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'ब्लैक' में रानी मुखर्जी का किरदार देख, बोल, सुन नहीं सकने वाली हेलेन से इंस्पायर्ड था

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हेलेन केलर याद हैं? स्कूल में ज़रूर पढ़ाया जाता था उनके बारे में. आज (27 जून) केलर का बर्थडे है. संजय लीला भंसाली की फिल्म ब्लैक, जिसमें अमिताभ बच्चन और रानी मुखर्जी थे. फिल्म की कहानी हेलेन केलर से इंस्पायर्ड थी.

हेलेन केलर की कहानी कितनी दुख भरी थी. लेकिन हमारे ज़ेहन में कभी भी उसकी याद दुख भरी नहीं होती. केलर के बारे में बातचीत की शुरुआत ऐसे होती है कि वो बोल नहीं पाती थीं. सुन नहीं पाती थीं और देख भी नहीं पाती थीं. लेकिन इस एक लाइन में ही उनकी सारी असमर्थता सिमट जाती है. क्योंकि इसके जवाब में उनकी उपलब्धियां ढेरों थीं. और उनके बारे में आगे की पूरी बातचीत खुशनुमा हो जाती है.

केलर ने किताबें लिखीं. आर्टिकल्स लिखे. पॉलिटिकल स्टैंड लिया. घुड़सवारी की. तैरना सीखा और भी क्या-क्या नहीं किया. ये सब जानते वक़्त ये ध्यान रखना कि ये सब करने वाली लड़की देख, सुन और बोल नहीं सकती थी, बड़ा मुश्किल होता है.

केलर जब 19 महीने की थीं, तो एक बीमारी ने उनकी ये तीनों शक्तियां ख़तम कर दी. जिस उम्र में बच्चे आसपास की हर चीज़ को देख कर समझते हैं. बोलते हैं. सवाल करते हैं. उस उम्र में केलर अनजान अंधेरे और सन्नाटे से जूझ रही थीं.

वो चीजों को छू कर महसूस तो कर सकती थीं. लेकिन न तो देख कर उनके निश्चित फॉर्म जान सकती थीं. और न ही उनके बारे में बात करके कुछ समझ सकती थीं. केलर को इस झल्लाहट से बाहर उनकी पहली टीचर ऐन सुलिवान निकाल सकीं. उन्होंने केलर को ‘वाटर’ ‘डॉल’ और ‘मग’ जैसे शब्द सिखाए. इसके लिए उन्होंने ये चीज़ें उन्हें छूने को दी और फिर समझाया. इसी तरह केलर के सीखने का सिलसिला शुरू हो गया. जो कभी ख़तम नहीं हुआ. आगे जा के वो पहली ऐसी ग्रेजुएट बनी जो सुन और बोल नहीं सकती थीं.

केलर की जिंदादिल शख्सियत हमेशा एक मिसाल रहेगी. जहां एक तरफ लोग एग्जाम में फेल होने, शादी टूटने और नौकरी छूटने जैसी चीज़ों के सामने आने पर ही उम्मीद छोड़ देते हैं. और दूसरी तरफ केलर को पता रहता था कि अगली सुबह भी वो देख नहीं पाएंगी. सुन नहीं पाएंगी और बोल नहीं पाएंगी. तब भी हर दिन वो नई एनर्जी और उम्मीद से भरी रहती थीं.

ख़ुद की ज़िंदगी में कभी रोशनी का मतलब ही न जान सकने वाली हेलेन केलर मेरे दिमाग में हमेशा सुबह की पहली धूप और शाम की ठंडी हवा की तरह ही आती हैं. अपनी बायोग्राफी, ‘द स्टोरी ऑफ़ माय लाइफ’ में केलर अपने बचपन के बहुत सारे किस्से सुनाती हैं. ये किस्से किसी भी आम बच्चे की बचपन की कहानियों की तरह ही हैं. केलर कभी तितली के पीछे भागती हैं, कभी पेड़ पर चढ़कर खेलती हैं, कभी बिल्ली और चूहों का पीछा करती हैं.

लेकिन इन किस्सों को ख़ास बनाता है उनका नजरिया. किसी का भी आम इंसान से अलग होना, उसके नैरेटिव को एक ऐसी जगह जाने की छूट दे देता है जो आम लोगों को नहीं मिल पाती. हेलेन केलर हर चीज़, हर किस्से को ऐसे बयां करती हैं जैसे उसमें देखने, सुनने या बोलने की ज़रूरत या गुंजाइश ही न हो. ये एक आम इंसान के लिए संभव नहीं है. लेकिन ऐसा नहीं है कि इसे पढ़कर आपके दिमाग में दूसरी किताबों की तरह दिमागी चित्र नहीं बनते जाएंगे. और यही ख़ास बात है कि वो चीज़ें जो बिना देखे या सुने लिखी गईं हैं. आपको दिखाई भी देंगी और सुनाई भी देंगी. किस्से एक अलग तरीके से दिमाग में चित्र बनाते जाएंगे. और यही वो पॉइंट होगा जहां पढ़ने वाला भी वहां जा सकेगा जहां जाने की आज़ादी लिखने वाली हेलेन को ही मिली थी.

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लेकिन केलर को आम लोगों की पहुंच से दूर वाली इस जगह पर घूमने की आज़ादी बड़ी कीमत पर मिली थी. उनका एक आर्टिकल है ‘थ्री डेज टू सी’, जिसमें वो बताती हैं कि अगर तीन दिनों के लिए वो देख पातीं, तो क्या क्या देखतीं. ये एक खूबसूरत आर्टिकल है, जिसमें वो देख सकने वाले लोगों के ‘न देखने’ की बात करती हैं. और यही सोच उन्हें यहां तक ले जाती है कि अगर मैं देख पाती तो क्या-क्या देखती. बचपन में इसे पढ़ा तो इसे सहजता से ले पाना बड़ा मुश्किल था.

आखिर ‘क्या क्या देखना है’ ये कोई पहले से कैसे तय कर सकता है! दो पन्ने के छोटे से आर्टिकल के ख़तम होने पर लगा कि पहली बार हमने ‘देखने’ को देखा. हेलेन केलर पेड़ की पत्तियों की लाइन, कंटीली झाड़ियां, ओस की नयी बूंद, सब कुछ को रुककर, फुर्सत से महसूस करने और छूकर याद कर लेने के लिए कहती हैं. क्या पता कब आप आखिरी बार ऐसा कर रहे हों. और पढ़ते वक़्त आपको ये सब ‘दिखाई’ देगा, महसूस होगा, फुर्सत से.

केलर सच ही कहती हैं, अंधेरे में रहना रौशनी की अहमियत सिखा देता है. और तीखा सन्नाटा ही शोर की खुशी का अंदाज़ा दिला सकता है. और इसीलिए बरसों बाद भी एक न देख-सुन पाने वाली लड़की हमें ‘देखना’ और ‘सुनना’ सिखाती है, और सिखाती रहेगी.


(ये स्टोरी पारुल ने लिखी है.)


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