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आतिशबाज मिट्ठूलाल: ऐसी क़ाबिलियत कि इंदिरा गांधी और जैल सिंह भी उठ खड़े हुए

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क़ुतुब मीनार, महाभारत चक्र, सुदर्शन चक्र, झरना, मानसरोवर, सुनहरी बरसात, गोल्डन फाउंटेन, चमेली और कश्मीर क्वीन. वल्लाह! क्या नाम हैं. ये सब सुन के दिल का इश्किया मिजाज हो जाए. मोहब्बत करने का मन करने लगे. लगता ही नहीं कि ये पटाखों के नाम होंगे. इस नामकरण के पीछे उस आतिशबाज का जहन था जिसकी आतिशी का जादू पीएम इंदिरा गांधी के दिल पर चला. और देश के सातवें राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह को भी उस आतिशबाज की क़ाबिलियत के लिए अपनी जगह से खड़ा होना पड़ा.

अगर उस आतिशबाज के लिए मैं हैरतअंगेज शब्द का इस्तेमाल करूं. तो ये कुछ भी नहीं है. क्योंकि आज के दौर में जो तुमने मशीनों की बनी आतिशबाजी नहीं देखी होगी. वो उन्होंने 1982-83 में कर दिखाई. उस शख्सियत को मिट्ठूलाल आतिशबाज के नाम से जाना गया. मगर उनकी कला, उनकी पहचान उसी तरह से आज गायब हो गई. जैसे फुलझड़ी जल जाती है. यानी जब तक फुलझड़ी जलती रही. चमक बिखेरती रही. और फिर खामोशी. इस आतिशबाज का पूरा नाम था मिट्ठूलाल मोहम्मद.

मिट्ठूलाल आतिशबाज (साल 2004)
मिट्ठूलाल आतिशबाज (साल 2004)

1923 में पैदा हुए मिट्ठूलाल महज 10 साल के थे. जब वो जालौन में एक आतिशबाजी की फैक्ट्री में मजदूरी करने लगे. इसके लिए उन्हें 10 रुपये मिलते थे. पढ़े-लिखे नहीं थे. इसलिए उनसे वही काम लिए जाते थे जैसे घर में किसी बच्चे से लिए जाते हैं कि बेटा ये चीज उठा दो और वो चीज उठा दो. बाकी उन्हें दूर ही रखा जाता है. ऐसे ही मिट्ठूलाल को पटाखे बनाने की कारीगरी से दूर रखा जाता था. वो दूर से ही पटाखे बनाने वालों को मासूमियत से निहारते रहते थे. 2 साल तक वहीं बोझा ढोते रहे. बिना किसी के बताए वो भी पटाखे बनाना सीख गए. और उनका प्रमोशन हो गया. मतलब बोझा ढोने से हटाकर पटाखे बनाने में लगा दिया मालिक ने. 15 साल के थे. शादी हो गई. बाप की मौत हुई. बीवी बच्चों को लेकर उरई में शिफ्ट हो गए.

मिट्ठूलाल अपनी बीवी, दो बेटों, और दो बेटियों के साथ.
मिट्ठूलाल अपनी बीवी, दो बेटों, और दो बेटियों के साथ.

उरई में अपनी फैक्ट्री लगा ली. अनपढ़ होने के बावजूद पटाखा मटेरियल की इत्ती समझ थी कि उनकी बनाई आतिशबाजी मशहूर होने लगी. अपनी आतिशबाजी का प्रदर्शन करने लगे. कम्पटीशन होते. और मिट्ठूलाल की आतिशबाजी जलवा अफरोज हो जाती. ये मिट्ठूलाल की आतिशबाजी नहीं था बल्कि उनका इश्क था. जिसका रंग लोगों के दिलों पर चढ़ जाता था. पलकें नहीं झपकती थीं. मुंह खुला रह जाता था. खुशियां लोगों के चेहरे पर पटाखों की रोशनी में साफ़ झलकती थीं.

मिट्ठूलाल की आतिशी पारी उस वक्त शुरू हुई जब 1982-83 में पीएम इंदिरा गांधी और प्रेसिडेंट ज्ञानी जैल सिंह जालौन में पधारे. बड़ा कम्पटीशन था. कई जिलों के आतिशबाज मैदान में जमा थे. अपनी महारत दिखानी थी. आर्ट को पेश किया जा रहा था. एक से बढ़कर एक खूबसूरत नज़ारों का लोग दीदार कर रहे थे. खूब चटर-पटर और धूम-धड़ाका हुआ.

अब बारी मिट्ठूलाल की थी. उन्होंने एक धमाका किया और पटाखे में से सरसरा कर एक तस्वीर निकली. वो तस्वीर थी इंदिरा गांधी की अपने परिवार के साथ. मौजूद लोगों ने तालियां बजाईं. लोगों ने सोचा ये इंदिरा गांधी का वेलकम किया गया है. वैसे तालियां बजनी भी थीं क्योंकि ये बिल्कुल जुदा अंदाज था. लेकिन असल हैरानी तब हुई जब फ़ौरन ही दूसरा धमाका हुआ और उसमें से फूलों का हार निकला और तस्वीर को अपने घेरे में ले लिया. लोगों के मुंह से वाह निकला. तालियों की गूंज तेज हो गई. पटाखों की चटर-पटर का ये नजारा इतना खूबसूरत था कि इंदिरा गांधी और ज्ञानी जैल सिंह भी खड़े हो कर तालियां बजने लगे.

मिट्ठूलाल को गोल्ड मेडल मिला. क्योंकि पहले से तय था जिसकी आतिशबाजी पर लोग ज्यादा खुश होंगे और लुत्फ़ उठाएंगे वही विनर होगा. उनकी इस आर्ट से खुश होकर इंदिरा गांधी ने उन्हें दिल्ली की रामलीला में आने का न्योता दिया. रामलीला मैदान में मिट्ठूलाल आए और अपनी आतिशबाजी दिखाई. यहां उन्होंने राम, लक्ष्मण और सीता को आतिशबाजी से हार पहनाए.

मिट्ठूलाल की शॉप की ये तस्वीर बहुत पुरानी है. कितनी पुरानी है ये सही पता नहीं.
मिट्ठूलाल की शॉप की ये तस्वीर बहुत पुरानी है. कितनी पुरानी है, ये सही पता नहीं.

इसके बाद तो वो लोगों के बीच इतने मकबूल हो गए. कि पटाखे उनके नाम से बिकने लगे. जब तक जिंदा रहे और जिस कम्पटीशन में हिस्सा लिया विजेता बने. दिवाली पर उनके पटाखों की धूम होती. लोग मिठाइयां गिफ्ट करते थे. और उनके पटाखे ही गिफ्ट में चलने लगे. वो भी अपने मिलने वालों को पटाखे गिफ्ट करते. शादियों या दूसरे प्रोग्राम में उनके पटाखे रौनक बिखेरने लगे. महफिलों को अपनी आतिशबाजी से जीनत बख्शने वाले मिट्ठूलाल मोहम्मद साल 2008 में इस दुनिया से रुखसत हो गए. अब उनके बेटे असलम और अकरम उनके काम को संभाल रहे हैं. असलम ने लॉ की पढ़ाई की है. वहीं अकरम को क्रिकेट खेलने का शौक है.

मिट्ठूलाल के बड़े बेटे असलम की शॉप.
मिट्ठूलाल के बड़े बेटे असलम की शॉप.

पढ़े लिखे न होने के बावजूद उनकी काबिलियत हैरान करने वाली थी. मिट्ठूलाल के पोते हाशिम कहते हैं, ‘दादा अक्सर बोलते थे कि वो पढ़े लिखे नहीं, इसका उन्हें अफसोस है. फिर भी उन्होंने ये सब किया. अगर पढ़-लिख जाते तो हेलिकॉप्टर बना देते.’

एक टाइम वो था जब मिट्ठूलाल आतिशबाज की दुकान किसी और पते से जानी जाती थी और फिर जल्द ही वो टाइम आया जब मिट्ठूलाल आतिशबाज जालौन वाले खुद ही एक पहचान बन गए.

 

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कैसे रखते थे पटाखों के नाम

दिवाली का मौका है. आप कहीं मोदी या केजरीवाल बम खरीद रहे होंगे या फिर करीना, कैटरीना फुलझड़ी. हो सकता है मुर्गा छाप या नागिन पटाखे भी झोले में भर लिए हो. ये तो वो पटाखे हैं जिनका उन नामों से कोई ताल्लुक नहीं. बस मार्केट भुना ली. मगर हाशिम बताते हैं कि दादा यूं ही किसी आतिशबाजी का नाम नहीं रखते थे. जिसका जैसा नाम होता था वो वैसा ही दिखता था. यानी कुतुबमीनार है. तो जब उसे जलाया जाता तो एक कुतुबमीनार की तरह नजारा दिखता था. महाभारत चक्र तो नजारा महाभारत युद्ध की तरह होता था. झरना, गोल्डन फाउंटेन. चमेली और कश्मीर क्वीन भी अपने नाम की तरह ही नजारा दिखाती थीं. आज अगर मोदी बम या केजरीवाल बम जलाओ तो न मोदी जी दिखाई देंगे और न केजरीवाल या करीना. मतलब सब अपना उल्लू सीधा करने वाली बातें रह गईं है इस दौर में.

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