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न होके भी जो रखे सूफी संत सा जलवा, वो जौन एलिया है

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सौरव
सौरव

जौन एलिया के दीवाने सरहद के दोनों ओर पाए जाते हैं. इंडिया, पाकिस्तान से इतर, कई मुल्कों में जौन एलिया के दीवाने हैं. एक दीवाने बंगलुरु में रहते हैं. सौरव कुमार सिन्हा. कहते हैं कि वो शायर नहीं हैं, उर्दू के जानकार भी नहीं. शायरी पसंद करने के लिए ये जरूरी शर्तें भी तो नहीं हैं. हां तो सौरव ने हमें लिख भेजा. हम आपको पढ़ाए दे रहे हैं.


ये है एक जब्र इत्तेफ़ाक नहीं,
जॉन होना कोई मजाक नही: जौन एलिया

जौन के बारे में लिखने से पहले मैं ये साफ करना चाहूंगा कि मैं ना तो कोई शायर हूं ना ही उर्दू का जानकार और किसी भी फलसफे से मेरा कोई ख़ास राबता नहीं है. लेकिन ये बात भी सच है कि जौन एलिया को जानने और समझने के लिए उपर्युक्त किसी भी सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं है. इसी लिए जौन के प्रति मेरे नजरिए को बिना किसी पूर्वाग्रह के पढ़े और तर्कसंगत समीक्षा करें.

शायर तो जमाने में बहुत हुए. हो भी रहे हैं और सोशल मीडिया के इस दौर में शायरों की हर प्रकार की जमात अपने-अपने कुनबे को भली भांती पाल पोस भी रही है. जब सब अच्छा चल रहा है तो इतिहास के पन्नों में से एक शायर को निकाल के उसके बारे में बात करना कितना उचित है? या अगर बात फलसफे और उर्दू शायरी के सफर की है तो हर शायर या उस लहजे हर साहित्यकार उसी एक रास्ते पे है शब्दावली बस अलग अलग है. फिर खासकर जौन को उस भीड़ में से निकाल कर आंकना सही है?

जौन को राजनीतिक दर्शन, खगोल विज्ञान और शास्त्रीय परंपराओं में प्रशिक्षित किया गया था. फिर भी वह कोई फैज़ अहमद फैज़ या जोश मलीहाबादी नहीं थे. उनके अशआर उर्दू, फ़ारसी और हिंदी के शब्दों का मुकम्मल इस्तेमाल थे. वो जुमलों का भी इस्तेमाल करते. हकीकत, वजूद और मौजूदा समस्याओं पे उनकी पैनी नजर थी जो उनके ढेरो कलाम में नजर आता है. लेकिन ना तो वो अहमद नदीम कासमी थे ना अली सरदार जाफरी.

जिस व्यक्ति को मानवीय संवेदनाओ में कोई ख़ास रूचि नहीं थी. जो सामजिक मूल्यों को हमेशा दरकिनार करता था. तो उस व्यक्ति की शायरी में मानव केंद्रित दर्शन कैसे निकलेगा? तो फिर जौन ही क्यों? इन सवालों का जब जवाब ढूंढता हुं तो तीन तर्क हैं जो जौन को किसी भी शायर, विचारक और सूफी संत से अलग करते हैं और जौन जो तीनों में से मेरे हिसाब से स्पष्ट रूप से कोई नहीं थे, लेकिन सबसे जुदा अंदाज ही जौन को तीनों की मिश्रित अभूतपूर्व कृति बनाता है.

वो तीन तर्क है:

जौन मिजाज से शायर थे लेकिन बाकी किसी भी शायर की तरह उन्होंने गजल या नज्म की बारीकियों पे ज्यादा ध्यान ना देते हुए फलसफे को प्राथमिकता दी. आसान लहज़ा, साफगोई, लफ्जों का जखीरा होते हुए भी शेरों में बोल चाल की शब्दावली को प्राथमिकता. गज़ल की बहरो के साथ ऐसी नक्काशी जिससे गज़लगोई बातचीत में बदल जाती है. उनके कुछ शेर जिनका फलसफा सदियों पुराना है लेकिन लहजा केवल जौन का.

जहर था अपने तौर पे जीना,
कोई एक था जो मर गया जानम

अब निकल आओ अपने अंदर से
घर में सामान की जरूरत है

उड़ जाते है धूल के मानिंद
आंधियों पे सवार थे हम तो

अब नहीं कोई बात खतरे की
अब सभी को सभी से खतरा है

तू है पहलू में फिर तेरी खुशबू
हो के बासी कहां से आती है.

दूसरा, जौन विचारक भी नहीं थे. क्योंकि ना तो वो किसी कबीले को मानते थे और ना ही उन्होंने कोई कबीला बनने दिया. हर विचारधारा पे तंज कसा. सवाल पूछे. गालियां दी लेकिन कोई सटीक जवाब कभी नहीं दिया, हालांकि दर्शन उनकी शायरी का एक अहम अंग है लेकिन कभी कभी वो भी उसमे खुद उलझते हुए नजर आते हैं या हो सकता है ऐसा ही वो चाहते हो. जौन को मजाक उड़ाने की बहुत आदत थी. फलसफों में हम अगर उलझते है तो वह एक जौन का इशारा भी है स्थापित कबीलों के ऊपर. जौन चाहते थे कि हम आंख बंद के भरोसा ना करें. इसलिए भी उलझा के सोचने पे मजबूर करते थे.

मुझे अब होश आता जा रहा है
खुदा तेरी खुदाई जा रही है.

यूं जो तकता है आसमान को तू ,
कोई रहता है आसमान में क्या.

तीसरा , जौन सूफी तो कतई नहीं थे. लेकिन जीवन शैली के अलावा वो हर वो जलवा रखते थे जो एक सूफी संत रखता है. अब उस पहलू की बात करते हैं, जिसने मुझे प्रेरित किया कि मैं जौन को रोज़-रोज़ पढ़ूं. समझूं. और नए आयाम पे पहुंचने की कोशिश करूं. मेरी नजर में आजतक इस कायनात में कोई ऐसी शख्सियत नहीं हुई है, जिसने अपनी बर्बादी का ढिंढोरा खुश हो के पीटा हो और उसी में खुश हो. उसी ढिंढोरे से शायरी निकालना, फलसफा निकालना और कभी कभी एक अनकहा रूहानी एहसास निकालना, जो हर व्यक्ति के लिए बहुत नया और अपना हो.

जौन के समकालीन विचारकों ने भी स्थापित सत्ता पे तंज किया. लेकिन सभी बच बच के किया करते थे. जौन का लहजा और आवारापन ना केवल बेबाक है बल्कि ज्यादा दांव पेंच में ना फंसते हुए सीधा प्रहार करता है. कुछ लोगों के लिए जौन की व्यवहारिक नाटकीयता उनकी पहचान थी. लोगों की दिलचस्पी उनके शेर कहने के लहज़े में रहती थी. लेकिन मेरे लिए जौन वही शख्स हैं. जो निराशावादी लगता तो है लेकिन आशावादियों के खोखलेपन को सरेआम नंगा करता है. जौन गम के शायर नहीं है, उनका तल्ख़ मिजाज उनकी शायरी में भरपूर दिखता है. लेकिन उसमे निराशा नहीं वरन उनका तजुर्बा और भिन्न फलसफों पे उनकी पकड़ दिखती है.

और तो कुछ नहीं किया मैंने
अपनी हालत तबाह कर ली है

जो गुजारी ना जा सकी हमसे
हमने वो जिंदगी गुजारी है

एक हुनर है जो कर गया हूं मैं
सब के दिल से उतर गया हूं मैं

हो रहा हूं मैं किस तरह बर्बाद
देखने वाले हाथ मलते हैं

मैं बहुत अजीब हूं, इतना अजीब हूं कि,
खुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं

जौन के बारे में रोज लिखा जा रहा है. रोज उनकी बर्बादी का जश्न मन रहा है. रोज नए अंदाज में उनकी सूफियाना शायरी को परोसा जा रहा है. कभी-कभी लगता है कि जौन जिन लफड़ों से अपनी शायरी को दूर रखना चाहते थे, उनके मरने के बाद उसी नाकाबिल तौर में उनकी पूरी शख्सियत को ढाला जा रहा है. जौन दर्शन के विषय हैं, प्रदर्शन के नहीं.

अंत में मैं जौन की उस रचना को आपके सामने रखता हु जो मुझे सबसे ज्यादा पसंद है.

सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई
क्यूं चीख़ चीख़ कर न गला छील ले कोई
साबित हुआ सुकून-ए-दिल-ओ-जां कहीं नहीं
रिश्तों में ढूंढता है तो ढूंढा करे कोई
तर्क-ए-तअल्लुक़ात कोई मसअला नहीं
ये तो वो रास्ता है कि बस चल पड़े कोई
दीवार जानता था जिसे मैं वो धूल थी
अब मुझ को एतिमाद की दावत न दे कोई
मैं ख़ुद ये चाहता हूं कि हालात हो ख़राब
मेरे ख़िलाफ़ ज़हर उगलता फिरे कोई
ऐ शख़्स अब तो मुझ को सभी कुछ क़ुबूल है
ये भी क़ुबूल है कि तुझे छीन ले कोई
हां ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूं
आख़िर मेरे मिज़ाज में क्यूं दख़्ल दे कोई
इक शख़्स कर रहा है अभी तक वफ़ा का ज़िक्र
काश उस ज़बां-दराज़ का मुंह नोच ले कोई


 

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