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सऊदी अरब में हुए 2 ड्रोन हमले आपकी जेब पर बहुत भारी पड़ सकते हैं

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14 सितंबर, 2019. पौ फटने से पहले सऊदी अरब के दो ठिकानों पर ड्रोन हमला हुआ. ये दोनों जगहें हैं- अबकैएक और खुरेइस. इनमें से पहली जगह है रिफाइनरी. दूसरी है, ऑइल फील्ड. इस हमले का सिंपल ट्रांसलेशन है-

1. दुनिया में कच्चे तेल की आपूर्ति में कमी
2. महंगा तेल

वजह- Saudi Aramco. वजह- Saudi Aramco. सऊदी अरब की सबसे बड़ी तेल कंपनी. जिन दो जगहों पर ड्रोन हमला हुआ वो दोनों अरामको की हैं. सऊदी अरब. दुनिया का सबसे बड़ा तेल निर्यातक देश. हर दिन करीब 9,800,000 बैरल तेल का उत्पादन करता है. इस हमले से उसके कुल तेल उत्पादन की क्षमता करीब आधी हो गई है. लगभग 5,700,000 बैरल हर रोज़ की कमी. यानी पूरी दुनिया में होने वाली क्रूड तेलों की सप्लाई का पांच फीसद से ज़्यादा. पहले की तरह प्रॉडक्शन शुरू होने में हफ़्तों लग सकते हैं. तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ गई हैं. इनके और बढ़ने की आशंका है.

हमले की जिम्मेदारी किसने ली?
हमले की जिम्मेदारी ली यमन के हूती विद्रोहियों ने. यमन के अंदर चल रही जंग में एक पार्टी हैं हूती. उनकी सऊदी और अमेरिका से लड़ाई है. मगर अमेरिका कह रहा है कि हमले के पीछे ईरान है. हूती का मददगार है ईरान. डॉनल्ड ट्रंप ने ईरान को धमकी भी दे दी है. ईरान ने कहा, आरोप झूठे हैं. इसलिए लगाए जा रहे हैं ताकि हमले (ईरान पर) को जस्टिफाई किया जा सके. तेहरान का कहना है कि ये अटैक यमन (हूती विद्रोही) की प्रतिक्रिया है. 2020 में अमेरिका का राष्ट्रपति चुना जाना है. ट्रंप प्रशासन अब तक बहुत कामयाब नहीं रहा. तालिबान से बातचीत नाकाम रही. सो अफ़गानिस्तान से अमेरिकी सेना वापस ले जाने का वादा भी पूरा होता नहीं दिख रहा. इसको और ट्रंप के टेम्परामेंट को. दोनों को मिलाकर आशंका उठ रही है. क्या ईरान पर हमला कर देगा अमेरिका? अगर ऐसा हुआ, तो क्या होगा? हम मामले को आसान भाषा में समझाने की कोशिश करते हैं.

Aramco का तेल भंडार
न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, 2017 में Aramco के पास कुल तेल भंडार था- 260,200,000,000 बैरल. एक बैरल माने 159 लीटर तेल. इतना बड़ा तेल भंडार Aramco को दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनी बनाता है. इसके पास नैचुरल गैस का भी काफी बड़ा भंडार है. 2018 में Aramco ने 1 करोड़ तीन लाख बैरल तेल प्रतिदिन का उत्पादन किया. नैचुरल गैस लिक्विड का प्रॉडक्शन रहा 11 लाख बैरल हर रोज़. नैचुरल गैस का उत्पादन रहा इसका 89 लाख क्यूबिक फीट हर दिन.

कहां-कहां और कितना निर्यात करता है?
2018 में Aramco ने एशिया को लगभग 52 लाख बैरल प्रति दिन के हिसाब से क्रूड तेल एक्सपोर्ट किया. खरीदने वालों में भारत, चीन, दक्षिण कोरिया, जापान सब शामिल हैं. अमेरिका को भेजा इसने तकरीबन 10 लाख बैरल प्रति दिन. यूरोप को सप्लाई गई 864,000 बैरल रोज़ाना.

कौन-कौन से देश तेल बेचते हैं?
14 मुल्क हैं. जिनके पास दुनिया में मौजूद कुल क्रूड ऑइल भंडार का 75 फीसद है. ये देश हैं- सऊदी, ईरान, इराक, कुवैत, वेनेजुएला, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), लीबिया, अल्जीरिया, नाइजीरिया, इक्वाडोर, अंगोला, गेबोन, रिपब्लिक ऑफ कांगो और रिपब्लिक ऑफ इक्वाटोरियल गीनिया. ये 14 देश OPEC देश कहलाते हैं. ऑर्गनाइजेशन ऑफ द पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज़. इसके अलावा रूस और अमेरिका के पास भी बड़े तेल भंडार हैं.

हम हैं खरीदार
खरीदने के मामले में सबसे ऊपर है चीन. फिर अमेरिका. और तीसरे नंबर पर भारत. इस वित्त वर्ष की बात करें, तो भारत ने 45 लाख बैरल कच्चा तेल खरीदा है रोज़ाना के हिसाब से. भारत सबसे ज़्यादा तेल खरीदता है OPEC देशों से. दूसरे नंबर पर अमेरिका. तीसरे नंबर पर ईरान से खरीदा करता था. ईरान का तेल हमें सस्ता भी पड़ता था. मगर अमेरिका के लगाए आर्थिक प्रतिबंधों की वजह से ईरान का तेल खरीदना मुमकिन नहीं रहा. स्टोरेज की बात करें, तो भारत के पास 12 दिनों तक अपनी कच्चे तेल की ज़रूरतें पूरी करने लायक क्रूड ऑइल है. आशंका जताई जा रही है कि Aramco पर हुए हमले के कारण हो रही तेल की कमी से अगले कुछ हफ़्तों के भीतर भारत में पेट्रोल और डीजल महंगा हो जाएगा. ये महंगाई 5 से 6 रुपया प्रति लीटर तक जा सकती है.

हूती कौन हैं? यमन का क्या सीन है?
2010 की शुरुआत में खाड़ी देशों में अरब स्प्रिंग शुरू हुआ. सरकार विरोधी प्रदर्शन. इसकी लहर यमन पहुंची. वहां सत्ता थी तानाशाह अली अब्दुल्लाह सलेह के पास. उन्हें सत्ता छोड़नी पड़ी. राष्ट्रपति बने उनके उपराष्ट्रपति अब्द्राबुह मंसूर हादी. वो ठीक से चीजें संभाल नहीं पाए. जिहादी हावी होने लगे. अलगाववादी अलग सक्रिय थे. उसके अलावा गरीबी, बेरोज़गारी और भुखमरी तो थी ही. इसका फ़ायदा उठाया हूती विद्रोहियों ने. जो पहले सालेह से भी लड़ते आए थे. ख़ुद को शिया अल्पसंख्यकों का नुमाइंदा बताने वाले हूती विद्रोहियों ने कई हिस्सों पर कंट्रोल भी कर लिया. राजधानी सना भी उनके हाथ में चला गया. मार्च 2015 में हादी विदेश भाग गए.

सऊदी की एंट्री
हूती विद्रोहियों का यमन पर नियंत्रण, ये स्थिति सऊदी को अपने पक्ष में नहीं लगी. क्योंकि वो मानता है, हूती ईरान से मदद पा रहे हैं. सऊदी कहता है, ईरान हथियार दे रहा है विद्रोहियों को. ईरान इससे इनकार करता है. सऊदी और ईरान राइवल हैं. इसी राइवलरी में सऊदी ने सुन्नी अरब देशों के साथ मिलकर हादी को सपोर्ट किया. उन्हें वापस सत्ता में बिठाने को हूती विद्रोहियों के विरुद्ध जंग छेड़ दी. सऊदी को अमेरिका और ब्रिटेन का भी समर्थन मिला. सऊदी को लगा था, ये लड़ाई फटाफट निपट जाएगी. मगर ये लंबी खिंच गई. दसियों हज़ार लोग मारे जा चुके हैं. लाखों लोग भुखमरी की स्थिति में है. यमन के कुपोषित बच्चों की तस्वीरें लगातार आती रहती हैं. UN लगातार कह रहा है, ये भीषण मानवीय संकट है. मगर जंग अब भी चल रही है. कब ख़त्म होगी, ये भी नहीं कहा जा सकता.

यमन में दिलचस्पी की एक और वजह
दुनिया के मानचित्र पर यमन जहां है, वो बहुत अहम है. बाब अल-मंडाब जलसंधि. ये एक पतला रास्ता है, जो कि रेड सी को अदन की खाड़ी से जोड़ता है. ये स्वेज नहर और हिंद महासागर के बीच का लिंक है. दुनिया में समंदर के रास्ते कच्चे तेल का जो कारोबार होता है, उसका एक बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से होकर आता-जाता है. बाहरियों की यमन में दिलचस्पी की एक बड़ी वजह ये भी है.

हूती-सऊदी की लड़ाई के बड़े नतीजे
5 अगस्त, 2019 को न्यू यॉर्क टाइम्स में छपा एक ओपिनियन पीस पढ़ा. इंटरनैशनल क्राइसिस ग्रुप के CEO रॉबर्ट माले का लिखा. इसमें सलाह थी, अमेरिका को हूती विद्रोहियों से बात करनी चाहिए. क्योंकि अगर वो सऊदी पर कोई मिसाइल या ड्रोन अटैक करते हैं, तो बहुत मुश्किल हो जाएगी. इसमें अमेरिका, सऊदी UAE समेत उसके अरब सहयोगी और ईरान के बीच बड़ा संकट पैदा हो जाएगा. संयोग देखिए. इस आर्टिकल के छपने के महीने भर बाद ही इसकी बात सच साबित होती दिख रही है. हूती विद्रोहियों का हमला इंटरनैशनल हेडलाइन बनाता है. जबकि बर्बादी और जान-माल के नुकसान में सऊदी और उसके गठबंधन द्वारा यमन पर किए जा रहे हमले ज़्यादा बड़े स्केल पर हैं. हूती कहते हैं. अगर सऊदी उनपर हमले रोक दे, तो वो भी सऊदी पर हमला रोक देंगे. मतलब संघर्ष विराम जैसी स्थिति. मगर ऐसा हो नहीं रहा.

ईरान और ट्रंप का क्या चल रहा है?
बराक ओबामा की सबसे बड़ी उपलब्धि थी- ईरान अमेरिका न्यूक्लियर डील. 2018 में डॉनल्ड ट्रंप ने अमेरिका को इससे अलग कर लिया. वो लगातार आर्थिक प्रतिबंध लगाकर ईरान को धकेल रहे हैं. जून में ओमान की खाड़ी के ऊपर ईरान ने अमेरिका का एक ड्रोन गिराया था. तब ख़बरें आई थीं कि अमेरिका बस ईरान पर मिसाइल अटैक करने ही वाला था. आख़िरी समय में ट्रंप ने लाल झंडी दिखा दी. वो ट्विटर पर ईरान से जुड़े रेटॉरिक देते रहते हैं. ईरान भी अमेरिका को जवाबी धमकियां देता रहता है. यूरोपीय देश- ख़ासतौर पर जर्मनी और फ्रांस ट्रंप की ईरान पॉलिसी से ख़ुश नहीं हैं.

प्रेस टीवी ईरान का इंटरनैशनल न्यूज़ नेटवर्क है. Aramco हमले पर सऊदी का मज़ाक उड़ाते हुए इन्होंने ये ट्वीट किया.
प्रेस टीवी ईरान का इंटरनैशनल न्यूज़ नेटवर्क है. Aramco हमले पर सऊदी का मज़ाक उड़ाते हुए इन्होंने ये ट्वीट किया.

इस हमले के बाद अमेरिका का रुख
Aramco पर हुए हमले पर अमेरिका की शुरुआती प्रतिक्रिया बचकानी थी. ऐसा लगा, बिना जांच-पड़ताल के वो ईरान पर आरोप मढ़ने को आमादा है. सेक्रेटरी ऑफ स्टेट माइक पॉम्पियो फटाफट ईरान पर उंगली उठा बैठे. ट्वीट किया कि तेहरान ने दुनिया की ईंधन आपूर्ति पर बहुत बड़ा हमला किया है. फिर जब ट्रंप से सवाल पूछा गया, तो उन्होंने कहा- ऐसा लगता तो है कि ईरान का हाथ है. लेकिन फिर जब पत्रकारों ने इसपर और खोदा, तो साफ़ नहीं बोले. पहले उन्होंने ईरान को धमकाया. कि अमेरिका कार्रवाई के लिए तैयार है. मगर फिर बोले- मैं नए फ़साद में फंसना तो नहीं चाहता.

 

अगर ईरान पर हमले की आशंका के बारे में पूछिए तो ट्रंप मिक्स्ड सिग्नल दे रहे हैं. अमेरिका ने अब तक ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया, जो बताता हो कि हमला ईरान ने किया है. जानकारों के मुताबिक, ईरान को लेकर लगातार बड़बोलापन दिखाकर ट्रंप ग़लती कर रहे हैं. अगर सच में ईरान का हाथ हो हमले में और अमेरिका ने कोई सैन्य कार्रवाई नहीं की, तो उसकी हिम्मत बढ़ जाएगी. अमेरिका भी कमज़ोर दिखेगा. और अगर अमेरिका ईरान पर कोई ऐक्शन लेता है, तो अपने लिए एक नया फ्रंट खोल लेगा. मौजूदा दौर में अमेरिकी जनता की आम राय ऐसी किसी नई लड़ाई के पक्ष में नहीं बताई जाती. ट्रंप ने अपने चुनावी कैंपेन में वादा किया था कि वो विदेशों में मोर्चे खोलने, लड़ाइयां लड़ने के पक्ष में नहीं. ऐसा करने में अमेरिका का आर्थिक नुकसान भी है.

एक और आशंका है
इसका भी शक जताया जा रहा है कि सऊदी आगे-आगे लड़े. और अमेरिका पीछे से मदद दे. ईरान के विरुद्ध ऐसी कोई लड़ाई बहुत हद तक इज़रायल को भी इन्वॉल्व करेगी. इज़रायल और ईरान में बैर है. परमाणु शक्ति संपन्न ईरान या क्षेत्रीय ताकत के तौर पर मज़बूत ईरान. इन आशंकाओं से इज़रायल को बेहद ख़ौफ है. अगर इस लड़ाई की नौबत आती है, तो पहले से ही अस्थिर मिडिल-ईस्ट और बुरी हालत में आ जाएगा. ये स्थिति न शांति के लिहाज़ से अच्छी होगी. न अर्थव्यवस्था के लिहाज से. ऐसा कोई भी कन्फ्रंटेशन और भी पार्टियों को साथ ला सकता है, इसकी आशंका है.


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