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शाहिद अफरीदी जो क्रिकेट में क्रांति की तरह आया था

Satya vyas
सत्य व्यास

कहना हॉस्टल वाले हमारे दोस्त मनोज ओझा का. असली आदमी वो है कि जिससे जितने लोग नफरत करें, उतने मुहब्बत करें. हिंदुस्तान में ये मुकाम शाहरुख खान को हासिल है. पाकिस्तान में शाहिद अफरीदी को. दोनों की मुहब्बत-नफरत को सरहद हाल तक तो नहीं रोक पाई. अफरीदी क्रिकेट में साइक्लोन की तरह आए थे. पर आज कल वो उन वजहों से चर्चा में रहते हैं, जिनका क्रिकेट से कोई वास्ता नहीं. सत्य व्यास इससे ख़फा हैं. नौजवान राइटर. हां वही ‘बनारस टॉकीज’ वाले. अपने फेवरेट अफरीदी पर कुछ कहना चाह रहे थे. फिर पट्ठे की पहली पारी याद आ गई. कयामत खेला था शाहिद!


क्रिकेट के लिए साल 1996 बिलाशक श्रीलंका का साल था. जयसूर्या और कालुविथरना का साल था. पिंच हिटर जैसे शब्द की उत्पत्ति का साल था (ग्रेटबैच अपवाद थे). भारत भी तौर-ए-नक़्ल जवागल श्रीनाथ और नयन मोंगिया जैसों को आजमाकर नाकाम हो चुका था. सचिन मास्टर ब्लास्टर जरूर थे; मगर डिस्ट्रॉयर नहीं थे. उस पर भी नंबर तीन या चार पर बल्लेबाज़ी करने आते थे. तब तक उन्हें डिस्ट्रॉय नहीं डैमेज कंट्रोल करना होता था.

ख़ैर, विषयांतर हो गया. बात हमें पाकिस्तानी क्रिकेट की सनसनी की करनी थी.

1996 वर्ल्ड कप में पाकिस्तान, भारत से हारकर बाहर हो चुका था. और जैसा कि बड़ी हार के बाद होता है, टीम में पूरी तरह रद्दोबदल की बात चल रही थी. आमिर सोहेल अपने एज और रेज की वजह से सलीम इलाही जैसे खिलाड़ियों की जगह बना रहे थे. मुश्ताक अहमद की परंपरागत लेग स्पिन की पिटाई शाहिद अफरीदी जैसे अनऑर्थोडॉक्स गेंदबाजों के टीम में शामिल होने की वजह बन रही थी.

तब भारत की ‘विज़डन’ कही जाने वाली मैगजीन ‘क्रिकेट सम्राट’ में भारत के पीटर रीबॉक कहे जाने वाले चरणपाल सिंह सोबती ने लिखा था, ‘क्रिकेट अब पूरी तरह बदल गया है. अब कप्तान की बात तक नहीं मानी जाती और एक सितारे का जन्म हो जाता है.’

बात सही भी थी. 4 अक्टूबर 1996 को नैरोबी जिमखाना में 16 साल का शाहिद अफरीदी जब उतरा तो सलीम इलाही के रूप में पहला विकेट गिर चुका था. रन भी बुरे नहीं थे. दस ओवर में 60 रन पर एक विकेट.

Pakistani batsman Shahid Afridi (L) celebrates hitting a century against India in Sahara Cup action in Toronto September 19. He scored 109 off 94 balls before being caught out. Pakistan's Aamir Sohail is at right. PJ/ME
Photo: Reuters

शाहिद अफरीदी जब बैटिंग करने आए तो कुमार धर्मसेना बोलिंग पर थे. उन्होंने धर्मसेना की पहली गेंद को इज़्ज़त दी और दूसरी ही गेंद को बेइज़्ज़त कर दिया. धर्मसेना के पास अपने दाईं ओर आसमान ताकने के अलावा कोई चारा न था.

अगले ओवर तक लड़के ने हेलमेट उतार दिया. हर छक्के के बाद उसे कप्तान सईद अनवर नसीहत देते, और हर छक्के से पहले वो उन नसीहतों को नजरअंदाज कर देता. कप्तान अनवर ने भी नेट पर उसके बल्ले की निर्ममता देखी थी, इसलिए दूसरे ही मैच में उसे ‘पिंच हिटर’ की भूमिका में उतारा था.

मगर उन्हें भी इस पश्तो पठान से इस किस्म के कत्लेआम की उम्मीद नहीं थी. जब तक यह खिलाड़ी क्रीज पर रहा तब तक पाकिस्तान के क्लासिकल खिलाड़ियों में शुमार सईद अनवर उसे समझाने के अलावा बस स्ट्राइक देने की भूमिका में ही रहे.

कप्तान अर्जुन रणतुंगा ने जब अपने तुरुप के पत्ते मुथैया मुरलीधरन को बॉल थमाई तो लगा कि यह एक समझदार फैसला है. मगर इस सोलह साला लड़के ने सबसे ज्यादा क्रूर बर्ताव सबसे अच्छे गेंदबाज के साथ किया. मुरलीधरन अजीबोगरीब चेहरे बनाकर बॉल डिलीवर करने के बाद गेंद को पवेलियन में उड़ता देखते रहे और चेहरा झुका लेने के सिवा कुछ न कर सके.

दसवें ओवर में उतरा यह लड़का पवेलियन लौटा तो स्कोर 60 से बढ़कर 186 हो चुका था. इन 126 रनों में से 102 रन इसने अकेले बनाये थे महज 37 गेंदों में. नीचे दिख रहे आंकड़े किसी मोबाइल का IMEI नंबर नहीं, बल्कि शाहिद अफरीदी के प्रति बॉल रन हैं.

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इस पारी के साथ ही साहिबजादा शाहिद मोहम्मद खान अफरीदी का जन्म हो चुका था. आज के क्रिकेटप्रेमी युवा यह शायद ही मान पाएं कि बीसवीं सदी के आखिरी सालों के क्रिकेट प्रेमी बॉलर के बॉल डालते ही अफरीदी के पिछले पांव को एक कोण पर मुड़ते देख भुनभुना उठते थे- ‘छक्का’. शाहिद खुद भी मानते हैं कि उन्होंने सीधे बल्ले से खेलने की मियांदाद की सलाह मानकर गलती की और अपना नैचुरल स्टांस भूल गए.

Photo: Reuters
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खैर नैचुरल स्टांस भूलने के बावजूद यह खिलाड़ी इतना खतरनाक रहा कि इसने पाकिस्तान जैसे देश में जहां साल में तिहत्तर खिलाड़ी बदले जाते हैं, अपनी जगह 20 सालों से बनाए रखी है. गेंदबाज के तौर पर उनके योगदान की तो हम बात ही नहीं कर रहे.

Photo: Reuters
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आज जब शाहिद अफरीदी उम्र के कारण ट्रोल होते देखता हूं तो याद आता है, हम वही लोग हैं जो नुसरत फ़तेह अली खान को फिल्मों में गाता देख फुरसत फ़तेह अली खान का नाम देते हैं और फिर उमके निधन पर लिखते हैं कि अभी उन्हें और गाना था. हम वही लोग हैं जो तेंदुलकर को एंडूलकर की उपाधि से नवाजते हैं और उनके रिटायरमेंट के बाद उनकी कमी अपूरणीय बताकर नए खिलाड़ियों को कोसते है. हम नामालूम अफराद हैं. हम भीड़ हैं.

शाहिद अफरीदी, 90 के दशक के क्रिकेट का आखिरी सितारा रह गया है. जितने दिन चमक है, बिखेर लेने दें. फिर तो यूट्यूब पर उसके वीडियो ही देखने हैं. 1 मार्च 1980 को पैदा हुए शाहिद अफरीदी आज 41 साल के हो गए. आजकल वह पाकिस्तान सुपर लीग में खेल रहे हैं.


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