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लोग लौ लेटर में बहोत मुहब्बत करता हूं, क्यों लिखते हैं?

चॉकलेट डे है आज. नहीं मतलब अंग्रेजों को भी क्या सूझता है न, मम्मी डे, पापा डे, लिपस्टिक डे, चॉकलेट डे, छुआरा डे, मखाना डे, अक्टूबर में एक दिन हाथ धुलाई डे भी मनाते हैं. अच्छा है! फैलाओ मोहब्बत. नफरत फैलाने की साइत-सुदिन नहीं देखी जाती फिर ये तो प्यार है. अप्रेजल, प्रपोजल और डेडलाइन के बीच फंसे लोगों को सोमवार को प्रपोज डे भी चंद्रकांता वाला क्रूर सिंह लगता होगा न? हमको अब लगने लगा है. अप्रैल में अप्रेजल है. बॉस भी ये लाइन पढेंगे.

कैसे सब फ्लो-फ्लो में होता है न सब. एक दिन पहले प्रपोज, फिर अगले दिन चॉकलेट लेकर पहुंच जाओ. कुछ बोले. चॉकलेट की क्या जरूरत? इश्क में भी ईमानदारी नहीं. यहां भी ‘खर्चा-पानी’. एक धरना इस पर भी बनता है. आशिकों के हिस्से भी एक लोकपाल होना चाहिए. पर नहीं न, ये तो बस तरीका है, चॉकलेट के बहाने बतिया लो. बस बरफ पिघलनी चाहिए.

अपना तो प्रपोज डे तब होता था, जिस दिन विविधभारती पर ‘आज कहेंगे दिल का फ़साना जान भी ले ले चाहे जमाना’ बज जाए. ये कमल शर्मा की आवाज भी कैसी ‘रोमांटिक’  होती थी न, लगता था शाम ढले कोई यूकेलिप्टस के सूखे पत्तों पर लखानी वाली चप्पल धरते चला आ रहा है.

ये भी पढ़ें –  लवर्स को प्रपोज क्यों करना पड़ता है. प्रपोज करते ही लव तो नहीं होता न

घर से ‘प्यार किया तो डरना क्या’ सुन जैसे ही दो मील दूर उनकी गली-मोहल्ले में पहुंचो. धड़कन, सांसों और ब्लड प्रेशर का भीमपलासी-कहरवा शुरू हो जाता. हार्टबीट को पंचम स्वर में रगियाते सुना है आपने? कभी उसके पीले सूट का दुपट्टा ऊंगली से छूके नही गुजरा होगा. वो सब तो जादू लगता है अब, लगता है कुछ और हुआ था हमने कुछ और समझ लिया. करंट दौड़ने जैसी बातें सिर्फ नोस्टेल्जियाने के लिए याद रखी जाती हैं, जब आप ज्यादा नोस्टेल्जियाने लगें तो समझिए बुढा रहे हैं.

प्रपोज का क्या हुआ कि सौ में से मुश्किल से तीन बार ही कोई हां कहती है. बीस ‘मुझे कुछ नहीं कहना’ कह कर आगे बढ़ जातीकुछ गाल को प्यार से छूकर (दरअसल इत्ते प्यार से भी नहीं, प्यार के साथ चटाक भी पढ़ें) ‘घर में मां-बहन नहीं हैं’ उछाल कर बढ़ लेतीं. कुछ ज्यादा ही पारिवारिक होतीं उन्हें भैया याद आ जाते. हमारे माने हुए प्रपोज डे का अगला दिन ‘चॉकलेट’ की बजाय ‘हल्दी-दूध’ पर बीतता. “हां पापा ओमी के यहां कूलर गिर स्टैंड से गिर गया था, वही लग गया थोड़ा सा.”

एक और तरीका होता था.. ‘लौ लेटर’ लिखने का “शीशी भरी गुलाब की पत्थर पे तोड़ दूं”, “मैं तुमसे बहोत मुहब्बत..”, “मरता हूं तेरी याद में जिन्दा न समझना..” वाला, अब तो इनकी खिल्ली उड़ाना भी क्लीशे हो चला है लेकिन हम समझ अब भी नहीं सके कि ये सारे ‘बहुत’ को ‘बहोत’ ही क्यों लिखते थे?

इस देश का आज ये हाल कतई न होता, इस देश को सबसे ज्यादा नुकसान ‘पंजे-कमल-झाड़ू-हाथी’, ‘लौ लेटर’ में ‘बहोत मुहब्बत’ और ‘यहां पेशाब करना “सक्त” मना है’ लिखने वालों ने पहुंचाया है. सालों से बार-बार वही गलतियां अलग-अलग लोग, अलग-अलग जगहों पर दोहराते आए हैं.

और ध्यान रखा जाए ‘लौ लेटर’ हमेशा सही हाथों में पड़ना जरुरी होता था, और दूसरे की हैण्डराइटिंग में होना भी जरुरी होता था. अगला अगर ‘लौ लेटर’ लेके घर पहुंच जाए तो प्रपोज डे की जगह रस्ते लग जाते थे. उससे बचाव अनिवार्य है. बेहतर यही कि आशिकों के इरादों के साथ हड्डियां भी मजबूत होनी चाहिए.

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