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सीरिया में लोगों को कौन मार रहा है, जानकर डर लगेगा

सीरिया. एक समय इस्लाम के खलीफा का देश. जिसने रोम से लेकर मंगोल और तुर्कों के हमले झेले. जहां कुर्द, सुन्नी, ईसाई, शिया, एस्सिरियन समेत कई कौमें रहती हैं. जो सैकड़ों सालों तक आपस में लड़ती रहीं. बाद में यूरोप के चंगुल में आ गया.

आबादी: 1.7 करोड़ (लगभग दिल्ली जितनी)
इस्लाम: 87% क्रिश्चियन: 10%
राजधानी: दमिश्क सबसे बड़ा शहर: अलेप्पो
भाषा: अरबी, इंग्लिश और फ्रेंच

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द्वितीय विश्व-युद्ध के बाद स्वतंत्र हुए देशों में ये भी था. 1946 में आज़ाद हुआ सीरिया फ्रांस के कल्चर को धीरे-धीरे स्वीकार कर चुका था. लेकिन फ्रांस के जाने के बाद राजनीतिक झंझटों से मुक्त नहीं हो पाया. 1960 में इजिप्ट के साथ यूनाइटेड अरब रिपब्लिक भी बनाया पर चल नहीं पाया. फिर 1967 में जॉर्डन और इजिप्ट के साथ मिल इजराइल से जंग भी की और हार भी गए. इजराइल ने उसी वक़्त गोलन हाइट्स छीन लीं. सीरिया की स्थिति गड़बड़ हो गयी.

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गोलन हाइट्स

आज़ाद देश में बाप की तानाशाही बेटे को ट्रान्सफर हो गई

इसी बीच 1970 में हाफिज अल असद ने सीरिया की सत्ता हड़प ली. ये सीरिया की माइनॉरिटी शिया कौम से आते थे. बाथ पार्टी के नाम पर. इस नाम से कई इस्लामी देशों में पार्टियां बनीं. बाथ का मतलब होता है पुनर्जागरण. इनका उद्देश्य था सारे मुस्लिम देशों को मिलाकर एक ‘अरब मुल्क’ बनाना. फिर जैसा कि हर तानाशाह करता है, अपने आप को सही साबित करने के लिए असद ने खूब हथियार ख़रीदे. देश में आतंक फैला दिया. फिर 1973 में इजिप्ट के साथ मिलकर इजराइल पर हमला कर दिया बदला लेने के लिए, लेकिन फिर हार गए. 1976 में पड़ोसी देश लेबनान में राजनीतिक हालात बदतर हो गए थे. तो इन लोगों ने अपनी सेना वहां भेज दी और तीस साल वहीं रह गए. असद के खिलाफ 1982 में मुस्लिम ब्रदरहुड ने सीरिया के हमा शहर में विद्रोह किया. पर असद की मिलिट्री ने उनके समेत हजारों सीरियन लोगों को भी मार दिया. फिर किसी ने बोलने की हिम्मत नहीं की. 2000 में असद मर गया. और उसकी जगह बेटा बशर अल असद तानाशाह बन गया. 2005 में लेबनान के प्रेसिडेंट रफीक अल हरीरी का क़त्ल हो गया. और असद ने वहां से अपनी सेना हटाने का फैसला लिया.

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बशर अल असद-Reuters

तब तक दुनिया मॉडर्न युग में आ चुकी थी. इंटरनेट और सोशल मीडिया से सबको अपने अधिकारों और दूसरे देश के महान लोगों के बारे में पता चलने लगा था. सब अपने देश की तुलना दूसरों से करने लगे. अब समझ आने लगा कि सीरिया में कितनी बेरोजगारी है, लोगों पर कितना दबाव है. तो 2011 में सीरिया के शहर डेरा में डेमोक्रेसी के लिए प्रदर्शन होने लगे. ये प्रदर्शन शांति से किये जा रहे थे. पर प्रेसिडेंट असद को ये मंजूर नहीं था. तुरंत आर्मी लगा दी गई. पर लोग माने नहीं. असद भी नहीं माना. विद्रोहियों पर सेरीन गैस भी इस्तेमाल किया. ये गैस दिमाग पर असर करती है. सिविलियन जनता को सबसे ज्यादा झेलना पड़ा. इसी बीच कुछ उग्रवादी लोगों ने हथियार उठा लिए. धीरे-धीरे हिंसा बढ़ गई और सैकड़ों लोग शामिल हो गए इसमें. सरकारी सेना को देश से खदेड़ने की बात होने लगी.

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ISW2012: सीरिया में विद्रोहियों के कब्जे के शहर

 

बाकी दुनिया ने क्या किया इस जंग में?

शिया, सुन्नी, डेमोक्रेसी, तानाशाही, तेल और मिडिल ईस्ट का ‘की-एरिया’ होने के चलते इस संघर्ष में ईरान, सऊदी अरब, अमेरिका और रूस भी शामिल हो गए. सुविधा के हिसाब से असद और उनके विपक्षियों को मदद दी जाने लगी. किसी को हथियार कम ना पड़े बस. इन बड़े देशों पर ये भी आरोप लगा कि सुन्नी को शिया के खिलाफ भड़काने का काम इन्हीं लोगों का है. क्योंकि लम्बे समय से सीरिया लगभग सेक्युलर देश ही था. अब हालत ऐसी है कि इस्लामिक स्टेट यानी ISIS सीरिया में रूस, अमेरिका, असद सबसे लड़ रहा है.

रूस क्या कर रहा है सीरिया में?

सितम्बर 2015 में रूस ने सीरिया पर हमला शुरू कर दिया. असद के सपोर्ट में. क्योंकि अमेरिका असद को हटाना चाहता है. और असद को सपोर्ट करने की वजह से रूस का दबदबा बना रहेगा वहां. 6 महीने में इस अटैक ने पूरा मामला असद के पक्ष में मोड़ दिया. फिर इतने पर ही पुतिन वहां से हट गए. पूरा मामला नहीं सलटाया. सलटा देने से हाथ डालने का इंतजाम ख़त्म हो जाता.

ISW: रूस के हमले की जगहें
ISW: रूस के हमले की जगहें

ईरान असद को अलग हथियार भेज रहा है

वहीं शिया सपोर्ट में ईरान हर साल बिलियन डॉलर झोंक देता है वहां. तेल और हथियार दोनों का जिम्मा लिया है. ये अपने सारे काम लेबनान के शिया आतंकवादी ग्रुप हिजबुल्ला से करवाता है, जो असद के लिए दीवाने हुए जा रहे हैं.

सऊदी अरब और टर्की विद्रोहियों की मदद कर रहे हैं, अमेरिका दुविधा पैदा कर रहा है

वहीं सऊदी अरब लगातार सुन्नी विद्रोहियों की मदद कर रहा है. टर्की भी इन्हीं की मदद करता है. पर अमेरिका दुविधा पैदा करता है. ISIS पर हमला करता है. पर बाकी विद्रोहियों की मदद करता है. असद को हटाना चाहता है पर उसकी मिलिट्री पर हमला नहीं करता.

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OSDH- सीरिया के एक मानवाधिकार संगठन का आंकड़ा

 

कैसे बीता है वहां 2011 से 2016 तक का एक युग?

पिछले 5 सालों में ढाई लाख लोग मर चुके हैं. हालांकि एक और अंदाज़ा है कि 5 लाख से कम नहीं मरे हैं. 50 लाख के करीब तो सीरिया छोड़ चुके हैं. जिनमें ज्यादातर औरतें और बच्चे हैं. लेबनान, जॉर्डन और टर्की में इतने ज्यादा रिफ्यूजी जा रहे हैं जितने इतिहास में शायद ही कभी गए हों. कुल 10% रिफ्यूजी यूरोप चले गए हैं. इतने में यूरोप की सारी मानवता और बड़ी-बड़ी बातें निपट गयी हैं. अब वो लोग कड़े कानून बना किसी को आने नहीं दे रहे वहां. UN के मुताबिक सीरिया की 70% आबादी को खाने-पानी की कोई सुविधा नहीं है. स्कूल, हॉस्पिटल तो बहुत दूर की बातें हैं.

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Reuters- भागते हुए डूब गए ऐलान कुर्दी की इस फोटो ने रिफ्यूजियों की स्थिति बयान की

2012 और 2014 में UN ने असद और विद्रोहियों के बीच सुलह कराने की कोशिश की, पर असद किसी की बात सुनने को तैयार नहीं थे. जनवरी 2016 में रूस और अमेरिका ने मीटिंग बुलाई कि अब मामला चुनाव से सुलझाया जाये. जब बात चल रही थी तभी असद की सेना ने अलेप्पो शहर में भयानक हमला कर दिया. मार्च में फिर से बात हुई. अमेरिका ने बाद में कहना शुरू किया कि हिंसा 90 प्रतिशत कम हो गई है.

पर 2017 में हिंसा फिर बढ़ गई है. अप्रैल में केमिकल अटैक होने की खबर आई है. इसमें बच्चे भी मरे हैं.


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