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अगर ये कहानी जान लेंगे, तो रोहिंग्या मुसलमानों से दोस्ती कबूल कर लेंगे

जब भारत अपनी आजादी की लड़ाई लड़ रहा था, उस वक्त देश में सामाजिक स्थिति बहुत बुरी थी. सती प्रथा जैसी क्रूरता समाज में मौजूद थी जिसे देखकर अंग्रेजों ने भारत को बहुत पिछड़ा घोषित कर दिया था. फिर जाति प्रथा को देखकर उन्होंने समां बांधा कि भारत को सुधारना हमारी जिम्मेदारी है. सुधारने लगे. तमाम कानून लगाने लगे. लोगों को बेइज्जत करने लगे. इसके तमाम उदाहरण हैं. वो अपने सामने हिंदुस्तानियों को कुछ समझते ही नहीं थे. तो हिंदुस्तानियों ने क्या किया?

#. कॉलोनियल शासकों नीतियों से हम आज तक नहीं उबर पाए हैं

हथियार उठाया. कभी छोटी तो कभी बड़ी लड़ाइयां लड़ीं. कॉलोनियल शासकों ने लड़ने वाले हिंदुस्तानियों को क्या कहा? आतंकवादी. भगत सिंह को भी ब्रिटेन आज भी टेररिस्ट ही लिखता है. इसको लेकर भारत में कई बार बवाल भी हो चुका है.

ये बात जरूर थी कि भारतीय समाज में बहुत कमियां थीं जो यूरोपियन समाज की आधुनिकता के आगे नहीं ठहरती थीं. पर इसका क्या मतलब था कि हिंदुस्तानियों को हर जगह बेइज्जत किया जाए? यहां का धन लूटकर ब्रिटेन ले जाया जाए? अपने हक के लिए लड़नेवालों को आतंकवादी कहा जाए? जलियांवाला बाग जैसी घटनाएं की जाएं? और विक्टिम इसका जवाब अहिंसा से दे तभी बेहतर है? तभी वो उनकी गुड बुक्स में आ पाएगा?

 

जालियांवाला बाग नरसंहार: अंग्रेजों ने जहां भारत को इतना परेशान किया, वहीं अपने खिलाफ हो रही एक सभा वो बर्दाश्त नहीं कर पाए.
जलियांवाला बाग नरसंहार: अंग्रेजों ने जहां भारत को इतना परेशान किया, वहीं अपने खिलाफ हो रही एक सभा वो बर्दाश्त नहीं कर पाए.

कॉलोनियल शासकों ने भारत पर कैसे शासन किया और जब छोड़ के गए तो कैसे छोड़ कर गए? फूट डालो और राज करो. साधारण परंतु बेहद ताकतवर नीति. जाते समय भी देश को दो क्या बल्कि तीन हिस्सों में बांट के गये. इसके मुख्य जिम्मेदार वही थे. हिंदुस्तानी नेता तो लाचार थे.

भारत  में आज तक कॉलोनियल शासन को यहां की कमियों के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है. ये सच भी है. कोई भी समाज खुद से विकास करे तभी आत्मसम्मान रह पाता है. अगर उसे मजबूर किया जाए तो हीनता का बोध होता है. जो गुस्से के रूप में कहीं ना कहीं निकलता है. ये हिंदुस्तान में भी होता है.

#. उस वक्त के इस्लामिक क्षेत्रों की स्थिति देखते हैं

1798 में फ्रांस के शासक नेपोलियन ने इजिप्ट को अपने कब्जे में कर लिया. सोचा कि स्वेज के पास ताकत मिलने पर ब्रिटिश लोगों को इंडिया जाने से रोका जा सकेगा. ज्ञात रहे कि ब्रिटेन ने इंडिया के दम पर ही पूरी दुनिया की नाक में दम कर रखा था. नेपोलियन ने इसके लिए इजिप्ट में फ्रेंच पढ़ाई और कल्चर को थोपना शुरू कर दिया था. फिर सीरिया में भी कोशिश की. पर उसके दोनों प्रयास असफल रहे. फिर ब्रिटेन ने ईरान समेत बाकी जगहों पर नजर भिड़ानी शुरू कर दी.

पूरा यूरोप ही उस समय पूरी दुनिया को तरबूज की तरह काटकर आपस में बांट रहा था. फ्रांस ने 1830 में अल्जीरिया पर कब्जा किया. दस साल बाद ब्रिटेन ने अदन पर. इसी तरह 1880 के बाद ट्यूनीशिया, इजिप्ट, सूडान, लीबिया और मोरक्को सब पर कब्जा कर लिया गया. इसी वक्त रूस ने भी सेंट्रल एशिया के देशों पर नजर जमानी शुरू कर दी. उधर 1915 में साइक्स पाइकोट एग्रीमेंट हुआ और मुसलमानों के महान ओटोमन साम्राज्य को आपस में बांट लिया गया. ख्याल रहे कि उस वक्त ईरान और इराक में तेल की खोज नहीं हुई थी. सिर्फ राजनीतिक वजहों से ये चीजें हो रही थीं. किसी और देश को एशिया में फायदा नहीं उठाने दिया जाएगा. एशिया बोले तो मुख्यतया इंडिया और चीन.

 

नेपोलियन ने स्वेज कैनाल को कब्जे में लेकर जो करना चाहता था, उसमें वो सफल नहीं हो सका.
नेपोलियन ने स्वेज को कब्जे में लेकर जो करना चाहता था, उसमें वो सफल नहीं हो सका.

फिर दो विश्वयुद्ध हुए. ये यूरोपियन देशों ने ही लड़ा. एशिया और इस्लामिक देश तो मजबूरी में लड़े. ये लड़ाई कॉलोनियलिज्म का ही रिजल्ट थी. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद ही भारत समेत ये सारे मुस्लिम देश आजाद हुए.

अब सोचिए कि भारत को आजाद करते वक्त ये शासक दो भागों में बांटकर गए, तो बाकी देशों के साथ क्या किया? 56 मुस्लिम देश हैं पूरी दुनिया में. इनमें से ज्यादातर में दो या दो से अधिक समुदायों में जर-जमीन और ताकत को लेकर झगड़ा है. ये बिल्कुल वही स्थिति है, जो भारत के साथ हुई थी.

#. अमेरिका ने कॉलोनियां तो नहीं बनाई पर इस्लामिक देशों में तानाशाही और आतंकवाद इसकी ही देन है

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद कई मुस्लिम देशों में तेल की खोज हो गई और तेल का उत्पादन बड़े पैमाने पर होने लगा. अब दुनिया की व्यापारिक लड़ाई समुद्र के रास्तों पर कब्जे से हटकर तेल पर आ गई थी. अमेरिका अब ब्रिटेन की जगह नया दादा बना था. अमेरिका ने कभी भी किसी देश को कॉलोनियल सत्ता के अधीन लाने की कोशिश नहीं की. पर तेल पर नियंत्रण के लिए उसने तकरीबन हर इस्लामिक देश में तानाशाही को फंड किया. इसका सबसे बड़ा उदाहरण ईरान है. ईरान में 60 के दशक में लड़कियां हाफ पैंट पहन के घूमती थीं. 1979 में वहां इस्लामिक क्रांति हुई और सत्ता कठमुल्लों के हाथ जा पहुंची. अमेरिका ही इसका सूत्रधार था. बाकी देशों में भी ऐसा ही हुआ. अफगानिस्तान पर कब्जे को लेकर अमेरिका और रूस ने वहां का बंटाधार कर दिया. अब सोचिए कि क्या वहां के मुसलमान इन देशों से खुश होंगे?

 

अमेरिका ने तेल के कुओं पर अधिकार के लिए सभी
इरान का एक तेल का कुआं: अमेरिका ने तेल के कुओं पर अधिकार के लिए सभी इस्लामिक देशों में डिक्टेटरशिप के लिए फंडिंग की.

दूसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात. यूरोपियन देशों और अमेरिका ने इन इस्लामिक देशों को टेक्नॉल्जी से मरहूम रखा. अपनी जरूरत की रेल बिछाई बस. मतलब विकास भी इन देशों में सिर्फ तेल के दम पर हो रहा था. जब टेक्नॉल्जी नहीं आएगी तो समाज में सुधार कैसे होगा? टेक्नाॉल्जी आने से ही तो औरत और मर्द में बराबरी आती है.

ऐसा नहीं है कि ये पहली बार इस्लाम के साथ ही हो रहा था. पूरे यूरोप में यहूदियों को प्रताड़ित किया जा रहा था पिछले 2000 सालों से. बाद में हिटलर ने इस प्रताड़ना की इंतिहा कर दी. अपने अपराध से मुक्ति पाने के लिए यूरोप ने यहूदियों को इजराइल दे दिया. वो जगह जहां अरब रहते थे. ये मुस्लिम समाज के आत्मसम्मान पर बहुत बड़ा दाग था. इस चीज से वो आजतक मुक्त नहीं हो पाए हैं. अमेरिका और इंग्लैंड भी आज भी अपने अपने क्षेत्रों को लेकर इमोशनल रहते हैं. रूस ने तो 3 साल पहले क्रीमिया को हड़प लिया. चीन सबको धमकी देते रहता है जमीन को लेकर. तो अरब कहां गलत हैं?

#. अब बात आती है इस्लाम के पूरी दुनिया का दुश्मन बनने की

ये सही है कि इस्लामिक देशों में सामाजिक बुराइयां बहुत हैं. पर इसका मतलब ये नहीं है कि उनके साथ कुछ भी कर दिया जाए. अमेरिका ने अफगानिस्तान में रूस को हराने के लिए जिन मुजाहिदीनों को बढ़ावा दिया उन्होंने ही 2001 में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर गिरा दिया. ये अमेरिका पर इस्लाम का हमला नहीं था. ये हमला था उन आतंकवादियों का जिनको अमेरिका ने बढ़ावा दिया था और बाद में पैसा देना बंद कर दिया था

9/11 वर्ल्ड ट्रेड सेंटर: इस हमले के बाद अमेरिका ने किसी भी तरह के आतंकवादी संगठनों को फंडिंग देनी बंद कर दी.
9/11 वर्ल्ड ट्रेड सेंटर: इस हमले के बाद अमेरिका ने किसी भी तरह के आतंकवादी संगठनों को फंडिंग देनी बंद कर दी.

इसके बाद शुरू हुआ प्रोपेगैंडा का दौर. इस्लामोफोबिया एक नया शब्द गढ़ा गया. मतलब लोग इस्लाम से डरने लगे. क्योंकि रोज ही नई खबरें आतीं कि इस्लामिक देशों के लोग कितने क्रूर होते हैं. पर इसमें एक चीज छुपा ली जाती कि लोग क्रूर नहीं होते, बल्कि सैनिक क्रूर होते हैं. वो सैनिक जो तानाशाहों और गैंग के लीडरों के अंडर काम करते हैं. जैसे कि अमेरिका के सैनिक जिन्होंने इंटरोगेशन के नाम पर ग्वांटानामो बे में प्रताड़ना की सीमा पार कर दी. पर इस्लामिक देशों के पास उतनी पावरफुल मीडिया नहीं थी. क्योंकि ज्यादातर देश या तो तानाशाही में थे या फिर गरीब थे. उनके यहां पुराने जमाने की विद्वत्ता तो थी पर आधुनिकता के हिसाब से विद्वत्ता नहीं आ पाई थी. कोई बोलने वाला भी नहीं था.

#. अब 2017 में इस्लाम को समझने के लिए इन 5 घटनाओं का सहारा लेंगे:
1.  

जॉर्ज बुश का कहना कि या तो आप हमारे साथ हैं या फिर उनके साथ हैं

अफगानिस्तान पर हमला करने से पहले बुश ने ये कहा था. पर ये आतंकवादियों के खिलाफ था. प्रोपेगैंडा मीडिया ने इसे इस्लाम के खिलाफ बना दिया. तुरंत चारों ओर संदेश गया कि मुसलमान यूरोप के खिलाफ हैं. लेकिन ऐसा नहीं था.

2. ISIS  का उदय

इस संगठन के उदय ने ये जताया कि सारे मुसलमान इतने हिंसक होते हैं. लोगों को मुसलमान सुनते ही इस संगठन का खयाल आने लगा. पर ऐसा भी नहीं था. दुनिया के हर देश के मुसलमानों ने कहा है कि ये लोग इस्लाम के प्रतिनिधि नहीं हैं. इन लोगों के पास हथियार कहां से आते हैं, ये अलग उत्सुकता का विषय है. क्योंकि इन देशों में हथियार नहीं बनते, यूरोपीय और अमेरिकी देशों में ही बनते हैं. लेकिन मीडिया ने बाकी मुसलमानों को दिखाने के बजाय इस संगठन को ही इस्लाम के प्रतिनिधि के तौर पर दिखाना शुरू किया.

 

ISIS ने दुनियाभर में मुसलमानों की इमेज ख़राब करने में बहुत अहम भूमिका निभाई है.
ISIS ने दुनियाभर में मुसलमानों की इमेज ख़राब करने में बहुत अहम भूमिका निभाई है.

3. शार्ली हेब्दो हमला

फ्रांस की मैगजीन शार्ली हेब्दो ने मुहम्मद का कार्टून छापा. छापने वाले भी अल्जीरियाई मूल के थे, जहां कभी फ्रांस का कब्जा हुआ करता था. उनको मारने वाले भी अल्जीरियाई मूल के ही थे. तो ये इस्लाम का मामला नहीं था. ये बस उसी पुराने झंझट की पैदाइश थी जिसे कॉलोनियलिज्म ने पैदा किया था. पर तुरंत कोई शिकार मिला तो वो था इस्लाम.

चार्ली हेब्दो पर इसी कार्टून के कारण हमला हुआ था.
चार्ली हेब्दो पर इसी कार्टून के कारण हमला हुआ था.

4. फ्रांस का बुर्कीनी मोमेंट

फ्रांस ने दुनिया को फ्रीडम से जुड़ी बहुत चीजें दी हैं. पर अपने यहां बीच पर एक औरत का बुर्का पहन के बैठना उनको भारी पड़ गया. पुलिस ने बुर्का उतरवा दिया. इससे ये संदेश गया  कि इस्लाम की औरतें भी कट्टर हैं और वो उन्हीं प्रथाओं का पालन करती हैं जिनको वेस्ट का समाज पिछड़ा मानता है. पर ये घटना इस्लाम के बजाय पुलिस शासन की कट्टरता दिखाती है. फ्रांस यहां पर गलती कर बैठा. लेकिन ताकतवर प्रोपेगैंडा ने इसे भी इस्लाम की कमी ही बना दिया.

इसी बुरका पहने महिला से फ्रेंच पुलिस को दिक्कत थी.
इसी बुरका पहने महिला से फ्रेंच पुलिस को दिक्कत थी.

5. रोहिंग्या मुसलमानों की समस्या

इस समस्या को बौद्ध बनाम इस्लाम बनाने की कोशिश की जा रही है. इसको चीन में हो रहे मुस्लिम समस्या और श्रीलंका की मुस्लिम माइनॉरिटी समस्या से जोड़ा जा रहा है. पर लोग ये भूल रहे हैं कि तीनों ही जगहों पर इस्लाम माइनॉरिटी में है. और तीनों का आपस में कोई संबंध नहीं है. पर दुनिया में तेजी से फैल रहे इस्लामोफोबिया ने तीनों को जोड़ने का काम किया है.

रोहिंग्या मुसलमान इसी इस्लामोफोबिया के शिकार हैं.
रोहिंग्या मुसलमान इसी इस्लामोफोबिया के शिकार हैं.

#. पहले जो हाल कॉलोनियों का था, अब वही हाल इस्लाम का हो गया है

इस लेख का मतलब ये नहीं कि इस्लाम के नाम पर किया जाने वाला आतंकवाद सही है. ये बिल्कुल ही गलत है. पर इस गलती को सही करने के नाम पर जो किया जा रहा है, वो और भी गलत है. ये वही गलती है जो कॉलोनियलिज्म ने 200 सालों तक दुनिया के साथ किया था. और अब इस्लाम को टार्गेट बनाकर कर रहे हैं. क्योंकि ये 56 देश अभी भी वहीं फंसे हैं, जहां 19वीं शताब्दी के देश फंसे हुए थे.  ये सारे देश अपनी कोशिशों से आगे आ सकते हैं. लेकिन लगातार इनकी भर्त्सना करने और इनपर हमले करने से तो कुछ नहीं होगा. अभी तो ऐसा हो गया है कि मुसलमान पर कोई भी ब्लेम लगाया जा सकता है. तमाम तरह की फेक न्यूज़ एजेंसीज़ आ चुकी हैं. जो उनपर नित नये आरोप लगाती हैं. लगातार ऐसा प्रचारित किया जाता है जैसे सारे मुसलमान दिन रात नमाज पढ़ते हैं और बाकी वक्त बॉम्ब ब्लास्ट की प्लानिंग करते हैं. उनके बारे में सही चीजें बताई ही नहीं जातीं.

अपने खिलाफ हो रही इस तरह की किसी भी साज़िश के खिलाफ मुसलमानों ने साइलेंट प्रोटेस्ट किया है. लेकिन उनकी सुनता कौन है.
अपने खिलाफ फ़ैल रही किस भी तरह की गलत न्यूज़ के खिलाफ मुसलमानों ने साइलेंट प्रोटेस्ट किया है. लेकिन उनकी सुनता कौन है.

#. बहस करने वाले आधे से ज़्यादा लोगों को मुद्दो की पूरी समझ भी नहीं है

अगर हिंदुस्तान की बात करें तो सच्चर कमिटी की ही रिपोर्ट पढ़ लें. इससे साफ साफ पता चलता है कि मुस्लिम समाज का शैक्षणिक स्तर इतना नीचे है कि बामियान में बुद्ध के गिरने की ये भर्त्सना ही नहीं कर सकते. क्योंकि इनको समझ ही नहीं आएगा. ये थोड़ी क्रूर बात लग सकती है. लेकिन ये सच्चाई है कि मुट्ठी भर लोगों को छोड़कर, ये किसी को समझ नहीं आएगा.

हिंदू समाज के साथ भी यही हाल है, बाबरी मुद्दे का सच किसको समझ आया है? ठीक इसी तरह रोहिंग्या मुसलमान और भी नीचे हैं. उस स्तर पर कोई खाने, पीने और सोने के अलावा कुछ और सोच ही नहीं पाएगा. उनके यहां कोई विद्वान नहीं बैठा है, जो हर चीज की आलोचना सके.  अगर वाकई में कोई मुसलमानों का भला चाहता है तो सबसे पहले उनपर आरोप लगाना बंद कर दे. इसका सबसे बड़ा उदाहरण है बॉलीवुड. यहां कोई जजमेंट पास नहीं किया गया और भारत को तीन खान मिले. सोचिए कि इस्लाम के नाम पर प्रताड़ित किया जाता तो क्या होता? रोज कहा जाता कि तुम्हारे समाज में तो ये होता है, वो होता है तो क्या आमिर खान तीन साल मेहनत करके एक फिल्म बना सकते?


ये स्टोरी हमारे साथ काम कर चुके रिषभ ने लिखी है.


वीडियो देखें:

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