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'कैश शो' से बेआबरू विदाई पर फूट फूटकर रोए हजार- पांच सौ

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sanajy jha mastanपुराने नोट बंद होने से कौन परेशान है? जाहिर है लाइन में लगे लोग. पाई पाई को तरसते लोग. लेकिन इनसे ज्यादा परेशान कौन है? यही तो प्रॉब्लम है. आप सिर्फ बोलने वालों की सुनते हैं. चुपके चुपके आंसू बहाने वालों पर आपका ध्यान नहीं जाता. सबसे ज्यादा दुखी होंगे वो नोट. जो कल खजाना थे. आज कबाड़ हो गए. रद्दी हो गए. कल किसी को भी खरीद सकने वाले आज खुद किलो के भाव बिक रहे हैं. कोई जला रहा है छिपाकर. कोई नाले में फेंक रहा है. खारे नाले में मुंह धोके आने पर भी इसे स्वीकार नहीं किया जाएगा. ये इन नोटों की बदनसीबी है. ये कचरा ही बनेंगे. इनकी शहादत कुबूल की जाए. इस शहादत को आंखों के सामने फिल्मा रहे हैं संजय झा मस्तान. ये अपनी बात फिल्मों से समझा सकते हैं. लिख के बता सकते हैं. क्योंकि मुंबई में रहते हैं. मायानगरी में फिल्में बनाते, लिखते और निर्देशित करते हैं. अब इस सर्कस शो और आपके बीच में ज्यादा देर अटके रहने की कोई जरूरत नहीं लग रही मुझे. तो अब तुम्हारे हवाले लेखन साथियों.

दी लास्ट शो

शो बीच में ही रुक गया. सर्कस की दुनिया में भारत सर्कस का कैश शो देखने दुनिया आती. कैश का सर्कस, सर्कस का सबसे खतरनाक खेल था. यह खेल हृदय रोगियों और बच्चों के लिए नहीं था फिर भी वे सब शो में हिस्सा लेने आते थे. कैश शो में पांच सौ हज़ार को ड्रम्स में भर – भर के डायनामाइट से उड़ाया जाता और खिलाडी बने दर्शक जान पर खेल कर रुपयों को घर ले जाने के लिए लूटते. यह एक हॉरर खेल था और रात में अकेले खेलने के लिए उचित नहीं था. फिर भी सरकस के लास्ट शो में इसे लोग खेलते थे. अमीर जीवन जीने के लिए लोग सर्कस का ये शो खेलने और देखने आते. शो का ऐसा असर होता कि दरिद्र दर्शक धनी हो जाते. सबकी जेब में एक – एक हज़ार का और एक – एक पांच सौ के नोट आने की सर्कस के जोकर्स की चेतावनी सच हो जाती. खेल का यही चमत्कार था. इसीलिए भारत सर्कस दुनिया का सबसे अनोखा सर्कस था.

सर्कस में यही एक शो था जिसे जोकर्स भी बैठ के देखते थे. खेल शुरू हो चुका था. हवा में लटकते हुए गुल्लकों में जोकर्स बैठे थे. उनके बैठने की यही जगह थी. वे गिरती चवन्नी की झन की आवाज़ के साथ मंच पर गिरते हुए एंट्री लेते. वो ऐसे थूकते कि चवन्नी का भ्रम होता. लोग जब उन्हें उठाने के लिए झुकते तो वे खूब हंसते. कैश के इस ख़तरनाक खेल में अठ्ठनी और चवन्नी जोकर्स बनते थे. चवन्नी को लेकर सीरियस होना फिज़ूल है इसलिये सर्व-सम्मति से सर्कस में खिलाड़ी दर्शकों ने उन्हें जोकर मान लिया था. हर रात कैश के खेल का शो कौड़ियों से शुरू हो कर लाखों करोड़ों तक पहुंच जाता. हज़ार पांच सौ कैश शो के हीरो थे.

इस खेल को देखने से पहले जोकर्स सर्कस के दर्शकों के लिए एक भविष्यवाणी पढ़ते थे. भविष्यवाणी के शब्द थे ‘लार्ड कुबेर इलेक्ट्रॉनिक मनी ले कर आएंगे. मिस्टेक होता जायेगा, करेक्सन्स आते जायेंगे’. इन खेलों को देखने के लिए जमाखोरी, सूदखोरी, मुनाफाखोरी जैसे दर्शनों से सर्कस के दर्शक को गुप्त परिचय कराया जाता. जोकर दर्शकों का चेहरा पढ़ते और कान में आ कर उन्हें बताते कि वे कंजूस हैं या कामचोर. दर्शक अपने बारे में सुनकर डरने का अभिनय करते हुए हंसते. फिर सब हंसने लगते. शो आगे बढ़ जाता.

खेल में बनिए और बिचौलिए बनावटी और दिखावटी नाम के चरित्र बनते. कैश के शो के क्लाइमेक्स में हज़ार पांच सौ मिल कर बनावटी बनिए और दिखावटी बिचौलिए की मदद से काले धन की निर्ममता से नकली हत्या करते थे. मंच पर ये थ्री डी के लाइट इफ़ेक्ट में होता जिसकी गंभीरता का काला हास्य भीड़ समझ लेती और सर्कस के लास्ट शो में सब खूब हंसते और शो ख़त्म होने के बाद हंसते हंसते कैश ले कर अपने अपने घर जाते.

आज कैश शो बीच में ही रुक गया था. हज़ार पांच सौ जैसे सुपरस्टार के मंच पर रहते रहते सब मिलकर हज़ार पांच सौ पर हंसने के लिए इतने चुटकुले बना लेंगे लोगों ने कभी सोचा नहीं था. कैश शो के रुकते ही दर्शक दीर्घा में बैठे सर्कस के दर्शक की भीड़ कोरस में रोने लगी और रोते रोते हंसने लगी. भीड़ की सोशल मीडिया पर सारे तर्कशास्त्री अर्थशास्त्री बन गए. कैश ट्रैश हो गया. रातों रात पांच सौ हज़ार हैश टैग बन गए. करोड़ कौड़ी हो गया. हज़ार पांच सौ कैश के शो में चलेबल – रनेबल था, मंच पर अचानक अनेबल हो गया. भीड़ आपस में बैठ कर तरह -तरह की चिंताएं करने लगी. दर्शक जहां थे वहीं बैठे बैठे अपने शब्दकोश बनाने लगे. विचार प्रसारित करने लगे. दर्शकों में बैठे शराबी अपनी जेबों की नोटों के साथ बच्चों की तरह खेलने लगे और हज़ार के नोट में चखना भर के सेल्फी लेने लगे. हज़ार इससे ज्यादा पहले कभी अपमानित नहीं हुआ था. अपनी नज़र में वो दलालों के क़दमों से भी नीचे गिर चूका था. कैश शो के रुकते ही मंच पर हज़ार पांच सौ दोनों खड़े थे. पांच सौ का मुंह उतर गया था. हज़ार अवाक था.

अभी अभी हज़ार पांच सौ को बीच शो में ही नौकरी से निकाल दिया गया था. अब तक जो शो का वीआईपी था एक पल में बेसहारा बन गया था. सर्कस की कुरूप सच्चाई आज हज़ार पांच सौ के सामने थी. हज़ार पांच सौ को लगा अब तक उनकी की गयी चापलूसी और भीड़ से मिले चरण स्पर्श का ऋण वे भाषण दे कर ही अदा कर सकते हैं. चाकरी छोड़ कर मंच पर से उतरने से पहले पांच सौ ने सर्कस के आयोजकों से माइक ले लिया और मौन हो गयी. ‘एक प्लेटफार्म से दूसरे प्लेटफार्म पर मुझे कूदना सिखाने से ले कर इस खतरनाक खेल तक मुझे किसने पहुंचाया?’ सबने पहली बार रुपये को बोलते हुए सुना. रुपया उनसे बात करे कईयों के गले से ये बात नहीं उतरी. भीड़ में बैठे इंटेलेक्चुअल्स पांच सौ को भाषण देते हुए देख कर हज़ार पांच सौ को उसके मुंह पर ही कोसने लगे. हज़ार पांच सौ को ये महसूस हो गया कि सब उनसे एक पल में दूर हो गए हैं और नफरत करने लगे हैं. हाथ का मैल कह कर उनसे हाथ झाड़ने लगे हैं.

हज़ार पांच सौ का दिल टूट गया. और वो कराहने लगे और बारी बारी से माइक पर अपने दिल की बात करने लगे. “इंटेलेक्चुअल्स मुझे क्यों कोस रहे हैं? बुद्धिजीवी मुझे क्यों गालियां दे रहे हैं? मुझे समझने में आप कहां चूक गए? मुझसे क्या भूल हुई?“ पांच सौ बोली. “इंटेलेक्चुअल्स देश के मूड को पढ़ने में नाकाम क्यों रहे?“ अब बोलने की बारी हज़ार की थी. हज़ार का स्वर सपाट था जैसे कहीं कुछ हुआ ही न हो.“ मेरी कंडीशनिंग किसने की? जीने के लिए आग पर चलना मुझे किसने सिखाया? मेरा स्वामी कौन था? मेरे धारक कहां गए? मेरे धारक … मेरे धारक“ इतना कह कर दोनों एक साथ रोने लगे. अब तक पांच सौ और हज़ार भीड़ में फेनोमेना थे पर अब शो के बीच में ही मंच पर अनाथ मेमना हो गए. दर्शकों की भीड़ ने न जाने क्या सोच कर कुछ पल तक उनको रोने दिया. भीड़ की अब यही सहानुभूति उनके लिए बची थी, जो उन्हें भीड़ से मिल रही थी. हज़ार पांच सौ भौचक्के थे. अचानक उनसे कोई डर नहीं रहा था. सब तरफ से रिजेक्ट होते देख कर, पांच सौ ने फिर कहना शुरू किया. ”सर्कस संघ का शुक्रिया. सर्कस सोसाइटी वाले, मेरे खेल प्रेमियों, मेरी एक आखिरी इच्छा जरुर पूरी करना. संस्कृति के नुक्कड़ों पर न रख सको तो कम से कम किसी चौक चौराहे पर मेरे नाम से कोई सड़क या चौराहा जरूर बनवा देना“ दोनों एक पल के लिए मौन हो गए. सब मौन थे. जैसे श्रद्धांजलि देने में होते हैं. “दे दे मेरा पांच रुपैया बारह आना …” गाते हुए पांच सौ रोने लगी और सबको भावुक कर दिया. भीड़ ये गीत गुनगुनाने लगी. तालियां बजी. हर्ष ध्वनि हुई. पांच सौ की आंखें डबडबा गयीं. सब कुछ बहुत नाटकीय हो गया.

भीड़ का समाज एक झटके में नए खेल के लिए तैयार हो गया था. पांच सौ और हज़ार अब तक जहां पूंजीवाद के नाम पर यूज्ड हो रहे थे अब उसी नाम पर वहीं अब्यूज़्ड होने लगे. नाटक शुरु होने से पहले जो नाटक होता है वो शुरू हो चुका था. आम लोगों के साथ खाने, पीने और घूमने का सबसे ज्यादा पोलिटिकल स्टंट किसने किया है? लोग ये गूगल करने लगे. उत्तर में पांच सौ हज़ार का नाम सबसे ऊपर था. प्रशंसा युग के चाटुकार पत्रकारिता काल में रुपया को बचाने कोई नहीं आया गुजरे वक़्त से सारे रिश्ते टूट चुके थे.

खेल में परदे के पीछे बैठा हुआ काला धन ये सब अपनी आंखों से देखने के लिए घबराया हुआ दौड़ा दौड़ा ग्रीन रूम से मंच पर आ गया और अचानक हांफता हुआ स्पॉट लाइट में फंस गया. वो पहली बार सबको साफ़ दिख रहा था. काले धन को मेकअप करने का मौका नहीं मिला था. वो अपनी सादगी में भी भयानक लग रहा था.

आज सर्कस के कैश शो के बीच में ही 8 बजे भारत सर्कस के प्रमुख की एक घोषणा ने खेल बदल दिया. भारत सर्कस के प्रमुख की बात किसी सरकारी कानून से कम नहीं था. प्रमुख सर कह रहे है तो सही ही कह रहे होंगे भीड़ ने सोचा और उनकी हर बात कानून हो कर लागू हो गया. हज़ार पांच सौ आज आधी रात से अब चाकरी में नहीं होंगे. चलता हुआ कैश शो बीच में ही रुक गया.

आना, सवैया, पहाड़े में ज़िंदगी का हिसाब लगाने वाला समाज पनियाही आंखों से सर्कस का ये लास्ट शो देख रहा था. कैश शो के रुकते ही भीड़ शो ख़त्म होने के उल्लास में ताली बजा कर हर्ष ध्वनि में चिल्लाने लगी. अफरा – तफरी में सब उल्टा पुल्टा होने लगा. लोग टेलीविज़न में छपने लगे और अख़बार में दिखने लगे. डिजिटल होते हुए देश के डिजिटल शून्य और डिजिटल एक, भीड़ को चीर कर सामने मंच पर आ गए और मंच का संचालन करने लगे. भीड़ ने अपने विचार प्रक्रिया से पांच सौ हज़ार को तत्काल हटा दिया. सबकी नज़रों के सामने भीड़ धीरे धीरे डिजिटल अंक में बदलने लगा.

सर्कस का अर्थशास्त्र जोकर ही समझ सकता है, भीड़ भरे किसी शो का कोई बेपरवाह दर्शक नही. आगे बढ़ कर चवन्नी – छाप जोकर्स ने ही नया डिजिटल शो संभाला. अपने पुश्तैनी भारत सरकस में इन जोकरों का इतिहास चवन्निया मेम्बरी से ही शुरू हुआ था. जोकर अपने गुलाबी और बैंगनी कपड़ों में मिल कर दस रूपये की साइज़ का बच्चों के स्टीकर टाइप दो हज़ार का नोट बन गए. एक दिन के दूधमुंहे नोट का अभिनय सब जोकर मिल कर बहुत खूबी से करने लगे. जोकर्स ने दर्शकों का ध्यान खींचना शुरू कर दिया. एक पैसे से दो हज़ार तक की नए डिजिटल कहानी में पांच सौ और हज़ार से एक पल में सबका कनेक्ट ख़तम हो गया. ‘चूरन वाला नोट’ चिल्लाती हुई शो में बॉयफ्रेंड के साथ आयी लड़कियों ने जोकर्स का साथ देना शुरू कर दिया. भीड़ में सबकी अपनी अपनी सेल्फी थी. भीड़ के पास सबकुछ अपना था. अपने सिद्धांत, अपनी पूंजी. अपनी किताबें, अपनी फिल्म, अपने ब्लॉग. नई दुनिया की नयी जेनेरेशन भीड़ पर सबसे ज्यादा यकीन करती है और पैसा भीड़ का सबसे बड़ा सिद्धांत है. भीड़ सर्कस के इस खेल को देश की व्याख्या कहने लगी. जोकर्स के डिजिटल खेल से इकॉनमी के माइक्रो मच्छर मंगल यान से मार्स पर जाने का सपना देखने लगे. शो में इस बार कोई भविष्य वाणी नहीं हुआ सबको सीधा भविष्य दर्शन हो गया. भीड़ के सामने हज़ार पांच सौ का जाना बचे खुचे का जाना हो कर रह गया. दो हज़ार का टिकट कूपन सा दिखने वाला नोट जोकर्स ने शो में सबके लिए बांट दिए. भीड़ को राहत मिली. कुछ ही देर में ज़ोकरों ने अच्छे खासे सर्कस को नौटंकी बना दिया. दर्शकों ने भी बिना बात के नाचने का मन बना लिया. अब्दुल्ला की शादी के सब बेगाने, दीवाने बन के नाचने लगे. भीड़ में कौन कहां सक्रिय हो गए कहना मुश्किल हो गया. सब अपने कूपन लहराने लगे और उन्हें छोटे छोटे रुपयों में बदलवाने के लिए बैंक की ओर बढ़ गए. सर्कस के बाहर भी लोग खुश थे. न पैसा है न बदलवाने की झंझट कहते और मुस्कुराते. लोग देख रहे थे और नौटंकी चल रहा था. लग रहा था लास्ट शो में ख़ुशी की सबको कोई नयी करन्सी मिल गयी थी. और इस करंसी का आनंद लेने के लिए काम करते हुए लोग कतार में खड़े हो गए. पांच सौ हज़ार के युग में कोई बर्तन मांजना नहीं चाहता था, पर अब जनता सब करने को तैयार थी.

अपने सपनों का भारत देखने के लिए लोग लाइन में खड़े हो गए. जिन्हें नहीं आती थी वो भी पैसों के लिए एटीएम के सामने एक्टिंग करने लगे और भीड़ में एक दुसरे के भाषण की खूबियों से पेट भरने लगे. लोगों ने उम्रदराज़ लोगों को बैंकों के आगे झुकते देखा. सबको मनोवैज्ञानिक आज़ादी मिल गयी थी. एक युवती ने ख़ुशी में अपना टॉप उतार दिया. वामपंथी और समाजवादी, पूंजीपतियों की मदद के लिये सडकों पर आ गए. ज़माना सच में बदलने लगा. जिस तरह की हताश युवाओं ने शिक्षा पायी, आनन फानन में सबको रोज़गार मिल गया. इसी दिन के लिए पाल पोस के नयी पीढ़ियों को बड़ा किया गया था ताकि ऐसे युद्ध में वो पुरानी पीढ़ी को डिस्पोज़बल कप्स में पानी पिलाये. जोकर्स ने युवाओं की हताशा को ऊलजुलूल के लिंक से विद्रोह में बदलना चाहा पर खुद हताश हो गए.

नोट बदल गया था लोग बदल गए थे. पैसा निकालने की सीमा समाप्त हो गयी. एटीएम से अब एक दिन में कोई कुछ भी निकाल सकता था. सुबह की चाय से लेकर लेटने की चटाई तक. दूध, ब्रेड, अंडा और सब्जी तरकारी के साथ गुप्त रूप से एटीएम की मशीन में जरूरत का सब सामान मिलने लगा. जिनके पास गुप्त पासवर्ड था वे लोग दूध जमा कर के एटीएम की मशीन से दही निकालने लगे. कहीं कहीं किसी मशीन से घी भी निकला और फिर मशीन बंद हो गयी.

टेलीविज़न पर बैठे कबाड़ी बीस रुपये किलो के भाव से हज़ार और पांच सौ को तौलने निकल पड़े. दवाई की कम्पनियों और डॉक्टरों की फ़ौज ने सबको बीमार, बहुत बीमार बना दिया था. शहरों में लोगों को सबसे पहले हॉस्पिटल की याद आयी. गांव में बैंक के समीप खुले आकाश के नीचे ज़ेरॉक्स मशीन लग गए. सबका धंधा चल पड़ा. नोट-एक्सचेन्ज फ़ॉर्म एक नया सर्कस था.

दुनिया जानती है भारत सर्कस के कैश शो में दर्शक की भीड़ पैसे वाली पार्टी है. इस भीड़ के पास पैसे की अपनी परंपरा है, पैसे की विरासत है, और पैसे का गौरव है. इसीलिए ये शो चल रहा था. भीड़ प्राय: बुद्धि विरोधी होते हैं और भीड़ सिर्फ बेहतर जीवन शैली के लिए जीती है. भीड़ का समाज एक झटके में नए खेल के लिए तैयार हो गया. व्यापारियों ने अपने दिमाग में जुगाड़ का गणित झटपट लगा लिया. कर्मचारियों की सैलरी कैश हो गयी. उनके दिमाग में उनका कर्मचारी नोट बदलवाने के लिए लाइन में खड़ा हो चुका था. पांच सौ हज़ार को पूरी पिक्चर समझ में आ गयी. सरकस में उनकी शो की तम्बू का बम्बू उठ चुका था. बचत का मतलब सिर्फ महिलायें जानती थी. महिलाओं का जो गुप्त धन नंगा हुआ उस पर जोकर हंसने लगे. कोई कह रहा था पांच सौ की इस नोट से ये लड़ाई पांच सौ वर्षों से चल रही थी, आज जीत मिली है. कोई एक हाथ में सौ सौ के नोट का पंखा बना कर दुसरे हाथ से सेल्फी ले रहा था. सौ का नोट सबसे ज्यादा बिजी हो गया. अपने से सभी छोटे नोटों का वो फिर से लीडर बन बैठा. सौ के नीलेपन में थोड़ा मोर पंख और घुल गया , सौ आसमान का राजा नील कंठ हो गया.

शो खत्म होते होते ये ऑफिसियल हो गया था कि देश की अस्सी प्रतिशत आबादी को कैश का ये शो अब सर्कस में नहीं चाहिए इसलिए इस खेल को अब खत्म कर देना चाहिए. असली नकली के अपने हर रूप में अब तक सबके जीवन में काम आने वाला और हर लिंग की मर्दानी ताक़त हज़ार पांच सौ, बड़े बे आबरू हो कर मंच पर से उतरे. कोई कह रह था ऐसा पहले भी हुआ है. कोई कह रह था ऐसा ही कुछ उसने कभी सपने में देखा था.

अपने अपने कैमरे के सामने सब सौ – सौ के नोट लेते देते ह्यूमन लगने लगे. हज़ार पांच सौ स्कूल, अस्पताल, रोड और रेल लाइन से भी विदा हो गए. सरकार के साथ साथ पुलिस, पंचायत, बाजार, फ़ौज, सबका कल्याण हुआ. एक, दो, पांच, दस के सिक्कों की टोपी पहने जोकर सफ़ेद – ग्रे – काला झंडा लिए ‘भूखे हैं, हम भी भूखे हैं’ कह कर छाती पीटने लगे, यह सब देख कर लास्ट शो में दर्शकों का हंसते हंसते बुरा हाल था. खुल्ले के फेर में इस दूकान से उस दूकान भीड़ चक्कर नहीं लगाना चाहती. इसीलिए नए सरकस में इन जोकरों की उपस्थिति ज्यादा फनी हो गया था. जोकर की नौकरी नए सर्कस में पक्की हो गयी.

इस बीच किसी जोकर ने पांच सौ हज़ार की पीठ पर सरकस की शो का अमर वाक्य लिख दिया था. मंच पर से उतरने के लिए जैसे ही वे दोनों मुड़े सबने उनकी पीठ पर ‘द – एन्ड’ पढ़ लिया. जाते जाते उनपर कोई जूते फेंकने लगा तो किसी ने स्याही लहरा दी. किसी जोकर ने उसी वक़्त लाइट्स आउट कर दिया. पांच सौ हज़ार अंधेरे में हमेशा के लिए डूब गए. कैश खत्म, शो ख़तम. ये उनका लास्ट शो था. हज़ार पांच सौ जाते जाते मंच के अंधेरे में काले धन से मिल गए और अंधेरे में अफरा तफरी मचाने की कोशिश की. इसी अफरा तफरी के हिसाब-किताब की मज़बूरी में सर्कस लास्ट शो के बाद दो दिन तक बंद रहा.


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