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गुजरात का वो मुख्यमंत्री जो दो मुख्यमंत्रियों के तख्ते पलटकर सत्ता पर काबिज हुआ

10 मई 1996, 11 वीं लोकसभा के चुनाव के नतीजे आने शुरू हुए. शाम होने तक दो बातें साफ़ हो चुकी थी. पहला कि इस बार की लोकसभा त्रिशंकु होने जा रही है. दूसरा कोई भी सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाएगी. 161 सीट के साथ भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. ऐसे में रवायत के चलते अटल बिहारी वाजपेयी को सरकार बनाने का न्यौता दिया गया. वाजपेयी ने 15 मई के रोज प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. वो जानते थे कि दो महीने के तय समय में वो बहुमत साबित नहीं कर पाएंगे. हालांकि जोड़-तोड़ की कोशिश बदस्तूर जारी थी.

20 मई के रोज अटल बिहारी वाजपेयी अहमदाबाद पहुंचे. इस चुनाव में उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी मिलने की पूरी उम्मीद थी. एहतियातन वो दो सीट पर चुनाव लड़ रहे थे. पहली सीट थी लखनऊ, जहां वो हमेशा से लड़ते आए थे और दूसरी गांधी नगर. गांधी नगर लालकृष्ण आडवाणी की सीट हुआ करती थी. जैन हवाला केस में नाम आने के बाद आडवाणी ने भरी संसद में यह घोषणा की थी कि जब तक वो इस मामले में पाक-साफ़ नहीं साबित हो जाते, वो चुनाव नहीं लड़ेंगे. सूबे की कुल 26 में 16 सीट बीजेपी के खाते में गई थी. वाजपेयी जीत के बाद गांधी नगर की सीट खाली कर रहे थे. ऐसे में वो यहां की जनता को आभार व्यक्त करने की गरज से आए थे. पिछले साल अक्टूबर में जब खजुराहो काण्ड के बाद बीजेपी सरकार दो-तिहाई बहुमत के बावजूद सांसत में आ गई थी तब वाजपेयी की मध्यस्थता में सारा मामला शांत हुआ था.

प्रधानमंत्री पद की शपथ लेटे हुए अटल बिहारी वाजपेयी
प्रधानमंत्री पद की शपथ लेटे हुए अटल बिहारी वाजपेयी

उस समय वाजपेयी को ये नहीं पता था कि जिस शांति समझौते को उन्होंने कायम करवाया था वो उनकी ही रैली के बाद धराशायी हो जाएगी. जैसे भी वायपेयी अपनी रैली खत्म करके सर्किट हाउस की तरफ बढ़े, रैली स्थल का नज़ारा बदल गया. बीजेपी कार्यकर्ता गली के शोहदों की तरह सड़क पर स्कोर बराबर करते नज़र आए. गुजरात बीजेपी में उस समय दो बड़े गुट थे. पहला केशुभाई पटेल का और दूसरा शंकर सिंह वाघेला का. शंकर सिंह वाघेला इस लोकसभा चुनाव में गोधरा की सीट से चुनाव हार गए. ऐसे में केशुभाई पटेल के गुट को सत्ता में वापसी की उम्मीद बंधने लगी. इसी उत्तेजना में केशुभाई के कुछ समर्थक लोक-लाज की देहरी लांघ गए.

खजुराहो काण्ड के बाद केशुभाई को मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी थी. उनकी जगह निर्गुट माने जाने वाले सुरेश मेहता को मुख्यमंत्री बनाया गया था. शंकर सिंह वाघेला के नेतृत्व वाले विद्रोही गुट के छह विधायकों को मेहता मंत्रिमंडल में जगह दी गई थी. इसी कोटे से मंत्री बने थे आत्माराम पटेल. पटेल मेहसाणा से विधायक थे और मेहता सरकार में पंचायत मंत्री हुआ करते थे. रैली के खत्म होने के बाद जब भीड़ छंटने लगी तब केशुभाई के समर्थकों ने आत्माराम को दौड़ा लिया. 78 साल के आत्माराम हल्की मशक्कत के बाद केशुभाई समर्थकों के हत्थे चढ़ गए. उन्हें पीटा गया और उनकी धोती उतार ली गई. पटेल इसी अपमानजनक अवस्था में किसी तरह घर पहुंचे.

केशुभाई,लालकृष्ण आडवाणी और काशीराम राणा
केशुभाई, लालकृष्ण आडवाणी और काशीराम राणा

इसके अलावा वाघेला के एक और समर्थक दत्ताजी को भी इसी किस्म की स्थितियों का सामना करना पड़ा. वो इस पचड़े से बच निकलने के लिए पैदल भागे और आगे जा रही पब्लिक ट्रांसपोर्ट की बस में चढ़ गए. केशुभाई के समर्थकों ने उस बस को रोक लिया. इसके बाद उन्होंने दत्ताजी को नीचे उतारा और उन्हें बुरी तरह से पीटा. इस पिटाई में उनकी पसली की हड्डियां टूट गईं. उन्हें गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती करवाया गया. दत्ताजी खजुराहो कांड के समय वाघेला के साथ थे. सुरेश मेहता सरकार में उन्हें Gujarat Industrial Investment Corporation (GIIC) का चेयरमैन बनाया गया था.

चुनाव हारने के बाद शंकर सिंह वाघेला लगातार विरोधी गुट के निशाने पर थे. केशुभाई पटेल के गुट को अंदरूनी तौर पर आडवाणी का समर्थन हासिल था. शंकर सिंह वाघेला बुरी तरह से घिरे हुए थे. ऐसे में इस घटना ने वाघेला को प्रतिघात करने का मौक़ा दे दिया. वो मीडिया के जरिए केशुभाई के धड़े पर जमकर बरसे. लगे हाथ उन्होंने ‘महागुजरात अस्मिता मंच’ नाम के नए संगठन की घोषणा भी कर दी थी. वो इसे अराजनीतिक संगठन बता रहे थे लेकिन विपक्ष में बैठे कांग्रेस के अमर सिंह चौधरी और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रबोध रावल ने इसमें छिपी हुई संभावना को सूंघ लिया था.

बीजेपी अपने विधायकों को वफादारी की शपथ दिलवाने पर मजबूर हो गई
बीजेपी अपने विधायकों को वफादारी की शपथ दिलवाने पर मजबूर हो गई

आडवाणी खजुराहो काण्ड के बाद से वाघेला को हाशिए पर धकेलने की कोशिश में लगे हुए थे. गोधरा लोकसभा चुनाव में उन्हीं के इशारे पर विश्व हिन्दू परिषद, पार्टी की स्थानीय इकाई और आरएसएस के लोग वाघेला के खिलाफ प्रचार करते नजर आए थे. जनसंघ के समय से ही वाघेला वाजपेयी के करीबी रहे थे. लोकसभा चुनाव हारने के बाद वाघेला जब घिरे थे, उस समय आडवाणी ने एक आखिरी चोट करने में देरी नहीं लगाई. प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष काशीराम राणा वाघेला के समर्थक माने जाते थे. लोकसभा चुनाव के बाद जून में उन्हें हटाकर केशुभाई के गुट के वजूभाई वाला को नया प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया. वाघेला शिकंजे की बढ़ती हुई कसावट समझ रहे थे. उन्हें बस इससे छूट जाने का इंतजार था.

फिर से बगावत की शुरुआत

3 सितम्बर 1996 की शाम भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव वैंकेया नायडू गांधी नगर से दिल्ली लौट रहे थे. दिल्ली पहुंचकर उन्होंने पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए कहा,

“यह बड़े गेम प्लान के चलते हो रहा है. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले गुजरात की बीजेपी सरकार को अस्थिर करके केंद्र की देवगौड़ा सरकार उत्तर प्रदेश के मतदाताओं को गलत संदेश देने की कोशिश कर रही है.”

अगले दिन ही गुजरात के सभी जिलों में बीजेपी के कार्यकर्ता प्रधानमंत्री एच.डी. देवगौड़ा और नरसिम्हा राव के पुतले फूंकते नजर आए. गुजरात में चल रहे प्रदर्शन और वैंकेया नायडू के बयान का संदर्भ क्या था?

कृष्ण पाल सिंह उस समय गुजरात के राज्यपाल हुआ करते थे
कृष्ण पाल सिंह उस समय गुजरात के राज्यपाल हुआ करते थे

अगस्त 1996. शंकर सिंह वाघेला साल भर से भी कम समय में बीजेपी के खिलाफ दूसरी बार बगावत करने की तैयारी में थे. 1995 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 182 में से 121 सीट हासिल हुई थीं. सितंबर 1995 में शंकर सिंह वाघेला ने अपने 47 समर्थकों के साथ बीजेपी से विद्रोह कर दिया था. उस समय केशुभाई पटेल को मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी थी और सुरेश मेहता नए मुख्यमंत्री बने थे. अंदरूनी कलह इसके बाद भी बदस्तूर जारी रही. अगस्त आते-आते बगावत नए सिरे से फिर से उठ खड़ी हुई.

कहानी की शुरुआत हुई अगस्त की 18वीं तारीख से. शंकर सिंह वाघेला अपने साथ 46 बीजेपी विधायकों को लेकर राज्यपाल के पास पहुंचे. उनका कहना था कि वो बीजेपी का साथ छोड़ चुके हैं. ऐसे में सुरेश मेहता की सरकार सदन में विश्वास मत खो चुकी है. चूंकि विद्रोहियों की संख्या बीजेपी के कुल 121 विधायकों के एक-तिहाई से ज्यादा है, इसलिए उन्हें विधानसभा में अलग ग्रुप की तरह मान्यता दी जाए. राज्यपाल कृष्ण पाल सिंह ने इस मामले को विधानसभा अध्यक्ष के हवाले कर दिया.

विधानसभा उपाध्यक्ष चंदूभाई डाभी जिनके एक फैसले ने सारा मामला वाघेला के पक्ष में झुका दिया था.
विधानसभा उपाध्यक्ष चंदूभाई डाभी जिनके एक फैसले ने सारा मामला वाघेला के पक्ष में झुका दिया था.

हरीशचंद्र पटेल उस समय विधानसभा के अध्यक्ष हुआ करते थे. वो बीजेपी की टिकट पर सरखेज से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे थे. 31 अगस्त के रोज उन्होंने विद्रोहियों की अलग ग्रुप की तरह पहचाने जाने की अर्जी अस्वीकार कर दी. शंकर सिंह वाघेला के विद्रोह के चलते विधानसभा का सत्र 15 दिन पहले 18 की बजाय 3 सितंबर को ही बुला लिया गया था. इस बीच हरीशचंद्र पटेल की तबीयत अचानक बिगड़ गई. ऐसे में विधानसभा की अध्यक्षता की जिम्मेदारी मिली चंदुभाई डाभी को. डाभी कांग्रेस के नेता थे और विधानसभा के उपाध्यक्ष चुने गए थे. 3 सितंबर को विधानसभा की पहली बैठक में ही डाभी ने बीजेपी विद्रोहियों को अलग ग्रुप के तहत मान्यता दे दी. इतना ही नहीं डाभी ने अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग करवाए बिना ही विधानसभा स्थगित कर दी. इस घटना ने संवैधानिक बहस खड़ी कर दी. बहस अपनी जगह थी लेकिन डाभी के फैसले की वजह से शंकर सिंह वाघेला को और विधायकों को अपने लिए समर्थन जुटाने का समय मिल गया.

19 सितम्बर को एक नाटकीय फैसले में गुजरात में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया. इस बीच शंकर सिंह वाघेला के साथ विद्रोह में शामिल 18 विधायक अपना अलग गुट बनाकर दोनों पक्षों के साथ मोल-भाव में लगे हुए थे. अब इन विधायकों के पास बहुत विकल्प नहीं बचा था. ऐसे में इन्होंने फिर से शंकर सिंह वाघेला का दामन थाम लिया. एक महीने चले राष्ट्रपति शासन के बाद शंकर सिंह वाघेला एक बार फिर से राज्यपाल कृष्ण पाल सिंह से मिले. उनके पास अपने 46 और कांग्रेस के 45 विधायकों का समर्थन पत्र था. उस समय गुजरात विधानसभा में विधायकों की संख्या 180 ही थी. ऐसे में 91 की संख्या बहुमत से एक ज्यादा की शर्त पर खरी उतरती थी. राज्यपाल केपी सिंह ने शंकर सिंह वाघेला को सरकार बनाने के लिए हरी झंडी दे दी. 23 अक्टूबर 1996 के रोज शंकर सिंह वाघेला ने गुजरात के 12वें मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली.

मुख्यमंत्री पद की शपथ लेटे शंकर सिंह वाघेला
मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते शंकर सिंह वाघेला

कांग्रेस भौचक्की रह गई

1 अक्टूबर 1997. गांधी जयंती से ठीक एक दिन पहले बतौर मुख्यमंत्री शंकर सिंह वाघेला गांधी नगर में भाषण दे रहे थे. अपने भाषण में उन्होंने घोषणा की कि गांधी जयंती के दिन पांच नए जिले और 48 नई तहसील गुजरात के नक़्शे पर अस्तित्व में आ जाएंगी. यह मांग लंबे समय से अटकी पड़ी थी. वाघेला के इस कदम ने कांग्रेस के कान खड़े कर दिए. कांग्रेस जानती थी कि यह कदम वाघेला को आदिवासी इलाकों में काफी लोकप्रिय बना देगी. ऐसे में वाघेला का यह कदम उन्हें अपने परम्परागत वोट बैंक में सेंध की तरह लगा. 1 अक्टूबर की शाम कांग्रेस नेता अमर सिंह चौधरी, वाघेला सरकार से समर्थन वापस लेने की धमकी देते नजर आए. चौधरी का आरोप था कि वाघेला ने बिना कांग्रेस को भरोसे में लिए यह कदम उठाया है.

शंकर सिंह वाघेला के बारे में कहा जाता है कि वो एक बार फैसला करने के बाद पीछे नहीं हटते हैं.
शंकर सिंह वाघेला के बारे में कहा जाता है कि वो एक बार फैसला करने के बाद पीछे नहीं हटते हैं.

वाघेला स्थिति संभालने के लिए नए मोर्चे पर जुट गए. उन्होंने दिल्ली में कांग्रेस चीफ सीताराम केसरी से बात की. इस बातचीत में शंकर सिंह वाघेला इस घोषणा को कुछ दिन टालने पर सहमत हो गए. केसरी के इशारे पर अहमदाबाद में अमर सिंह के तेवर ढीले पड़ने लगे. कांग्रेस वालों को वाघेला का असल खेल समझ में आया अगले दिन सुबह. बिना किसी शोर-शराबे के वाघेला ने नए जिलों के निर्माण का आदेश जारी कर दिया. कांग्रेस इस चाल से भौचक्की रह गई. इसके बाद वाघेला सरकार का बोरिया-बिस्तर बंधना तय हो गया.

मोतीचूर कड़वा पड़ गया

20 अक्टूबर 1997. शंकर सिंह वाघेला दिल्ली में थे. यहां उनकी नई पार्टी ‘राष्ट्रीय जनता पार्टी’ का पहला अखिल भारतीय कंवेंशन चल रहा था. वो राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी थे. कांग्रेस की परेशानी वो कांग्रेस से ज्यादा समझते थे. उन्हें पता था कि कांग्रेस फिलहाल विधानसभा चुनाव के लिए तैयार नहीं है. न ही वो किसी भी सूरत में बीजेपी को एक बार फिर से सत्ता पर कब्ज़ा करते हुए देखना चाहती है. ऐसे में वो अपनी सरकार के भविष्य को लेकर निश्चिंत थे. तीन दिन बाद उनकी सरकार को एक साल पूरा होने जा रहा था. इस मौके पर उन्होंने एक बड़े जलसे की योजना बना रखी थी. 1000 किलो मोतीचूर के लड्डू का ऑर्डर दिया जा चुका था.

राष्ट्रीय जनता पार्टी के कार्यक्रम में शंकर सिंह वाघेला और दिलीप पारीख
राष्ट्रीय जनता पार्टी के कार्यक्रम में शंकर सिंह वाघेला और दिलीप पारीख

वाघेला दिल्ली में थे और दिल्ली का एक खिलाड़ी गुजरात की राजनीति पर नजर गड़ाए बैठा था. इस खिलाड़ी का नाम था, ‘प्रणब मुखर्जी.’ 18 अक्टूबर को अमर सिंह चौधरी को कांग्रेस हाईकमान की तरफ से सरकार गिराने की हरी झंडी मिल चुकी थी लेकिन उन्हें अंतिम आदेश के लिए इंतजार करने लिए कहा गया था.

20 अक्टूबर की शाम कंवेंशन के दौरान शंकर सिंह वाघेला को सूचना मिली कि अहमदबाद के कांग्रेस कार्यालय में ढोल बज रहे हैं. वाघेला इसका मतलब जानते थे. उनके मुख्यमंत्री के तमगे के आगे भूतपूर्व लग चुका था. इधर अमर सिंह चौधरी इस सियासी उलटफेर के बाद मीडिया से मुखातिब थे-

“वाघेला सरकार कांग्रेस के सिर पर बोझ बन गई थी. यह निर्णय काफी समय पहले ही लिया जाना चाहिए था. अगर उनकी तरफ से नेतृत्व परिवर्तन किया जाता है तो यह गठबंधन आगे भी चल सकता है.”

प्रणब मुखर्जी और सीताराम केसरी
प्रणब मुखर्जी और सीताराम केसरी

इस बार भौचक्का रहने की बारी शंकर सिंह वाघेला की थी. 20 अक्टूबर की सुबह प्रणब मुखर्जी ने अमर सिंह चौधरी से बात की और उन्हें कुछ निर्देश दिए. शाम को जब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सी.डी. पटेल और चौधरी राज्यपाल के आवास पर समर्थन वापसी की अर्जी देने पहुंचे. इस समय इन तीन आदमियों के अलावा किसी को इस कदम की जानकारी नहीं थी. यहां तक कि कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष सीताराम केसरी को भी इसकी जानकारी काफी समय बाद लगी. शंकर सिंह वाघेला का अंदाजा गलत तो साबित हुआ लेकिन पूरी तरह से नहीं. कांग्रेस के साथ गठबंधन की संभावनाएं अभी बची हुई थीं. उनका अगला काम इन्हें ज़िंदा रखने का था. कुछ देर बाद मीडिया से मुखातिब होते हुए वो बोले-

“सबसे पहले मैं कांग्रेस पार्टी का शुक्रिया अदा करता हूं. उन्होंने मेरी सरकार को एक साल तक बिना शर्त समर्थन दिया.”

शंकर सिंह वाघेला का यह बयान गुजरात के 13 वें मुख्यमंत्री की गद्दीनशीन होने की प्रस्तावना था. इसकी कहानी हम अगली कड़ी में आपको बताएंगे. फिलहाल इस बयान को दिमाग में जमाकर रखिए.

कैसा रहा कार्यकाल

शंकर सिंह वाघेला अपनी सरकार को ‘टनाटन सरकार’ कहा करते थे. एक साल के उनके कार्यकाल को कई चीजों के लिए याद रखा जाएगा. पांच नए जिलों का निर्माण ऐसा फैसला था जिसकी वजह से उन्हें अपनी सरकार की बलि देनी पड़ी. इसके अलावा उन्होंने विधायिका और सरकारी नौकरी में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण लागू किया. उनके इस निर्णय के बाद सूबे में पहली बार 6000 महिला प्रधान बनकर आईं.

खेत मजदूरों के लिए अलग कार्ड बनाए गए. उनकी मजदूरी में इजाफा किया गया. उन्होंने आदिवासी समाज को भूमि अधिकार दिए. प्रशासन को जिम्मेदार और पारदर्शी बनाने के लिए उन्होंने दो बड़े कदम उठाए. पहला कि उन्होंने आम जनता के लिए किसी भी विभाग का लेखा-जोखा लेना आसान बना दिया. यह सूचना के अधिकार को लागू किए जाने के शुरुआत थी. दूसरा, गांधी नगर में होने वाली मंत्रिमंडल की बैठकों का चलन तोड़ा. वो सूबे के अलग-अलग इलाकों में मंत्रिमंडल की बैठक करते ताकि उस क्षेत्र की समस्या को भी बैठक में चर्चा का विषय बन सके. शंकर सिंह का कार्यकाल छोटा लेकिन प्रभावी कार्यकाल था. उस समय वो अपनी लोकप्रियता के चरम पर थे. वो खुद कहते हैं, “मैंने जनता को खुश रखने का प्रयास किया, क्योंकि जनता जब खुश होती है तो छप्पर फाड़ कर देती है.”

शंकर सिंह वाघेला
शंकर सिंह वाघेला

कैसा रहा अब तक राजनीतिक सफ़र

शंकर सिंह वाघेला ग्रास रूट से ऊपर तक आए नेता थे. कई मौकों पर आप उन्हें यह दावा करते सुन सकते हैं कि गुजरात के 18,000 गांवों में से हर गांव में वो कम से कम 10 आदमियों को नाम से जानते हैं. गुजरात के लोग उनके इस दावे को सही भी मानते हैं. इसकी वजह ये है कि अपने शुरुआती राजनीतिक सफ़र में उन्होंने केशुभाई पटेल के साथ गांव-गांव धूल फांकी थी. गांधी नगर के वासन गांव में पैदा हुए वाघेला ने गुजरात विश्वविद्यालय से एमए की तालीम हासिल की थी. छात्र जीवन में ही उनका झुकाव आरएसएस की तरफ हो गया. 1965 के साल में वो जनसंघ के सदस्य बने. तब से लगभग 30 साल तक तो उसी पार्टी में रहे. हालांकि पार्टी का नाम बदलता रहा. 1998 के विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने चुनाव न लड़ने की घोषणा की और राष्ट्रीय जनता पार्टी का विलय कांग्रेस में हो गया.

राज्य के साथ-साथ वो केंद्र की सियासत में भी पर्याप्त दखल रखते हैं. वो छठी, नौवीं, दसवीं, तेरहवीं और चौदहवीं लोकसभा के सदस्य रहे. 1984 से 1989 तक वो बीजेपी के खाते से राज्यसभा सदस्य भी रह चुके हैं. 2004 से 2009 तक मनमोहन सिंह सरकार में केन्द्रीय कपड़ा मंत्री थे. फिलहाल वो एक बार फिर से विद्रोही की भूमिका में हैं. 2017 के राज्यसभा चुनाव से ठीक पहले उन्होंने 20 साल के लंबे साथ के बाद कांग्रेस का हाथ छोड़ दिया. फिलहाल वो फिर से गुजरात में तीसरा मोर्चा बनाने की तैयारी में जुटे हुए हैं.


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