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चीतल डायरीज़ः गुजरात का वो समुदाय जो भारत सरकार को नहीं मानता

क्या आपने कभी एक रुपए के नोट को ध्यान से देखा है? यह दूसरे नोटों से अलग है. इस नोट के ऊपर केन्द्रीय रिजर्व बैंक नहीं लिखा हुआ है, बल्कि भारत सरकार लिखा हुआ है. इस पर रिजर्व बैंक के गवर्नर के बजाय वित्त सचिव के दस्तखत होते हैं. न ही इस नोट पर रिजर्व बैंक की तरफ से कोई गारंटी लिखी होती है.

1934 में आए रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया एक्ट का सेक्शन 24 कहता है कि रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया 2 लेकर 10 हजार तक के नोट छाप सकता है. इसमें एक रुपए के नोट का जिक्र नहीं है. एक रुपए का नोट केवल भारत सरकार छाप सकती है. इसका एक साधारण जवाब यह है कि इस देश में एक रुपए का नोट 1917 में छपना शुरू हुआ. यह पहले विश्वयुद्ध का दौर था. करेंसी की जितनी मांग थी उसकी भरपाई करने के लिए ब्रिटिश राज के पास पर्याप्त सिक्के नहीं थे. सिक्कों की ढलाई में काफी समय में लगता था. ऐसे में 30 नवंबर 1917 के रोज पहली बार एक रुपए के 25 नोट छापे गए.

vinay cheetal diaries

चीतल दरअसल उमरकोट के राणा महेंद्र के तेज़ चाल वाले ऊंट का नाम था जिस पर बैठकर वो रेगिस्तान चीरते हुए, रात को लौद्रवा (जैसलमेर) अपनी प्रेमिका मूमल से मिलने जाता था और सुबह होते-होते फिर उमरकोट (सिंध) लौट आता था. उस चीतल ने न सिर्फ इस एपिक लव स्टोरी को विटनेस किया बल्कि जहां-जहां उसके पैर पड़े, वहां का समय और कहानियां देखीं. चीतल डायरीज़ सीरीज़ के जरिए हम गुजरात से ऐसी कहानियां लेकर आ रहे हैं जो इस समय और काल में आप तक पहुंचनी चाहिए.

1934 में जब रिजर्व बैंक एक्ट बना, उस समय ब्रिटिश सरकार पहले से ही एक रुपए का नोट छाप रही थी. अगर रिजर्व बैंक को भी इसे छापने का अख्तियार दे दिया जाता तो दो किस्म के नोट बाजार में आ जाते. इस विसंगति से बचने के लिए एक रुपए के नोट की छपाई सरकार के पास ही रहने दी गई. तो क्या इससे विसंगति दूर हो गई? दरअसल इस कदम ने विसंगति को स्थाई बना दिया. इसी विसंगति ने गुजरात और महाराष्ट्र के सीमावर्ती इलाकों में एक नए संप्रदाय को जन्म दिया है. यहां से हम इस रिपोर्ट के उस हिस्से में घुस रहे हैं जहां आपका साबका कई कॉस्परेंसी थ्योरी से लैस एक दार्शनिक और राजनीतिक गुत्थी से पड़ने वाला है. थोड़ी देर के लिए दिमाग को यहां जमा लीजिए.

डेडियापाड़ा में पड़ने वाले खेड़ाअम्बा में रहने वाले सति पति आदिवासी भारत सरकार को नहीं मानते (फोटोःविनय सुल्तान / दी लल्लनटॉप)
डेडियापाड़ा में पड़ने वाले खेड़ाअम्बा में रहने वाले सती पति आदिवासी भारत सरकार को नहीं मानते (फोटोःविनय सुल्तान / दी लल्लनटॉप)

नर्मदा जिले में एक तालुका है डेडियापाडा. इसमें एक गांव पड़ता है खोड़ाअम्बा. प्रशासन की फाइलों में यह गांव शेडो जोन का हिस्सा है. शेडो जोन माने नर्मदा जिले के वो 103 पोलिंग बूथ जहां मोबाइल कनेक्टिविटी या तो पूरी तरह से नदारद है या फिर बहुत बाधित है. यहां पर पोलिंग पार्टी अपने साथ संचार के दूसरे इंतजाम रखती हैं ताकि विपरीत परिथितियों में सुरक्षा बलों को मदद के लिए बुलाया जा सके.

2012 के विधानसभा चुनाव में डेडियापाडा सीट से बीजेपी के मोतीलाल वसावा चुनाव जीतकर आए थे. खेड़ाअम्बा उनका पैतृक गांव है. गांव में घुसते ही आपको इस बात का अहसास हो जाता है. पूरा गांव बीजेपी के झंडों से पटा पड़ा है. मोतीलाल वसावा इस चुनाव में फिर से बीजेपी की टिकट पर किस्मत अाज़मा रहे हैं. सतपुड़ा की पहाड़ियों पर बसे इस छोटे से गांव का कोई आदमी अगर जनता का प्रतिनिधि बनकर विधानसभा में पहुंचता है तो यह लोकतंत्र में आस्था मजबूत करने वाला तथ्य होना चाहिए. इसी गांव के एक कोने में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का एक काउंटर नैरेटिव भी है. इस चुनावी माहौल में इसे भी दर्ज किया जाना चाहिए, क्योंकि लोकतंत्र एकालाप पर नहीं चलता.

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अपने खेतों में पानी लगाते हुए रायसिंह भाई. उन्होंने हमसे तभी बात की, जब अपनी ‘यूनिफॉर्म’ पहन ली (फोटोः विनय सुल्तान / दी लल्लनटॉप)

जब हम खेड़ाअम्बा पहुंचे उस समय सूरज ढलने में बमुश्किल आधा घंटा बचा होगा. रायसिंह भाई अपने खेत में पानी लगा रहे थे. उन्होंने हमसे कहा कि वो बिना यूनिफार्म पहने अपनी बात नहीं कहना चाहते. ऐसे में हम उनके काम खत्म होने का इन्तजार करते रहे. करीब एक आधे घंटे बाद हम उनके घर पर थे जहां आस-पड़ोस के 15-20 दूसरे लोग भी जुटे हुए थे. वो घर के भीतर गए. धोती और गुलाबी रंग का कुर्ता पहनकर बाहर निकले. कुर्सी पर बैठते हुए उन्होंने कहा, “यही हम आदिवासियों की यूनिफॉर्म है. धोती और कुर्ता.” अन्दर से वो अपने साथ दो थैलियां भी लाए थे जिनमें कई दस्तावेज़ थे. उन्होंने सबसे पहले हरी थैली में से एक रुपए का लेमिनेटेड नोट निकाला और कहना शुरू किया-

“आपने एक का नोट गौर से देखा है. सिर्फ यह ऐसा नोट है जिसमें सबसे ऊपर भारत सरकार लिखा हुआ है. बाकी सभी नोटों पर सेन्ट्रल गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया लिखा हुआ है. यह एक रुपए का नोट ही असल करंसी है. इस पर कहीं भी रिजर्व बैंक की गारंटी नहीं लिखी हुई है. रिजर्व बैंक जो दूसरे नोट पर गारंटी लिखता है कि मैं धारक को इतने रुपए देने का वचन देता हूं. वो कहीं से इस गारंटी को हासिल करता है तभी तो हमें देता है. ये जो भारत की केंद्र सरकार है, यह इस नोट की तरह करार पर चलने वाली सरकार है. इसलिए हम इंडियन सेन्ट्रल गवर्नमेंट को नहीं मानते. हम गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया को मानते हैं.”

रायसिंह चौथी कक्षा तक ही पढ़े हुए हैं. लेकिन फिलहाल वो एक कुशल वकील की भूमिका में आ चुके थे. उन्होंने समझाने के अंदाज में कहना शुरू किया-

“आप गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया और सेंट्रल गवर्नमेंट में फर्क समझना चाहते हैं? इस कागज से आपको यह समझ में आएगा.” 

रायसिंह भाई (बाएं) अपनी 'यूनिफॉर्म'
रायसिंह भाई (बाएं) अपनी ‘यूनिफॉर्म’ में. वो बताते हैं कि ये आदिवासियों की यूनिफॉर्म है. (फोटोः विनय सुल्तान / दी लल्लनटॉप)

उन्होंने 2004 के अखबार की कतरन निकाली जिसपर अटल बिहारी वाजपेयी का बयान दर्ज था. यह 2004 लोकसभा चुनाव के बाद की खबर थी. अटल बिहारी वाजपेयी उत्तराखंड के किसी सरकारी स्कूल के दौरे पर थे. उन्होंने स्कूल को 100 रुपए का अनुदान देते हुए कहा था कि उनके पास ज्यादा पैसे नहीं है और हाल ही में उनकी नौकरी छूट गई है. रायसिंह भाई अखबार की कतरन को समेटकर पन्नी में रख देते हैं और बोलना शुरू करते हैं-

“केंद्र सरकार का प्रधानमंत्री खुद कह रहा कि उसकी नौकरी छूट गई है. माने वो नौकर था. आज मोदी भी यही कहता है कि वो प्रधानसेवक है. माने यह जितने भी लोग हैं, चपरासी से लेकर प्रधानमंत्री तक ये सब भारत सरकार की नौकरी कर रहे हैं. मोदी आज देश के प्रधानमंत्री है. सारा माल-खजाना उनकी पहुंच में हैं. वो चाहे तो पूरा माल हड़प सकते हैं लेकिन वो ऐसा नहीं करते. उन्हें भी दूसरे सरकारी कर्मचारियों की तरह हर महीने तनख्वाह मिलती है. इसका क्या मतलब हुआ? इसका मतलब हुआ कि वो सरकार नहीं हैं. तो सरकार कौन है? वो सरकार हैं कुंवर केश्रीसिंह जी. वही असली सरकार हैं.”

रायसिंह भाई जिन कुंवर केश्रीसिंह का जिक्र कर रहे थे उन्हें गुजरात, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के जिलों में देवता की तरह पूजा जाता है. उनके नाम के आगे तरह-तरह की उपमाएं लगाई जाती हैं मसलन एंटी क्राइस्ट, फर्स्ट लार्ड ऑफ़ दी ट्रेजरी, ओनर ऑफ़ इंडिया. उनके बारे में उनके अनुयायी बहुत कुछ नहीं बताते सिवाए इसके कि उनके बारे में सभी जानकारी आपको ब्रिटिश हाईकमीशन के इनफॉर्मेशन डिपार्टमेंट से मिल जाएगी.

कुंवर केश्रीसिंह से जुड़ा सति-पति आदिवासियों का साहित्य (फोटोः विनय सुल्तान / दी लल्लनटॉप)
कुंवर केश्रीसिंह से जुड़ा सती-पति आदिवासियों का साहित्य (फोटोः विनय सुल्तान / दी लल्लनटॉप)

बहरहाल इन्टरनेट पर जो जानकारी हमें उपलब्ध है उसके हिसाब से कुंवर केश्री सिंह का जन्म गुजरात के तापी जिले के गांव कटास्वान में हुआ. उनकी मां का नाम जमाना और पिता का नाम टेटिया कानजी था. उनके अनुयायी बताते हैं कि उन्होंने बैरिस्टर की पढ़ाई पढ़ी थी और बड़ोदा के सयाजीराव गायकवाड़ उनके क्लासमेट थे. यह सूचना गलत है क्योंकि उनके अनुयायियों का दावा है कि केश्रीसिंह ने 1930 में अपनी पढ़ाई खत्म की. उस समय तक सयाजीराव को बड़ौदा पर राज करते हुए 55 साल का वक्त गुज़र चुका था.

16 जुलाई 1997 को आउटलुक मैग्ज़ीन में छपे लेख के अनुसार कुंवर केश्री सिंह की पढ़ाई बीए तक हुई थी. तमाम विरोधाभासी तथ्यों के बावजूद एक बात निश्चित तौर पर कही जा सकती है कि केश्रीसिंह आदिवासियों के एक संप्रदाय ‘सती-पति’ के प्रवर्तक हैं. उनके अनुयायी उन्हें भारत की असली सरकार, भारत के खजाने का मालिक मानते हैं. सती-पति संप्रदाय के लोग किसी भी हिंदू देवी-देवता को नहीं मानते. ये लोग अभिवादन के लिए ‘स्वकर्ता पितु की जय’ का इस्तेमाल करते हैं. पहचान के लिए किसी भी किस्म का सरकारी दस्तावेज़ इन लोगों के पास नहीं है. ये लोग न तो वोट डालते हैं और न ही किसी किस्म की सरकारी योजना का हिस्सा बनते हैं. ये लोग खुद को भारत के किसी भी कानून का हिस्सा नहीं मानते. बस एक आभासी सरकार है जो इन्हें आपस में जोड़े हुए है.

जब रायसिंह भाई से पूछा गया कि वो अपने को किसी भी कानून से अलग क्यों मानते हैं? उनका हाथ एक बार फिर से हरी थैली के भीतर चला गया. उन्होंने एक नॉन ज्यूडिशियल स्टाम्प पेपर निकाला और आगे बढ़ा दिया. उनकी जिद्द थी कि इसके हर एक हर्फ़ को पढ़ा जाए. पूरा पढ़े जाने के बाद उन्होंने इसे अपने हाथ में ले लिया और रोशनी के सामने इस अंदाज में फैलाया जैसे कि कोई बहुत बड़ा रहस्य उजागर करने जा रहे हों. नॉन ज्यूडिशियल स्टाम्प पेपर पर रोशनी पड़ते ही एक वॉटरमार्क उभर आया जिसपर भारत सरकार लिखा हुआ था. अब रायसिंह भाई ने इस तथ्य की व्याख्या करनी शुरू की-

“हम लोग उस भारत सरकार को मानते हैं जोकि नॉन ज्यूडिशियल है. नॉन मतलब नहीं अौर ज्यूडिशियल माने कानून. मतलब कि असल भारत सरकार इंसान के बनाए कानून पर नहीं चलती. ऐसे में इंसान के बनाए कोई भी नियम हम पर लागू नहीं होते.”

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सती-पति समाज के लोगों के पास कुंवर केश्रीसिंह से जुड़ा इस तरह का साहित्य मिलता है (फोटोः विनय सुल्तान / दी लल्लनटॉप)

सती-पति समाज के लोग अपने को असली भारत सरकार का कुटुंब मानते हैं. उनका कहना है कि वो ही इस धरती के असली मालिक हैं. इसके पक्ष में वो लैंड रेवन्यू एक्ट 1921 के पेज नंबर 221 को सन्दर्भ के तौर पर पेश करते हैं. इस संप्रदाय के लोगों के अनुसार अंग्रेजों ने 1870 में उनकी जमीन 99 साल के लिए लीज पर ली थी. यह लीज 4 फरवरी 1969 को खत्म हो गई थी. इसके बाद लीज के इस करार को आगे नहीं बढ़ाया गया. ऐसे में इस देश के आदिवासी जोकि इस जमीन के असल मालिक हैं, उनका इस देश की जमीन पर अपने आप मालिकाना हक़ कायम हो गया. जमीन पर अपने मालिकाना हक़ को साबित करने के लिए रायसिंहभाई का हाथ एक बार फिर से थैली में घुस जाता है. वो अखबार की एक कटिंग निकालते हैं. इस पर जस्टिस काटजू का एक बयान दर्ज है कि 90 फीसदी से ज्यादा भारतीय विदेशी मूल के हैं. रायसिंह भाई कहते हैं-

“देखो यह हम नहीं कह रहे. यह आपके बीच का एक आदमी कह रहा है. आदिवासी ही इस जमीन का मूलबीज हैं. वो ही धरती के असली मालिक हैं. बाकी के लोग विदेशी हैं.”

इस पूरे मामले पर और ज्यादा जानकारी के लिए हमने एक स्थानीय पत्रकार से बात की. उनका कहना था कि सती-पति समुदाय के लोगों की बात समझ से बाहर है. ये लोग न सिर्फ बेतुकी बात करते हैं बल्कि खुद के सही होने को लेकर इनका रवैया अड़ियल किस्म का है. हम लोग सामान्य तौर पर इनसे दूर ही रहते हैं.

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खेड़ाअम्बा के कुछ बाशिंदे इस तरह का आईकार्ड साथ रखते हैं जिसमें एक तरफ कुंवर केश्रीसिंह की तस्वीर बनी होती है (फोटोः विनय सुल्तान / दी लल्लनटॉप)

28 अगस्त 2013 को मिड डे में छपी एक खबर इस बात की तस्दीक भी करती है. खबर के मुताबिक मुंबई में 32 साल के एक शख्स कैलाश गुप्ता को गिरफ्तार किया गया था. वो विरार से चर्चगेट जाने वाली लोकल के फर्स्ट क्लास डिब्बे में बिना टिकट के यात्रा कर रहे थे. जब उन्हें पकड़ा गया तो उन्होंने पीले रंग का एक परिचय-पत्र दिखलाया. यह ‘ए/सी भारत सरकार’ का परिचय पत्र था जिस पर कुंवर केश्रीसिंह की तस्वीर छपी हुई थी. आदिवासी समाज से आने वाले कैलाश का कहना था कि वो भारत के असली मालिक हैं और उन्हें टिकट लेने की ज़रूरत नहीं हैं. उनके इसी रवैए के चलते उन्हें कोर्ट में पेश किया गया. यहां उन्हें 1000 का फाइन करने के बाद छोड़ दिया गया. 9 जून 2016 में सती-पति समुदाय पर DNA वेबसाइट पर छपी एक खबर में ख़ुफ़िया विभाग के एक स्थानीय अफसर का बयान छपा है-

“सती-पति समुदाय के दस्तावेज हमारे लिए काफी मुश्किल खड़ी कर रहे हैं. उनके ज्यादातर साहित्य हमारी समझ के परे हैं.”

क्या सचमुच ऐसा है? तमाम सन्दर्भों को अगर किनारे रख दिया जाए तो इस संप्रदाय के लोग तीन मुख्य बातें कहते हैं. पहला कि आदिवासी समाज ही इस देश की ज़मीन और इसके तमाम प्राकृतिक संसाधनों का असली मालिक है. दूसरा वो इंसान के बनाए किसी भी कानून को नहीं मानते. माने सरकार से उनका राब्ता नॉन ज्यूडिशियल है. तीसरा ‘A/C भारत सरकार’ या फिर गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया ही असली सरकार है.

गोनाजी भाई
गोनाजी भाई कहते हैं कि उनके कबीले के लोग प्रकृति को भारत सरकार मानते हैं. ये भारत सरकार अंग्रेज़ों से पहले से है और ईशू से भी पहले से (फोटोः विनय सुल्तान / दी लल्लनटॉप)

‘नॉन ज्यूडिशियल’ और ‘A/C भारत सरकार’ को समझाते हुए इसी गांव के गोनजी भाई कहते हैं-

“एसी का मतलब हुआ एंटी क्राइस्ट. आज का जो कैलेंडर है, वो यीशु मसीह की पैदाइश के साल से शुरू होता है. हम लोग मानते हैं कि भारत सरकार उससे पहले भी थी और हमेशा रहेगी. अब सवाल यह उठता है कि भारत सरकार क्या है? जब इस देश में लोकशाही नहीं थी, अंग्रेज भी नहीं थे तब क्या सूरज नहीं उगता था, चांद नहीं उगता था? पेड़, पौधे, पक्षी ये सब वैसे ही थे जैसे कि आज हैं.

यही वो ताकत है जिसे आप प्रकृति कहते है और हम भारत सरकार. यह हमेशा से हैं. हम सभी आदिवासी इसी भारत सरकार का कुटुंब हैं. जब कोई कानून की किताब नहीं थी, कोई लिखा हुआ कानून नहीं था तब भी दुनिया चलती थी. प्रकृति का अपना कानून है. वो कहीं दर्ज नहीं है लेकिन अपने तरीके से काम करता है. इसलिए हम कहते हैं कि हम इंसान के बनाए हुए किसी भी कानून को नहीं मानते. हमारा भारत सरकार से सम्बन्ध नॉन ज्यूडिशियल है.”

उमिया दादा
उमिया दादा मानते हैं कि भारत सरकार अनिश्चितकाल से है, उसका चुनाव नहीं होता. इसलिए वोट नहीं देते कभी. (फोटोः विनय सुल्तान / दी लल्लनटॉप)

हर चुनाव से पहले सती-पति संप्रदाय के लोगों का मतदान पहचान पत्र बनाने की कोशिश की जाती है. संप्रदाय के लोग इसका जमकर विरोध करते हैं. चुनाव से पहले इस हवाले से खबर अख़बारों में छपती हैं. यह सारा उपक्रम अब एक रूटीन की शक्ल ले चुका है. 75 के पेटे में चल रहे उमिया दादा मतदाता कार्ड न बनवाने पर कहते हैं-

“पहली बात तो वोट डालना कोई मजबूरी नहीं है. यह आदमी की मर्जी पर है कि वो वोट डाले या नहीं. दूसरी चीज लोकशाही को आए हुए 50-60 साल हुए. भारत सरकार तो अनाशकाल से है. उसका कभी चुनाव नहीं होता. ऐसे में जिस सरकार से हमारा कोई सम्बन्ध ही नहीं है, उसके चुनाव से हमारा क्या लेना-देना?”

एक रुपए का नोट इस पूरी पहेली की सबसे तिलस्मी कड़ी है. आखिर एक रुपए का नोट इतना महवपूर्ण क्यों हैं? रायसिंह भाई बताते हैं-

“हम लोग हिन्दुओं से अलग हैं. हम किसी भी देवी-देवता की पूजा नहीं करते. हम अपने मां-बाप और अन्न की बाली की पूजा करते हैं. एक रुपए का नोट भारत सरकार के होने का सबूत है. इसके पीछे की तरफ गेंहू की बाली है जिसकी हम पूजा करते हैं.”

तो आखिरकार इस पूरी पहेली को समझा कैसे जाए. दरअसल बात एकदम सरल है. सती-पति संप्रदाय का बुनियादी विश्वास है कि चीजें प्रकृति के अनुसार चलानी चाहिए और वो ही असली सत्ता है. जंगल, नदियां या फिर पहाड़ जो भी चीजें प्रकृति का हिस्सा हैं उन सबके साथ एक सहअस्तित्व कायम करके रहना ही जीवन जीने का तरीका है. आखिरकार आदमी भी उसी प्रकृति का हिस्सा है. इसी प्रकृति को अपना समझने के लिए उन्होंने ‘ए/सी भारत सरकार’ का नाम दिया हुआ है.

इस गुजरात विधानसभा चुनाव में दोनों ही बड़ी राजनीतिक पार्टियों ने अपनी-अपनी कैम्पेन लाइन ‘विकास’ के इर्द-गिर्द रखी हुई है. जहां कांग्रेस ‘विकास’ के पागल होने की बात कह रही है वहीं बीजेपी ने नारा दिया है, ‘हूं छू गुजरात, हूं छू विकास.’ दोनों ही राजनीतिक दलों ने एक पूरी राजनीतिक अवधारणा को व्यक्तिवाचक संज्ञा में तब्दील कर दिया है. किसी ने भाषा की इस धोखाधड़ी पर सवाल खड़ा नहीं किया.

आदिवासी प्रकृति के जीवन दर्शन को अपनी शब्दावली में पेश कर रहे हैं तो यह हमारे लिए समझ से परे क्यों हो जाता है? सती-पति इसी देश की भौगौलिक सीमा में रहने वाले लोग हैं जिन्होंने इस देश नागरिकता लेने से इनकार कर दिया है. यह लोकशाही के खिलाफ असहमति का स्वर है. इसे इसी तरह से देखा जाना चाहिए.

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