Submit your post

Follow Us

मोटा चश्मा, माथे पर लटकी एक ज़ुल्फ और इकहरी काया, ये मंटो है

मोटा चश्मा, माथे पर लटकी एक ज़ुल्फ और इकहरी काया. ये मंटो है. सआदत हसन मंटो. सारी परतें उघाड़कर लिखता था. गैरजरूरी सुंदरता के चक्कर में नहीं पड़ता था. अपने कथ्य में बेहद ईमानदार और इसलिए अधिकांशत: बदसूरत.

उसने इश्क पर लिखा. हिंदू-मुसलमान पर लिखा. सरहद और बंटवारे की त्रासदी पर लिखा. उसे कमलेश्वर ने दुनिया का सबसे अच्छा कहानीकार कहा.

फिर भी वह सारी जिंदगी मुश्किलों से घिरा रहा. उस पर मुकदमे चले, कहानियों पर अश्लीलता के आरोप लगे, उधारी का बहीखाता चलता रहा.

उस बेफिक्र-बेलौस मंटो का 11 मई को जन्मदिन होता है. इस पूरे महीने हम आपको मंटो की रचनाएं पढ़वाएंगे. क्योंकि ये महीना मंटो का है. और ये रचनाएं हमें उपलब्ध कराई हैं वाणी प्रकाशन ने. इस पब्लिकेशन हाउस से मंटो अब तक शीर्षक के साथ मंटो की सभी कहानियां प्रकाशित हुई हैं.


नया कानून

मंगू कोचवान अपने अड्डे में बहुत अक्लमन्द आदमी समझा जाता था. हालाँकि उसकी शिक्षा शून्य के बराबर थी और उसने कभी स्कूल का मुँह भी नहीं देखा था, लेकिन इसके बावजूद उसे दुनिया भर की बातों का पता था. अड्डे के वे सारे कोचवान, जिनको यह जानने की इच्छा होती थी कि दुनिया के अन्दर क्या हो रहा है, उस्ताद मंगू की विस्तृत जानकारी से फ़ायदा उठाने के लिए उस के पास जाते थे.

पिछले दिनों, जब उस्ताद मंगू ने अपनी एक सवारी से स्पेन में जंग छिड़ जाने की अफ़वाह सुनी थी तो उसने गामा चौधरी के चौड़े कन्धे पर थपकी देकर, ज्ञानियों के-से अन्दाज़ में पेशगोई की थी, ‘देख लेना चौधरी, थोड़े ही दिनों में स्पेन के अन्दर जंग छिड़ जायेगी.’

और जब गामा चौधरी ने उससे यह पूछा था कि यह स्पेन कहाँ पर है तो उस्ताद मंगू ने बड़ी गम्भीरता से जवाब दिया था, ‘विलायत में, और कहाँ?’ स्पेन में जंग छिड़ी और जब हर आदमी को इसका पता चल गया तो स्टेशन के अड्डे में जितने कोचवान घेरा बनाए हुक्का पी रहे थे, मन-ही-मन उस्ताद मंगू की ‘महानता’ स्वीकार कर रहे थे और उस्ताद मंगू उस समय माल रोड की चमकीली सड़क पर ताँगा चलाते हुए अपनी सवारी से ताज़ा हिन्दू-मुस्लिम फ़साद पर ‘विचार-विनिमय’ कर रहा था.

mantomantoउस दिन, शाम के क़रीब, जब वह अड्डे में आया तो उसका चेहरा ग़ैर-मामूली तौर पर तमतमाया हुआ था. हुक्के का दौर चलते-चलते, जब हिन्दू-मुस्लिम दंगे की बात छिड़ी तो उस्ताद मंगू ने सिर पर से ख़ाकी पगड़ी उतारी और बग़ल में दाब कर बड़े ‘विचारकों’ के-से अंदाज़ में कहा ‘यह किसी पीर की बद-दुआ का नतीजा है कि आये-दिन हिन्दुओं और मुसलमानों में चाकू-छुरियाँ चलते रहते हैं और मैंने अपने बड़ों से सुना है कि अकबर बादशाह ने किसी दरवेश का दिल दुखाया था और उस दरवेश ने जल कर यह बद-दुआ दी थी जा, तेरे हिन्दुस्तान में हमेशा फ़साद ही होते रहेंगे…. और देख लो, जब से अकबर बादशाह का राज ख़तम हुआ है, हिन्दुस्तान में फ़साद-पर-फ़साद होते रहते हैं.’ यह कह कर उसने ठण्डी साँस भरी और फिर हुक्के का दम लगा कर अपनी बात कहनी शुरू की, ‘ये कांग्रेसी हिन्दुस्तान को आज़ाद कराना चाहते हैं. मैं कहता हूँ, अगर ये लोग हज़ार साल भी सर पटकते रहें तो कुछ न होगा. बड़ी-से-बड़ी बात यह होगी कि अंग्रेज़ चला जायेगा और कोई इटली वाला आ जायेगा; या वह रूस वाला, जिसके बारे में मैंने सुना है कि बहुत तगड़ा आदमी है. लेकिन हिन्दुस्तान हमेशा ग़ुलाम रहेगा. हाँ, मैं यह कहना भूल ही गया कि पीर ने यह बद-दुआ भी दी थी कि हिन्दुस्तान पर हमेशा बाहर के आदमी राज करते रहेंगे.’ उस्ताद मंगू को अंग्रेजों से बड़ी नफ़रत थी. इस नफ़रत का कारण वह यह बतलाया करता था कि वे उसके हिन्दुस्तान पर अपना सिक्का चलाते हैं और तरह-तरह के जुल्म ढाते हैं. मगर उसकी नफ़रत की सबसे बड़ी वजह यह थी कि छावनी के गोरे उसे बहुत सताया करते थे. वे उसके साथ ऐसा बर्ताव करते थे, जैसे वह एक जलील कुत्ता हो. इसके अलावा उसे उनका रंग भी बिलकुल पसन्द न था. जब कभी वह किसी गोरे के सुर्ख़-सफ़ेद चेहरे को देखता तो उसे मतली-सी आ जाती. न जाने क्यों. वह कहा करता था कि उनके लाल झुरियों-भरे चेहरे देख कर उसे वह लाश याद आ जाती है, जिसके जिस्म पर से ऊपर की झिल्ली गल-गल कर झड़ रही हो.

जब किसी शराबी गोरे से उसका झगड़ा हो जाता तो सारा दिन उसकी तबियत नाखुश रहती और वह शाम को अड्डे में आ कर, लैम्प मार्का सिगरेट पीते या हुक्के के कश लगाते हुए, उस गोरे को जी भर के सुनाया करता.

मोटी-सी गाली देने के बाद वह ढीली पगड़ी-समेत अपने सिर को झटका दे कर कहा करता था ‘आग लेने आये थे. अब घर के मालिक ही बन गये हैं. नाक में दम कर रखा है इन बन्दरों की औलाद ने. ऐसे रोब गाँठते हैं, जैसे हम उनके बाबा के नौकर हों…’
इस पर भी उसका गुस्सा ठण्डा नहीं होता था. जब तक उसका कोई साथी उसके पास बैठा रहता, वह अपने सीने की आग उगलता रहता.

‘शकल देखते हो न तुम उसकी…जैसे कोढ़ हो रहा है….बिलकुल मुर्दार-एक धप्पे की मार. और गिट-पिट, गिट-पिट, यों बक रहा था, जैसे मार ही डालेगा. तेरी जान की क़सम, पहले-पहल जी में आयी कि साले की खोपड़ी के पुर्जे उड़ा दूँ, लेकिन इस ख़याल से टाल गया कि इस मरदूद को मारना भी अपनी हतक है.’…यह कहते-कहते वह थोड़ी देर के लिए ख़ामोश हो जाता और नाक को ख़ाकी क़मीज़ की आस्तीन से साफ़ करने के बाद फिर बड़बड़ाने लग जाता.

‘क़सम है भगवान की, इन लाट साहबों के उठाते-उठाते तंग आ गया हूँ. जब कभी इनका मनहूस चेहरा देखता हूँ, रगों में ख़ून खौलने लग जाता है. कोई नया क़ानून-वानून बने तो इन लोगों से छुटकारा मिले. तेरी क़सम, जान-में-जान आ जाये.’

और जब एक दिन उस्ताद मंगू ने कचहरी से अपने ताँगे पर दो सवारियाँ लादीं और उनकी बातों से उसे पता चला कि हिन्दुस्तान में नया क़ानून लागू होने वाला है तो उसकी ख़ुशी का कोई ठिकाना न रहा. दो मारवाड़ी, जो कचहरी में अपने दीवानी के मुक़दमे के सिलसिले में आये थे, वापस घर जाते हुए नये क़ानून यानी ‘इण्डिया ऐक्ट’ के बारे में बातें कर रहे थे.

‘सुना है कि पहली अप्रैल से हिन्दुस्तान में नया क़ानून चलेगा?…क्या हर चीज़ बदल जायेगी?’ ‘हर चीज़ तो नहीं बदलेगी, मगर कहते हैं कि बहुत कुछ बदल जायेगा और हिन्दुस्तानियों को आज़ादी मिल जायेगी.’ ‘क्या ब्याज के बारे में भी कोई नया क़ानून पास होगा?’ ‘यह पूछने की बात है. कल किसी वकील से पूछेंगे.’ उन मारवाड़ियों की बात-चीत उस्ताद मंगू के दिल में नाक़ाबिले-बयान ख़ुशी पैदा कर रही थी. वह अपने घोड़े को हमेशा गालियाँ देता था और चाबुक से बहुत बुरी तरह पीटा करता था, पर उस दिन वह बार-बार पीछे मुड़ कर मारवाड़ियों की तरफ़ देखता और अपनी बढ़ी हुई मूँछों के बाल एक उँगली से बड़ी सफ़ाई के साथ ऊँचे कर के, घोड़े की पीठ पर लगाम ढीली करते हुए, बड़े प्यार से कहता-‘चल बेटा, चल…ज़रा हवा से बातें करके दिखा दे.’
मारवाड़ियों को उनके ठिकाने पहुँचा कर, उसने अनारकली में दीनू हलवाई की दुकान पर आध सेर दही की लस्सी पी कर एक बड़ी डकार ली और मूँछों को मुँह में दबा कर उनको चूसते हुए, यों ही ऊँची आवाज़ में कहा-‘हत तेरी ऐसी-की-तैसी.’

शाम को, जब वह अड्डे पर लौटा और वहाँ उसे अपना कोई जानू-पहचानू ताँगे वाला न मिल सका तो उस के सीने में एक अजीबो-ग़रीब तूफ़ान बरपा हो गया. आज वह एक बड़ी ख़बर अपने दोस्तों को सुनाने वाला था-बहुत बड़ी ख़बर. और उस ख़बर को अपने अन्दर से बाहर निकालने के लिए, वह बहुत बेचैन हो रहा था. लेकिन वहाँ कोई था ही नहीं.

आध घण्टे तक वह चाबुक बग़ल में दबाये, स्टेशन के अड्डे की लोहे की छत के नीचे, बेचैनी की हालत में टहलता रहा.

उस के दिमाग़ में बड़े अच्छे-अच्छे ‘विचार’ आ रहे थे. नये क़ानून के लागू होने की ख़बर ने उस को एक नयी दुनिया में ला कर खड़ा कर दिया था. वह उस नये क़ानून के बारे में, जो पहली अप्रैल को हिन्दुस्तान में लागू होने वाला था, अपने दिमाग़ की तमाम बत्तियाँ रोशन कर के, ‘सोच-विचार’ कर रहा था. उसके कानों में मारवाड़ी का यह अन्देशा-क्या ब्याज के बारे में भी कोई नया क़ानून पास होगा?-बार-बार गूँज रहा था और उसके पूरे शरीर में ख़ुशी की एक लहर दौड़ा रहा था. कई बार अपनी घनी मूँछों के अन्दर हँस कर उसने उन मारवाड़ियों को गाली दी-‘ग़रीबों की खटिया में घुसे हुए खटमल! नया क़ानून इनके लिए खौलता हुआ पानी होगा.’

वह बेहद ख़ुश था. ख़ासकर उस समय उसके मन को बड़ी ठण्डक पहुँचती, जब वह सोचता कि इन गोरों-सफ़ेद चूहों (वह उन को इसी नाम से याद करता था)-की थूथनियाँ, नये क़ानून के आते ही, बिलों में हमेशा-हमेशा के लिए ग़ायब हो जायेंगी.

जब नत्थू गंजा, पगड़ी बग़ल में दबाये, अड्डे में दाख़िल हुआ तो उस्ताद मंगू बढ़ कर उससे मिला और उसका हाथ अपने हाथ में ले कर ऊँची आवाज़ में कहने लगा- ‘ला हाथ इधर! ऐसी ख़बर सुनाऊँ कि तेरा जी ख़ुश हो जाय! तेरी इस गंजी खोपड़ी पर बाल उग आयें.’

और यह कह कर मंगू ने बड़े मज़े ले-ले कर नये क़ानून के बारे में अपने दोस्त से बातें शुरू कर दीं. बातों के दौरान उसने कई बार नत्थू गंजे के हाथ पर ज़ोर से अपना हाथ मार कर कहा-‘तू देखता रह, क्या बनता है! यह रूस वाला बादशाह कुछ-न-कुछ ज़रूर करके रहेगा.’

उस्ताद मंगू मौज़ूदा सोवियत रूस की समाजवादी सरगर्मियों के बारे में बहुत कुछ सुन चुका था और उसे वहाँ के नये क़ानून और दूसरी नयी चीज़ें बहुत पसन्द थीं. इसीलिए उसने ‘रूस वाले बादशाह’ को ‘इण्डिया ऐक्ट’-यानी नये विधान के साथ मिला दिया था और पहली अप्रैल को पुराने निज़ाम में जो नयी फेर-बदल होने वाली थी, वह उसे ‘रूस वाले बादशाह’ के असर का नतीजा समझता था.

कुछ अर्से से पेशावर और दूसरे शहरों में, सु़र्खपोशों (ग़फ़्फ़ार ख़ाँ के ख़ुदाई ख़िदमतगारों) का आन्दोलन चल रहा था. उस्ताद मंगू ने उस आन्दोलन को अपने दिमाग़ में ‘रूस वाले बादशाह’ और फिर नये क़ानून के साथ ख़ल्त-मल्त कर दिया था. इसके अलावा, जब कभी वह किसी से सुनता कि अमुक शहर में इतने बम बनाने वाले पकड़े गये हैं या फलाँ जगह इतने आदमियों पर बग़ावत के इल्ज़ाम में मुक़दमा चलाया गया है तो वह इन सारी घटनाओं को नये क़ानून की पूर्व-सूचना समझता था और मन-ही-मन बहुत ख़ुश होता था. एक दिन उसके ताँगे में बैठे दो बैरिस्टर नये विधान की बहुत कड़ी आलोचना कर रहे थे और वह ख़ामोशी से उनकी बातें सुन रहा था. उनमें से एक, दूसरे से कह रहा थाः
‘नये क़ानून का दूसरा हिस्सा फ़ेडरेशन है, जो मेरी समझ में अभी तक नहीं आया. ऐसा फ़ेडरेशन दुनिया की तारीख़ में आज तक न सुना, न देखा गया है. सियासी नज़रिये से भी यह फ़ेडरेशन बिलकुल ग़लत है, बल्कि यों कहना चाहिए कि यह फ़ेडरेशन है ही नहीं.’

उन बैरिस्टरों के बीच जो बातचीत हुई, क्योंकि उसमें ज़्यादातर शब्द अंग्रेज़ी के थे, इसलिए उस्ताद मंगू, सिर्फ़ ऊपर के जुमले को ही किसी क़दर समझ पाया और उसने ख़याल किया, ये लोग हिन्दुस्तान में नये क़ानून के आने को बुरा समझते हैं और नहीं चाहते कि इनका वतन आज़ाद हो. चुनांचे इस ख़याल के असर में उसने कई बार उन दो बैरिस्टरों को हिकारत की नज़रों से देख कर मन-ही-मन कहा-‘टोडी बच्चे!’ जब कभी वह किसी को दबी ज़बान में ‘टोडी बच्चा’ कहता, तो दिल में यह महसूस करके बहुत-ख़ुश होता था कि उसने इस नाम को सही जगह इस्तेमाल किया है और यह कि उसमें शरीफ़ आदमी और ‘टोडी बच्चे’ में फ़र्क़ करने की ‘योग्यता’ है.

इस घटना के तीसरे दिन वह गवर्नमेण्ट कॉलेज के तीन विद्यार्थियों को अपने ताँगे में बैठा कर मजंग जा रहा था कि उसने उन तीनों लड़कों को आपस में ये बातें करते सुनाः ‘नये क़ानून ने मेरी उम्मीदें बढ़ा दी हैं. अगर ‘ऊ’ साहब एसेम्बली के मेम्बर हो गये तो किसी सरकारी दफ़्तर में नौकरी ज़रूर मिल जायेगी.’
‘वैसे भी बहुत-सी जगहें और निकलेंगी. शायद इसी गड़बड़ में हमारे हाथ भी कुछ आ जाय.’
‘हाँ-हाँ, क्यों नहीं.’
‘वे बेकार ग्रैजुएट, जो मारे-मारे फिर रहे हैं, उनमें कुछ तो कमी होगी.’

इस बातचीत ने मंगू उस्ताद के दिल में नये क़ानून का महत्त्व और भी बढ़ा दिया और वह उसको ऐसी चीज़ समझने लगा, जो बहुत चमकती हो.
‘नया क़ानून….’ वह दिन में कई बार सोचता, ‘यानी कोई नयी चीज़.’ और हर बार उसकी नज़रों के सामने अपने घोड़े का वह नया साज़ आ जाता, जो उसने दो बरस हुए चौधरी ख़ुदा बख़्श से बड़ी अच्छी तरह ठोंक-बजा कर ख़रीदा था. उस साज़ पर, जब वह नया था, जगह-जगह लोहे की, निकल-चढ़ी हुई, कीलें चमकती थीं और जहाँ-जहाँ पीतल का काम था, वह तो सोने की तरह दमकता था. इस लिहाज़ से भी ‘नये क़ानून’ का चमकता-दमकता होना ज़रूरी था.
पहली अप्रैल तक उस्ताद मंगू ने नये विधान के पक्ष और विपक्ष में बहुत कुछ सुना. पर उसके बारे में जो ख़ाका वह अपने मन में बना चुका था, उसे वह बदल न सका. वह समझता था कि पहली अप्रैल को नये क़ानून के आते ही सब मामला साफ़ हो जायेगा और उसे विश्वास था कि उसके आने पर जो चीज़ें नज़र आयेंगी, उनसे उसकी आँखों को ज़रूर ठण्डक पहुँचेगी.

आख़िर मार्च के इकतीस दिन ख़त्म हो गये और अप्रैल के शुरू होने में रात के चन्द ख़ामोश घण्टे बाक़ी रह गये. मौसम आम दिनों की बनिस्बत ठण्डा था और हवा में ताज़गी थी.

पहली अप्रैल को सुबह-सवेरे मंगू उस्ताद उठा और अस्तबल में जा कर उसने ताँगे में घोड़े को जोता और बाहर निकल गया. उसकी तबियत आज असाधारण रूप से प्रसन्न थी…. वह आज नये क़ानून को देखने वाला था. उसने सुबह के सर्द धुँधलके में, कई तंग और खुले बाज़ारों का चक्कर लगाया, मगर उसे हर चीज़ पुरानी नज़र आयी.

आसमान की तरह पुरानी. उसकी निगाहें आज ख़ास तौर पर नया रंग देखना चाहती थीं, पर सिवाय उस कलगी के, जो रंगबिरंगे परों से बनी थी और उसके घोड़े के सिर पर जमी हुई थी, बाक़ी सब चीज़ें पुरानी नज़र आती थीं. यह नयी कलगी उसने नये की ख़ुशी में इकतीस मार्च को चौधरी ख़ुदा बख़्श से साढ़े चौदह आने में ख़रीदी थी.

घोड़े की टापों की आवाज़; काली सड़क और उसके आस-पास थोड़ा-थोड़ा फ़ासला छोड़ कर लगाए गये बिजली के खम्भे; दुकानों के बोर्ड; उसके घोड़े के गले में पड़े हुए घुँघरुओं की झनझनाहट; बाज़ार में चलते-फिरते आदमी-इनमें से कौन-सी चीज़ नयी थी? ज़ाहिर है कि कोई भी नहीं! लेकिन उस्ताद मंगू निराश नहीं हुआ.

‘अभी बहुत सबेरा है. दुकानें भी तो सब-की-सब बन्द हैं.’ इस ख़याल ने उसे तसकीन दी. इसके अलावा, वह यह भी सोचता था, ‘हाई कोर्ट में तो नौ बजे के बाद ही काम शुरू होता है. अब इससे पहले नया क़ानून क्या नज़र आयेगा?’

जब उसका ताँगा गवर्नमेण्ट कॉलेज के दरवाज़े के क़रीब पहुँचा तो कॉलेज के घड़ियाल ने बड़े घमण्ड से नौ बजाये. जो विद्यार्थी कॉलेज के बड़े दरवाज़े से बाहर निकल रहे थे, ख़ुश-पोश थे, पर उस्ताद मंगू को न जाने क्यों उनके कपड़े मैले-मैले-से नज़र आये. शायद इसका कारण यह था कि उसकी निगाहें आज आँखों को चौंधिया देने वाले किसी जलवे का इंतज़ार कर रही थीं. ताँगे को दाएँ हाथ मोड़ कर वह थोड़ी देर के बाद फिर अनारकली में चला आया. बाज़ार की आधी दुकानें खुल चुकी थीं और अब लोगों की आमद-रफ़्त भी बढ़ गयी थी. हलवाई की दुकानों पर ग्राहकों की ख़ूब भीड़ लगी थी. मनिहारी वालों की नुमायशी चीज़ें शीशे की अलमारियों में से लोगों को अपनी ओर खींच रही थीं और बिजली के तारों पर कई कबूतर आपस में लड़-झगड़ रहे थे, पर उस्ताद मंगू के लिए इन तमाम चीज़ें में कोई दिलचस्पी नहीं थी…. वह नये क़ानून को देखना चाहता था, ठीक उसी तरह, जिस तरह कि वह अपने घोड़े को देख रहा था.

जब उस्ताद मंगू के घर बच्चा पैदा होने वाला था तो उसने चार-पाँच महीने बड़ी बेचैनी में गुज़रे थे. उसको विश्वास था कि बच्चा किसी-न किसी दिन ज़रूर पैदा होगा. पर वह इंतज़ार की घड़ियाँ नहीं काट सकता था. वह चाहता था कि अपने बच्चे को सिर्फ़ एक नज़र देख ले. इसके बाद वह पैदा होता रहे. चुनांचे इसी अदम्य इच्छा के तहत उसने कई बार अपनी बीमार बीवी के पेट को दबा-दबा कर और उसके ऊपर कान रख-रख कर अपने बच्चे के बारे में कुछ जानना चाहा था. पर वह नाकाम रहा था. एक बार तो वह इंतज़ार करते-करते इतना तंग आ गया था कि अपनी बीवी पर बरस भी पड़ा थाः ‘तू हर वक़्त मुर्दे की तरह पड़ी रहती है. उठ, और ज़रा चल-फिर! तेरे अंगों में थोड़ी-सी ताक़त तो आये. यों तख़्ता बने रहने से कुछ न होगा. तू समझती है कि इस तरह लेटे-लेटे बच्चा जन देगी?’

उस्ताद मंगू तबियत से बहुत जल्दबाज़ था. वह हर चीज़ का अमली रूप देखने के लिए न सिर्फ़ इच्छुक था, बल्कि उसे खोजता भी रहता था. उसकी बीवी गंगादेई उसकी इस क़िस्म की बेकरारियों को देख कर आम तौर पर यह कहा करती थी-‘अभी कुआँ खोदा ही नहीं गया और तुम प्यास से बेहाल हो रहे हो.’
कुछ भी हो, पर उस्ताद मंगू नये क़ानून के इंतज़ार में इतना बेचैन नहीं था, जितना कि उसे अपनी तबियत के लिहाज़ से होना चाहिए था. वह आज नये क़ानून को देखने के लिए घर से निकला था; ठीक उसी तरह, जैसे वह गांधी या जवाहर लाल के जुलूस को देखने के लिए निकलता था.

नेताओं की महानता का अनुमान उस्ताद मंगू हमेशा उनके जुलूस के हंगामों और उनके गले में डाली हुई फूलों की मालाओं से किया करता था. अगर कोई लीडर गेंदे के फूलों से लदा हो तो उस्ताद मंगू के नज़दीक वह बड़ा आदमी था और जिस नेता के जुलूस में भीड़ की वजह से दो-तीन दंगे होते-होते रह जाते, वह उसकी नज़र में और भी बड़ा था. अब नये क़ानून को वह अपने ज़ेहन के इसी तराज़ू में तौलना चाहता था.

अनारकली से निकल कर वह माल रोड की चमकीली सड़क पर अपने ताँगे को धीरे-धीरे चला रहा था कि मोटरों की दुकान के पास उसे छावनी की एक सवारी मिल गयी. किराया तय करने के बाद, उसने अपने घोड़े को चाबुक दिखाया और मन में सोचा-‘चलो, यह भी अच्छा हुआ…. शायद छावनी से ही नये क़ानून का कुछ पता चल जाय.’

छावनी पहुँच कर उस्ताद मंगू ने सवारी को उसकी मंज़िल पर उतार दिया और जेब से सिगरेट निकाल कर, बाएँ हाथ की आख़िरी दो उँगलियों में दबा कर सुलगाया और पिछली सीट के गद्दे पर बैठ गया.

जब उस्ताद मंगू को किसी सवारी की तलाश नहीं होती थी या उसे किसी बीती हुई घटना पर ग़ौर करना होता तो वह आम तौर पर अगली सीट छोड़ कर पिछली सीट पर बैठ जाता और बड़े इत्मीनान से अपने घोड़े की लगामें दाएँ हाथ के गिर्द लपेट लिया करता था. ऐसे अवसरों पर उसका घोड़ा थोड़ा-सा हिनहिनाने के बाद बड़ी धीमी चाल चलना शुरू कर देता था, मानो उसे कुछ देर के लिए भाग-दौड़ से छुट्टी मिल गयी हो.

घोड़े की चाल और उस्ताद मंगू के दिमाग़ में ख़यालों की आमद बहुत सुस्त थी; जिस तरह घोड़ा धीरे-धीरे क़दम उठा रहा था, उसी तरह उस्ताद मंगू के ज़ेहन में नये क़ानून के बारे में नये अनुमान दाख़िल हो रहे थे. वह नये क़ानून के आने पर म्यूनिसिपल कमेटी से ताँगों के नम्बर मिलने के तरीक़े पर ग़ौर कर रहा था और इस ग़ौर-तलब बात को नये क़ानून की रोशनी में देखने की कोशिश कर रहा था. वह इसी सोच-विचार में डूबा था जब उसे ऐसा लगा, जैसे किसी सवारी ने उसे बुलाया है. पीछे पलट कर देखने पर उसे सड़क के उस पार, दूर बिजली के खम्भे के पास, एक गोरा खड़ा नज़र आया, जो उसे हाथ के इशारे से बुला रहा था. जैसा कि कहा जा चुका है, उस्ताद मंगू को गोरों से बेहद नफ़रत थी. जब उसने अपनी नयी सवारी को गोरे के रूप में देखा तो उसके मन में नफ़रत के भाव जाग उठे. पहले तो उसके जी में आयी कि बिलकुल ध्यान न दे और उस को छोड़ कर चला जाय, पर बाद में उस को ख़याल आया कि इनके पैसे छोड़ना भी बेवकूफ़ी है. कलगी पर जो मुफ़्त में साढ़े चौदह आने ख़र्च कर दिये हैं, इनकी जेब ही से वसूल करने चाहिए. चलो, चलते हैं.

ख़ाली सड़क पर बड़ी सफ़ाई से ताँगा मोड़ कर, उसने घोड़े को चाबुक दिखाया और पलक झपकते ही वह बिजली के खम्भे के पास पहुँच गया. घोड़े की लगाम खींच कर उसने ताँगा हराया और पिछली सीट पर बैठे-बैठे, गोरे से पूछाः ‘साहब बहादुर, कहाँ जाना माँगता है?’

इस सवाल में गज़ब का व्यंग्य-भरा अंदाज़ था. ‘साहब बहादुर’ कहते समय उसका ऊपर का मूँछों-भरा होंट नीचे की ओर खींच गया और पास ही गाल की इस तरफ़ जो मद्धिम-सी लकीर, नाक के नथुने से ठोड़ी के ऊपरी सिरे तक चली आ रही थी, एक कँपकँपी के साथ गहरी हो गयी, जैसे किसी ने नोकीले चाकू से शीशम की साँवली लकड़ी में धार-सी डाल दी हो. उस का सारा चेहरा हँस रहा था और अपने अन्दर उसने उस गोरे को सीने की आग में जला कर राख कर डाला था. जब गोरे ने, जो बिजली के खम्भे की ओट में हवा का रूख़ बचा कर सिगरेट सुलगा रहा था, मुड़ कर ताँगे के पायदान की तरफ़ क़दम बढ़ाया तो अचानक उस्ताद मंगू की और उसकी निगाहें चार हुईं और ऐसा लगा कि एक साथ आमने-सामने की बन्दूकों से गोलियाँ निकलीं और आपस में टकरा कर, आग का एक बगूला बन कर, ऊपर को उड़ गयीं. उस्ताद मंगू, जो अपने दाएँ हाथ से लगाम के बल खोल कर ताँगे से नीचे उतरने वाला था, अपने सामने खड़े गोरे को यों देख रहा था, जैसे वह उसके वजूद के ज़र्रे-ज़र्रे को अपनी निगाहों से चबा रहा हो और गोरा कुछ इस तरह अपनी नीली पतलून पर से अनदेखी चीज़ें झाड़ रहा था, जैसे वह उस्ताद मंगू के इस हमले से अपने वजूद के कुछ हिस्से बचा लेने की कोशिश कर रहा हो.

गोरे ने सिगरेट का धुआँ निगलते हुए कहा-‘जाना माँगटा या फिर गड़बड़ करेगा?’
‘वही है.’ ये शब्द उस्ताद मंगू के दिमाग़ में पैदा हुए और उसकी चौड़ी छाती के अन्दर नाचने लगे. ‘वही है,’ उसने ये शब्द अपने मुँह के अन्दर दोहराए और साथ ही उसे पूरा यक़ीन हो गया कि गोरा, जो उसके सामने खड़ा था, वही है, जिससे पिछले बरस उसकी झड़प हुई थी और उस ख़ाह-म-ख़ाह के झगड़े में, जिसकी वजह गोरे के दिमाग़ में चढ़ी हुई शराब थी, उसे लाचार हो कर बहुत-सी बातें सहनी पड़ी थीं. उस्ताद मंगू ने गोरे का दिमाग़ दुरुस्त कर दिया होता, बल्कि उसके पुर्ज़े उड़ा दिये होते, पर वह किसी ख़ास कारण से चुप हो गया था. उसको पता था, इस तरह के झगड़ों में अदालत का नज़ला आमतौर पर कोचवानों पर ही गिरता है.

उस्ताद मंगू ने पिछले बरस की लड़ाई और पहली अप्रैल के नये क़ानून पर ग़ौर करते हुए, गोरे से पूछा-‘कहाँ जाना माँगता है?’ उस्ताद मंगू के लहजे में चाबुक-ऐसी तेज़ी थी.
गोरे ने जवाब दिया-‘हीरा मण्डी.’
‘किराया पाँच रुपया होगा.’ उस्ताद मंगू की मूँछें थरथरायीं.

यह सुन कर गोरा हैरान हो गया. वह चिल्लाया-‘पाँच रुपये. क्या टुम…?’ ‘हाँ-हाँ, पाँच रुपये.’ यह कहते हुए उस्ताद मंगू के बालों-भरे दाहिने हाथ ने भिंच कर एक भारी घूँसे का रूप ले लिया. ‘क्यों, जाते हो या बेकार बातें बनाओगे,’ उस्ताद मंगू का लहजा और भी ज़्यादा सख़्त हो गया.

गोरा पिछले वर्ष की घटना का ख़याल कर के, उस्ताद मंगू के सीने की चौड़ाई नज़रअंदाज कर चुका था. वह सोच रहा था-इसकी खोपड़ी फिर खुजला रही है. हौसला बढ़ाने वाले इस ख़याल के तहत वह ताँगे की ओर अकड़ कर बढ़ा और अपनी छड़ी से उसने उस्ताद मंगू को ताँगे से नीचे उतरने का इशारा किया.
बेंत की वह पालिश की हुई पतली-सी छड़ी उस्ताद मंगू की मोटी रान के साथ दो-तीन बार छुई. उसने खड़े-खड़े नाटे क़द के गोरे को ऊपर से नीचे देखा, जैसे वह अपनी निगाहों के भार ही से उसे पीस डालना चाहता हो. फिर उसका घूँसा, कमान में तीर की तरह, ऊपर को उठा और पलक-झपकते ही गोरे की ठोड़ी के नीचे जम गया. धक्का दे कर उसने गोरे को परे हटाया और नीचे उतर कर उसे धड़ाधड़ पीटना शुरू कर दिया.

गोरा हक्का-बक्का रह गया और उसने इधर-उधर सिमट कर उस्ताद मंगू के वज़नी घूँसों से बचने की कोशिश की और जब देखा कि उस्ताद मंगू की हालत पागलों-सी हो गयी है और उसकी आँखों से अंगारे बरस रहे हैं तो उसने ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाना शुरू किया. उस चीख़-पुकार ने उस्ताद मंगू की बाँहों का काम और भी तेज़ कर दिया. वह गोरे को जी भर के पीट रहा था और साथ-साथ यह कहता जाता थाः
‘पहली अप्रैल को भी वही अकड़ फूँ… पहली अप्रैल को भी वही अकड़ फूँ … अब हमारा राज है बच्चा.’

लोग जमा हो गये और पुलिस के दो सिपाहियों ने बड़ी मुश्किल से गोरे को उस्ताद मंगू की पकड़ से छुड़ाया. उस्ताद मंगू उन दो सिपाहियों के बीच खड़ा था. उसकी चौड़ी छाती, फूली हुई साँस की वजह से ऊपर-नीचे हो रही थी. मुँह से झाग बह रहा था और अपनी मुस्कराती हुई आँखों से हैरत-ज़दा भीड़ की तरफ़ देख कर, वह हाँफती हुई आवाज़ में कह रहा थाः ‘वो दिन गुजश्र गये, जब ख़लील ख़ाँ फ़ाख़्ता उड़ाया करते थे…. अब नया क़ानून है मियाँ, नया क़ानून.’
और बेचारा गोरा अपने बिगड़े हुए चेहरे के साथ, बेवक़ूफ़ों की तरह, कभी उस्ताद मंगू की तरफ़ देखता था और कभी भीड़ की तरफ़.

उस्ताद मंगू को पुलिस के सिपाही थाने में ले गये. रास्ते में और थाने के अन्दर कमरे में वह ‘नया क़ानून, नया क़ानून’ चिल्लाता रहा, पर किसी ने एक न सुनी.

‘नया क़ानून, नया क़ानून क्या बक रहे हो!… क़ानून वही है-पुराना!’ और उसको हवालात में बन्द कर दिया गया.

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

गंदी बात

राष्ट्रपति का चुनाव लड़ रहे शख्स से बच्चे ने पूछा- मैं सबको कैसे बताऊं कि मैं गे हूं?

जवाब दिल जीत लेगा.

'इस्मत आपा वाला हफ्ता' शुरू हो गया, पहली कहानी पढ़िए लिहाफ

उस अंधेरे में बेगम जान का लिहाफ ऐसे हिलता था, जैसे उसमें हाथी बंद हो.

PubG वाले हैं क्या?

जबसे वीडियो गेम्स आए हैं, तबसे ही वे पॉपुलर कल्चर का हिस्सा रहे हैं. ये सोचते हुए डर लगता है कि जो पीढ़ी आज बड़ी हो रही है, उसके नास्टैल्जिया का हिस्सा पबजी होगा.

बायां हाथ 'उल्टा' ही क्यों हैं, 'सीधा' क्यों नहीं?

मां-बाप और टीचर बच्चों को पीट-पीट दाहिने हाथ से काम लेने के लिए मजबूर करते हैं. क्यों?

फेसबुक पर हनीमून की तस्वीरें लगाने वाली लड़की और घर के नाम से पुकारने वाली आंटियां

और बिना बैकग्राउंड देखे सेल्फी खींचकर लगाने वाली अन्य औरतें.

'अगर लड़की शराब पी सकती है, तो किसी भी लड़के के साथ सो सकती है'

पढ़िए फिल्म 'पिंक' से दर्जन भर धांसू डायलॉग.

मुनासिर ने प्रीति को छह बार चाकू भोंककर क्यों मारा?

ऐसा क्या हुआ, कि सरे राह दौड़ा-दौड़ाकर उसकी हत्या की?

हिमा दास, आदि

खचाखच भरे स्टेडियम में भागने वाली लड़कियां जो जीवित हैं और जो मर गईं.

अलग हाव-भाव के चलते हिजड़ा कहते थे लोग, समलैंगिक लड़के ने फेसबुक पोस्ट लिखकर सुसाइड कर लिया

'मैं लड़का हूं. सब जानते हैं ये. बस मेरा चलना और सोचना, भावनाएं, मेरा बोलना, सब लड़कियों जैसा है.'

ब्लॉग: शराब पीकर 'टाइट' लड़कियां

यानी आउट ऑफ़ कंट्रोल, यौन शोषण के लिए आमंत्रित करते शरीर.

सौरभ से सवाल

दिव्या भारती की मौत कैसे हुई?

खिड़की पर बैठी दिव्या ने लिविंग रूम की तरफ मुड़कर देखा. और अपना एक हाथ खिड़की की चौखट को मजबूती से पकड़ने के लिए बढ़ाया.

कहां है 'सिर्फ तुम' की हीरोइन प्रिया गिल, जिसने स्वेटर पर दीपक बनाकर संजय कपूर को भेजा था?

'सिर्फ तुम' के बाद क्या-क्या किया उन्होंने?

बॉलीवुड में सबसे बड़ा खान कौन है?

सबसे बड़े खान का नाम सुनकर आपका फिल्मी ज्ञान जमीन पर लोटने लगेगा. और जो झटका लगेगा तो हमेशा के लिए बुद्धि खुल जाएगी आपकी.

'कसौटी ज़िंदगी की' वाली प्रेरणा, जो अनुराग और मिस्टर बजाज से बार-बार शादी करती रही

कहां है टेलीविज़न का वो आइकॉनिक किरदार निभाने वाली ऐक्ट्रेस श्वेता तिवारी?

एक्ट्रेस मंदाकिनी आज की डेट में कहां हैं?

मंदाकिनी जिन्हें 99 फीसदी भारतीय सिर्फ दो वजहों से याद करते हैं

सर, मेरा सवाल है कि एक्ट्रेस मीनाक्षी शेषाद्री आजकल कहां हैं. काफी सालों से उनका कोई पता नहीं.

‘दामिनी’ के जरिए नई ऊंचाई तक पहुंचा मीनाक्षी का करियर . फिर घातक के बाद 1996 में उन्होंने मुंबई फिल्म इंडस्ट्री को बाय बोल दिया.

ये KRK कौन है. हमेशा सुर्खियों में क्यों रहता है?

केआरके इंटरनेट एज का ऐसा प्रॉडक्ट हैं, जो हर दिन कुछ ऐसा नया गंधाता करना रचना चाहता है.

एक्ट्रेस किमी काटकर अब कहां हैं?

एडवेंचर ऑफ टॉर्जन की हिरोइन किमी काटकर अब ऑस्ट्रेलिया में हैं. सीधी सादी लाइफ बिना किसी एडवेंचर के

चाय बनाने को 'जैसे पापात्माओं को नर्क में उबाला जा रहा हो' कौन सी कहानी में कहा है?

बहुत समय पहले से बहुत समय बाद की बात है. इलाहाबाद में थे. जेब में थे रुपये 20. खरीदी हंस...

सर आजकल मुझे अजीब सा फील होता है क्या करूं?

खुड्डी पर बैठा था. ऊपर से हेलिकॉप्टर निकला. मुझे लगा. बाबा ने बांस गहरे बोए होते तो ऊंचे उगते.