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यूपी की कैराना लोकसभा की कहानी, जिस जमीन के पहले सांसद ने पंडित नेहरू की मौज ले ली थी

1962. देश के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू तब हिंदी-चीनी भाई-भाई का राग अलाप रहे थे और चीन ने भारत पर हमला बोल दिया. 72 हजार वर्ग मील जमीन पर कब्जा कर लिया. विपक्ष ने इस मुद्दे पर बवाल काट रखा था. नेहरू संसद पहुंचे विपक्षी सांसदों को समझाने, मनाने कि सब ठीक है. मगर वहां विपक्ष का कोई नेता कुछ बोलता, उससे पहले ही एक कांग्रेसी सांसद ने नेहरू के सामने एक तगड़ा सवाल दाग दिया. पूछा –

आप ये 72 हजार वर्ग मील जमीन को कब वापस ला रहे हैं?

नेहरू का जवाब आया – नॉट ए ब्लेड ऑफ़ ए ग्रास ग्रोज़ देयर (वहां तो घास की एक पत्ती भी नहीं उगती)

इसके जवाब में उस कांग्रेसी सांसद ने अपना गंजा सर नेहरू को दिखाया और कहा- यहां भी कुछ नहीं उगता तो क्या मैं इसे कटवा दूं या फिर किसी और को दे दूं.

बेबाक किस्म के आदमी थे महावीर त्यागी.
बेबाक किस्म के आदमी थे महावीर त्यागी.

नेहरू को काटो तो खून नहीं वाली हालत हो गई. और ये हालत करने वाला सांसद वो आदमी था, जिसने 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग कांड के बाद अंग्रेज सरकार से पंगा ले लिया था. अंग्रेज सरकार के सैन्य अधिकारी वाली नौकरी छोड़कर वो स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़ा था. महात्मा गांधी के पीछे हो लिया था. जिसे असहयोग आंदोलन से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन तक सक्रिय रहने पर 11 बार अंग्रेजों ने जेल में डाला. और जो आजादी के बाद पहले ही चुनाव में सांसद और फिर मंत्री बन गया. हम बात कर रहे हैं महावीर त्यागी की.

खैर इसका मतलब ये नहीं कि महावीर त्यागी की नेहरू से कोई दुश्मनी थी. वो दोनों एकदम कर्रे वाले दोस्त भी थे. इसे इन दो वाकयों से समझिए.

1. एक बार नेहरू ने त्यागी को लंच पर बुलाया. नेहरू इस दौरान सेब छीलकर खा रहे थे. त्यागी बोले, पंडित जी असली सार तो सेब का छिलके में है.
नेहरू तुरंत बोले, इसीलिए तो सब छिलके तुम्हारे लिए इकट्ठा करता जा रहा हूं.

2. ऐसे ही एक बार त्यागी ने नेहरू से पूछा, पंडित जी, ऐसा क्या है कि जहां आप जाते हैं, तुरंत आपको महिलाएं घेर लेती हैं?
पंडितजी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, तुम क्यों जलते हो, उनको मर्द की पहचान है.

पंडित नेहरू के साथ त्यागी का का काफी हंसी मजाक चलता था.
पंडित नेहरू के साथ त्यागी का काफी हंसी-मजाक चलता था.

खैर मुद्दे पर लौटते हैं. हम ये सब इसलिए बता रहे हैं क्योंकि 31 दिसंबर, 1899 को उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में जन्मे महावीर 1951 में पहले लोकसभा चुनाव में उस क्षेत्र से चुनाव लड़े थे, जिसमें से कटकर बाद में कैराना लोकसभा निकली थी. कैराना लोकसभा का जिक्र इसलिए क्योंकि यहां 28 मई को लोकसभा का उपचुनाव होना है. वो इसलिए क्योंकि यहां के सांसद हुकुम सिंह अब इस दुनिया में नहीं हैं.

अब वापस 1951 में लौटते हैं. तब कैराना लोकसभा वजूद में नहीं आई थी. कैराना का इलाका तब देहरादून डिस्ट्रिक्ट कम बिजनौर डिस्ट्रिक्ट (नॉर्थ वेस्ट) कम सहारनपुर डिस्ट्रिक्ट (वेस्ट) नाम की सीट में आता था. और यहां पहले आम चुनाव में उतरे थे महावीर त्यागी और एकतरफा चुनाव जीते थे. वजह थी यहां के किसानों के बीच उनकी सक्रियता. 1921 में जब कांग्रेस असहयोग आंदोलन की नैया पर सवार थी तो त्यागी बिजनौर में किसानों के आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे. पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उनका बोलबाला था. उन्होंने आजादी के आंदोलन के दौरान इसी क्षेत्र में अपना खून-पसीना बहाया था और इसकी गवाही 1951 में मिले वोट देते हैं. रिजल्ट रहा –

महावीर त्यागी, कांग्रेस – 1,22,141 वोट – 63.73%

जेआर गोयल – भारतीय जनसंघ – 26,472 वोट – 13.81%

त्यागी ये चुनाव 95,669 वोटों के अंतर से जीते. और ये हो सका था सिर्फ और सिर्फ किसानों और खासकर यहां के जाटों पर उनकी पकड़ के कारण. आने वाले चुनावों में भी इसका असर दिखना था. मगर अब इस लोकसभा की जियोग्राफी और बदल चुकी थी. देहरादून डिस्ट्रिक्ट कम बिजनौर डिस्ट्रिक्ट (नॉर्थ वेस्ट) कम सहारनपुर डिस्ट्रिक्ट (वेस्ट) तीन भागों में बंट चुकी थी. माने देहरादून अलग. बिजनौर अलग और सहारनपुर अलग. अब कैराना का क्षेत्र सहारनपुर में आ गया था. और इसके साथ उसके पहले सांसद महावीर त्यागी भी उससे दूर चले गए थे. उन्होंने देहरादून को अपनी चुनावी भूमि चुना था.

अब चूंकि कैराना सहारनपुर में आ गया था तो उसी पर लौटते हैं. 1957 के आम चुनाव में सहारनपुर से हर पार्टी के दो प्रत्याशी खड़े थे. पर जीत मिली कांग्रेस के ही दोनों प्रत्याशियों को. ये रहा था रिजल्ट –

अजीत प्रसाद जैन, कांग्रेस – 2,02,081 – 21.75 %
सुंदर लाल, कांग्रेस – 1,61,181 – 17.35 %
अतहर हसन ख्वाजा, निर्दलीय – 1,38,996 – 14.96%
मुल्की राज, निर्दलीय – 95,656 – 10.30 %

उस वक्त कैराना में कांग्रेस का ही बोलबाला था.
उस वक्त कैराना में कांग्रेस का ही बोलबाला था.

1951 के चुनाव में भी ये दोनों प्रत्याशी चुनावी मैदान में थे. इस सीट का नाम था सहारनपुर(वेस्ट) कम मुज्जफरनगर(नॉर्थ). माने कैराना का कुछ हिस्सा इस सीट में भी आता था. तब रिजल्ट रहा था –

सुंदर लाल, कांग्रेस – 2,53,220 – 35.60 %
अजीत प्रसाद जैन, कांग्रेस – 2,51,175 – 35.31 %
मुल्की राज, एसपी – 63,848 – 8.98 %
संगत, एसपी – 51,640 – 7.26%

अब आप सोचेंगे कि एक सीट से एक पार्टी से दो प्रत्याशी कैसे. तो इसका जवाब भी बताए दे रहे हैं. दरअसल देश का पहला चुनाव बहुत सलीके से नहीं हुआ था. देश उस समय आकार ले रहा था. उसके प्रशासनिक ढांचे को कायदे से गढ़ा जाना था. ऐसे में अंग्रेजों के छोड़े गए ढांचे से काम चलाया जा रहा था. चुनाव आयोग को मतदाता और जनप्रतिनिधि के बीच के अनुपात में संतुलन कायम करने में काफी मशक्कत करनी पड़ रही थी. लोकसभा के लिए कुल 489 सीटें थी, लेकिन चुनाव हुआ महज 401 सीट पर. इस चुनाव में कुल 86 सीट ऐसी थीं, जहां से एक ही सीट से दो सांसद चुनकर आए थे. एक सीट ऐसी थी, जहां से तीन सांसदों को चुना जाना था. दो सांसदों वाली सीट पर हर पार्टी को दो प्रत्याशी और तीन सांसदों वाली सीट पर हर पार्टी को 3 प्रत्याशी लड़ाने का हक़ था. तो सहारनपुर भी ऐसी सीट थी, जहां से दो सांसदों को चुना जाना था.

1962 : वजूद में आई कैराना लोकसभा और कांग्रेस हारी

और इस चुनाव के बाद वो घड़ी आ गई जिसका सबको इंतजार था. 1962 में कैराना लोकसभा वजूद में आ चुकी थी. ये लोकसभा सहारनपुर से टूटकर बनी थी. 1962 का चुनाव कैराना लोकसभा में ही होना था. इस बार यहां की जनता किसी और नाम की मोहताज नहीं थी. पर अपना नाम मिलते ही यहां की जनता ने कांग्रेस का नाम मिट्टी में मिला दिया. 1962 के चुनाव में देश में कांग्रेस ने 361 सीटें जीतीं थी. इसमें वो 1957 के मुकाबले 10 ज्यादा सीटों पर हारी थी. और इसी में एक सीट बनी थी कैराना की. यहां एक निर्दलीय प्रत्याशी यशपाल सिंह ने कांग्रेस को झटका दिया था. उन्होंने यहां से पिछले चुनाव में जीते कांग्रेस के दूसरे सांसद अजीत प्रसाद जैन को 53,435 वोटों से हराया था. ये रहा था रिजल्ट –

यशपाल सिंह, निर्दलीय – 1,34,575 वोट – 48.38%
अजीत प्रसाद जैन, कांग्रेस – 81,140 वोट – 29.17%

अजीत प्रसाद कैराना बनते ही चुनाव हार गए थे.
अजीत प्रसाद कैराना बनते ही चुनाव हार गए थे.

फिर आया 1967 का चुनाव. इस बार फिर कांग्रेस को झटका लगने वाला था. न सिर्फ कैराना में बल्कि देश में भी. उसकी 78 सीटें कम हो गई थीं. 361 से वो 283 पर आ गई थी. वजह थी तमाम अन्य विपक्षी पार्टियों का वर्चस्व बढ़ना. इसी में एक थी संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी. जो 1964 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से टूटकर बनी थी. संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी ने 1967 के चुनाव में 23 लोकसभा सीटों पर चुनाव जीता था. इसी में से एक थी कैराना. यहां से उसके प्रत्याशी गयूर अली खां ने चुनाव जीता. अजीत प्रसाद जैन लगातार दूसरी बार कांग्रेस को हारने से नहीं बचा पाए. हालांकि मामला बड़ा नजदीकी रहा. इन दोनों प्रत्याशियों के बीच मात्र 1,665 वोटों का अंतर था. पर ये चुनाव एक लिहाज से महत्वपूर्ण था. यहां की मुस्लिम आबादी के उभार के लिहाज से. अबकी बार उन्होंने एकजुट होकर वोट डाला था और जाटों के वर्चस्व को चैलेंज किया था. उन जाटों को जिनका वर्चस्व इस सीट पर आजादी के बाद से अब तक रहा था. ये रहा था रिजल्ट –

गैयूर अली खान, एसएसपी – 76,415 वोट – 26.43%
अजीत प्रसाद जैन, कांग्रेस – 74,750 वोट – 25.85%

1971 में कांग्रेस ने उतारा मुस्लिम प्रत्याशी और वापसी की

1971 के चुनाव में कांग्रेस इस सीट पर मुस्लिम मतदाताओं की गणित को समझ चुकी थी. इस बार उसने मैदान में उतारा शफकत जंग को और इस तरह उसका इस सीट पर वनवास खत्म हो गया. ग्रैंड वापसी की. ठीक वैसे ही जैसे उसने पूरे देश में की थी. पिछली बार के मुकाबले 73 ज्यादा सीटें पाई थीं. इंदिरा गांधी के नेतृत्व में 352 सीटें जीतीं थीं. और कैराना में भी उसके प्रत्याशी ने चुनाव 72,766 वोटों के अंतर से जीता. पर इस बार दूसरे नंबर की लड़ाई के लिए एक नई पार्टी मैदान में आ चुकी थी. भारतीय क्रांति दल. चौधरी चरण सिंह की पार्टी. इनके प्रत्याशी थे गयूर अली खान. हालांकि ये बात अलग है कि खुद चौधरी चरण सिंह ये चुनाव हार गए थे. बगल की मुज्जफरनगर सीट से. उन्हें हराया था कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया के प्रत्याशी विजय पाल सिंह ने. खैर कैराना का रिजल्ट कुछ ऐसा रहा था –

शफकत जंग, कांग्रेस – 1,62,276 वोट – 52.36%
गयूर अली खान, बीकेडी – 89,510 वोट – 28.88%

चौधरी चरण सिंह की कैराना में काफी तगड़ी पकड़ थी.
चौधरी चरण सिंह की कैराना में काफी तगड़ी पकड़ थी.

इमरजेंसी के बाद भला कैसे जीत सकती थी कांग्रेस

फिर आया 1977 का चुनाव. इमरजेंसी की बेड़ियां ताजा-ताजा टूटी थीं. पूरा विपक्ष एकदम भरे बैठा था. उसे लेना था बदला. सो सारे साढ़ू भाई आ गए एक बैनर के नीचे. जनता पार्टी के झंडे के नीचे. और इसका असर भी हुआ. पूरे देश में कांग्रेस की लंका लग गई. वो 352 सीटों से सिमटकर 189 सीटों पर आ गई. वहीं जनता पार्टी ने देश में 345 सीटों पर चुनाव जीता. देश को पहला गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री मिला. मोरारजी देसाई. अब देश में जब ये हाल था तो कैराना इस बहती गंगा में हाथ धोने से क्यों चूकता. पिछले चुनाव में दूसरे नंबर पर रही पार्टी भारतीय क्रांति दल अब भारतीय लोक दल बन चुकी थी. नेता अब भी चौधरी चरण सिंह (वो भी इस चुनाव में मुज्जफरनगर से बागपत शिफ्ट हो गए थे और 1,21,538 वोटों से जीते ) ही थे. सो इसने भी पिछली बारी का बदला कांग्रेस में कायदे से लिया. इनके प्रत्याशी चंदन सिंह 1,46,858 वोटों के अंतर से चुनाव जीते. एक्कै साल में यहां की जनता ने कांग्रेस को फिर वनवास पर भेज दिया. कांग्रेस से सांसद रहे शफकत जंग बुरी तरह से हारके दूसरे नंबर पर रहे. ये रहा रिजल्ट –

चंदन सिंह, बीएलडी – 2,42,500 वोट – 64.60%
शफकत जंग, कांग्रेस – 95,642 वोट – 25.48%

1980 में मैदान में आईं चौधरी साहब की पत्नी गायत्री देवी

1980 आते-आते देश में काफी कुछ बदल चुका था. देश में बनी पहली गैर कांग्रेसी सरकार मुंह के बल गिर चुकी थी. विपक्ष की एकता की मूर्ति माने जनता पार्टी टूट चुकी थी. दो धड़ों में. एक जनता पार्टी सेकुलर और एक जनता पार्टी तो थी ही. जनता पार्टी सेकुलर के नेता थे चौधरी चरण सिंह. जनता पार्टी के नेता थे चंद्रशेखर. और ये टूट जनता को बिल्कुल पसंद नहीं आई. वो समझ गई कि इनके बस का नहीं है और फिर लौट आईं इंदिरा गांधी और उनकी कांग्रेस. 374 सीटों के भारी बहुमत के साथ. वहीं टूटकर अलग हो चुकी जनता पार्टी मात्र 31 सीटें जीत पाई. वहीं चरण सिंह की जनता पार्टी सेकुलर के हाथ आईं 41 सीटें. इन्हीं में से एक सीट थी कैराना जहां से चौधरी साहब की पत्नी गायत्री देवी चुनावी मैदान में थीं. ये रहा था रिजल्ट –

गायत्री देवी, जेएनपीएस – 2,03,242 वोट – 48.89%
नारायण सिंह, कांग्रेस – 1,43,761 वोट – 34.58%
जुल्फिकारुल्लाह, जनता पार्टी – 63,818 वोट – 15.35%

इंदिरा गांधी के साथ चरण सिंह और गायत्री देवी.
इंदिरा गांधी के साथ चरण सिंह और गायत्री देवी.

1984 में कांग्रेस की वापसी और मायावती ने लड़ा अपना पहला चुनाव

1984 के चुनाव का जैसा असर देश में दिखा, वैसा ही असर कैराना में भी देखने को मिला. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए इस चुनाव में कांग्रेस ने 404 सीटों पर जीत दर्ज की. इतनी सीटें न उनकी मम्मी ने कभी जीती थीं और न उनके नाना ने. इसी तरह कैराना में भी कांग्रेस की वापसी हो गई. यहां से जीते चौधरी अख्तर हसन. इस बार यहां चौधरी चरण सिंह का जादू नहीं चला. उनकी बनाई पार्टी लोकदल इस बार इंदिरा की सहानुभूति लहर के कारण अपने गढ़ में भी फेल हो गई. शायद चौधरी साहब को इसकी भनक भी थी. इसी वजह से इस बार उनकी पत्नी और कैराना से सांसद मैदान में नहीं थीं. गायत्री देवी इस बार मथुरा से लड़ रही थीं, हालांकि वहां भी उनकी दाल नहीं गली. और कैराना में लोकदल के प्रत्याशी श्याम सिंह चुनाव हारे. मगर कैराना का ये चुनाव एक और लिहाज से भी महत्वपूर्ण था. इसी साल एक और पार्टी वजूद में आई थी. बहुजन समाज पार्टी. बसपा. और कैराना से बसपा ने उतारा था मायावती को. ये बसपा सुप्रीमो मायावती का पहला चुनाव था. वो चुनाव में तीसरे नंबर पर रहीं मगर मजबूत शुरुआत की. ये रहा था रिजल्ट –

चौधरी अख्तर हसन, कांग्रेस – 2,36,904 वोट – 52.98%
श्याम सिंह, लोकदल – 1,38,355 वोट – 30.94%
मायावती, निर्दलीय – 44,445 वोट- 9.94%

मायावती अपना पहला चुनाव कैराना से ही लड़ी थीं.
मायावती अपना पहला चुनाव कैराना से ही लड़ी थीं.

पर 1984 का चुनाव कैराना में कांग्रेस की आखिरी जीत साबित हुई. 1989 में कैराना में कांग्रेस का वही हाल हुआ जो उसका देश में हुआ था. वो 207 सीटें घटकर 197 सीटों पर आ गई थी. फिर कैराना के वोटरों के क्या कहने, वो तो जैसे देश के मिजाज को समझकर ही हर बार वोट डालते थे. जिसकी सरकार बनती दिख रही हो, उसे ही अपनी सीट से लोकसभा भेजते थे. यानि देश में वीपी सिंह के नेतृत्व में जनता दल का झंडा लहरा रहा था तो कैराना वालों ने भी जनता दल के प्रत्याशी हर पाल को लोकसभा भेजा. ये रहा था रिजल्ट –

हरपाल, जनता दल – 3,06,119 वोट – 58.86%
बशीर अहमद, कांग्रेस – 1,84,290 वोट – 35.43%

1991 में राम लहर पर जनता दल भारी

फिर आया 1991 का चुनाव. देश में कांग्रेस ने वापसी की. मगर यूपी राम लहर पर सवार था. ऐसे में कैराना की जनता ने बीच का रास्ता चुना. अपने पिछले सांसद और जनता दल के प्रत्याशी हर पाल पर फिर से भरोसा जताया और उन्हें लोकसभा भेजा. मगर राम लहर का असर कैराना में भी नजर आया. बीजेपी जोकि अब तक इस सीट पर गायब थी, अचानक से उसका प्रत्याशी दूसरे नंबर पर आ गया. टफ फाइट दी. कांग्रेस को तो निपटा ही दिया. वो अब तीसरे नंबर पर आ चुकी थी. ये रहा था रिजल्ट –

हरपाल, जनता दल – 2,23,892 वोट – 44.65%
उदयवीर सिंह, बीजेपी – 2,01,223 वोट – 40.13%
बशीर अहमद, कांग्रेस – 55,369 वोट – 11.04%

1996 में मुनव्वर हसन बने सांसद.
1996 में मुनव्वर हसन बने सांसद.

1996 में मुनव्वर हसन आए और सपा के हाथ आई कैराना

1996 के आम चुनाव में इस सीट पर बाजी मारी समाजवादी पार्टी ने. उसने टिकट दिया था 1984 में कैराना में कांग्रेस की वापसी करवाने वाले अख्तर हसन के बेटे मुनव्वर हसन को. सपा का ये दांव चला भी. वैसे भी अब कैराना की राजनीति पर हिंदू-मुस्लिम का रंग कायदे से चढ़ चुका था. यही वजह थी कि यहां 1991 से बीजेपी टक्कर देने वाली भूमिका में आ चुकी थी. 96 में भी यही हुआ. एक बार फिर बीजेपी के उदयवीर सिंह ने सपा के मुनव्वर को कड़ी टक्कर दी. मगर वो जीत नहीं सके. करीब 10,020 वोटों से चुनाव हार गए. पर वोटों का अंतर पिछली बार के मुकाबले कम हो गया था. ये रहा था रिजल्ट –

मुनव्वर हसन, सपा – 1,84,636 वोट – 32.75%
उदयवीर सिंह, बीजेपी – 1,74,614 वोट – 30.97%

1998 में आखिरकार भगवा लहराया पर 99 में हारे

और दो बार से कैराना में कड़ी टक्कर दे रही बीजेपी को कुर्सी मिलने का वक्त 1998 में आखिरकार आ चुका था. पर इस बार प्रत्याशी उदयवीर नहीं, वीरेंद्र वर्मा थे. सपा के सांसद रहे मुनव्वर हसन इस बार अपना किला नहीं बचा सके. कैराना एक बार फिर से केंद्र के मिजाज से वोट देने के अपने पुराने पैंतरे पर लौट आया था. सो देश में भी भगवा रंग चढ़ा और कैराना पर भी. बीजेपी के वीरेंद्र 62,175 वोटों से जीते. ये रहा था रिजल्ट –

वीरेंद्र वर्मा, बीजेपी – 2,89,110 वोट – 40.13%
मुनव्वर हसन, सपा – 2,26,935 वोट – 31.50%

वीरेंद्र वर्मा ने पहली बार खिलवाया कमल.
वीरेंद्र वर्मा ने पहली बार खिलवाया कमल.

पर बीजेपी की खुशी एक चुनाव तक ही टिक सकी. अगले ही माने 1999 के चुनाव में उसको हार का सामना करना पड़ा. देश में तो इस बार भी भगवा लहरा रहा था. मगर कैराना ने अपना मूड बदल लिया था. वो अब अपने पुराने नेता की पार्टी की तरफ खिंच गई थी. चौधरी चरण सिंह की पार्टी आरएलडी की तरफ. इसके प्रत्याशी आमिर आलम ने जीत जर्ज की. बीजेपी की तरफ से इस बार वीरेंद्र वर्मा नहीं, निरंजन सिंह मलिक थे और वो ये चुनाव 38,272 वोटों से हारे. आरएलडी को मुस्लिम प्रत्याशी के साथ ही आरएलडी के बेस वोट बैंक का फायदा मिला. ये रहा था रिजल्ट –

आमिर आलम, आरएलडी – 2,06,345 वोट – 29.82%
निरंजन सिंह मलिक, बीजेपी – 1,68,073 वोट – 24.29%

इंडिया शाइनिंग के साथ कैराना में बीजेपी गई तीसरे नंबर पर

2004 के लोकसभा चुनाव में जब इंडिया शाइनिंग का जहाज डूबा तो कैराना इससे कैसे बच सकता था. कैराना में भी इसका पूरा असर दिखा. बीजेपी अब तीसरे नंबर पर आ चुकी थी. दूसरे नंबर पर इस बार रहा बीएसपी का प्रत्याशी. पर पहले नंबर पर कैराना ने फिर से एक बार आरएलडी की प्रत्याशी को ही बैठाया. हालांकि इस बार आरएलडी ने अपना प्रत्याशी बदल दिया था, मगर कैराना ने अपना मूड नहीं बदला. अनुराधा चौधरी को जिताया. वो भी बंपर तरीके यानि 3,42,421 वोटों से. हालांकि कहा ये भी जाता था कि उनको मुनव्वर हसन का पूरा सपोर्ट था. इसके बदले मुनव्वर का आरएलडी ने मुजफ्फरनगर में सपोर्ट किया था, जहां से वो लड़ रहे थे. खैर ये रहा था कैराना का रिजल्ट –

अनुराधा चौधरी, आरएलडी – 5,23,923 वोट
शाहनवाज, बीएसपी – 1,81,509 वोट
अमरकांत राणा, बीजेपी – 75,851 वोट

अनुराधा चौधरी बनीं सांसद.
अनुराधा चौधरी बनीं सांसद.

हुकुम सिंह आए मैदान में, मगर मुनव्वर की पत्नी से हारे

2009 के चुनाव में बीजेपी ने नया दांव खेला. 6 बार के विधायक हुकुम सिंह को चुनावी मैदान में उतारा. मगर उनके ऊपर बसपा का दांव भारी पड़ गया, जिसने पूर्व सांसद मुनव्वर हसन की पत्नी तबस्सुम बेगम को चुनाव में उतार दिया. हुकुम सिंह ने तबस्सुम को कड़ी टक्कर तो दी मगर वो सीट निकाल नहीं सके. तबस्सुम ये चुनाव 22463 वोटों से जीत गईं. और देश की कहानी तो सबको मालूम ही है. लालकृष्ण आडवाणी एक बार फिर पीएम इन वेटिंग बनकर रह गए और मनमोहन सिंह चुप्पेचाप फिर से कुर्सी पर बैठ गए. खैर कैराना में ये रहा था रिजल्ट-

तबस्सुम बेगम, बीएसपी – 2,83,259 वोट
हुकुम सिंह, बीजेपी – 2,60,796 वोट

मोदी लहर और मुज्जफरनगर दंगे ने दिलवाई हुकुम सिंह को कुर्सी

फिर आया 2014 का चुनाव. मगर इससे पहले उत्तर प्रदेश में एक दंगा हुआ था. कैराना लोकसभा के बगल वाले जिले मुज्जफरनगर में. उसी मुज्जफरनगर से जहां से कटकर 2011 में शामली जिला बना था, जिसका ही हिस्सा है कैराना लोकसभा. खैर दंगे पर लौटते हैं. इसकी शुरुआत हुई 27 अगस्त 2013 को, जब यहां के कवाल गांव में कथित तौर पर एक जाट समुदाय की लड़की के साथ एक मुस्लिम लड़के ने छेड़खानी की. फिर इस लड़की के दो भाइयों ने उस मुस्लिम लड़के की हत्या कर दी. वहीं पर इन दोनों हिंदू लड़कों को भी मार डाला गया. इसके बाद मामला बढ़ा और दंगे का रूप धारण कर लिया. इसमें करीब 62 लोगों की जान गई. इसका असर अगले साल होने वाले चुनाव माने 2014 के चुनाव में दिखा. इसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया गया. जमके ध्रुवीकरण हुआ. हिंदू-मुस्लिम वोट जमके बंटा और सबसे ज्यादा फायदा मिला बीजेपी. न सिर्फ कैराना में बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश में.

2009 में तबस्सुम बनीं सांसद.
2009 में तबस्सुम बनीं सांसद.

बीजेपी गठबंधन ने 2014 में यूपी में 80 में 73 सीटें जीतीं. मगर ये कहना गलत होगा कि ये नतीजा पूरा का पूरा दंगों की भट्टी पर तपकर ही आया था. इसके पीछे सबसे बड़ा फैक्टर था मोदी लहर जो पूरे देश में दिखी. कांग्रेस के 10 साल के खिलाफ गुस्सा लोगों ने जमकर निकाला और अकेले बीजेपी को 282 सीटें जिता दीं. कांग्रेस 206 से सिमटकर 44 पर आ गई. तो कैराना कैसे चूकता. उसने भी पिछले चुनाव में दूसरे नंबर पर रहे हुकुम सिंह के सिर सेहरा बांधा. दूसरे नंबर पर रहे इस सीट से सांसद रहीं तबस्सुम हसन के बेटे नाहिद हसन और उनका खेल बिगाड़ा खुद उनके चाचा कंवर हसन ने जो बीएसपी से टिकट ले आए थे. ये बात अलग है कि इन दोनों के वोट मिला दें तो भी हुकुम सिंह ही आगे हैं. वो इसलिए क्योंकि वो 2,36,828 वोटों से चुनाव जीते थे. ये रहा था रिजल्ट –

हुकुम सिंह, बीजेपी – 5,65,909 वोट – 50.54%
नाहिद हसन, सपा – 3,29,081 वोट – 29.39%
कंवर हसन, बसपा – 1,60,262 वोट – 10.47%

हुकुम सिंह बने 2014 में सांसद.
हुकुम सिंह बने 2014 में सांसद.

फिर 2017 के विधानसभा चुनाव में पलायन बना मुद्दा

कैराना के सांसद हुकुम सिंह 2017 के विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी के खूब काम आए. उन्होंने कैराना में पलायन का मुद्दा छेड़कर यूपी की राजनीति को ठीक चुनावों से पहले फिर गर्मा दिया. इसका फायदा बीजेपी को यूपी के विधानसभा चुनाव में मिला भी. खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में. बीजेपी ने 403 में से 325 सीटों पर जीत हासिल की. हालांकि कैराना का मुद्दा उठाने वाले हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह खुद कैराना विधानसभा सीट हार गईं. 21,162 वोटों से. उन्हें हराया था नाहिद हसन ने. लोकसभा में उनके पिता के खिलाफ लड़े नाहिद ने. उनकी हार का एक कारण उनके चचेरे भाई भी रहे थे. अनिल कुमार जो कि आरएलडी की टिकट पर चुनाव लड़े थे. ये रहा था रिजल्ट –

नाहिद हसन, सपा – 98,654 वोट
मृगांका सिंह, बीजेपी – 77,529 वोट
अनिल कुमार, आरएलडी – 19,903 वोट

कैराना लोकसभा में कैराना विधानसभा के अलावा चार और विधानसभाएं आती हैं और चारों में बीजेपी ने जीत दर्ज की थी. यही वजह थी कि बीजेपी ने इनमें से दो धर्म सिंह सैनी और सुरेश राणा को मंत्री बनाया. देखें वहां क्या रहा था रिजल्ट –

1.थाना भवन – बीजेपी के सुरेश कुमार जीते
सुरेश कुमार राणा, बीजेपी – 90,796 वोट
अब्दुल वारिस खान, बीएसपी – 74,178 वोट

2. शामली – बीजेपी के तेजेंद्र निर्वाल
तेजेंद्र निर्वाल, बीजेपी – 69,803 वोट
पंकज कुमार मलिक, कांग्रेस – 40,270 वोट

3. गंगोह – बीजेपी के प्रदीप कुमार जीते
प्रदीप कुमार, बीजेपी – 99,112 वोट
नौमान मसूद, कांग्रेस – 61,354 वोट

4. नकुड़ – बीजेपी के धरम सिंह सैनी जीते
धरम सिंह सैनी, बीजेपी – 94,038 वोट
इमरान मसूद, कांग्रेस – 90,170 वोट

हुकुम सिंह के साथ मृगांका.
हुकुम सिंह के साथ मृगांका.

फिर 3 फरवरी 2018 को हुकुम सिंह इस दुनिया में नहीं रहे और एक बार फिर कैराना में चुनाव की मुनादी पिट गई. गोरखपुर और फूलपुर के उपचुनावों में बीजेपी की हार ने इस चुनाव को और मजेदार बना दिया है. एक और फैक्टर जो इस चुनाव को मजेदार बनाता है. वो है विपक्ष की एकता. जैसे गोरखपुर और फूलपुर में सपा-बसपा साथ आ गए थे. वैसे ही यहां विपक्ष एक कदम आगे निकल गया है. यहां सपा में रहीं तबस्सुम हसन आरएलडी की टिकट पर चुनाव लड़ रही हैं. वहीं कांग्रेस और बसपा ने भी अपना प्रत्याशी न उतारते हुए तबस्सुम को मौन समर्थन दे दिया है. बीजेपी ने मैदान में उतारा है हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह को. उसे उम्मीद है कि मृगांका को उतारने से उसे अपने बेस वोट के साथ ही सहानुभूति वाले वोट भी मिलेंगे. वोटिंग 28 मई को होनी है और रिजल्ट 31 मई को सामने आ जाएगा. हालांकि ये इतना आसान नहीं होने वाला है. इन दोनों ही प्रमुख प्रत्याशियों के राह में ढेरों रोड़े हैं. इन रोड़ों को समझने से पहले यहां का जातिगत गणित समझते हैं –

कुल वोटर : 17 लाख

मुसलमान : 5.5 लाख
दलित : 2 लाख
पिछड़ी जाति (जाट, सैनी, प्रजापति, कश्यप) : 4 लाख
गुर्जर : 1.30 लाख
राजपूत : 75 हजार
ब्राह्मण : 60 हजार
वैश्य : 55 हजार

मृगांका कैराना से इस बार बीजेपी की प्रत्याशी हैं.
मृगांका कैराना से इस बार बीजेपी की प्रत्याशी हैं.

अब समझें बीजेपी की मुश्किल –

1. विपक्ष की एकता के साथ ही कांग्रेस का प्रत्याशी न होना.

2. कैराना में 5.5 लाख से ज्यादा मुस्लिम वोटर्स.

3. कैराना किसान बेल्ट में आता है और किसान केंद्र सरकार से बहुत खुश नहीं हैं.

4. तबस्सुम जैसा मजबूत प्रत्याशी जो पहले भी एक बार सांसद रह चुकी हैं.

5. मृगांका अपना पिछला चुनाव ही हारी हैं. कैराना से विधानसभा का.

तबस्सुम रालोद की टिकट पर लड़ रही हैं.
तबस्सुम रालोद की टिकट पर लड़ रही हैं.

विपक्ष की मुश्किलें –

1. कांग्रेस और बसपा के नेता ग्राउंड में तबस्सुम का प्रचार नहीं कर रहे.

2. हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण होने का डर.

3. बीजेपी का पूरा काडर पूरी मुस्तैदी से जुटा है. मुज्जफरनगर दंगों में हुए मुकदमों की वापसी भी बना मुद्दा.

4. मोदी लहर जो कि 2017 विधानसभा चुनाव में दिखी. इस उपचुनाव में भी बिगाड़ सकती है खेल. मोदी 27 मई को दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे NH-9 और ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेसवे (EPE) के पहले फेज का उद्घाटन भी करने आ रहे हैं. इस दौरान उनका रोडशो होगा. साफ है कि इसका असर कैराना चुनाव पर पड़ेगा.


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