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कॉमरेड चंदू की कहानी जिसे दिन-दहाड़े गोलियों से भून दिया गया

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आपके हिस्से कुछ बरगद बिना कोशिशों के आ जाते हैं. वो भी बिलकुल नए नवेले. बुजुर्गों में जवान से. जवानों में कुछ उधर की तरफ को बसे. हिमांशु पंड्या ऐसे ही हैं. हमारे लिए. हिंदी के मास्टर. जेएनयू के मेरे सीनियर. पढ़ने लिखने विचारने वाले इंसान. वामपंथी सरोकारों की तरफ झुकाव. मगर पर्ची कटाऊ अंध श्रद्धा से सिरे से मुक्त.

और हां. सिर्फ मुंहाचाही भर के प्रगतिशील नहीं हैं. जीवन और आचरण में भी वैसे ही हैं. ये एक जरूरी चीज है. गोकि इस पर बात करना अश्लील माना जाने लगा है. पर आखिर तो बात वही है. कि आप कैसे जीते हैं. वैसे ही अपना दर्शन रचते हैं. और जो मुंह और कलम से रचते हैं. वो कुछ पीछे को ठहरता है.

आजकल राजनीति का भक्तिकाल नए सिरे से परवान चढ़ा है. सबने अपने-अपने देवता, तीरथ और मंतर चुन लिए हैं. उनकी बुदबुदाहटें एक फरेबी सुकून दे देती हैं. अगरबत्तियों का धुंआ चिलम चमत्कार को मात दे रहा है. किसी को मोदी में मुक्ति नजर आ रही है, तो कोई कन्हैया में तारणहार खोज रहा है.

पर आखिर में धूमिल की वो लाइन ही मिलती है. जो अब सेक्सिस्ट होने के कारण टेक्स्ट से हटाई सी जा रही है. मैंने जिसकी भी पूंछ उठाई. उसको मादा पाया. आप त्योरियां चढ़ाएं पर पहले याद करें कि पाठ संदर्भ से भी तय होता है.

और धूमिल ने ये बात मादा या औरत जात के खिलाफ नहीं लिखी थी. बस एक चालू मुहावरा उठाया था.

और कन्हैया कुमार ने हमें क्या मुहावरा दिया. ये कि ये मेरा संस्कार है. लालू प्रसाद यादव के लपककर पैर छूना.

कन्हैया के एक पुरखे हैं. चंद्रशेखर.चंदू बोलते हैं हम उन्हें. उन्हें भी लपककर छुआ था. सीवान के गुंडों की गोलियों ने. लालू राज में. वो आतंक का संस्कार था.

अब कन्हैया ने दोनों का गठजोड़ कर दिया है.

बधाई.

और हां. हम ये सवाल होशो हवास में उठा रहे हैं. और जो कॉमरेड जानना चाहें तो. हम ‘जी न्यूज’ से भी नहीं हैं.

अब आप हिमांशु पंड्या की ये कहानी पढ़िए. चंदू के दौर को याद करती.

हम अकसर दोहराते हैं. वो जवानी जवानी ही क्या. जिसकी कोई कहानी न हो. और कहानियां सिर्फ फूलों, कविताओं की मिट्टी से घर नहीं बनातीं. उन्हें कुछ जोश. कुछ संकल्प. कुछ सपने. कुछ तकलीफें भी चाहिए होती हैं गारा गाढ़ा करने के लिए.

– सौरभ द्विवेदी 


शमशेर बहादुर सिंह ने तीन चीजों को सबसे जरूरी बताया था—  ऑक्सीजन,  मार्क्सवाद और जनता के आईने में अपनी शक्ल। उन्होंने कविता का जिक्र इसलिए नहीं किया कि कविता उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा थी। इसे अलग से रेखांकित करने की उन्हें जरूरत ही महसूस नहीं हुई। वह पूरावक्ती कवि थे।

यह कहानी आलोकधन्वा की एक कविता के बारे में है, जो अचानक जीता-जागता साकार जीवन हो गई। लेकिन उसके बारे में बताने के लिए पहले बहुत-सी बातें बतानी होंगी।

(आगे इस कहानी में सभी पात्रों को क, , ग आदि नाम से संबोधित किया गया है, पहले किस्से का क दूसरे किस्से का क हो, यह जरूरी नहीं, पर सबका एक ही नाम इसलिए क्योंकि वे सब थे। बस यह ध्यान रखें कि अल्पप्राण अक्षर लड़कों के परिचायक हैं और महाप्राण लड़कियों के।)

उनके भीतर बारिश का पानी ठहर गया है

क का बोलना जारी था, कभी-कभी इच्छा होती है, मैं चंदू का ओवरकोट पहनकर बाहर निकल जाऊं। ठीक है वह नहीं है, लेकिन मुझे, हमें उसकी कितनी जरूरत है। क्यों न मैं चंदू हो जाऊं। यह सघन लड़ाइयों के बीच एक ठहरी हुई शाम थी जो न आते आते आई थी। चंदू की मौत की खबर से लेकर अब तक सब सड़क पर थे, लड़ रहे थे और इसका आकलन करने से बच रहे थे कि उन्होंने क्या खो दिया है। ठीक उसी समय ग ने पीछे मुड़कर देखा, ख— जो कैंपस की सबसे फायरब्रांड लड़ाका मानी जाती थी मेस के कोने की दीवार में अपने घुटनों में मुंह छुपाए फफक रही थी।


जिस रात बांध टूटा

31 मार्च को तुम नहीं थे, घर पर यह खबर सुनकर कैसा लगा? क्या बताऊं, ‘आज तक’ पर क, ख, च, ट, ढ कितने लोग दिखे, बिहार भवन के बाहर गोलियां चलती दिखीं और फिर बेसाख्ता गालिब याद आए, ‘हम बयाबां में हैं और घर में बहार आई है।’ बहार! शे’र के ऐसे इस्तेमाल को क देखता रह गया और ख और ग ने ठहाका लगाया।


माणिक वह देखो बह रही है हमारी पद्मा

आज तक की इस रिपोर्ट को बार-बार बारीकी से देख गिनकर ही एस पी ने बताया था कि बिहार भवन पर इक्कीस राउंड फायरिंग हुई थी। आगे अजय भारद्वाज की दस्तावेजी फिल्म और होने वाली जांच के लिए भी यही फुटेज सबसे पुख्ता सबूत होनी थी। एस पी ने इसे बार-बार ध्यान से देखा भागलपुर कांड को सामने लाने वाले, मंडल विरोधी अंधड़ में अकेले साहसपूर्वक वंचितों के पक्ष में खड़े होने वाले, गणेश के दुग्धपान का सच सामने लाने वाले एस पी के लिए खबरें जीवन की लड़ाइयों से निकलती थीं। एस पी पत्रकारिता में कविता की भाषा के घालमेल के विरोधी थे, उनके लिए पत्रकारिता ही कविता थी। वे पूरावक्ती पत्रकार थे। ढाई महीने बाद, उपहार सिनेमा अग्निकांड की रिपोर्ट उन्होंने तैयार की, दिखाई और उसी रात कोमा में चले गए।


काली रात बहुत काली होती थी सफेद रात बहुत सफेद होती थी 

मोहम्मद शहाबुद्दीन राष्ट्रीय जनता दल का सांसद था। उसके नाम हत्या, अपहरण, डकैती, फिरौती के मामले दर्ज थे। राजद धर्मनिरपेक्ष संयुक्त मोर्चे का एक महत्वपूर्ण घटक था। संयुक्त मोर्चे को एक कम्युनिस्ट पार्टी का संसद में समर्थन हासिल था, दूसरी कम्युनिस्ट पार्टी सरकार में शामिल थी। देश का गृहमंत्री एक वरिष्ठ वामपंथी नेता था और दिल्ली की सड़कों को पूरे हफ्ते भर से नौजवान लड़के-लड़कियों ने एक वामपंथी छात्र की दिनदहाड़े हुई हत्या की सीबीआई जांच के लिए जाम कर रखा था। बथानी टोला और लक्ष्मणपुर बाथे के दलितों और छत्तीसगढ़ के आदिवासियों को चीरने वाली गोलियों के बारे में धुंधलका था कि वे धर्मनिरपेक्ष बंदूक से निकली थीं या सांप्रदायिक बंदूक से। कैंपस का सबसे बड़ा वाम छात्र संगठन चुनाव से ऐन पहले कश्मीर पर जो पोस्टर जारी करता था, उसे आसानी से नाम बदलकर विद्यार्थी परिषद् का बनाया जा सकता था। दक्षिणपंथ को रोकने के लिए आक्रामक राष्ट्रवाद और पितृसत्ता से सुविधाजनक समझौते आवश्यक थे। क्रांति ने चुनाव के आगे घुटने टेक दिए थे। अंहकार वही था कि उनको हराना है तो हमारे साथ आओ। दक्षिण को रोकने के लिए वाम थोड़ा दक्षिण हुआ जाता था और दक्षिण बढ़ता जाता था। उपाध्यक्ष, महासचिव और संयुक्त सचिव के पद पर विद्यार्थी परिषद् जीती थी और अध्यक्ष के पद पर महज तीन वोट से जीत कर वामपंथ बमुश्किल अपनी साख बचा पाया था। नरेंद्र मोदी के सामने जीत का दावेदार कोई अजय राय था जो उत्तर प्रदेश में समानांतर सत्ता के गौरवशाली पद ‘बाहुबली’ को धारण करता था और जो धर्मनिरपेक्ष होने से पहले तीन बार भाजपा का विधायक रह चुका था।

चीजें कुछ गड्डमड्ड हो रही हैं। लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार दिसंबर, 1997 में हुआ था और कुछ और घटनाएं भी शायद बाद की हैं, ऐसा लगता है। यह कहकर छूट ली जा सकती है कि कहानी में स्मृति का एकायामी होना आवश्यक नहीं पर ऐसा लिखना ज्यादा उचित होगा कि सोलह मई, दो हजार चौदह से पहले के हिंदुस्तान में बैठकर कहानी लिखते समय काल को कल्पनाविहीन एकायामी रास्ते पर चलने देना अपराध है।

शमशेरआज कविता की जरूरत सबसे ज्यादा है।


कभी-कभी तो इससे सीखना भी पड़ सकता है

यह अगले छात्रसंघ चुनाव की बात है। सतलज मेस से गूंजती आवाजें सभा की सफलता का आभास दे रही थीं। ग ने पूछा, ‘क्या हमें चलना चाहिए?’ ख ने कहा, टॉस कर लेते हैं। नीचे जाते हुए क ने कहा, मैं सिक्का जमीन पर आने से पहले ही जान गया था कि हमें क्या करना है! कॉमरेड सीताराम येचुरी का भाषण समाप्त हो गया था, सवाल जवाब का सत्र चल रहा था। क ने पूछा, कॉमरेड, आपको पता है, हमारे दोस्त, साथी और भूतपूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष कॉमरेड चंद्रशेखर की सीवान में दिनदहाड़े हत्या कर दी गई थी। इसके विरोध में सारा छात्र समुदाय आंदोलन कर रहा था जिसमें आपकी पार्टी का छात्र संगठन भी शामिल था। उसमें सभी नए-पुराने छात्र जुड़ रहे थे। तीन भूतपूर्व छात्रसंघ अध्यक्षों— अमित सेनगुप्ता, शकील अहमद खान और प्रणय कृष्ण द्वारा संयुक्त रूप से एक अपील जारी की गई थी, जिसमें खासतौर पर पुराने छात्रसंघ पदाधिकारियों का आह्नान किया गया था कि वे आकर इस लड़ाई को मजबूत बनाएं। आपका शामिल होना तो दूर, कोई बयान तक नहीं पढ़ा हमने। कॉमरेड, जब कैंपस सुलग रहा था, तब आप कहां थे? वह एसएफआई की मीटिंग थी, एबीवीपी की नहीं, इसलिए तमाम व्यवधानों के बावजूद ख और ग ने भी यही सवाल दोहराया और उन्हें सुना भी गया। यह एसएफआई की मीटिंग थी, एबीवीपी की नहीं, पर कॉमरेड सीताराम येचुरी ये भूल गए थे। कॉमरेड, आपने क्या मुझे बुलाया था? एक पोस्टकार्ड ही डाल देते, पब्लिक बूथ से जाकर एक फोन ही कर कर देते, एक रुपए ही खर्च होता आपका…।

यानी एक पार्टी, जिसके नाम में ‘कम्युनिस्ट’ जुड़ा था और जिसके पीछे एक राज्य में भूमि सुधार का गौरवशाली इतिहास था, आज जनसंघर्षों में शामिल होने के लिए निमंत्रण पत्र की अपेक्षा रखती थी। लेकिन सतलज मेस की ताली पीट रही भीड़ को इस विडंबना के काव्यात्मक निहितार्थ नहीं पता थे। भीड़ में कविता नहीं हो सकती, सिर्फ कुमार विश्वास हो सकते हैं।

तय पाया गया कि इस संवाद को एक पर्चे के जरिए सब तक पहुंचाया जाए। लेकिन आचार संहिता लग चुकी थी। हम पर्चा बांट नहीं सकते, हम नहीं ‘बांटेंगे’ घ ने जिम्मेदारी ली। वह झेलम लॉन के बीचों-बीच पर्चे का गठ्ठर लेकर बैठ गई। सबने खुद आकर पर्चा ले लिया च— जो एसएफआई का थिंक टैंक था,  यह उसके बारे में गर्व से कहा जाता था और पार्टी में सोचने का काम वही करता था। और जो आजकल टी.वी. बहसों में पार्टी का सबसे प्रमुख चेहरा है— भी आया। उसने पर्चा लिया, पढ़ा, फिर उसके छोटे-छोटे, छोटे-छोटे, छोटे-छोटे, छोटे-छोटे टुकड़े किए।

घ को अपने पहले चुंबन से भी ज्यादा यह स्मृति आनंद देती है।


सिर्फ उड़ानें बची रह जाती हैं

 के कमरे में ग को घुसते देख च थोड़ा आश्चर्यचकित हुआ क्योंकि दोनों के बीच बोलचाल के संबंध नहीं थे। उस दिन जब पीएम रेजिडेंस के बाहर हुए लाठीचार्ज में डंडा खाकर मैं गिर गया था, तब न जाने कहां से ग और उसके दोस्त आए और मुझ पर ढाल बनकर बिछ गए। वर्ना आज हाथ ही टूटा है, शायद काफी कुछ टूट-फूट गया होता। कहते हुए क ने अपना प्लास्टर वाला हाथ माथे तक लाया—  सलाम, शुक्रिया या हो सकने वाले नुकसान का आभास, पर ग यह देखने के लिए मौजूद नहीं रहा, वह चाय का गिलास रखकर जा चुका था। वैसे, मैटर ऑफ फैक्ट, ग एसएफआई से था।


उस देश का नाम बाढ़ में बह गए मेरे पिता का नाम भी हो सकता है

एक हत्यारी गोली सुरक्षित परिसर के भीतर चली आई थी और परिसर बहसों की सुषुप्तावस्था से निकलकर चौंक पड़ा था। ठीक से पता नहीं था कि यह गोली वह थी जो विस्थापन का विरोध कर रहे आदिवासियों पर चलती या वह जो इज्जत को रोटी के ऊपर तवज्जोह देने वाले दलितों पर चलती या वह जो नौजवान मुसलमान युवक-युवतियों का राष्ट्रहित में एनकाउंटर करती। परिसर, परिसर से बाहर निकल आया था पर उसे पता नहीं था कि वह गुस्से में उछाले पत्थर का निशाना किसे बनाए।

***

रिंग रोड को जाम हुए आध घंटा हो गया था। दिल्ली की जीवन रेखा रुकी हुई थी। च को लग रहा था कि अनंतकाल तक वह यहीं बैठा रहे। क की इस बात को मानने को कोई तैयार नहीं था कि अब जाम हटा लिया जाए, ग को याद आया कि क ने कहा भी था कि ‘चंदू था तो बोलते हुए भरोसा रहता था कि कोई एक तो सुनेगा’, ‘आज क की कौन सुनेगा?’ ग ने सोचा और तभी क ने अपने अगले वाक्य से बताया कि चंदू के न रहने से उसे सुनने वालों की संख्या गणितीय ढंग से घटकर शून्य नहीं हो गई है, चंदू होता तो ऐसा ही करता।


सरकार ने नहीं —  इस देश की सबसे सस्ती सिगरेट ने मेरा साथ दिया

यह अगले लोकसभा चुनावों की बात है। क से ख ने कहा कि वे— ख, ग और घ सीवान जा रहे हैं, चुनाव प्रचार के लिए। क ने कहा कि वह भी चलेगा। तय हुआ कि दो दिन बाद चला जाएगा पर वे तीनों क से मिल नहीं पाए और निकल गए। क भी अगली ट्रेन से निकल पड़ा। जीवन में पहली बार उसने बिना रिजर्वेशन यात्रा की और वह भी बिहार जाने वाली ट्रेन में। तीन घंटे बाद दोनों टांगें ठीक से जमीन पर टिकीं और छह घंटे बाद पीठ टिकाकर बैठने को मिला, जमीन पर। बैरिकेड्स के अलावा भी संघर्ष के कई ठोस मुकाम होते हैं। वही शॉल चादर भी बनी बिछौना भी, जो छ ने उसे जबरदस्ती दे दी थी, जब वह उसे स्टेशन छोड़ने आई थी।


क्या इस आकस्मिक चुनाव के बाद मुझे बारूद के बारे में सोचना बंद कर देना चाहिए

आगे की कुछ घटनाएं ये हैं। वर्ष दो हजार पांच में नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने के बाद राजद के सांसद शहाबुद्दीन का दायरा सिमटना शुरू हुआ और उनके लिए जेल से समानांतर सत्ता संभालना भी संभव नहीं रहा। उनके कई ‘दाएं हाथ’ अब जदयू में हैं। नए अधिनियम के तहत जब शहाबुद्दीन चुनाव लड़ने के अयोग्य करार दिए गए, तब 2001 में उनकी पत्नी हिना शहाब प्रत्याशी बनी। हिना शहाब को जदयू के बागी उम्मीदवार ओमप्रकाश यादव ने हराया। तब निर्दलीय रहे ओमप्रकाश यादव वर्ष 2014 में भाजपा की ओर से प्रत्याशी हैं। जल्दी बताइए, 16 मई को कौन जीतेगा— धर्मनिरपेक्षता या सांप्रदायिकता? या चलिए ये बताइए— कौन हारेगा?

वर्ष 2012 में चंद्रशेखर की हत्या के जुर्म में तीन लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। वे तीनों भाड़े के हत्यारे थे। एक फिल्म निर्देशक— जो चंद्रशेखर पर फिल्म बनाने की घोषणा कर चुके हैं— ने कहा कि आखिरकार चंद्रशेखर को इंसाफ मिला और यह सुनकर न जाने क्यों माया कोडनानी, डीजी वंजारा और बाबू बजरंगी को हंसी आ गई।


दुनिया रोज बनती है

 ख ग घ की सीवान यात्रा का फल यदि आप जानना चाहें तो कुल जमा यह रहा कि शहाबुद्दीन इस बार भी भारी अंतर से जीता। सीवान के गांवों में धूल-धक्कड़  में दस-बारह दिन के रोमांचकारी प्रचार अभियान का हिस्सा बनने से भारत का सामाजिक यथार्थ पता चल जाएगा, ऐसी कोई खुशफहमी क को नहीं थी। लेकिन एक बात थी, जो याद रही। परिसर में आगे ख जब भी बोलने खड़ी हुई, उसने कभी भी इस यात्रा के लिए ‘हम आइसा के सदस्य’ नहीं कहा, हमेशा ‘हम जेएनयू के विद्यार्थी’ ही कहा, यहां तक कि चुनावी भाषण के दौरान अपने दल की उपलब्धियां गिनाते हुए भी। सिर्फ क के कारण, बाकी तीन आइसा के थे। क को अपने दोस्त, पिछली कहानी के क की याद आई जिसे भरोसा था कि कोई नहीं सुनेगा तो चंदू तो सुनेगा। यही भरोसा इस सफर का हासिल था।

क ख ग घ च छ ज झ ट ठ ड ढ प फ ब भ किसी ने भी इस लड़ाई में ऐसा कुछ हासिल नहीं किया जिसे ‘जुज तेरे और को’ समझाया जा सके। उन्होंने सिर्फ जिंदगी भर की दोस्तियां कमाईं और यह सीखा कि कोई लड़ाई अकेली नहीं है और कोई लड़ाई अकेले नहीं लड़ी जा सकती। लेकिन इसके लिए सुरक्षित चहारदीवारी को लांघकर एक गोली का आना जरूरी होता है शायद। गोली चाहे पोस्टर दागे या बंदूक, जिंदगी की रफ्तार और तेज होती है। कुछ लोग सोलह मई का इंतजार नहीं करते हैं, वे भगाणा की बलात्कार की शिकार हुई दलित लड़कियों की लड़ाई में साथ आ मोर्चा बनाते हैं।


ऊंची घास की जड़ों के बीच छोटे-छोटे फूल खिलते थे

…और ठीक एक साल बाद, 31 मार्च, 1998 को चंद्रशेखर की शहादत की बरसी पर जुलूस से लौटे नौजवान जब गंगा ढाबा पर बैठे थे और रात के 12.30 हो रहे थे, क ख से पूछ रहा था कि जो हासिल वह समझ पा रहा है, क्या उसका कोई मानी है, तभी ख ने— एक अहिंदीभाषी लड़की ने हिंदी की एक कविता के जरिए क को समझाया कि भगत सिंह, पाश, गोरख पांडे और चंद्रशेखर की शहादतों का महीना मार्च इसलिए है क्योंकि यही टेसू के खिलने का मौसम है। उसने कहा, सुन, तू मुझे भगा ले चल, अभी के अभी। मैं किसी को नहीं बताऊंगी कि अप्रैल आ गया था। मैं आधे घंटे का झूठ बोल दूंगी…।


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