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गोरक्षकों को फटकारने के बहाने PM मोदी ने साधे हैं ये 3 निशाने

sandeep singh

संदीप सिंह. इलाहाबाद यूनिवर्सिटी और जेएनयू से पढ़ाई. स्टूडेंट पॉलिटिक्स का देश का चर्चित नाम. जेएनयू स्टूडेंट यूनियन  के प्रेसिडेंट रहे. फिर आइसा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी. सिनेमा, साहित्य, सामाजिक आंदोलनों पर लगातार लिखते बोलते रहे. आज आप उनसे जानिए गौ-रक्षा और मोदी की राजनीति के बारे में.


 

‘गौ-रक्षा की दुकानें’ चला रहे लोगों पर प्रधानमंत्री मोदी गुस्सा गए हैं. मोदीजी के मुताबिक इनमें से अधिकांश असामाजिक तत्व हैं जो रात में आपराधिक काम करते हैं और दिन में गौ-रक्षक बन जाते हैं. हालांकि अगले दिन लगभग ‘भूल-सुधार’ करते हुए उन्होंने इसे ‘मुट्ठी भर असामाजिक तत्व’ कर दिया. प्रधानमंत्री का यह बयान बहुत जरूरी और समयानुकूल है. हजारों वर्षों से मनुष्यों के साथ रह रही गाय अचानक भारत की राजनीति में नफरत और हिंसा की सबसे बड़ी वजह बनती जा रही है. ‘गौ-आतंक’ का भूगोल फैलता ही जा रहा है. एक्सप्रेस अख़बार में तीन दशकों से जानवरों का व्यापार करने वाले पंजाब के अमरजीत सिंह देओल के हवाले से खबर छपी है. जानवर ढुलाई के लिए उनके ट्रकों के प्रदेश भर में बाधारहित परिवहन को लेकर उन्होंने हिन्दू शिव सेना के एक नेता को दो लाख रुपये का भुगतान किया. अब गौ-रक्षा सिर्फ धर्म व राजनीति का ही मुद्दा नहीं रह गई है बल्कि इसका ‘गौ-अर्थशास्त्र’ भी है.

चुनावी पोस्टर में गाय

आधुनिक भारत में गाय के नाम पर सांप्रदायिक राजनीति की जड़ें कम से कम दो सौ वर्ष पीछे तक जाती हैं. इसे इतना बड़ा विभाजनकारी मुद्दा बना देने में जहां एक तरफ ‘बांटों और राज करो’ पर आधारित औपनिवेशिक सत्ता की साजिशें थीं तो दूसरी तरफ आर्य-समाज जैसे पुनरुथानवादी संगठनों और यहां तक कि कांग्रेस का भी हाथ था. 1980 के पहले तक कांग्रेस का चुनाव चिह्न ‘गाय और बछड़ा’ ही था. भारत के ‘मिल्क मैन’ वर्गीस कुरियन की मार्फत अब हम जानते हैं कि किस तरह 60 के दशक में गोलवलकर साहब ने ‘गौ-रक्षा’ के मुद्दे को अखिल भारतीय स्तर पर स्थापित करने की शुरुआत की.

समकालीन भारतीय राजनीति में अगर गाय को राष्ट्रीय-राजनीति के केंद्र में ला देने का श्रेय आरएसएस, उससे जुड़े असंख्य संगठनों और भाजपा को जाता है. तो गाय के मुद्दे को भावनात्मक स्तर पर जन-जन तक पहुंचाने का श्रेय पीएम नरेन्द्र मोदी को जाता है. 2014 के लोकसभा चुनाव की तूफानी रैलियों, सभाओं और भाषणों से देश का दिल जीत लेने वाले मोदी ने बार-बार गाय को मुद्दा बनाया और भारत की राजनीति को ‘पिंक रेवोलुशन’ नाम का नया जुमला दिया. खासतौर से पश्चिमी उत्तर-प्रदेश और बिहार की रैलियों में इस मुद्दे पर वे बहुत मुखर थे. तब शायद उन्हें प्लास्टिक खाकर मरने वाली गायों की खबर न थी! बिहार विधानसभा चुनावों में तो भाजपा ने गाय और मोदी की तस्वीरों के साथ बड़े-बड़े होर्डिंग्स भी लगाए थे.

गौ-भक्ति = देश-भक्ति

गाय के नाम पर फलने-फूलने वाले विभिन्न संगठनों, अफवाह-समूहों, लंपट-गिरोहों को चाहे-अनचाहे मोदी के भाषणों से काफी वैधता मिली. कई स्टेट में सत्तासीन भाजपा सरकारों के शुरुआती कामों में गौ-हत्या कानूनों को और सख्त करना एक पैटर्न की तरह शामिल दिखता है. कई सारे भाजपा मुख्यमंत्री और केंद्र सरकार के कई मंत्री खुलेआम इसमें एक ख़ास पक्ष लेते दिखाई पड़ते हैं.

देखते ही देखते गौ-भक्ति को देशभक्ति से जोड़ दिया गया. एक हिंसक उन्माद में राष्ट्र, दादरी और ऊना के रास्ते पर बढ़ चला. कुछ भाजपा-विरोधी ताकतें और खासकर वामपंथी इतिहासकार वेद-पुराण और न जाने कहां-कहां से साक्ष्य दिखाकर यह साबित करने में हल्कान रहे कि हिंदुओं के वैदिक-पूर्वज गौ-मांस खाते थे. पर गौ-भक्ति से ओतप्रोत और ‘गौ-माता व्हाट्सएप ग्रुपों’ के उत्साही सिपाहियों को यह सब जानने की फुर्सत नहीं थी. अपनी सामूहिक आत्म-अभिव्यक्ति करने के लिए अगर इस देश को कभी चरखा मिला, कभी खादी, कभी गांधी परिवार मिला. तो आज इसे ‘गौ-माता’ मिली है.

गौ-रक्षा अभियान के निशाने पर दलित

इस हिंसक ‘गौ-रक्षा’ अभियान ने हर किस्म के सामंती-सांप्रदायिक तत्वों को सक्रिय कर दिया. आमतौर से इस अभियान का निशाना मुस्लिम ही होते रहे. जैसा कि हर विभाजनकारी विचार के साथ होता है. गौ-रक्षा अभियान की दिशा मुस्लिमों के साथ-साथ दलितों की तरफ भी मुड़ी. पेशेगत कारणों और सामाजिक-आर्थिक प्रक्रियाओं के चलते दलितों का काफी बड़ा हिस्सा न सिर्फ जानवरों के चमड़े के व्यापार में लगा हुआ है बल्कि गाय के मांस को लेकर इस समुदाय में ऐसी कोई ख़ास असहजता भी नहीं है. जाहिर है परंपरा के चलते मरे जानवरों का मांस खाने को मजबूर किए गए लोगों को जिंदा गाय का मांस खाने से कोई खास आपत्ति नहीं थी.

भाजपा की पहली केंद्र सरकार में झज्जर यदि एक इशारा था तो दूसरी बार केंद्रीय सत्ता में आते ही यह इशारा मुखर होकर एक हिंसक अभियान में तब्दील हो गया. जगह-जगह पर दलित पीटे जाने लगे. गोबर, मूत्र खिलाकर और सामूहिक सजाएं देकर उनका ‘शुद्धिकरण’ किया जाने लगा. सत्ताधारी दल का एजेंडा राजनीति के राजमार्ग पर सरपट दौड़ने लगा. गौ-रक्षा अभियान भाजपा का राम मंदिर 2.0 हो गया. एक समय तो ऐसा लगा कि गाय की पूंछ पकड़कर उत्तर-प्रदेश की वैतरणी पार हो जाएगी.

दलित प्रतिरोध का मॉनसून

पर इसी बीच उत्तर प्रदेश में दयाशंकर और गुजरात में ऊना हो गया. वह प्रदेश जिसे मोदी की प्रयोगशाला कहा जाता है, मोदी के विकास का मॉडल कहा जाता है. वहां दलितों ने मरी गायें सरकारी दफ्तरों में, रास्तों पर फेंक दीं और कहा गौ-रक्षक अपनी माता का अंतिम संस्कार करें. देश दहल गया. हजारों दलित गुजरात की सड़कों पर आ गए. देखते-देखते इसे ‘दलित उभार का मॉनसून’ कहा जाने लगा. डैमेजकंट्रोल के चक्कर में दयाशंकर को, आनंदीबेन को जाना पड़ा और मोदी को टाउनहाल मीटिंग में उस अभियान के खिलाफ बोलना पड़ा जिसका बीज उन्होंने खुद बोया था.

मोदीजी की ‘फटकार’ के निहितार्थ

कई असहमतियों के बावजूद भी मोदीजी के इस बयान का स्वागत किया जाना चाहिए. उन्होंने वह कहा है जो एक प्रधानमंत्री के बतौर उन्हें काफी पहले कहना चाहिए था. आरएसएस से उनकी जितनी भी प्रतिबद्धता हो, उन्हें यह याद रखना चाहिए कि अब वे आरएसएस के स्वयंसेवक नहीं बल्कि एक संवैधानिक सरकार के चुने हुए प्रधानमंत्री हैं. एक ऐसे संविधान के प्रथम-रक्षक जो उन सारी चीजों की मनाही करता है जिसकी बारंबारता फिलहाल उनके राज में बड़े पैमाने पर दिख रही हैं. देर से सही पर उन्होंने बहुत जरूरी हस्तक्षेप किया है. यह और पहले हो जाता तो शायद कुछ जानें बचाई जा सकती थीं.

देखने वाली बात यह है कि ‘गो-रक्षकों को फटकारने’ वाले ‘अभिनयता’ से भरे इस भावुक भाषण से मोदीजी एक साथ दो नहीं तीन निशाने लगा रहे हैं. पहला – गोरक्षा के नाम पर मुस्लिमों पर हुए हमलों का जिक्र न कर एक तरह से वे दादरी, लातेहार को जायज ठहरा देते हैं. दूसरा– बादशाह और राजा की जंग में गाय के इस्तेमाल के रूपक को चालाकी से पेश करते हैं. वे दरअसल राजा सोहालदेव और सालार मसूद उर्फ़ गाजी मियां का संदर्भ देकर चुनावासन्न उत्तर प्रदेश में अपनी सांप्रदायिक बिसात बिछाते हैं. और तीसरा– वे दलितों को यह संदेश देना चाहते हैं कि मोदी उनके हितों की चिंता करते हैं.

ऐसा वे क्यों करते हैं? ऊना की घटना के बाद उठ खड़े हुए दलित आंदोलन को गुजरात के मुस्लिमों का अभूतपूर्व समर्थन मिल रहा है. अगर यह टिक गया तो एक ऐसा सामाजिक समीकरण बन सकता है जो गुजरात की अगली सरकार का रूप तय करने की ताकत रखता है. इस संभावना का डर मोदीजी के लिए बहुत वास्तविक है. उनके ‘गुजरात मॉडल’ में दलितों को समाहित किया जा चुका था. इस मॉडल से निकल रहे दलितों-मुस्लिमों का यह नया मॉडल बड़ी चुनौतियां पेश कर सकता है. दलितों के लिए गोली खाने का उनका उदगार कहीं इसी डर से तो नहीं निकल रहा?

अनेक मोदी से बेहतर एक मोदी

इस भाषण के बाद अब कई प्रश्न हैं जिनका जवाब दिया जाना है. मसलन, क्या केंद्र सरकार आतंक फैला रहे गौ-रक्षक संगठनों के खिलाफ कोई कानून लाएगी? सिर्फ राज्य-सरकारों के ऊपर इसे न छोड़कर क्या खुद केंद्र सरकार इस पर सख्त कदम उठाएगी? अलग-अलग जगहों में गौ-रक्षा के नाम पर हिंसा में लिप्त पाए गए संगठनों/लोगों पर क्या कार्रवाई की जाएगी? ‘पिंक रेवोलुशन’ का नारा क्या वापस होगा? गाय के नाम पर हो रही हिंसा को येनकेन प्रकारेण जायज ठहराने वाले मनोहरलाल खट्टर, गिरीराज सिंह, रघुवर सहाय, योगी आदित्यनाथ, संजीव बालियान, संगीत सोम, राजा सिंह, हुकुम सिंह जैसे भाजपा नेताओं के ऊपर क्या कोई एक्शन लिया जाएगा?

2014 के लोकसभा चुनावों के संभावित विजेता के रूप में दो छवियां मोदी का अस्त्र थीं. विकास-पुरुष और हिंदू-ह्रदय सम्राट. तीसरी छवि जो स्वयं मोदी ने गढ़ी– वह थी प्रथम गौ-रक्षक. मोदी के सफल प्रयोग के बाद अब छुटभैये नेताओं के लिए ‘गौ-रक्षक’ का तमगा राजनीति में स्थापित हो जाने का शॉर्टकट बन चुका है. तेज़ गति से नेता बनने का आरएसएस/भाजपा का यह ‘घरेलू उद्योग’ है. कहीं मोदीजी की नाराजगी इस बात को तो लेकर नहीं है कि सब उनके रास्ते चलकर ‘छोटे-छोटे मोदी’ बनना चाहते हैं! जाहिर है अनेक मोदी से बेहतर एक मोदी!

जर्सी और होलस्टाइन गायें तो शैतान होती हैं !

यह एक स्थापित तथ्य है कि अधिकांश गौ-रक्षक दल प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आरएसएस से जुड़े हुए हैं. स्वयं आरएसएस का ‘गौ-सेवा’ प्रकोष्ठ है. इसके अखिल भारतीय प्रमुख शंकरलाल का इंडियन एक्सप्रेस ने इंटरव्यू लिया है. यह सज्जन अपने मोबाइल के पीछे गाय का गोबर चिपकाकर रखते हैं. उनका दावा है कि यह गोबर फ़ोन से निकलने वाली नुकसानदेह तरंगों से बचाव करता है. हर तरह की गंभीर बीमारियों के इलाज के साथ-साथ वे गर्भवती महिलाओं को भी गाय का गोबर व मूत्र पिलाते हैं. उनके मुताबिक  इससे औरतों को प्रसव में दिक्कत नहीं होती. उनका यह भी मानना है कि ये औषधिमूलक गुण सिर्फ भारतीय देशी गाय में होते हैं. जर्सी और होलस्टाइन गायें तो शैतान होती हैं.

जरा सोचिए कि गाय के मलमूत्र के बारे में ऐसे दिव्य-विचार रखने वाले आरएसएस के नेशनल लेवल  के संगठन-प्रमुखों का कितना असर आमजन पर पड़ता होगा. वैसे गाय या किसी भी पशु के बारे में पर्सनली ऐसे ख्याल रखने में कोई बुराई नहीं है. भारत में हजारों लोग होंगे जो गाय के मलमूत्र से इलाज में विश्वास करते होंगे. पर जब सारी राजनीति ही गाय के इर्द-गिर्द सिमट गई हो तब ऐसे विश्वास हिंसक रूप ले लेते हैं.

मोदी गौ-रक्षकों से नाखुश क्यों हैं?

गाहे-बगाहे यह सुनने को मिलता रहता है कि आरएसएस और भाजपा के भीतर कुछ लोग मोदी से खुश नहीं हैं. यह सिर्फ आडवाणी एंड कंपनी की बात नहीं है. उन्हें मोदी और शाह की जोड़ी कमोबेश अप्रासंगिक कर चुकी है. वैसे भी खुद में बहुत ही ज्यादा यकीन रखने वाले मोदी पहले से खींची ‘लक्ष्मण रेखाओं’ को मानने वाले राजनेता नहीं हैं. वे नई लकीरें, बड़ी लकीरें खींचने का माद्दा और इच्छा रखते हैं. कहीं कुछ लोगों को यह खटक तो नहीं रहा? अपने राजनीतिक कैरियर के ऐसे दौर में जब वे खुद को ‘विश्व-स्तर के नेता’ के रूप में प्रतिष्ठित होते हुए देखना चाहते हैं तो उन्हें लग सकता है कि ‘गौ-रक्षकों का यह तांडव’ उन्हें दोबारा उसी कीचड़ में खींच रहा है. जो भी हो, कई चुप्पियों के बावजूद हमें उनके इस विस्फोट का स्वागत करना चाहिए और यह जनमत बनना चाहिए कि टाउनहॉल में जो उन्होंने कहा है मोदी उससे पीछे न जाएं और वह सिर्फ एक ‘परफॉरमेंस’ बनकर न रह जाए.

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