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जॉर्ज फर्नांडिस नहीं रहे: जिन्होंने प्यार भी किया एक विद्रोही की तरह

जॉर्ज फर्नांडिस का निधन हो गया. वो 88 साल के थे. उनकी जीवन यात्रा लोकतंत्र की किताब में एक मुकम्मल पाठ है. हम उसे तीन किस्तों में समेटने की कोशिश कर रहे हैं. ये आखिरी किस्त है. पहली किस्त आप यहां क्लिक करके और दूसरी किस्त आप यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं.


अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में जॉर्ज फर्नांडिस जब रक्षा मंत्री थे, तो उनका आवास हुआ करता था 3 कृष्णा मेनन मार्ग. उस समय उन्होंने अपने आवास का एक फाटक हमेशा के लिए हटवा दिया था. कोई उनसे मिलने आए और दरवाजे पर ही रोक दिया जाए, ये उन्हें पसंद नहीं था.

2010 में जून की आखिरी तारीख थी. मानसून दस्तक दे चुका था. पिछले एक दशक में पहली बार था कि जॉर्ज के घर के दरवाजे बंद थे. दरवाजे के बाहर जया जेटली, माइकल और रिचर्ड फर्नांडिस खड़े थे. जॉर्ज के केयर टेकर केडी सिंह ने उन्हें घर में घुसने से मना कर दिया. जया का दावा था कि वो यहां पर अपनी कुछ किताबें और पेंटिंग्स लेने आई हैं. केडी सिंह का कहना था कि उन्हें जॉर्ज से मिलने की इजाजत नहीं है.

 

जॉर्ज के घर के बाहर जया
जॉर्ज के घर के बाहर जया

2009 में लोकसभा चुनाव में हार के बाद जॉर्ज बुरी हालत में थे. उनके पास दिल्ली में रहने का ठिकाना नहीं था. अल्जाइमर की मार अलग से थी. इस बीच उनके दोस्तों ने उनके लिए किराए का मकान खोजना शुरू कर दिया था. उसके तीन महीने बाद वो बिहार से राज्यसभा में पहुंच गए और इस संकट से मुक्त हुए.

4 अगस्त 2009. अल्जाइमर से पीड़ित जॉर्ज जब राज्यसभा सदस्य के तौर पर शपथ ले रहे थे. तब उनके बगल में एक महिला खड़ी थीं, लैला कबीर. ये लैला की 25 साल बाद जॉर्ज के जीवन में वापसी थी. लैला, जिनसे जॉर्ज ने कभी पागलों की तरह प्यार किया था.

जंग के मोर्चे से लौटते वक़्त वो प्यार कर रहे थे 

सन 1971 की बाद है. बांग्लादेश एक निर्णायक युद्ध के बीच फंसा हुआ था. कलकत्ता से दिल्ली आ रहे हवाई जहाज में दो लोग युद्ध के मोर्चे से घर लौट रहे थे. लैला वहां रेडक्रॉस के अपने मिशन से लौट रही थीं और जॉर्ज अपनी राजनीतिक यात्रा पूरी करके दिल्ली आ रहे थे. उस समय वो संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के अध्यक्ष हुआ करते थे. अगल-बगल की सीट पर बैठे दोनों नौजवानों में बात शुरू हुई. साहित्य, इतिहास, संगीत और जाहिरा तौर पर राजनीति बात का हिस्सा थे. दिल्ली पहुंच कर जॉर्ज ने उन्हें घर छोड़ने की पेशकश की. लैला इसे बड़ी विनम्रता से ठुकरा दिया.

 

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लैला और जॉर्ज (फोटो: आउटलुक )

 

लैला के लिए ज्यादा दिन तक जॉर्ज को नजरअंदाज करना मुश्किल हो गया. दिल्ली में दोनों बार-बार मिलने लगे. इन मुलाकातों के एक महीने के भीतर ही जॉर्ज ने उनके सामने शादी की पेशकश की. इस बार लैला इनकार नहीं कर पाईं. लैला नेहरू काबिना में मंत्री रहे हुमायूं कबीर की बेटी भी थीं. आजाद ख्याल परिवार में इस प्रेम विवाह से किसी को कोई एतराज नहीं था.

22 जुलाई, 1971 को उन्होंने शादी कर ली. लैला ने एक बेटे को जन्म दिया, शॉन फर्नांडिस.

उसकी जिंदगी का आपातकाल ज्यादा लंबा खिंच गया 

25 जून 1975 को जब आपातकाल लगा, जॉर्ज और लैला उड़ीसा के गोपालपुर में छुट्टियां मनाने गए हुए थे. जॉर्ज यहां से अंडरग्राउंड हो गए थे. अगले 22 महीने तक उनकी लैला से कोई बात नहीं हुई. लैला अपने बेटे के साथ अमेरिका चली गईं. आपातकाल खत्म होने पर जॉर्ज ने उन्हें बुलावा भेजा. लेकिन तब तक इस रिश्ते में काफी पानी बह चुका था. टेलीग्राफ को दिए इंटरव्यू में लैला याद करती हैं –

“मैं अमेरिका से लौटी, तब तक जॉर्ज सत्ता की चौंधिया देने वाली ऊंचाई तक पहुंच चुके थे. मैं यहां अपने बेटे को उसका पिता देने आई थी, लेकिन पिता ने कोई रुचि नहीं दिखाई. तब से अब तक बहुत कुछ घट चुका है.”

1984 का साल था. इंदिरा गांधी की कहानी एक दर्दनाक अंत पर खत्म हुई. इसी साल जॉर्ज का 13 साल पुराना रिश्ता जहां पहुंचा, वो भी सुखांत नहीं था. लैला अपने बेटे के साथ जॉर्ज को छोड़ कर निकल गईं. लेकिन जॉर्ज बचे रहे लैला के साथ ही. दोनों को अलग रहते हुए काफी साल हो गए. लेकिन अब जॉर्ज और जया जेटली का जो रिश्ता बन गया था, वो साथी राजनीतिक कार्यकर्ता से काफी आगे बढ़ गया था. लैला ने इस रिश्ते से छुटकारा पाने के लिए जॉर्ज को तलाकनामा भेजा. जॉर्ज की तरफ से जो जवाब आया उसे लैला कुछ यूं बयान करती हैं –

“मैंने उन्हें तलाक के पेपर भेजे. उन्होंने मुझे सोने के दो कंगन भेजे. यह कहते हुए कि ये कंगन मेरी मां के हैं. जो वो कहना चाहते थे, मैं समझ चुकी थी.”

यह एकदम सिनेमाई कहानी है 

लैला की जॉर्ज के जीवन में वापसी भी कम नाटकीय नहीं रही. 2007 की बात है. जॉर्ज लंबे अंतराल के बाद अपने बेटे शॉन से मिले. ये मुलाकात काफी भावुक रही होगी. 23 साल बाद जॉर्ज ने पहली बार लैला से फोन पर बात की. शॉन को यहां अपने पिता की बीमारी के बारे पता लगा. लैला का कहना है कि उन्हें महसूस हुआ कि जॉर्ज को अब उनकी सबसे ज्यादा जरूरत है. इसलिए वो जॉर्ज की जिंदगी में वापस लौट आईं.

2 जनवरी, 2010 को दोपहर 2 बजे लैला जॉर्ज के घर पहुंचती हैं. उनके साथ उनके बेटे शॉन और बहू भी होती हैं. लैला घर के एक कमरे में खुद को जॉर्ज के साथ बंद कर लेटी हैं. जब वो वहां से निकलती हैं, तो जॉर्ज के अंगूठे पर स्याही का निशान छोड़ जाती हैं. इस तरह जॉर्ज की पावर ऑफ़ अटर्नी, जो कि नवंबर 2009 में जया के नाम पर लिखी गई थी, वो लैला के पक्ष में चली जाती है.

वो मेरा जॉर्ज है 

2009 के चुनावी हलफनामे में जॉर्ज ने अपनी संपत्ति का ब्योरा 13 करोड़ के करीब दिया था. यह पैसा उन्हें बेंगलुरु की अपनी पुश्तैनी जमीन बेच कर मिला था. दरअसल जॉर्ज की मां ने उनके लिए बेंगलुरु में जमीन का टुकड़ा छोड़ रखा था. उनको उम्मीद थी कि जॉर्ज अपने बुढ़ापे में यहां समाज सेवा केंद्र चलाएंगे. हालांकि जॉर्ज यहां कोई समाज सेवा केंद्र तो नहीं खोल पाए, लेकिन यह जमीन बुढ़ापे में उनके काम आई.

जानकार मानते हैं कि संपत्ति असल में कहीं ज्यादा होगी. जॉर्ज के भाई रिचर्ड ने लैला की इस हरकत को मध्यकालीन तख्तापलट सा बताया. लेकिन शॉन ने कहा कि ऐसा इसलिए किया गया ताकि ये पैसे उनके पिता के इलाज में खर्च किए जा सकें.

 

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जया जेटली

 

2010 में जया ने अदालत में लैला के खिलाफ मामला दायर करते हुए कहा कि वो उन्हें जॉर्ज से मिलने नहीं दे रही हैं. उस जॉर्ज से, जिनके साथ वो पिछले 30 साल से थीं. अप्रैल 2012 में इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला आया जो कि जया के खिलाफ था. जया मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गईं. जस्टिस पी सदाशिव की बेंच ने हाईकोर्ट का फैसला पलट दिया. जॉर्ज के 80वें जन्मदिन पर एक तस्वीर जारी की गई, जिसमें जया और लैला मुरझाए हुए से जॉर्ज के दोनों बगल में खड़ी थीं. शायद इस कहानी का यही सबसे एकमात्र संभव गरिमापूर्ण अंत था.

यह इस सीरिज की अंतिम किस्त है. पहले की दो किस्त यहां पढ़ें 

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