समझौता किया. अमेरिका ने खेद जताया और मृतकों के घरवालों को मुआवजा दिया.

न्यूक्लियर डील
फिर लंबी बातचीत के बाद 2015 में दोनों देशों के बीच एक न्यूक्लियर डील हो गई. इसमें ईरान की न्यूक्लियर क्षमता पर पाबंदियां लगाई गईं. ऐसा इंतज़ाम कि न्यूक्लियर बम बनाने के लिए ज़रूरी मटीरियल डिवेलप करने से कम से कम एक साल पीछे रहे ईरान. जब तक डील है, तब तक. बराक ओबामा के आठ साल के कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि थी ये.

ट्रंप ने डील का क्या किया?
ट्रंप इस डील के आलोचक थे. उनका कहना था कि डील में दांत नहीं हैं. कि ये पर्याप्त सख़्त नहीं है. इसमें ईरान के पास काफी न्यूक्लियर इन्फ्रास्ट्रक्चर बचा रहने दिया गया. आर्थिक प्रतिबंध हटने से ईरान के पास काफी पैसा भी आ गया. इस पैसे से वहां के कट्टरपंथी नेता आतंकवाद की फंडिंग करेंगे. अपनी हरकतों से पूरे मिडिल-ईस्ट को अस्थिर करेंगे. मई 2018 में ट्रंप ने अमेरिका को इस डील से अलग कर लिया.

तो क्या डील पूरी मर गई?
मगर ये डील अभी खत्म नहीं हुई है. फ्रांस, ब्रिटेन, चीन, रूस और जर्मनी भी डील के पार्टनर थे. उनकी ईरान से अभी भी डील चालू है. मगर ट्रंप ईरान पर लगातार आर्थिक प्रतिबंध लादते जा रहे हैं. जिससे ईरान की अर्थव्यवस्था लगातार लुढ़क रही है. ईरान ने अपने हिस्से की डील निभाने की कोशिश की. लेकिन जब उसके ऊपर लगातार सेक्शन्स थोपे जाते रहे, तो ईरान ने भी मई 2019 में कह दिया कि वो अब सब्र नहीं करेगा. उसने कहा कि वो न्यूक्लियर ईंधन का भंडार बढ़ाएगा.

ईरान के पास न्यूक्लियर हथियार का मतलब क्या है?
अगर ईरान ने परमाणु हथियार बना लिया, तो ये पूरे मिडिल-ईस्ट को हिला देगा. ईरान और सऊदी गैंग कट्टर दुश्मन है. ईरान के पास न्यूक्लियर हथियार होने से पूरे मिडिल-ईस्ट में इसे हासिल करने की होड़ बढ़ेगा. आतंकवाद, इस्लामिक कट्टरपंथ, तख्तापलट, कम्युनल टेंशन, ये बहुत ही असुरक्षित और अस्थिर हिस्सा है. कई देश हैं, तो एक-दूसरे के अस्तित्व के लिए खतरा हैं. जैसे- इज़रायल और ईरान. ईरान और सऊदी. ऐसे में अगर ईरान के पास न्यूक्लियर हथियार आया, तो अमेरिका और शायद इजरायल भी सैन्य कार्रवाई कर सकते हैं.

तो ईरान क्या चाहेगा?
ईरान की फिलहाल सबसे बड़ी परेशानी है उसके ऊपर लगे आर्थिक प्रतिबंध. अमेरिका ने इसे ‘ईरान या हम’ का सवाल बना दिया है. या तो ईरान से बिजनस कर लो या अमेरिका से रिश्ता रख लो. ईरान इसका तोड़ चाहता है. इसके लिए ज़रूरी है कि यूरोपीय देशों की तरफ से उसे राहत मिले. बाकी देश, खासतौर पर यूरोपीय और एशियाई मुल्क उसका तेल खरीदें. यही तेल ईरान की अर्थव्यवस्था का आधार है. वैसे भी अमेरिका के न्यूक्लियर डील से हटने पर यूरोप सहमत नहीं था. उन्होंने कहा भी है कि अमेरिका के प्रेशर का ये नतीजा हो सकता है कि शायद ईरान फिर से न्यूक्लियर हथियार की राह बढ़ जाए. तो ईरान की उम्मीद है यूरोप हालात बिगड़ने न दे. जंग, अस्थिरता और सैन्य टकराव टालने के लिए डील में शामिल बाकी देश उसके साथ कारोबार करने की राह निकालें.

हमको क्या फ़र्क पड़ेगा?
2018 तक भारत ईरान से आयात में नंबर दो था. भारत आने वाले तेल की तीसरी सबसे बड़ी खेप ईरान से आ रही थी. मगर फिर अमेरिका के प्रतिबंधों के कारण भारत ने ईरान से तेल खरीदना बंद कर दिया. ईरान का तेल भारत को सस्ता पड़ता है. सबसे नजदीक पड़ता है. फिर ईरान में भारत का चाबहार प्रॉजेक्ट है. सेंट्रल एशिया और उस रास्ते आगे यूरोप पहुंचने के लिए ईरान बेहद ज़रूरी है भारत के लिए. इतना ज़रूरी कि वो हमारे साथ होना ही चाहिए. भारत चीन के बॉर्डर ऐंड रोड इनिशिएटिव (BRI) की तर्ज़ पर इस रूट में अपना एक रोड नेटवर्क शुरू करना चाहता है. पाकिस्तान के साथ खराब रिश्तों के मद्देनज़र ईरान और अहम हो जाता है भारत के लिए. ईरान और अमेरिका, दोनों ही हमारी विदेश नीति और आर्थिक-सामरिक हितों के लिहाज से बेहद ज़रूरी हैं. इनके बीच जंग या जंग जैसी हालत भारत के लिए बेहद बुरी खबर है.


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