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दुनिया का सबसे भयानक युद्ध हुआ, जिसमें जीता वो जो सबसे तेज भागा

क्या कोई युद्ध ऐसा भी होता है जिसमें पहले से तय हार को जीत में बदल दिया गया हो? वो भी सेना को तोड़कर?

ये ईसा से लगभग पांच सौ साल पहले की बात है.  विशाल पर्शियन साम्राज्य अपने चरम पर था. पर्शिया के सम्राट डेरियस को यह मुगालता था कि ईश्वर उनके साथ है. डेरियस ने जितना बड़ा साम्राज्य खड़ा किया था, उतना पहले नहीं देखा गया था. सिन्धु नदी के किनारे से लेकर नील नदी तक सिर्फ फारसी झंडा लहरा रहा था. उस दौर में किसी भी राजा के पास इतना साहस नहीं था कि वो फारस की सेनाओं से टक्कर ले सके. जिस राज्य पर फारसी घेरा पड़ता, उसका सीधा सा मतलब होता था: “आत्मसमर्पण करना है”. डेरियस का मन पूरब से भर गया था. वो अब पश्चिम जीतना चाहता था. उसने अब अपना रुख यूरोप की तरफ किया.

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डेरियस द ग्रेट

उस समय यूरोप के ग्रीस में सिटी स्टेट का दौर हुआ करता था. मतलब वहां राज्य थे, जो मॉडर्न चीज थी. इसमें मुख्य थे एथेंस, स्पार्टा और क्रान्थ. लेकिन आत्मसमर्पण शब्द ग्रीक शब्दावली में जुड़ा नहीं था. क्योंकि 20 साल पहले ही एथेंस ने अपने राजा हेपियस से छुटकारा पाया था. अब वो एक गणराज्य था. एक गणराज्य जो कि अपनी आजादी के लिए कुछ भी दांव पर लगा सकता था.

पर डेरियस को दूसरों की डिक्शनरी बदलने की आदत थी

डेरियस पहले से ही एथेंस से खफा था. वजह थी लोनियन विद्रोह. लोनियन एशिया माइनर का छोटा सा ग्रीक टापू था, जिसे 540 बीसी में फारस ने जीत लिया था. 499 बीसी में यहां पर एरिस्टागोरस के नेतृत्व में ग्रीक लोगों ने फारसी शासन के खिलाफ विद्रोह कर दिया. इस विद्रोह में एथेंस ने फारसी खेमे के खिलाफ अपने सैनिक भेजे थे. डेरियस भूला नहीं था इस बात को. उस वक्त के राजा मान और अपमान भूलते नहीं थे. ना ही दोस्ती और दुश्मनी.

ऐसी किंवदंती है कि हर रोज खाने के वक़्त डेरियस का एक सेवक उसके कानों में फुसफुसाता था, “एथेंस को सबक सिखाना है.”

डेरियस ने अपने सबसे भरोसेमंद जनरल डेटिस को इस सैन्य अभियान का जिम्मा सौंपा. डेटिस ने 600 जहाजी बेड़ों के साथ दक्षिणी यूबोयिन खाड़ी में अपने लंगर डाल दिए. एरीट्रिया पर कब्ज़ा महज औपचारिकता थी. इस तरह पहला ग्रीक सिटी स्टेट दुश्मन के कब्जे में था. डेटिस को अपनी सेना पर पूरा भरोसा था. 25 हजार इन्फैन्ट्री, एक हजार घुड़सवार, कुख्यात फारसी इमॉर्टल (माना जाता था कि ये मर नहीं सकते) और सीरिया के जानलेवा तीरंदाजों के साथ उसने मैराथन के मैदान में घेरा डाल दिया. साथ में था एथेंस का निर्वासित राजा हेपियस, जिसे उम्मीद थी कि फारसी सेना की मदद से वो अपना राज्य फिर से हासिल कर लेगा.

एथेंस के पास अपनी रक्षा के लिए ज्यादा मौका नहीं था. उसने स्पार्टा के पास मदद की गुहार लगाई. लेकिन स्पार्टा ने यह कह कर मना कर दिया कि अभी वो अपने धार्मिक त्यौहार मनाने में व्यस्त हैं.

इस तरह मैराथन के मैदान में 11 हजार सैनिकों के साथ एथेंस अपने कमांडर मेल्टायडीस के भरोसे खड़ा था. इसके साथ ही भरोसा था उनको अपनी रणनीति का जिसको हाप्लान लाइन कहते हैं.

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प्राचीन ग्रीस के जंगजू एक ख़ास किस्म की शील्ड का इस्तेमाल करते थे. इस शील्ड का नाम था हाप्लान. इस शील्ड की खासियत यह थी कि यह चमड़े के बेल्ट के जरिए हाथ में फंस जाती थी. यह शील्ड लकड़ी की बनी होती थी, जिस पर पतला कांसा चढ़ा होता था. लम्बी रियाज के चलते ग्रीक योद्धाओं के लिए यह लगभग हाथ के हिस्से जैसी ही बन जाती थी. इसके अलावा उस समय लंबे भालों का चलन था. ये दोनों हथियार मिल कर हाप्लान लाइन बनाते थे. शील्ड सैनिकों को तीर से बचाती थी और लम्बे भाले दुश्मन को एक निश्चित दूरी से आगे नहीं आने देते.

डेरियस के जनरल डेटिस ने एक चाल चल दी

डेटिस ने पांच दिन तक घेरा डाल रखा था, पर दोनों तरफ से सिर्फ घूरा जा रहा था. कुछ हो नहीं रहा था. तो बड़ी सेना का मालिक होने के नाते डेटिस को ही कुछ करना था. अब डेटिस ने अपनी रणनीति को बदलने का फैसला किया. उसकी योजना थी कि जिस समय मेल्टायडीस अपनी सेना के साथ मैराथन मैदान में उनके खिलाफ खड़ा रहेगा, ठीक उसी समय वो अपनी आधी सेना के साथ सीधा एथेंस पर हमला बोल देगा. मतलब एथेंस की सेना मैदान में और एथेंस डेटिस के कब्जे में. रात के अंधेरे में डेटिस ने अपनी घुड़सवार सेना और 15 हजार की इन्फैन्ट्री को फिर से जहाजों में चढ़ा दिया. अपने 12 हजार सैनिक पीछे छोड़ दिए ताकि वो मेल्टायडीस को मैराथन में उलझा कर रखें.

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www.emersonkent.com से

फंसने पर मेल्टायडीस ने अपने मन में एक शब्द दोहराया

मेल्टायडीस को डेटिस की योजना की जानकारी मिल गई. अब उसके सामने धर्म संकट की स्थिति पैदा हो गई. अगर वो मैराथन से पीछे हटता है तो डेटिस की 12 हजार की इन्फैन्ट्री एथेंस पर चढ़ाई कर देगी. अगर वो यहीं डटा रहता है तो उसके पीठ पीछे एथेंस दुश्मन के कब्जे में चला जाएगा. मेल्टायडीस ने हालात का मुआयना किया और अपने मन में एक ग्रीक शब्द दोहराया, “कायरोस.” माने कि यही मौका है. उसने उपाय खोज लिया.

डेटिस ने अपनी विशाल सेना के हिसाब से ही मैदान चुना था. यह एक खुला तटीय इलाका था. घुड़सवार सेना डेटिस के बेड़े के साथ एथेंस की तरफ कूच कर चुकी थी. इससे मेल्टायडीस की आधी चिंता समाप्त हो गई थी. अब उसे फ़िक्र थी तो सिर्फ सीरियन तीरंदाजों की. ये तीरंदाज टुकड़ी फारसी सेना की सबसे जानलेवा टुकड़ी थी और तीन सौ गज के घेरे में खड़ी किसी भी जिंदा चीज को फौत करना इसके लिए चुटकियों का काम था. मेल्टायडीस ने तय किया कि उसकी सेना तीन सौ गज की यह जानलेवा दूरी दौड़ कर पूरी करेगी.

अपने भारी आर्मर के साथ ग्रीक सेना ने यह कर दिखाया. ये एक करिश्मा था.

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मैराथन की लड़ाई

मेल्टायडीस ने इस जंग में एक और जुआ खेला. रवायती तौर पर कोई भी इंफैन्ट्री बीच से सबसे ज्यादा मजबूत और किनारों से कमजोर होती है. मेल्टायडीस ने यह समीकरण उलट दिया. इससे फायदा यह हुआ कि उसकी सेना के दोनों किनारे मजबूती के साथ दुश्मन के खिलाफ टिके रहे और केंद्र धीरे-धीरे पीछे हटता चला गया. इस ट्रूप फ़ॉर्मेशन से यह फायदा हुआ कि फारसी सेना अपने आप ग्रीक घेरे में फंसती चली गई. फारसी सेना चारों तरफ से घिर गई और फिर शुरू हुआ असली कत्लेआम. तीन घंटे के अंदर युद्ध खत्म हो गया. 6400 फारसी सैनिक ग्रीक भाले और तलवारों का शिकार हुए. बाकी भाग खड़े हुए. एथेंस ने महज 192 सैनिक खोये थे. मेल्टायडीस के पास दुश्मनों का पीछा करने का मौका नहीं था और ना जीत की खुशी मनाने का समय. ग्रीक सैनिकों ने अपनी पीठ घुमाई और एथेंस की ओर रुख किया.

उधर जब डेटिस अपने बेड़े के साथ एथेंस पहुंचा तो हैरान रह गया.  मेल्टायडीस एथेंस की दीवार पर खड़ा उसका इंतजार कर रहा था.

मेल्टायडीस को समझ में आ चुका था कि उसके पास सुस्ताने का समय नहीं था. अगर वो थोड़ी भी देर रुकता तो मोर्चे पर जीतने के बावजूद युद्ध हार जाता. ग्रीक सैनिक अपने भारी-भरकम आर्मर पहने हुए पूरी रात चलते रहे. इस थका देने वाली यात्रा के बाद सुबह वो एथेंस की दीवार पर अपने देश को बचाने के लिए पूरी सख्ती के साथ खड़े थे. डेटिस के पास मैराथन के कत्लेआम की खबर पहुंच गई. वो इतना पस्त हो गया कि अपने सैनिकों को किनारे पर उतरने की हिम्मत ना जुटा पाया. उसने एथेंस के सामने जहाज से तीन चक्कर लगाए और हमेशा के लिए फारस लौट गया.

लड़ाई पर बनी डॉक्यूमेंट्री:

लड़ाई पर बनी फिल्म:

एक लड़के ने एथेंस के लोगों को खबर दी और अमर हो गया

जिस समय मैराथन में युद्ध हो रहा था, उस समय एक जगह से दूसरी जगह सन्देश भेजने का आम जरिया हुआ करते थे, पैदल संदेशवाहक. किस्सा यह है कि मेल्टायडीस ने अपनी इस जीत का संदेश देने के लिए एक सैनिक को चुना. नाम था फिलीपिडस. फिलीपिडस बिना रुके दौड़ते हुए एथेंस पहुंचा और असेंबली के सामने जाकर चिल्लाया, “निनिकेकामेन.” माने हम जीत गए. इसके बाद फिलीपिडस बेहोश हो कर गिर गया और फिर कभी नहीं उठा. इस किंवदंती का सबसे पहला जिक्र प्लूटार्क के जरिए मिलता है. इसके बाद एथेंस के लोग वहां के बैटल के लिए तैयार हो गए. फिलीपिडस इतना तेज भागा था कि फारस की सेना के पहुंचने से पहले पहुंच गया. यही नहीं, ग्रीक सेना भी पहले ही तैयार हो गई. फिलीपिडस इस युद्ध का विजेता था.


1896 में आधुनिक ओलंपिक खेलों की शुरुआत हुई तो 42.195 किलोमीटर की एक दौड़ उन खेलों में आकर्षण का मुख्य विषय थी. दौड़ का नाम था मैराथन. यह दूरी ठीक उतनी ही थी जितनी मैराथन के मैदान से एथेंस की है. इस दौड़ के जरिए ग्रीस ने अपने नायक फिलीपिडस को शुक्राना पेश किया था. एक तथ्य यह भी है कि पहले ओलंपिक के अलावा ग्रीस कभी भी मैराथन दौड़ में स्वर्ण पदक नहीं जीत पाया है.


आज के युग में ग्रीस बेलआउट पैकेज पर जी रहा है. पूरा यूरोप उसपर उंगली उठाता है कि अपने खर्चे कम करो नहीं तो मदद करना बंद कर देंगे.

विनय ने ये स्टोरी की है.

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