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बीएस येदियुरप्पा ने कभी ताव से कहा था- मेरा विकल्प सिर्फ मैं हूं

बीएस येदियुरप्पा ने 26 जुलाई 2021 को कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. किसी ने नहीं सोचा था कि अपनी सरकार के 2 साल पूरे होने पर येदियुरप्पा यह ऐलान करेंगे. ऐसा करते हुए येदियुरप्पा भावुक होकर रोने भी लगे. बाद में राज्यपाल थावर चंद्र गहलोत के निवास पर पहुंचे और उन्हें इस्तीफा सौंप दिया. येदियुरप्पा का कहना है कि वे कर्नाटक में बीजेपी के लिए काम करते रहेंगे. हालांकि उन्होंने कभी बड़े ताव में कहा था- येदियुरप्पा का विकल्प सिर्फ येदियुरप्पा है. लल्लनटॉप का हिस्सा रहे विनय सुल्तान ने येदियुरप्पा के राजनीतिक जीवन पर यह लेख तीन साल पहले लिखा था. आज के दिन इसे जरूर पढ़ा जाना चाहिए.


यह 1981 का बरस था. कर्नाटक के शिमोगा जिले में एक छोटा सा कस्बा पड़ता है – शिकारीपुर’. भारतीय जनता पार्टी बने हुए अभी एक साल ही हुआ था. नई नवेली बीजेपी के शिकारीपुर तालुका यूनिट का नौजवान अध्यक्ष एक पदयात्रा पर निकला हुआ था. अपने साथ तकरीबन दस हजार बंधुआ मजदूर लेकर जब वो शिकारीपुर से 52 किमी का सफ़र तय करके शिमोगा पहुंचा, अखबार के पन्ने उसके नाम से रंगे जा चुके थे. वो रातोंरात सूबे की सियासत का स्टार बन चुका था.

शिमोगा की पदयात्रा निपटाकर जब वो शांति से एक किनारे बैठा हुआ था. उसने मन में सोचा कि उसके गांव से 200 किलोमीटर दूर यह छोटा सा कस्बा किस तरह देखते ही देखते उसके अस्तित्व का हिस्सा बन गया है. शिकारीपुर, जहां वो 15 साल पहले महज एक संयोग के चलते चला आया था.

वीरभद्र शास्त्री यहां आजादी के वक़्त से एक राइस मिल चलाया करते थे. 1965 आते-आते उनकी उम्र ढलान पर थी. वो अकेले इस कारोबार को संभाल नहीं पा रहे थे. उन्हें एक अच्छे मैनेजर की तलाश थी. इसी दौर में उनकी नजर पड़ी शिमोगा के समाज कल्याण विभाग के दफ्तर में काम करने वाले एक नौजवान क्लर्क पर. वो उसे अपने साथ शिकारीपुर ले आए और राइस मिल की मैनेजरी सौंप दी.

Yedddy Karna
1983 के चुनाव में पार्टी ने उन्हें शिकारीपुर विधानसभा सीट से पहली बार टिकट दी.

नौजवान को काम करते हुए एक साल होने को था. अपनी ईमानदारी और लगन की वजह से लड़का शास्त्री के मन को भा गया. उन्होंने एक दिन लड़के को अपने पास बुलाकर पूछा कि क्या वो उनकी बेटी मित्रा से शादी करेगा? लड़के ने हां कर दी. वीरभद्र चाहते थे कि लड़का घरजमाई बनकर उनके कारोबार को आगे बढ़ाए. शादी के बाद वीरभद्र शास्त्री की योजना धरी की धरी रह गई. लड़के ने घरजमाई बनने से इंकार कर दिया और शिमोगा में हार्डवेयर की एक दुकान खोल ली. इस दुकान का उसने नाम रखा, ‘सिद्धालिंग्प्पा हार्डवेयर’. यह नाम उससे और उसकी सामुदायिक पहचान दोनों से जुड़ा हुआ था.

दरअसल 15वीं सदी में लिंगायत समुदाय के प्रभावी संत हुए थे सिद्धालिंगप्पा. कर्नाटक के तुमकुरु जिले के येदियुर में उनका बड़ा मठ था. आज भी यह जगह लिंगायत समुदाय के लिए श्रद्धा का केंद्र है. 27 फरवरी 1943 को जब मंड्या जिले के बूकनाकेरे गांव में सिद्धालिंगप्पा और पुट्टाथमय्या के घर लड़का पैदा हुआ तो उन्होंने उसका नाम सिद्धालिंगप्पा के नाम पर ही रखना तय किया. इस तरह लड़के का नाम पड़ा – सिद्धालिंगप्पा येदियुरप्पा. कर्नाटक की परम्परा के अनुसार उसके गांव बूकनाकेरे का नाम उनके नाम के आगे जुड़ना ही था और पूरा नाम मुकम्मल हुआ बीएस येदियुरप्पा.

1981 में येदियुरप्पा अपनी पदयात्रा के कारण पहले ही चर्चा में आ चुके थे. 1983 के चुनाव में पार्टी ने उन्हें शिकारीपुर विधानसभा सीट से टिकट थमा दी. उनके सामने थे कांग्रेस के के. येंकाटप्पा. येदियुरप्पा यह मुकाबला एकतरफ़ा जीते. उन्हें इस सीट पर मिले 40,687 वोट जबकि के. येंकाटप्पा महज 18,504 वोट ही हासिल कर पाए. इस चुनाव में बीजेपी को 224 में से महज 18 सीटों पर सफलता मिली थी और येदियुरप्पा उसमें से एक थे. 1985 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने अपनी जीत को बरकरार रखा. वो सदन में पहुंचने वाले दो बीजेपी विधायकों में से एक थे.

गर्म लोहे पर चोट

साल 1988. तीन साल पहले बनी जनता पार्टी सरकार में दरारें दिखना शुरू हो गई थीं. तीन साल में दो मुख्यमंत्री बनाए जा चुके थे. तत्कालीन एसआर बोम्मई सरकार संवैधानिक संकट में फंस चुकी थी. कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव के दो साल पहले से सियासी चौसर पर अपनी गोटियां बैठाना शुरू कर दिया था. चुनाव से पहले सूबे में कांग्रेस की कमान सौंपी गई वीरेंद्र पाटिल को. पाटिल उस समय लिंगायत समाज का बड़ा चेहरा हुआ करते थे.

दक्षिण का दरवाजा खटखटा रही बीजेपी की सारी आस लिंगायत वोटरों पर टिकी हुई थी. ऐसे में कांग्रेस के इस दांव की काट निकालनी जरूरी थी. बीजेपी को याद आई शाखा से सियासत में आए युवा लिंगायत नेता की. 1988 तक येद्दी की हैसियत सूबे की राजनीति में बहुत बड़ी नहीं थी. संघ के साथ के चलते उन्हें कर्नाटक बीजेपी की कमान सौंप दी गई. उनके नेतृत्व में बीजेपी कोई खास कमाल नहीं कर सकी. 1989 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की सीटें 2 से बढ़कर 4 तक ही पहुंच पाईं. कांग्रेस को इस चुनाव में 178 का रिकॉर्ड बहुमत मिला. वीरेंद्र पाटिल 18 साल बाद मुख्यमंत्री की कुर्सी पर थे. 1969 में निजलिंगप्पा के कांग्रेस छोड़ने के बाद जो लिंगायत वोट कांग्रेस का साथ छोड़ चुका था वो फिर से पाटिल के नाम पर कांग्रेस के खेमे में लामबंद था.

येदियुरप्पा (4)
किसान नेता की छवि हमेशा काम आई है येदियुरप्पा के.

1990 में अाडवाणी की राम रथयात्रा के चलते कर्नाटक के कई हिस्सों में दंगे हो गए. राजीव गांधी ने दंगा पीड़ित क्षेत्रों का निरीक्षण करने के बाद एयरपोर्ट पर खड़े-खड़े वीरेंद्र पाटिल को मुख्यमंत्री की कुर्सी से बेदखल कर दिया. राजीव के इस कदम ने लिंगायत समुदाय को गुस्से से भर दिया. इसके बाद इडिगा समुदाय से आने वाले बंगारप्पा की ताजपोशी ने रही-सही कसर पूरी कर दी. यह येदियुरप्पा के लिए सुनहरा मौक़ा था. अब तक उनकी छवि किसान नेता की हुआ करती थी. मौक़ा देखकर उन्होंने खुद को लिंगायतों के नेता के तौर पर प्रोजेक्ट करना शुरू किया. 2004 आते-आते वो लिंगायत-बहुल उत्तरी कर्नाटक के सबसे बड़े नेता बन चुके थे.

अपनी बारी का इंतजार

मंदिर आंदोलन के बाद बीजेपी ने पहली दफा दक्षिण भारत में अपनी जगह बनानी शुरू की. 1994 के चुनाव में बीजेपी ने पहली बड़ी छलांग लगाई जब वो 4 से सीधा 40 सीट पर पहुंची. 1999 के चुनाव में कांग्रेस की लहर होने के बावजूद बीजेपी 44 सीटें जीतने में कामयाब रही. 1999 से 2004 के बीच बीजेपी लगातार गांव और तालुका स्तर पर घुसने की कोशिश में लगी हुई थी. 2004 के चुनाव में इसका फायदा बीजेपी को मिला. बीजेपी 79 सीट के साथ सूबे की सबसे बड़ी पार्टी बनके उभरी.

2004 के चुनाव के बाद एचडी देवेगौड़ा ने सेकुलरिज्म के नाम पर कांग्रेस से हाथ मिला लिया. धरम सिंह को इस गठबंधन के नेता के तौर पर चुना गया. अगले दो साल तक दो लोग अपनी बारी का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे. पहले एचडी कुमारस्वामी जिन्हें अपने पिता की पार्टी में खुद के लिए जगह बनानी थी. देवेगौड़ा 1994 में ही अपने बड़े बेटे एचडी रवन्ना को अपना सियासी उत्तराधिकारी घोषित कर चुके थे. कुमारस्वामी अपनी जिद्द के चलते पॉलिटिक्स में आए थे. पार्टी के भीतर भी उन्हें अपनी हैसियत हासिल करने के लिए जम कर संघर्ष करना पड़ा रहा था.

इधर सूबे में सबसे बड़ी पार्टी बनने के बाद येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री बनने की संभावनाएं दिखाई दे रही थीं लेकिन इसके लिए जरूरी था कि राज्य में बीजेपी पर कंट्रोल उनके हाथ में रहे. 1996 से 2003 तक केंद्र की सियासत में रहने के बाद अनंत कुमार फिर से कर्नाटक की सियासत में लौट आए थे. उन्हें 2003 में प्रदेश बीजेपी का अध्यक्ष बनाया गया था. अनंत कुमार की वापसी येद्दी के लिए खतरे की घंटी थी. उन्होंने अनंत कुमार को फिर से केंद्र में भेजने के लिए अपना पूरा जोर लगा दिया. आखिरकार पार्टी आलाकमान को उनकी सुननी पड़ी. 2004 के चुनाव के बाद अनंत कुमार को बीजेपी का राष्ट्रीय महासचिव बना दिया गया. उन्हें मध्य प्रदेश, बिहार और छत्तीसगढ़ का प्रभारी नियुक्त कर दिया गया. कर्नाटक में येद्दी के लिए खुला मैदान था.

पीठ में खंजर

2006 की जनवरी में जब कुमारस्वामी ने कांग्रेस से गठबंधन तोड़ा तो यह भावावेश में उठाया गया कदम नहीं था. लंबे समय से कुमार और येदियुरप्पा के बीच समझौते पर बातचीत चल रही थी. कुमार को बस जरूरत भर विधायक अपने पाले में आने का इंतजार था. उन्होंने जेडीएस के 56 में 41 विधायकों को अपने पाले में किया और 18 जनवरी के रोज कांग्रेस की सरकार गिरा दी. इसी दिन शाम को उन्होंने येदियुरप्पा के साथ राजभवन जाकर राज्यपाल टीएन चतुर्वेदी के सामने सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया.

येदियुरप्पा (5)
राजनीतिक गठजोड़ में माहिर हैं येदियुरप्पा.

येदियुरप्पा और कुमारस्वामी ने सत्ता को साझा करने के लिए कश्मीर फॉर्मूले पर समझौता किया था. इसके हिसाब से विधानसभा कार्यकाल के बचे हुए 40 महीनों में से 20 महीने कुमारस्वामी राज्य के मुख्यमंत्री बनेंगे और शेष 20 महीने येदियुरप्पा. पहली बार विधानसभा पहुंचने के 23 साल बाद आखिरकार येदियुरप्पा ने सचिवालय में एक कमरा अपने लिए सुरक्षित करवा लिया. वो कुमारस्वामी की सरकार में उपमुख्यमंत्री बने और 20 महीने बीत जाने का इंतजार करने लगे. लेकिन इस इंतजार को थोड़ा और लंबा होना था.

कुमारस्वामी और बीजेपी के बीच हुए करार के मुताबिक कुमार को 3 अक्टूबर के रोज सत्ता का हस्तांतरण करना था. सितम्बर तक सबकुछ ठीक चल रहा था. 2 सितम्बर को कुमारस्वामी ने बीदर के विधायक मजरुद्दीन पटेल को जेडीएस का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया. हालांकि ये कुमार की पार्टी का ज़ाती मामला था लेकिन इस नियुक्ति ने बीजेपी को असहज कर दिया था. कुमार फिर से एपीआई पार्टी की सेकुलर छवि की चिंता में पड़े हुए थे. लेकिन दो सफत बाद बीजेपी सत्ता के हस्तांतरण को लेकर निश्चिंत हो चुकी थी. वजह बने निकाय चुनाव. इस चुनाव में कुमार ने बीजेपी के साथ गठबंधन को जारी रखा. चुनाव 28 सितंबर को हुए थे और इसके पांच दिन बाद उन्हें येदियुरप्पा के लिए गद्दी छोड़नी थी.

2 अक्टूबर को गांधी जयंती थी और यह कुमार का सीएमओ में आखिरी दिन था. वो राज्यपाल रामेश्वर ठाकुर से मिलने के लिए राजभवन पहुंचे. सियासी हलकों में इसको लेकर अलग-अलग तरीके की अफवाहें उड़ने लगी. इनमें से एक अफवाह यह भी थी कि शायद वो राज्यपाल से विधानसभा भंग करने की अनुशंसा भी कर सकते हैं. ऐसे में कार्यकारी सीएम के तौर पर उनका कार्यकाल 6 महीने और खिंच सकता था. इस मामले में एक रिस्क यह था कि बीजेपी को उनके इस कदम से सहानुभूति जुटाने का मौक़ा मिल जाता.

तनातनी के इस माहौल में मंझे हुए खिलाड़ी ने फिर से मोर्चा संभाल लिया. कुमारस्वामी अपने ज्योतिषी से इस्तीफ़ा देने के समय के बारे में सलाह कर ही रहे थे कि जेडीएस के पितामह एचडी देवेगौड़ा ने एक बयान ने बीजेपी की सांसें फुला दीं. पत्रकारों से बात करते हुए देवेगौड़ा ने कहा –

“कुमारस्वामी कब इस्तीफ़ा देंगे, इसका फैसला पार्टी की पॉलिटिकल अफेयर कमिटी की दिल्ली में होने वाली बैठक में लिया जाएगा.”

देवेगौड़ा के इस बयान को राजनीतिक विश्लेषकों ने इस तरह सुना –

“हमारा अभी सत्ता छोड़ने का कोई मूड नहीं है. हम दिल्ली में कांग्रेस से समर्थन हासिल करने के प्रयास में लगे हुए हैं.”

बीजेपी देवेगौड़ा के बयान के मायने निकाल ही रही थी कि जेडीएस के नए प्रदेश अध्यक्ष मजरुद्दीन पटेल ने नया बम फोड़ दिया.

उन्होंने पत्रकारों से कहा –

“कश्मीर फॉर्मूले पर बनी सहमति का जेडीएस से कोई लेना-देना नहीं है. वो समझौता तो कुमारस्वामी और बीजेपी के बीच में हुआ था.”

मजरुद्दीन के इस बयान के बाद जेडीएस का गेमप्लान खुलकर सामने आया. बीजेपी के पास अब हाथ मलने के अलावा कोई विकल्प बाकी नहीं रहा था.

8 अक्टूबर को आखिरकार कुमारस्वामी ने विधानसभा भंग करने की सिफारिश करते हुए अपना इस्तीफ़ा राज्यपाल को सौंप दिया. कुछ घंटे के बाद राज्यपाल रामेश्वर ठाकुर ने राष्ट्रपति शासन की ताकीद करते हुए एक ख़त दिल्ली भेज दिया. अगले दिन माने 9 अक्टूबर को कर्नाटक में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया.

इस बीच जेडीएस के बागी विधायकों में एक और विद्रोह हो गया. जेडीएस के वरिष्ठ लिंगायत नेता एमपी प्रकाश के नेतृत्व ने कुमारस्वामी धड़े का साथ छोड़ दिया और खुद को सत्ता में बनाए रखने के लिए बीजेपी और कांग्रेस के साथ अलग-अलग स्तरों पर सौदेबाजी शुरू कर दी. इससे कुमारस्वामी के समर्थकों की संख्या घट कर 30 रह गई. ऐसे में उनकी विधानसभा में मान्यता खतरे में पड़ गई.

अंततः अक्टूबर के आखिर में कुमारस्वामी जैसे-तैसे करके बीजेपी को समर्थन देने में कामयाब रहे. हालांकि देवेगौड़ा इसके लिए तैयार नहीं हो रहे थे. कुमार ने नई पार्टी बनाने की धमकी देकर उन्हें इसके लिए राजी किया. आखिरकार 12 नवम्बर को येदियुरप्पा ने कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली.

ये बात येदियुरप्पा भी जानते थे कि वो अपना कार्यकाल पूरा नहीं करने जा रहे हैं. उन्होंने दफ्तर संभालते ही योजनाओं की झड़ी लगा दी. मुफ्त साइकिल बांटना, राशनकार्ड का वितरण, शिमोगा और गुलबर्गा में एयरपोर्ट को मंजूरी और सरकारी कर्मचारियों के ट्रांसफर जैसे कई फैसले उनके कार्यकाल के पहले हफ्ते में हो चुके थे.

येदियुरप्पा का अंदेशा ठीक ही साबित हुआ. मुख्यमंत्री बनने के सात दिन बाद ही में कुमारस्वामी ने उनकी सरकार को दिया समर्थन वापस ले लिया. इसके बाद सूबे में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया. येदियुरप्पा चुनाव की तैयारी में जुट गए.

अमित शाह येदियुरप्पा
बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के साथ येद्दी.

नाम में सबकुछ रखा है

कुमारस्वामी के हाथों मात खाए येदियुरप्पा आखिरकार उसी रास्ते पर गए जिस पर चलते हुए कुमारस्वामी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पहुंचे थे. 2006 में कुमारस्वामी ने एक ज्योतिषी के कहने पर धरम सिंह की सरकार गिरा दी थी. येदियुरप्पा भी अपनी बिगड़ी किस्मत बनवाने के लिए एक ज्योतिषी के पास पहुंचे.

येदियुरप्पा की कुंडली देखने के बाद ज्योतिषी ने उन्हें अपना नाम बदलने की सलाह दी. उन्होंने 11 अक्टूबर 2007 को आधिकारिक तौर पर अपना नाम बदला था. अब तक वो अपना नाम Yediyurappa लिखते आए थे. इसके बाद उनका नाम बदल कर Yeddyurappa हो गया था. संयोगवश यह टोटका काम कर गया था और येद्दी सात दिन के लिए ही सही लेकिन मुख्यमंत्री बन गए.

बदले हुए नाम के साथ वो 2008 के विधानसभा चुनाव में उतरे. इस बार हवा उनके पक्ष में बह रही थी. 110 सीटों के साथ बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. कांग्रेस ने भी अपनी स्थिति को और बेहतर कर लिया था. वो 15 सीटों की बढ़त के साथ 80 विधायकों को सदन में भेजने में कामयाब रही थी. 2006 से 2008 के बीच चले पॉलिटिकल सर्कस का सबसे बड़ा घाटा जेडीएस को उठना पड़ा. वो 30 सीटों की गिरावट के साथ 28 के आंकड़े पर सिमट गई. आखिरकार येदियुरप्पा ढाई दशक की लंबी मशक्कत के बाद मुख्यमंत्री की कुर्सी पर थे.

येद्दी ने इस चुनाव में दोहरी लड़ाई जीती थी. पहली जीत बीजेपी को पहली बार दक्षिण के किसी राज्य में बहुमत दिलाकर हासिल की थी. दूसरी जीत उन्होंने अपनी विधानसभा सीट पर हासिल की थी. वो 1983 से लगातार शिमोगा जिले की शिकारीपुर सीट से चुनाव जीतते आ रहे थे. इस सीट पर 1999 में उन्हें महज एक बार हार का मुंह देखना पड़ा था. इस चुनाव में वो कांग्रेस के महालिंगप्पा से 7561 वोट से चुनाव हार गए थे. 2008 के चुनाव में शिकारीपुर सीट से उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री एस बंगारप्पा चुनौती दे रहे थे. बंगारप्पा समाजवादी पार्टी की टिकट पर चुनाव लड़ रहे थे. उन्हें कांग्रेस का भी समर्थन हसिल था. इस मुकाबले में बंगारप्पा बुरी तरह से पिटे. उन्हें 45,927 के बड़े मार्जिन से हार का मुंह देखना पड़ा.

बलि का बकरा

20 जुलाई 2011. कर्नाटक के लोकायुक्त और पूर्व न्यायाधीश संतोष हेगड़े ने जमीन आवंटन और अवैध खनन के मामले में अपनी रिपोर्ट सौंपी. यह रिपोर्ट एक सप्ताह पहले ही लीक हो चुकी थी. जिन परिस्थितियों में यह लीक हुई थी उसने येदियुरप्पा को और बड़ा खलनायक बना दिया था.

2011 का मानसून सत्र हंगामाखेज रहने जा रहा था. 2 फरवरी को संचार मंत्री दूसरी पीढ़ी के स्पेक्ट्रम की बंदरबांट के चलते जेल में थे. 25 जुलाई 2011 को उन्होंने अदालत से दरख़ास्त की कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पूर्व वित्तमंत्री चिदम्बरम को उनके पक्ष में गवाही देने लिए कोर्ट में बुलाया जाए. साफ़ छवि के मनमोहन सिंह पर हमला बोलने का इससे बेहतर मौक़ा नहीं था.

कांग्रेस के लिए जैसे इतना काफी न था. गांधी परिवार के ख़ास सिपहसालार और कॉमनवेल्थ गेम्स की आयोजक कमिटी के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी 25 अप्रैल 2011 को सीबीआई की हिरासत में थे. कांग्रेस 2जी और सीडब्लूजी में बुरी तरह घिरी हुई थी. उसके पास बचने का कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था. बीजेपी कांग्रेस की छवि पर निर्णायक चोट करने के लिए तैयार थी और ठीक उस दौर में येद्दी भ्रष्टाचार के आरोपों में घिर गए थे. बीजेपी के पास उनकी बलि लेने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था. लेकिन यह इतना आसान नहीं था. 27 जुलाई को काफी छीछालेदर के बाद उन्हें दिल्ली तलब किया गया.

तुगलक रोड और कर्नाटक का तुर्क

27 और 28 फरवरी की दरम्यानी रात. 2 बजने को थे और तुगलक रोड के बंगला नंबर 25 में पांच आदमी अब भी जगे हुए थे. यह बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी का घर था. गडकरी के अलावा यहां मौजूद थे राजनाथ सिंह, अरुण जेटली, वैंकेय्या नायडू और येदियुरप्पा. दिल्ली पहुंचने के साथ ही येदियुरप्पा ने साफ़ कर दिया कि वो आसानी से अपनी कुर्सी छोड़ने वाले नहीं है. अरुण जेटली और बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने भी उन्हें बचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. यह बीजेपी का वो दौर था जब आडवाणी का वचन ही शासन हुआ करता था और आडवाणी ने येदियुरप्पा को विदाई का फरमान जारी कर दिया था. वैंकेय्या नायडू जोकि उस दौर में आडवाणी के खेमे के सबसे भरोसेमंद सिपहसालार माने जाते थे, लगातार येद्दी को मनाने की कोशिश में लगे हुए थे.

येद्दी ने उन्हें मुंहतोड़ जवाब देते हुए कहा, “आप कर्नाटक से राज्यसभा सांसद हैं. आपने कितनी बार कर्नाटक का दौरा किया है? क्या आपने आजतक उन एमएलए या एमएलसी से बात भी की है जिनके दम पर आप यहां तक पहुंचे हैं? आप कर्नाटक के बारे में जानते क्या हैं?”

इसके बाद वैंकेय्या येद्दी को समझाने का साहस नहीं जुटा पाए. रात के 2:30 बजे येदियुरप्पा ने गडकरी का घर छोड़ते वक़्त जो शब्द कहे थे उससे वहां मौजूद चारों लोगों को समझ में आ चुका था कि बीजेपी को आने वाले वक़्त में कर्नाटक में और ज्यादा मुश्किलों का सामना करना होगा.

येद्दी ने बड़े ताव में कहा, “कर्नाटक में येदियुरप्पा का विकल्प सिर्फ येदियुरप्पा है.”

येदियुरप्पा और सिद्धारमैया
सिद्धारम्मैया और येद्दी.

येदियुरप्पा का विकल्प सिर्फ येदियुरप्पा

आखिरकार 31 जुलाई 2011 को येदियुरप्पा को इस्तीफ़ा देने के लिए इस शर्त पर मना लिया गया कि परदे के पीछे से वो ही सरकार चला रहे होंगे. नए मुख्यमंत्री के तौर पर सदानंद गौड़ा का नाम भी उन्होंने सुझाया था. 2006 से सदानंद गौड़ा उनके प्रति वफादार रहे थे. 2007 में जब पार्टी आलाकमान उनके खिलाफ हो गया था. कुमारस्वामी के दगा देने के बाद बीजेपी आलाकमान चाहता था कि येदियुरप्पा मुख्यमंत्री बनने की कोशिश करने के बजाए अपने साथ हुए धोखे का गाना गाकर सहानुभूति बटोरें. तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाने से साफ़ मना कर दिया था लेकिन दिल्ली से बैंगलोर पहुंचते ही उन्होंने मुख्यमंत्री बनने का दावा पेश कर दिया था. उस समय सदानंद गौड़ा पूरी मजबूती से उनके खिलाफ खड़े थे. लेकिन यह सिर्फ वफ़ादारी का बदला चुकाने की भावुक कहानी भर नहीं थी. येद्दी ने सोचे-समझे तरीके से यह फैसला लिया था. सदानंद गौड़ा वोक्कालिगा बिरादरी से आते थे. उनके सीएम बनने से लिंगायतों पर येद्दी की बादशाहत को कोई खतरा नहीं था. दूसरा गौड़ा का कोई ख़ास जनाधार नहीं था. ऐसे में उन्हें काबू में रखना आसान था.

शपथ लेने के कुछ दिन बाद तक गौड़ा येद्दी के कहे मुताबिक चलते रहे. अभी 15 अक्टूबर 2011 में अपने पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते येद्दी को जेल जाना पड़ गया. हालांकि 25 दिन बाद उन्हें इस केस में जमानत मिल गई. इन 25 दिनों में सूबे की सियासत में काफी कुछ बदल गया था. सदानंद गौड़ा यह समझने की भूल कर बैठे कि जेल जाने के बाद येद्दी उनका तख्ता पलटने की भूल नहीं करेंगे.

येद्दी मौके की तलाश में थे. सदानंद गौड़ा भी यह बात जानते थे. उन्होंने आलाकामान के सामने मांग रखी कि प्रदेश अध्यक्ष का पद फिर से उन्हें सौंपा जाए और तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष ईश्वरप्पा को उनकी सरकार में उपमुख्यमंत्री बना दिया जाए. इसके अलावा वो कैबिनेट रीशफल की इजाजत भी मांग रहे थे. उनके इसी कदम ने येद्दी को वो मौक़ा दिया जिसकी उन्हें लंबे समय से तलाश थी.

9 जून 2012. येद्दी ने अपने करीबी 9 मंत्रियों के इस्तीफों का एक पुलिंदा बनाया और उसे लेकर दिल्ली पहुंच गए. दिल्ली में बैठे हुए नेता येद्दी के स्वाभाव को जानते थे. उन्होंने बिना किसी हुज्जत के सदानंद गौड़ा को कुर्सी से नीचे उतारने की बात मान ली. सदानंद गौड़ा की विदाई के बाद येद्दी के कहने पर उनके खास सिपहसालार जगदीश शेट्टार को नया मुख्यमंत्री बना दिया गया.

बीजेपी के विभीषण

2012 में सदानंद गौड़ा का तख्ता पलटने के बावजूद येदियुरप्पा का गुस्सा शांत नहीं हुआ था. वो लंबे समय से अपने समर्थकों से कहते आ रहे थे कि खुद की पार्टी लॉन्च कर देंगे लेकिन सब इसे धमकी ही समझ रहे थे. 30 नवंबर 2013 को उन्होंने सबको चौंकते हुए बीजेपी की प्राथमिक मेम्बरशिप से इस्तीफ़ा दे दिया. इसी दिन हावेरी में एक रैली के दौरान उन्होंने नई पॉलिटिकल पार्टी ‘कर्नाटक जनता पक्ष’ को आधिकारिक तौर पर लॉन्च किया. येद्दी का यह फैसला चौंका देने वाला था लेकिन वो इसकी तैयारी लंबे समय से कर रहे थे. यह पार्टी 2011 में रजिस्टर हुई थी. उस समय पद्मनाभ प्रसन्ना नाम के एक आदमी ने खुद को इसका संस्थापक सदस्य बताया था. 2011 में ही येद्दी दूसरी बार सत्ता से बेदखल हुए थे.

2013 के चुनाव में येदियुरप्पा कर्नाटक जनता पार्टी का नेतृत्व कर रहे थे. वो बीजेपी को खत्म करने की कसमें खा रहे थे. उन्होंने 204 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे. इसमें से 146 अपनी जमानत बचाने में असफल रहे. कुल 10 फीसदी वोट के साथ 6 विधायक इस पार्टी के खाते में गए. येदियुरप्पा की पार्टी चाहे दहाई के आंकड़े को भी न छू पाई हो लेकिन उसने बीजेपी का खेल खत्म कर दिया. बीजेपी इस चुनाव में महज 40 सीटों पर सिमट गई. सिद्धारमैय्या के नेतृत्व में लड़ रही कांग्रेस 122 सीटें जीतने में कामयाब रही.

जब 2018 चुनाव के लिए बीजेपी का घोषणापत्र जारी हुआ
जब 2018 चुनाव के लिए बीजेपी का घोषणापत्र जारी हुआ

2014 आते-आते देश में नरेंद्र मोदी की लहर साफ़ दिखाई देने लगी थी. येदियुरप्पा भी इस बात को समझ गए थे. इसके अलावा अपने दम पर सत्ता पाने के उनके सपने पर भी पानी फिर चुका था. आखिरकार उगते सूरज को सलाम ठोकते हुए वो 2 जनवरी 2014 को बिना किसी शर्त के बीजेपी में शामिल हो गए. उनके साथ उनकी पार्टी के पांच विधायकों ने भी बीजेपी जॉइन कर ली. 2014 के लोकसभा चुनाव में शिमोगा सीट से चुनाव लड़े और रिकॉर्ड 3,63,305 वोटों से चुनाव जीते. 2016 में उन्हें फिर से बीजेपी का प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया था. लेकिन अब येदियुरप्पा क्या करेंगे? उनका कहना है कि वो कर्नाटक में बीजेपी को सत्ता में वापस लाने का काम करते रहेंगे. देखने वाली बात होगी कि यह करते हुए खुद उनकी पार्टी में क्या हैसियत रहेगी?


वीडियो- कर्नाटक में सीएम बीएस येदियुरप्पा की कुर्सी को खतरा क्यों था?

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या इलाही ये माजरा क्या है?

राष्ट्रपति का चुनाव लड़ रहे शख्स से बच्चे ने पूछा- मैं सबको कैसे बताऊं कि मैं गे हूं?

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जवाब दिल जीत लेगा.

'इस्मत आपा वाला हफ्ता' शुरू हो गया, पहली कहानी पढ़िए लिहाफ

'इस्मत आपा वाला हफ्ता' शुरू हो गया, पहली कहानी पढ़िए लिहाफ

उस अंधेरे में बेगम जान का लिहाफ ऐसे हिलता था, जैसे उसमें हाथी बंद हो.

PubG वाले हैं क्या?

PubG वाले हैं क्या?

जबसे वीडियो गेम्स आए हैं, तबसे ही वे पॉपुलर कल्चर का हिस्सा रहे हैं. ये सोचते हुए डर लगता है कि जो पीढ़ी आज बड़ी हो रही है, उसके नास्टैल्जिया का हिस्सा पबजी होगा.

Lefthanders Day: बायां हाथ 'उल्टा' ही क्यों हैं, 'सीधा' क्यों नहीं?

Lefthanders Day: बायां हाथ 'उल्टा' ही क्यों हैं, 'सीधा' क्यों नहीं?

मेरा बाएं-हत्था होना लोगों को चौंकाता है. और उनका सवाल मुझे चौंकाता है.

फेसबुक पर हनीमून की तस्वीरें लगाने वाली लड़की और घर के नाम से पुकारने वाली आंटियां

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और बिना बैकग्राउंड देखे सेल्फी खींचकर लगाने वाली अन्य औरतें.

'अगर लड़की शराब पी सकती है, तो किसी भी लड़के के साथ सो सकती है'

'अगर लड़की शराब पी सकती है, तो किसी भी लड़के के साथ सो सकती है'

पढ़िए फिल्म 'पिंक' से दर्जन भर धांसू डायलॉग.

मुनासिर ने प्रीति को छह बार चाकू भोंककर क्यों मारा?

मुनासिर ने प्रीति को छह बार चाकू भोंककर क्यों मारा?

ऐसा क्या हुआ, कि सरे राह दौड़ा-दौड़ाकर उसकी हत्या की?

सौरभ से सवाल

दिव्या भारती की मौत कैसे हुई?

दिव्या भारती की मौत कैसे हुई?

खिड़की पर बैठी दिव्या ने लिविंग रूम की तरफ मुड़कर देखा. और अपना एक हाथ खिड़की की चौखट को मजबूती से पकड़ने के लिए बढ़ाया.

कहां है 'सिर्फ तुम' की हीरोइन प्रिया गिल, जिसने स्वेटर पर दीपक बनाकर संजय कपूर को भेजा था?

कहां है 'सिर्फ तुम' की हीरोइन प्रिया गिल, जिसने स्वेटर पर दीपक बनाकर संजय कपूर को भेजा था?

'सिर्फ तुम' के बाद क्या-क्या किया उन्होंने?

बॉलीवुड में सबसे बड़ा खान कौन है?

बॉलीवुड में सबसे बड़ा खान कौन है?

सबसे बड़े खान का नाम सुनकर आपका फिल्मी ज्ञान जमीन पर लोटने लगेगा. और जो झटका लगेगा तो हमेशा के लिए बुद्धि खुल जाएगी आपकी.

'कसौटी ज़िंदगी की' वाली प्रेरणा, जो अनुराग और मिस्टर बजाज से बार-बार शादी करती रही

'कसौटी ज़िंदगी की' वाली प्रेरणा, जो अनुराग और मिस्टर बजाज से बार-बार शादी करती रही

कहां है टेलीविज़न का वो आइकॉनिक किरदार निभाने वाली ऐक्ट्रेस श्वेता तिवारी?

एक्ट्रेस मंदाकिनी आज की डेट में कहां हैं?

एक्ट्रेस मंदाकिनी आज की डेट में कहां हैं?

मंदाकिनी जिन्हें 99 फीसदी भारतीय सिर्फ दो वजहों से याद करते हैं

सर, मेरा सवाल है कि एक्ट्रेस मीनाक्षी शेषाद्री आजकल कहां हैं. काफी सालों से उनका कोई पता नहीं.

सर, मेरा सवाल है कि एक्ट्रेस मीनाक्षी शेषाद्री आजकल कहां हैं. काफी सालों से उनका कोई पता नहीं.

‘दामिनी’ के जरिए नई ऊंचाई तक पहुंचा मीनाक्षी का करियर . फिर घातक के बाद 1996 में उन्होंने मुंबई फिल्म इंडस्ट्री को बाय बोल दिया.

ये KRK कौन है. हमेशा सुर्खियों में क्यों रहता है?

ये KRK कौन है. हमेशा सुर्खियों में क्यों रहता है?

केआरके इंटरनेट एज का ऐसा प्रॉडक्ट हैं, जो हर दिन कुछ ऐसा नया गंधाता करना रचना चाहता है.

एक्ट्रेस किमी काटकर अब कहां हैं?

एक्ट्रेस किमी काटकर अब कहां हैं?

एडवेंचर ऑफ टॉर्जन की हिरोइन किमी काटकर अब ऑस्ट्रेलिया में हैं. सीधी सादी लाइफ बिना किसी एडवेंचर के

चाय बनाने को 'जैसे पापात्माओं को नर्क में उबाला जा रहा हो' कौन सी कहानी में कहा है?

चाय बनाने को 'जैसे पापात्माओं को नर्क में उबाला जा रहा हो' कौन सी कहानी में कहा है?

बहुत समय पहले से बहुत समय बाद की बात है. इलाहाबाद में थे. जेब में थे रुपये 20. खरीदी हंस...

सर आजकल मुझे अजीब सा फील होता है क्या करूं?

सर आजकल मुझे अजीब सा फील होता है क्या करूं?

खुड्डी पर बैठा था. ऊपर से हेलिकॉप्टर निकला. मुझे लगा. बाबा ने बांस गहरे बोए होते तो ऊंचे उगते.