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महाभारत के पहले एपिसोड में क्या बदलवाया था राजीव गांधी ने?

कुछ दिन पहले आई फिल्म उड़ता पंजाब से बहुत सारे सीन काटने को लेकर सेंसर बोर्ड और फिल्म वालों के बीच लम्बा विवाद हुआ था. इस तरह के विवाद नए नहीं हैं. सेंसरशिप पहले भी होती रही है. 1988 में दूरदर्शन के एक सीरियल के सीन काटे गए थे. दूरदर्शन को तो वैसे ही सरकार के हाथों की कठपुतली माना जाता रहा है. सरकार का प्रचार-प्रसार करने और चेहरा दिखाने का साधन.

अक्टूबर 1988 में दूरदर्शन पर शुरू हुआ था महाभारत सीरियल. रामानंद सागर के रामायण की सफलता के बाद दूरदर्शन के लिए यह सीरियल लेकर आए थे बलदेव राज चोपड़ा. उस दौर में दूरदर्शन में खुलापन आ रहा था. कई सारे हास्य और रंगारंग नए कार्यक्रम शुरू हुए थे. लम्बे समय तक चले विवादों और बहसों के बाद शुरू हुआ था महाभारत. चोपड़ा ने अपनी खूबसूरत कलाकारी से इसको समसामयिक बना दिया था. इसमें वंशवाद को जिस तरह दिखाया गया, उससे सीधा अंदेशा था कि दर्शकों का ध्यान सीधे-सीधे नेहरू परिवार पर जाएगा.

इसके पहले एपिसोड से ही कानाफूसी शुरू हो गई थी कि कुछ सीन काटे गए हैं. उस समय सवाल उठे थे कि इसके पहले एपिसोड में राजनैतिक कटाक्ष किए गए थे. दूरदर्शन ने डरकर चोपड़ा को ये अंश हटाने के निर्देश दिए. ये सीन किसने कटवाए थे? दूरदर्शन के तब के निदेशक भास्कर घोष ने या उस समय के सूचना एवं प्रसारण मंत्री हरकिशन लाल भगत ने? या फिर जैसा कि इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा था, खुद राजीव गांधी ने?

हालांकि चोपड़ा का कहना था कि ये सीन संपादन के दौरान ही हटा दिए गए थे. पर पहले एपिसोड को देखकर सीधा-सीधा समझ में आ रहा था कि सीन बहुत ही बेतरतीबी से काटे गए हैं. भरत के दरबार के बाद सीधे राजमाता शकुंतला के कक्ष का दृश्य और भरत के शासन के बाद सीधे शांतनु के दृश्य जिस तरह से दिखाए गए हैं उसमें साफ नज़र आता है कि बीच के दृश्य काटे गए हैं. काटे जाने से पहले इसमें दिखाया जाना था कि, बेटों को राज सिंहासन न देने के अपने फैसले के बारे में बताते हुए भरत कहते हैं, “राजा का कर्तव्य राज्य के हितों की रक्षा करना है ना कि अपने पुत्रों के हितों की”.

महाभारत सीरियल की शुरुआत चोपड़ा ने थोड़ा पीछे जाकर महाराजा भरत की राजतंत्र की आदर्शवादी अवधारणा से की. इसके पटकथा लेखक राही मासूम रजा ने कहा, “भरत को दिखाए बिना हमें कथा का मूलाधार नहीं मिल पाता. वो एक ऐसी राजनीतिक बात कहते हैं, जो रामायण से भी पहले का विचार है – सत्ता का अधिकार जन्म से नहीं, कर्म से मिलता है. और आज देश की स्थितियां कुछ-कुछ महाभारत काल जैसी है.”

इस प्रकार के विचारों से सीधे-सीधे दर्शकों के ज़ेहन में नेहरू परिवार की तस्वीर उभरती. और सरकार चला रहे थे उसी परिवार के राजीव गांधी, तो सीन कटने पर उंगली तो उन्हीं पर उठनी थी. ऊपर से दूरदर्शन पर सरकार का नियंत्रण तो था ही.

सरकार पर लगा था छोटे परदे पर ‘ग्लास्तनोस्त’ की हत्या का आरोप:

इसी वक्त दूरदर्शन के महानिदेशक भास्कर घोष के तबादले के बाद हंगामा मचा हुआ था. क्योंकि इस तबादले का मतलब साफ-साफ नजर आ रहा था. चुनाव नजदीक थे और उस समय दूरदर्शन ही नेताओं के पास अपना चेहरा दिखाने का सबसे बड़ा माध्यम था. इस तबादले के बाद अखबारों के संपादकीय में लिखा गया कि छोटे परदे पर ‘ग्लास्तनोस्त’ (खुलेपन की नीति) की हत्या हो गई. घोष को हटाने के पीछे कारण उनका काम-काज नहीं था. सरकार कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी. क्योंकि चुनावों में सरकार को अपना चेहरा दिखाना था टीवी पर.

Photo: Penguin Books India
भास्कर घोष (Photo: Penguin Books India)

कुछ ऐसी घटनाएं हुई कि घोष सत्तारूढ़ दल की नज़रों में चुभने लगे थे. नेशनल हेराल्ड की रजत जयंती पर प्रधानमंत्री द्वारा दिए जा रहे भाषण में टीवी पर प्रधानमंत्री की आवाज की जगह दर्शकों को सिर्फ भीड़ के नारे सुनाई दिए थे.

अपनी किताब दूरदर्शन डेज़ में भास्कर लिखते हैं, “एक दिन अचानक संडे को गोपी अरोड़ा का फोन आया कि तुम ऑफिस आओ. घर पर कुछ गेस्ट थे, तो मैंने कहा कि मंडे को आऊंगा. गोपी ने कहा कि जरूरी है, अभी आओ. मैं गया तो बोले कि तुम्हारे लिए बैड न्यूज़ है. तुम्हें दूरदर्शन के डीजी का पद छोड़ना होगा.”

ये घटनाएं दिखाती हैं कि दूरदर्शन अपनी स्वायत्तता के लिए कब से संघर्ष कर रहा है. अलग-अलग सरकारों ने कैसे अपने फायदे के लिए उसका उपयोग किया.

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