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पढ़िए भीमसेन जोशी के बार में, जो 11 की उम्र में घर छोड़कर गुरु की खोज में खाक छानते रहे

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उफ ये सतही संगीत की बमबारी और स्तरीय की अनुपलब्धता. पंडित भीमसेन जोशी का इस पीढ़ी के लिए एक ही मतलब है, ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ को विचित्र भाव-भंगिमाओं के साथ गाने वाला एक बुजुर्ग गायक! लेकिन बजाहिर उनका वितान इससे कहीं विशाल है.

संगीत पर मेरी कच्ची समझ है, इसलिए नट कसने के लिए कभी-कभी देवांशु सर की संगत लेता हूं. हमेशा कुछ नया बताते हैं. इस पेशे के शुरुआती सबक भी उनसे मिले थे. वे पंडितजी के बड़े मुरीद हैं. उनसे लिखने की गुजारिश की तो बोले, यार मेहनत करके लिखना पड़ेगा.

तो उन्होंने मेहनत करके लिखा है. पढ़िएगा. इस पीढ़ी को ज्यादा पढ़ना चाहिए, जो ‘पंडिज्जी’ के श्रवण और उनके आभामंडल से महरूम रही है.

-कुलदीप ‘सरदार’


devanshu jha the lallantop

ये आर्टिकल देवांशु झा के कीबोर्ड से निकला है. पत्रकार हैं, सियासत पर खूब लिखा है. लेकिन मन हिन्दुस्तानी संगीत में बहुत रमता है. पंडित भीमसेन जोशी, लता मंगेशकर, किशोरी अमोणकर और मेहदी हसन के मुरीद हैं. अगर आपके पास भी कायदे का कंटेंट हो, तो हमें  lallantopmail@gmail.com पर भेजिए. अच्छा लगा तो हम छापेंगे.


सन चौरासी की बात है. रेडियो पर दोपहर डेढ़ बजे शास्त्रीय संगीत का कार्यक्रम आता था. स्कूल के हॉस्टल से घर आने वाले बड़े भैया उन दिनों शास्त्रीय संगीत में रुचि लेने लगे थे. एक दिन उस कार्यक्रम में भीमसेन जोशी का गायन हुआ. राग था, वृंदावनी सारंग. करीब आधे घंटे के बाद जब गाना खत्म हुआ तो भैया अभिभूत होकर बोल पड़े, ‘ऐसा गायन पहले नहीं सुना, कैसा निर्झर सा प्रवाह है उनके गायन में’ !

हम दोनों भाई सोचते रहे कि कंठ की कला और नाद सौंदर्य का ऐसा मेल भला कैसे संभव है. भीमसेन जोशी उनके जीवन में शास्त्रीय संगीत के प्रति गहरी रुचि पैदा करने वाले प्रणेता गायक बने. उनका गायन हमें सम्मोहित कर गया था, फिर धीरे-धीरे जब हमने उन्हें बार-बार सुनना, तस्वीरों में देखना शुरू किया तो जोशी जी अपने असाधारण आलाप, उन्हें गाते हुए अपनी स्वत:स्फूर्त भंगिमाओं और अपने आभामंडल से हमारे मन में अधिष्ठाता गायक के रूप में विराजने लगे.

यूं तो बड़े हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायकों की सूची बहुत लंबी है लेकिन अपने अपूर्व स्वर और आकर्षक व्यक्तित्व से जादू करने वाले गायक कम हैं. बीसवीं सदी में उस्ताद बड़े गुलाम अली खान ऐसे ही गायक थे और दूसरा नाम पंडित भीमसेन जोशी का ध्यान में आता है.

उनका नाम, उनका स्वर और व्यक्तित्व तीनों मिलकर एक समष्टि का निर्माण करते हैं, जिसे हम भीमसेन जोशी के नाम से जानते हैं, वो इस समष्टि में ही पूर्ण होते हैं, उसमें कोई काट-छांट या संपादन संभव नहीं है . ये कोई हवाहवाई आकलन नहीं बल्कि स्वयंसिद्ध है जिसे बड़ी ही सरलता के साथ समझा जा सकता है.

80 और 90 के दशक में दूरदर्शन पर विविधता में एकता के विषय पर सिने कलाकारों, संगीतज्ञों और खिलाड़िय़ो की मंडली के साथ दो कैप्सूल बनाए गए थे, उन दोनों ही कैप्सूल की शुरुआत जोशी जी के सुर से होती थी. ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ और ‘बजे सरगम हर तरफ से, गूंजे बन कर देश राग’. उन सभी सिने तारक-तारिकाओं और दिग्गज कलाकारों के बीच भीमसेन जोशी की मौजूदगी सबसे मोहक और विराट है वो सितारों के सितारे बन कर छा गए और जिन्हें शास्त्रीय संगीत की समझ नहीं या रुचि नहीं वो भी जोशी जी के गुरु-गंभीर स्वर को सुनकर स्तंभित रह गए थे. ये असर हम जैसे श्रोताओं के जीवन पर ताउम्र रहेगा. भीमसेन जोशी के संपूर्ण व्यक्तित्व का गुणधर्म ही यही है.

Pandit Bhimsen Joshi the Lallantop

उनके बचपन कहानी बहुत दिलचस्प है, जो इस बात को प्रमाणित भी करती है कि संगीत के प्रति उनमें असीम अनुराग था और सहज भाव से था. बहुत छोटी उम्र में धारवाड़ के छोटे से शहर रोन में वो लोकगायकों और वाद्यमंडलियों के पीछे मोहित भागे चले जाते थे और संगीत सुनते हुए मीलों चलने के बाद थककर कहीं भी बेसुध पड़ जाया करते. निश्चय ही बेसुधी के उन क्षणों में सुर ने चुपके से उनकी आत्मा में स्थायी डेरा डाल दिया था, जिसे वर्षों के तपन और अपनी अंतर्दृष्टि से उन्होंने सुघड़ स्थापत्य दे दिया.

संगीत सीखने की पहली लौ जोशी जी की आत्मा में तब जली जब उन्होंने उस्ताद अब्दुल करीम खान की ठुमरी सुनी.

11 की उम्र में भीमसेन जोशी ने घर छोड़ दिया, अगले तीन साल तक वो गुरु की खोज में बीजापुर, पुणे, ग्वालियर, दिल्ली, कलकत्ता, लखनऊ, रामपुर की खाक छानते रहे. यह एक तरह का महाभिनिष्क्रमण ही था. उनका गृहत्याग भी ज्ञान प्राप्ति के लिए था, संगीत-सरोवर में उतरने के लिए वो घर से चुपचाप चल पड़े थे. हालांकि तीन साल के बाद पिता ने उन्हें जालंधर से खोज निकाला. जोशी जी घर वापस लौटे और जिन गुरु की तलाश में उत्तर भारत में भटकते रहे वो तलाश घर में ही पूरी हो गई. किराना घराना के धुरंधर गायक, सवाई गंधर्व ने उन्हें शिष्य बनाना स्वीकार कर लिया था, फिर धीरे-धीरे गुरु-शिष्य परंपरा में गायन की एक भीमसेनी काया बनती चली गई.

अपने स्वरों की शुद्धि, ठहरी हुई तान के विलंबित तारतम्य, निर्झर जैसे प्रवाह, तकनीकी दक्षता, नाद सौन्दर्य, अतुलनीय नियंत्रण और विस्मयकारी विविधता के साथ पहले सुर से समापन के अंतिम विलय तक वो आपको बांधे रखते हैं. उनके उदार गायन में ग्वालियर घराने के बोल-तानों की चित्रमय उपस्थिति, आगरा घराने की लयबद्ध भव्यता, जयपुर घराने की कंठ की पूर्ण मुक्ति में गढ़ी गई कलाकारी और अंतत: किराना घराने की मौलिकता एक साथ है.

वो कई घरानों को धारण करते हैं. उनके तराशे हुए स्वरों में हिन्दुस्तानी गायकी का श्रेष्ठ मिश्रण है, जो किसी और कंठ में दुर्लभ है. दरअसल जोशी जी एक विलक्षण गायक थे जो अपने सुरों की प्रभा से शास्त्रीय संगीत की सैद्धांतिक सीमाओं के पार उतर जाते हैं और हर वर्ग के श्रोता को एक उदात्त भावभूमि पर ले जाकर छोड़ देते हैं.

उनकी ईश्वरीय आवाज पीड़ा और परमानंद के भिन्न धरातलों की परतें खोल देती है और समान सरलता के साथ खोलती है. वो जिस उत्साह के साथ ‘तोड़ी’ और ‘कल्याण’ जैसे बड़े राग को विविधता में पेश करते हैं, उसी उत्साह से उनके छोटे रूप, राग ‘भूप’ और ‘अभोगी’ का निर्वहन करते हैं.

इन दोनों भिन्न स्थितियों में श्रोता उनके गायन की गहराई और शक्ति का अनुभव कर सकता है जो भीतर अपनी परतें जमाती चली जाती है. कहां गायन को उठाने के लिए क्या त्याग देना जरूरी है, ये उन्हें अच्छी तरह से पता था. इसीलिए वो कई बार निष्ठुर होकर बोल-तानों में माधुर्य से मुंह मोड़़ लेते हैं.

आश्चर्य होता है कि वो किस तरह प्रकारांतर से अपने स्वरों को चमकीले और कोमल रंग प्रदान करते हैं और ऐसा करते हुए उनके कंठ को कोई कष्ट भी नहीं होता है. सूक्ष्म तानों को पकड़ना और क्षण भर में अपने गायन के सौन्दर्यशाली वैभव से परिचय करा देना उनकी महानता है.

उनके आलाप, बढ़त और बंदिश समानुपातित और नियंत्रित हैं. ख्याल गायन में जहां उनका रेंज समुद्र की तरह विशाल है वहीं भावगीत, ठुमरी, भजन और अभंग में वो सरलता से सुवासित हैं.

उनके कई भजनों और मराठी अभंगों में राम या सीताराम का उच्चारण मात्र विह्वल कर जाता है. ऐसा लगता है साक्षात विट्ठल ही उनके स्वरों में गा रहे हैं. देव विट्ठळ तीर्थ विट्ठल.. आता कोठे धावे मन तुझे चरण देखी लिया.. मन राम रंगी रंगले…सुमति सीताराम…काया ही पंढरी आत्मा हा विट्ठल.. चतुर्भुज झूलत श्याम हिंडोले..राजस सुकुमार मदनाचा पुतला जैसे अनेक भजनों को सुनते हुए ये अनुभव किया जा सकता है.

जोशीजी शुद्धतावादी गायक थे लेकिन उन्होंने खुद को किसी सीमा में नहीं बांधा. उन्होंने सिनेमा के लिए गाया, पार्श्वगायकों के साथ गाया. जब लता और मन्ना डे जैसे गायकों ने उनके साथ गाने में हिचकिचाहट जताई तो उनका उत्साहवर्धन भी किया. बसंत बहार फिल्म में मन्ना डे उनके साथ गाने के लिए तैयार नहीं थे. गाना था, केतकी गुलाब जूही चंपक वन फूले. तब जोशीजी ने मन्ना दा का उत्साह बढ़ाया.

एक बार औरंगाबाद में गाने गए थे पंडित जी. वहां एक लड़की उनका गाना सुनने आती थी. वहां दोनों की मुलाकात हुई. फिर प्रेम हुआ और फिर शादी. जी हां, उस दौर में भीमसेन जोशी ने प्रेम विवाह किया था.

इसी तरह भजन गाने की बात आई तो लता मंगेशकर उनके साथ गाने से हिचक रही थीं लेकिन भीमसेन जोशी के कहने पर उन्होंने साथ में गाया. इस एल्बम के कई भजन यादगार हैं. राम का गुणगान करिए और सुमति सीताराम तो बहुत लोकप्रिय और भावप्रवण हैं.

जोशी जी कहा करते थे कि गायन हमेशा श्रोता के लिए करो, उनको ध्यान में रखकर करो, जबकि कुमार गंधर्व जैसे गायक मानते थे कि गायन स्वांत:सुखाय होना चाहिए.

जब हम जोशीजी के गाने में उतरते हैं तो साफ पता चलता है कि वो क्यों श्रोताओं के लिए गाने की बात करते थे. उन्होंने अपने संगीत को इतना तराश लिया था कि वहां श्रोता और गायक में कोई भेद ही नहीं रह गया. दोनों एक हो गए थे. दरअसल संगीत में यह एक तानसेनी ऊंचाई पा लेने जैसी उपलब्धि है, जहां श्रोता और गायक का एकात्म हो जाता है.

जीवन में उन्हें गायन के अलावा दो और चीजें प्रिय थीं. एक अपनी फियट कार और दूसरी मदिरा. मदिरा तो एक समय उन पर मोहिनी की तरह हावी होती जा रही थी और उनका अनन्य प्रेम, उनकी महान कला कुम्हलाने लगी. कई बार शराब के नशे में वो स्टेज पर अपने सुरों से भटके लेकिन उनके जीवन में संगीत का मोहपाश सबसे प्रबल था.

मदिरा की आदत छूटनी ही थी सो छूटी और सुरों ने जैसे अगला-पिछला सब हिसाब एक साथ कर लिया. इस कोहरे को चीरने के बाद उनकी कला उमड़ आई. उन्होंने अपने जीवन का श्रेष्ठ गायन किया.

पंडित भीमसेन जोशी उस कड़ी के अंतिम मूर्धन्य गायक थे, जिनसे भारतीय शास्त्रीय संगीत का आकाश दीप्तिमान है. वो उन चंद गायकों में से एक थे जो उत्तर और दक्षिण में समादृत रहे. बीसवीं सदी के महान गायकों में अब्दुल करीम खान, सवाई गंधर्व, गंगूबाई हंगल, फैयाज खान, बड़े गुलाम अली खान, खान साहब अमीर खां, डीवी पलुस्कर, केसरबाई केरकर, मोगुबाई कुर्डीकर, हीराबाई बड़ौदेकर विनायक राव पटवर्धन, नारायण राव व्यास, कुमार गंधर्व, पंडित ओंकारनाथ ठाकुर, मल्लिकार्जुन मंसूर जैसे बड़े नाम हैं. इस श्रृंखला को जोशी जी ने अपने स्वरों से समृद्ध किया है. उनकी परंपरा के गायक गायिकाओं में अब किशोरी अमोणकर ही बची हैं. नए गायकों में कुछ बड़े प्रतिभाशाली जरूर हैं जिन्होंने अपनी अलग लीक बनाई है लेकिन गायन में भीमसेनी ऊंचाई को छूने वाला फिलहाल कोई नहीं दिखता.

आजादी के सिपाही और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के नेता बैरिस्टर नाथ पई पंडित जी के गायन के मुरीद थे. वे राजीव गांधी और संजय गांधी को लेकर पंडित जी का गाना सुनने आते थे. उनसे कहते थे, सुनो गाना सुनना चाहिए. उससे राजनीति का मैला साफ हो जाता है. इसलिए असली नेता बनने के लिए गाना सुनना जरूरी है.

लेखक और समालोचक विश्वनाथ त्रिपाठी कहते हैं कि पंडित जी को सुनते हुए निराला की ‘बादल राग’ कविता को पढ़ने का अनुभव होता है. मेघ और वर्षा का जैसा भव्य शब्द संयोजन और ध्वनि सौंदर्य इस कविता में है कुछ वैसा ही भाव उनके सुरों से आता है. निश्चय ही भीमसेन जोशी उस ‘बादल राग’ के गायक हैं जो निदाघ में लंबी प्रतीक्षा के बाद गाढ़ा नीला रंग लिये पूरे आकाश पर उमड़ आता है. उनके आलाप में उसी मेघमय आसमान का सौन्दर्य है और जब वो बरसता है तो सबकुछ सराबोर हो जाता है. जोशी जी का गायन अनन्य, आत्मीय, आदरणीय और देश-काल से परे है.

‘बादल राग’ में निराला लिखते हैं:

झूम-झूम मृदु गरज-गरज घन घोर।
राग अमर! अम्बर में भर निज रोर!

झर झर झर निर्झर-गिरि-सर में,
घर, मरु, तरु-मर्मर, सागर में,
सरित-तड़ित-गति-चकित पवन में,
मन में, विजन-गहन-कानन में,
आनन-आनन में, रव घोर-कठोर-
राग अमर! अम्बर में भर निज रोर!

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