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बाल ठाकरे का वो वादा, जो मुंबई को लील गया

1 मई 1960 को महाराष्ट्र और गुजरात एक राज्य बने थे.

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अपने मरने के दो महीने पहले बाल ठाकरे ने एक इंटरव्यू में कहा: आर्मी मेरे हवाले कर दो, मैं देश को एक महीने में ठीक कर दूंगा.

साल 1975 ने भारत को कई मायनों में उघाड़ कर रख दिया. नेहरू के आदर्शवाद से ढंका देश पूरी निर्ममता से उस साल अपनी कमजोर नसों पर चीरे लगा रहा था.

इन्दिरा गांधी ने इमरजेंसी लगा दी उस साल. पर उसके कुछ महीने पहले महाराष्ट्र में ठाकरे के फैन 12 साल से रहे मुख्यमंत्री वसंत राव नायक को हटाकर इंदिरा ने एस बी चवन को गद्दी दे दी.

शिवसेना की राजनीति 1975-85

एक मिलिटेंट आर्गनाईजेशन शिवसेना ने क्या किया होगा इमरजेंसी के वक़्त?

इंदिरा को तो किसी तरह का विरोध पसंद नहीं था. उधर ठाकरे को किसी तरह से पॉलिटिशियन नहीं पसंद थे. इंदिरा सरकार ने आरएसएस समेत सारे संगठनों को बैन कर दिया था. शिवसेना पर भी बैन लगाने की तैयारी चल रही थी. अंदाज़ा लगाया जा रहा था कि ठाकरे को अब दोबारा जेल भेजा जायेगा. क्योंकि ठाकरे तो दबेगा नहीं. और इंदिरा को ये पसंद नहीं.

बाल ठाकरे ने सारे कयासों को गलत साबित कर दिया. खुल के इमरजेंसी का सपोर्ट किया. कभी इंदिरा को तो कभी संजय गांधी को महान नेता बताया.

शिव सैनिकों ने तर्क दिया कि बालासाहेब ठाकरे की आइडियोलॉजी इंदिरा जी से मिलती है. इसीलिए सपोर्ट किया गया है.

बाद में एक इंटरव्यू में ठाकरे ने कहा: हम लोग जेल जाने से डरते नहीं थे. उस समय मेरे दांत में बहुत दर्द था और मैं जसलोक हॉस्पिटल में भर्ती था. हमने आत्म-सम्मान नहीं बेचा था बल्कि इंदिरा सरकार को स्टडी कर रहे थे.

इमरजेंसी के ढाई साल तक शिवसेना ने कुछ नहीं किया. एकदम स्टडी करते रहे. कोई नौकरी की डिमांड नहीं. कोई बॉर्डर इशू नहीं. कहीं कुछ नहीं. कोई भाषणबाज़ी नहीं. फुल स्टडी.

इमरजेंसी के बाद

1977 में लोकसभा के चुनाव हुए. शिवसेना ने एक भी सीट से चुनाव नहीं लड़ा बल्कि कांग्रेस के लिए दबा के प्रचार किया. जनता कांग्रेस के साथ शिवसेना से भी पूरी नाराज थी. 1978 में असेंबली इलेक्शन हुए. शिवसेना कुछ सीटों पर लड़ी पर बुरी तरह हारी. फिर BMC के चुनाव हुए. यहां शिवसेना 42 से 21 सीटों पर आ गई.

चुनाव से पहले ठाकरे ने ऐलान किया था: अगर BMC की बिल्डिंग पर मैंने अपना भगवा झंडा नहीं फहराया तो मैं शिवसेना से इस्तीफ़ा दे दूंगा. हारने के बाद शिवसैनिकों को संबोधित करते हुए ठाकरे ने अचानक जेब से एक पुर्जा निकाला और पढ़ते हुए कहा: “मैं भगवा झंडा फहरा नहीं पाया. लोगों का मुझपे विश्वास नहीं है. इसलिए मैं इस्तीफ़ा दे रहा हूं”. शिव सैनिक पागल हो गए. बाला साहेब, आप नहीं छोड़ सकते. शिवसैनिकों के प्यार ने ठाकरे को नहीं छोड़ने दिया. ठाकरे का ये तरीका करियर में कई बार काम आया.

1980 में लोकसभा चुनाव फिर हुए. जनता पार्टी के उत्पात के बाद. इंदिरा कांग्रेस ने कमबैक किया. उन्होंने महाराष्ट्र की ‘पीपल डेमोक्रेटिक फ्रंट’ की सरकार को बर्खास्त किया और फिर से चुनाव करवाए. किसी मराठा को मुख्यमंत्री न चुन इंदिरा ने अब्दुल रहमान अंतुले को चुना. अंतुले एक ज़माने से ठाकरे के दोस्त हुआ करते थे. इस बार दोस्ती में शिवसेना ने 1980 का चुनाव भी नहीं लड़ा. कांग्रेस का प्रचार किया. इनाम मिला. शिवसेना के तीन लोग MLC बनकर विधान-परिषद पहुंचे. इतनी स्टडी के बाद.

ठाकरे ने स्टडी के बाद फाइनल कन्क्लूजन दिया था: देश को एक तानाशाह की जरूरत है.

स्टडी के दौरान जो खाली समय मिलता था उसमें ठाकरे ने ‘जनता पार्टी’ के साथ भी गठबंधन बनाने की कोशिश की थी. क्योंकि 1977 में कांग्रेस के हारने की पूरी उम्मीद थी. पर मामला कुछ जमा नहीं.

स्टडी ख़त्म होने के बाद जनता ने जवाब दे दिया था: लोकसभा, विधानसभा, BMC किसी में शिवसेना के नेता नहीं चाहिए.

टेक्सटाइल हड़ताल 1982

इमरजेंसी के समय डांगे की पार्टी CPI ने खुल के इंदिरा का समर्थन किया था. इससे बम्बई में कम्युनिस्ट नेताओं की इज्जत ख़त्म हो गई थी. 1982 में ट्रेड यूनियन के नेता दत्ता सामंत ने वेज और बोनस को लेकर हड़ताल की. कम्युनिस्ट नेताओं ने इसको फुल सपोर्ट दिया. ये एक मौका था इज्जत वापस पाने का. इंदिरा सरकार और अंतुले सरकार ने इस हड़ताल को बुरी तरह कुचला.

शिवसेना ने भी इस हड़ताल के खिलाफ अपनी पूरी ताकत झोंक दी.

एक साल तक चले इस हड़ताल में ढाई लाख ‘मराठी’ कामगार थे और ज्यादातर ‘हिन्दू’ थे.

हड़ताल ऐसी हुई कि महाराष्ट्र से टेक्सटाइल इंडस्ट्री ही ख़त्म हो गई. स्टडी से ये भी पता चला था कि अभी मराठी मानुस या नौकरी के लिए झंझट करने का वक़्त नहीं था. वो बाद में कभी किया जाएगा.

शिवसेना के पास इसके लिए तर्क था: हमने हड़ताल का विरोध इसलिए किया क्योंकि हमें कामगारों से ज्यादा उनके परिवारों की चिंता थी.

कांग्रेस के राज में बाल ठाकरे जिस तरह ऊपर चढ़े थे उसकी दक्षिणा भी पूरी दी थी इन्होंने. पर अब बावरा मन राजनीति की गद्दी के लिए मचलने लगा था. अक्टूबर 1982 की दशहरा रैली में ठाकरे ने कहा: आज से और अब से कांग्रेस के साथ हमारे सारे रिश्ते ख़त्म हो गए.

उस मंच पर ठाकरे के दो स्पेशल गेस्ट थे: शरद पवार और जॉर्ज फर्नान्डीज़!

प्रैक्टिकल सोशलिज्म

1983 में नवकाल अखबार के एडिटर और ठाकरे के मित्र नीलकंठ खाडिलकर सोवियत यूनियन गए. लौटने के बाद उन्होंने एक किताब लिखी: प्रैक्टिकल सोशलिज्म. उसमें बताया गया कि कैसे ‘परमिट सिस्टम’ लागू करने से मास्को शहर में ‘बाहरी’ लोगों की समस्या से निबटा गया.

ये आईडिया ठाकरे को इतना जंचा कि उन्होंने इसे शिवसेना की आइडियोलॉजी बना दी. कुछ समय बाद खाडिलकर से बोले: ये चल नहीं पाएगा. इसके लिए सत्ता चाहिए. उसके लिए हिंदुत्व और हिन्दू सोशलिज्म चाहिए.

जनवरी 1984 में सावरकर स्मारक, दादर पर भाषण देते हुए ठाकरे ने सोशलिज्म की जबरदस्त तारीफ की. उस मंच पर मुख्य अतिथि थे: एस ए डांगे! जिनके खिलाफ ठाकरे ने दो दशक से जंग छेड़ रखी थी. डांगे ने जबरदस्त भाषण दिया. जनता एकदम उत्साह में भर गई. पर ठाकरे को ये पसंद नहीं आया. वो नाराज थे क्योंकि डांगे ने कहा कि जनता की लड़ाई के लिए आइडियोलॉजी होनी जरूरी है. बिना इसके कोई संगठन नहीं चल सकता. ठाकरे का कहना था कि शिवसेना तो 18 साल से चल ही रही है. डांगे गलत है.

हिंदुत्व

1984 में फाइनली शिवसेना ने हिंदुत्व को अपना लिया. ठाकरे ने सारी ‘हिन्दू शक्तियों’ का आह्वान करते हुए ‘हिन्दू महासंघ’ बनाने का प्रस्ताव रखा.

थ्री-पॉइंट प्रोग्राम भी दिया:
1. मुसलमानों को भी हिन्दुओं की तरह एक ही शादी करनी होगी.
2. ‘गो-हत्या’ पर रोक लगाना होगा.
3. उनको मानना होगा कि हिंदुस्तान एक ‘हिन्दू राष्ट्र’ है. मैं ‘भारत’ शब्द को नहीं मानता. मैं ‘हिन्दू राष्ट्र फ़ौज’ बनाऊंगा. और हम लोग हिंदुस्तान के लिए सब कुछ करेंगे.

उस समय देश में कुछ और ही माहौल था. इस बात पर किसी ने ध्यान नहीं दिया.

पर अप्रैल में मौका मिल गया.

भिवंडी दंगे

फ़रवरी में कश्मीर में आतंकवाद के चलते पहली हत्या हुई थी. ठाकरे ने आतंकवाद के खिलाफ भाषण दिया: “इंदिरा जी मुसलमानों को अल्पसंख्यक समझती हैं. यहां ये ढाई करोड़ से चौदह करोड़ हो गए हैं. कैंसर की तरह फैले जा रहे हैं. हम इस कैंसर को उखाड़ फेंकेंगे. और सुन लो, इस साल भिवंडी में शिव-बारात निकलेगी.”

भिवंडी में ठाकरे पहले भी खेल चुके थे. 1970 में दंगों के बाद शिव-बारात पर बैन लग गया था पर 1982 में बैन हटा लिया गया था.

चौपाटी में दिए इस भाषण को उर्दू अखबारों ने कुछ इस ढंग से पेश किया: ठाकरे ने मुहम्मद साहब के खिलाफ ऐसा-वैसा कहा है.

ठाकरे के भाषण से हिन्दू तैयार थे ही. उर्दू समाज की इस गुस्ताखी से मुसलमान भी तैयार हो गए.

मोर्चा निकाला कि माफ़ी मांगी जाए. बाल ठाकरे के फोटो पर चप्पलों की माला के साथ. भिवंडी न्यूज़ के एडिटर इसा आजमी ने ऐलान किया ‘भारतीय मुस्लिम सेना’ बनाने का. लड़ने के लिए.

शिवसैनिकों ने परेल बंद कर दिया. भिवंडी में हरे झंडे और भगवे झंडे की उंचाई लेकर हिन्दू और मुसलमान दोनों ग्रुप झगड़ गए. दो पुलिस जवानों को मिलाकर छः लोगों को चाकू मार दिया गया. 100 लोग घायल हो गए. होटल और दुकानें फूंक दिए गए. मुख्यमंत्री पाटिल ने शूट-ऐट-साईट का आदेश दे दिया. पर मामला संभला नहीं. आर्मी बुलाई गई. कर्फ्यू लग गया भिवंडी में.

पर गोवंडी में मस्जिद से आते लोगों ने शिवसेना का ऑफिस फूंक दिया. फिर सायन, वोर्ली, मुसाफिरखाना, क्राफोर्ड मार्किट, दादर, गणेशपुरी हर जगह दंगे हो गए. फिर थाने और कल्याण में भी हुए. अंत में भिवंडी में फिर दंगे हो गए. नागपाड़ा में एक SHO और एक कांस्टेबल मार दिए गए. पुलिस चौकी फूंक दी गई. बीच-बीच में हर जगह छुराबाज़ी और आगज़नी की घटनाएं चलती रहतीं. ज्यों लगता कि थोड़ा शांत हुआ, किसी नए इलाके में शुरू हो जाता.

DCP रिबेरो ने कहा: बम्बई में किसका राज है? सरकार का या शिवसेना का?

ठाकरे ने कहा: जानना है तो आओ मेरे पास. मैं दिखाता हूं किसका राज है.

जो भी हो, इस दंगे ने शिवसेना को एक बार फिर सबकी नज़रों में ला दिया. जो पार्टी एक सीट के लिए तरस रही थी अब फिर से पब्लिसिटी पा गई थी. स्टडी रूम में बैठे-बैठे अंधेरा हो गया था. अब मौका मिला था ज्ञान दिखाने का.

1984

31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या हो गई. ठाकरे ने इंदिरा की बड़ाई में क्या-क्या नहीं कहा. ये भी कहा कि इंदिरा जी मुझे ऊंचे से ऊंचा पद देने को तैयार थीं, मैंने लिया नहीं.

इंदिरा की हत्या के बाद हर जगह सिखों को मारा जाने लगा. पर बम्बई में सिख सुरक्षित रहे.

ठाकरे ने बाद में कहा: राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह जब बम्बई आये तो मुझसे बोले कि आप चाहते तो क्या कुछ कर देते. पर आपने किया नहीं. यहां सिख सुरक्षित रहे. आपके चलते.

पर शक्की लोग कहते हैं: सिख समुदाय के बिजनेस से शिवसेना को काफी फायदा था, इसलिए उनको बचाया गया. बचाने के लिए बहुत कुछ दान-दक्षिणा भी ली गई थी.

सब कुछ हो जाने के बाद 1984 के लोकसभा चुनाव में शिवसेना ने बीजेपी का दामन थाम लिया. पर बुरी तरह हार हुई. इंदिरा गांधी के मरने के बाद कांग्रेस ने 400 से ऊपर सीटें जीतीं. बीजेपी की महाराष्ट्र में बहुत औकात नहीं थी पर अपने ‘चिंतन शिविर’ में बीजेपी के नेताओं ने हार के लिए शिवसेना जैसे संगठन को जिम्मेदार ठहराया.

फिर महाराष्ट्र में विधान सभा चुनाव हुए. शिवसेना का एक कैंडिडेट जीता: छगन भुजबल.

कांग्रेस का शिवसेना को गिफ्ट

अब BMC के चुनाव होने थे. शिवसेना स्टडी कर रही थी. पर जनता शिवसेना के स्टडी रूम की लाइट काट चुकी थी. ऐसे में कांग्रेस एक बार फिर शिवसेना के लिए तारणहार बन के आई.

मुख्यमंत्री वसंत दा पाटिल ने चुनाव जीतने के लिए ‘अफवाह’ उड़ाई: “केंद्र सरकार बम्बई को केंद्र-शासित प्रदेश बनाना चाहती है.” कहने का मतलब था कि कांग्रेस के बजाय कोई और जीता तो पक्का लगाय  देंगे. हमारे लोग रहे तो बचा लेंगे.

यहीं नहीं रुके: “बम्बई महाराष्ट्र में तो है पर मैं बम्बई में महाराष्ट्र को नहीं देखता.”

उनको अंदाज़ा नहीं था. शिवसेना को पहली पोलियो ड्राप ‘मराठी मानुस’ वाली ही दी गई थी. 140 में से 74 सीटें शिवसेना ने जीत लीं ‘मराठी अस्मिता’ के नाम पर.

कांग्रेस ने शिवसेना को BMC गिफ्ट कर दिया.

और फिर राजीव गांधी ने शाह बानो वाले मुद्दे पर शिवसेना को एक और मौका दिया. हिंदुत्व को नेशनल लेवल पर ले जाने का. ठाकरे ने रह-रह कर ऐलान किया कि मुल्क को पाकिस्तान नहीं बनने देंगे.

चलते-चलते: ठाकरे और राजनीतिक कार्टून

एक जमाने में नेताओं के ऊपर कार्टून बनाने से रोक दिए गए थे ठाकरे. ऐसी चीजों से नाराज होकर तीन बार नौकरी छोड़ चुके थे. पर ताकत मिलने के बाद क्या किया:

1.मराठी नाटककार विजय तेंदुलकर ने 1972 में एक नाटक लिखा: घासीराम कोतवाल. इसमें पेशवाई के नाना फड़नवीस को आधार बनाकर दिखाया गया था कि कैसे सत्ता हासिल करने के लिये आइडियोलॉजी गढ़ी जाती है. और फिर सत्ता मिलने के बाद उस आइडियोलॉजी को ठुकरा दिया जाता है. शिवसेना ने विजय तेंदुलकर का जीना मुश्किल कर दिया. क्योंकि फड़नवीस तो इतिहास का हिस्सा थे. ठाकरे तो वर्तमान थे. नाम बदल देने से पता नहीं चलेगा क्या कि किसको बोल रहे हो?

2.1975 में भाऊ पाध्ये की किताब आयी: राडा. इसमें एक सेना और उसकी शाखाओं के बारे में लिखा था. कि कैसे एक लड़का पहले सेना जॉइन करता है और फिर बाद में इनको नंगा कर देता है. शिवसेना ने किताब मार्किट में आने ही नहीं दिया. बाद में 1997 और फिर 2011 में कायदे से छपी ये किताब.

3.1977 में किरन नागरकर का लिखा नाटक ‘बेडटाइम स्टोरीज’ 17 साल बाद मंच पर आया.

शिवसेना को अपनी आइडियोलॉजी मिल चुकी थी. देश इमरजेंसी और 1984 के दंगे से बाहर आ चुका था. पर अभी बहुत कुछ होना बाकी था. श्रीराम को उनका घर दिया जाना था इंडिया में. इतिहास को नए सिरे से पढ़ा जाना था. ऐसे में ठाकरे कहां थे? पढ़िए आगे…


ये स्टोरी ‘दी लल्लनटॉप’ के लिए ऋषभ ने की थी.


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