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वो लेखक जिसके आगे फिल्म इंडस्ट्री के दिग्गज हाथ जोड़े खड़े रहते थे

90 और उससे पहले के दशकों की अपनी प्रायोरिटीज़ थीं. अपना संविधान था. मां-बाप द्वारा बच्चों पर लगाई जाने वाली पाबंदियों की लिस्ट में अलग तरह की चीज़ें हुआ करती थीं. आज अभिभावक किशोरों को मोबाइल से दूर रखने की नाकाम कोशिश करते रहते हैं. पॉर्न की सहज उपलब्धता से सहमे रहते हैं. उन्हें ये जानकर हैरानी होगी कि किसी ज़माने में उपन्यास पढ़ना इसी श्रेणी का ‘ऐब’ हुआ करता था. किसी बच्चे का उपन्यास के साथ पकड़ा जाना, हाहाकारी घटना हुआ करती थी. तबीयत से तुड़ाई होती. ऐसे में किशोर मन और भी ललचाता. उन्हीं दिनों की बात है.

14 की उम्र, पढ़ने का चस्का और एक उपन्यास

ख़ाकसार को पढ़ने का चस्का छुटपन से ही लग गया था. कॉमिक्स की पतली काया जब पढ़ने की भूख को शांत करने में नाकाम रहने लगी तो सहजता से उपलब्ध दूसरे ऑप्शन्स पर नज़र गई. लोकप्रिय साहित्य के कितने ही उपन्यास उन दिनों पढ़ने-पढ़ाने वालों के घर में बिख़रे रहते थे. ऐसे ही एक दिन हाथ लगा, ओमप्रकाश शर्मा का उपन्यास ‘ख़ून की दस बूंदें’. लगभग 300 पन्नों का उपन्यास एक बैठक में ख़त्म कर डाला गया. और यूं समझो लहू मुंह लग गया. लगा, ये तो मस्त दुनिया है यार! और ज़्यादा पढ़ने का कीड़ा कुलबुलाने लगा. उपन्यास हासिल करने की कोशिशें तेज़ हुईं. इन कोशिशों को कामयाबी भी मिली. एक दिन एक और किताब हाथ लगी. हाथ क्या लगी, मोहल्ले के स्कॉलर समझे जाने वाले भैया की चिरौरी कर के ली गई. किताब का नाम था ‘लरज़ते आंसू’ और लेखक के नाम की जगह लिखा था गुलशन नंदा.

16 नवंबर को गुलशन नंदा की बरसी होती है. इस मौके पर पढ़ें उनके लेखन से जुड़ी कुछ खास बातें.

कहानी अब याद नहीं. कुछ याद है तो बस इतना कि सफ़ेद अनारकली ड्रेस में एक बेहद ख़ूबसूरत दोशीजा कवर पेज पर थी. बैकड्रॉप में ताजमहल था और लड़की की आंखों से आंसू ढलक रहे थे. गुलशन नंदा से हुआ वो एनकाउंटर, आगे काफी बरस तक चलता रहा. फिर प्रेमकथाओं से ऊब हुई और रहस्य-रोमांच की जादुई गिरफ्त में जकड़े हम, सुरेंद्र मोहन पाठक पर सेटल हुए हमेशा के लिए.

हिंदी उपन्यास लेखन से कमाई के मामले में गुलशन नंदा एवरेस्ट हैं.
हिंदी उपन्यास लेखन से कमाई के मामले में गुलशन नंदा एवरेस्ट हैं.

लिख-लिख के लखपति हुआ लेखक

सुरेंद्र मोहन पाठक के एक उपन्यास के लेखकीय में एक किस्सा पढ़ा था. कोई साहब लेखन के पेशे में थे. किसी महफ़िल में उनसे पूछा गया,

“साहब, काम क्या करते हैं?”

उन्होंने सगर्व जवाब दिया, “जी, लेखक हूं. लिखता हूं.”

आगे से बाउंसर आया, “वो तो ठीक है, लेकिन काम… काम क्या करते हैं?”

लिहाज़ा इस मुल्क में घास खोदना काम है, सिग्नल पर कारों के शीशे पर पटका मारना काम है, लेकिन लेखन कोई काम नहीं है. ऐसी मानसिकता वाले मुल्क में सिर्फ और सिर्फ लेखन करके बेशुमार पैसा कमाना यकीनन बड़ी उपलब्धि थी. गुलशन नंदा वो पहले हिंदी लेखक हुए, जिनकी किताबों की रॉयल्टी लाखों में आती थी. वो भी उस दौर में जब ‘लाख’ बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी. 60 और 70 के दशक में. लुगदी साहित्य में लेखन से उम्दा ज़ात-औकात बनाने का कारनामा, गुलशन नंदा के बाद सिर्फ सुरेंद्र मोहन पाठक ही कर पाए हैं.

ये उनका शुरूआती उपन्यास है.
ये उनका शुरुआती उपन्यास है.

ऐसा लिखते क्या थे गुलशन नंदा?

गुलशन नंदा के ज़्यादातर उपन्यासों में प्रेम, विरह, धोखा, मजबूरियां और इनसे उपजी बेशुमार भावुकता छाई रहती थी. पारिवारिक रिश्ते, अमीरी-गरीबी का मायाजाल, न्याय-अन्याय की जंग इनके इर्द-गिर्द ही कथानक रहता था. शायराना ढंग से लिखे गए लंबे-लंबे संवाद इन उपन्यासों की विशेषता हुआ करती थी. संवादों में जो इमोशनल टच होता था, वो तमाम संवेदनशील आत्माओं को रुलाने का माद्दा रखता था. न जाने कितने ही पाठकों के आंसू गुलशन नंदा के उपन्यासों के पन्नों में गर्क हो गए होंगे. उनकी अति-भावुक कलम से लोगों का लगाव अद्भुत था. यूं ही नहीं उन्होंने लोकप्रियता की बुलंदियों को छुआ. उन्होंने लेखन से वो रास्ता बनाया, जो फ़िल्मी दुनिया में शिरकत की वजह बना. जहां उन्होंने कामयाबी के और भी झंडे गाड़े.

फिल्म राइटिंग में तो उन्होंने उपन्यास लेखन से ज़्यादा सफलता पाई.
फिल्म राइटिंग में तो उन्होंने उपन्यास लेखन से ज़्यादा सफलता पाई.

दिल्ली की गलियों से मायानगरी तक

कहते हैं वो दिल्ली के बल्लीमारान में एक चश्मे की दुकान पर काम करते थे. किसी की सलाह पर लेखन की तरफ मुड़े. एन.डी. सहगल नामक प्रकाशक ने पहली बार उनको छपने का मौक़ा दिया. कहते हैं उस समय उन्हें एक किताब के 100 या 200 रुपए मिला करते थे. फिर रफ़्ता-रफ़्ता उनकी कामयाबी बोलने लगी और रकम बढ़ने लगी. एक वक़्त ऐसा आया कि वो जो भी रकम मांगते, उन्हें मिल जाती. प्रकाशक हाथ जोड़े खड़े रहते उनके द्वारे.

उन्हें साइन करने के लिए होड़ मची रहती थी.
उन्हें साइन करने के लिए होड़ मची रहती थी.

हिंदी साहित्य से उपेक्षा की टीस

हिंदी साहित्य जगत की एक बड़ी दिक्कत ये है कि किसी चीज़ के लोकप्रिय होते ही वो उससे यूं किनारा करने लगता है, जैसे उसे छूत की बीमारी हो. श्रेष्ठतावाद का मारा हमारा हिंदी साहित्य गुलशन नंदा की घनघोर उपेक्षा करता रहा. इस बात का उन्हें हमेशा मलाल रहा. इस बारे में वो कहा भी करते थे. इसका एक रोचक किस्सा भी है. हिंदी की अग्रणी प्रकाशन संस्था हिंद पॉकेट बुक्स ने एक तरह से गुलशन नंदा का बॉयकॉट कर रखा था. उनकी किताबें छापने को लेकर अघोषित इनकार सा था. लेकिन चढ़ते सूरज की रोशनी से कब तक मुंह छिपाया जा सकता है. हिंद को अपनी ग़लती का एहसास हुआ और उन्होंने गुलशन नंदा को छापने का इरादा किया. इस बार सिक्का गुलशन नंदा का चल रहा था. उन्होंने मुंहमांगी रकम लेकर किताब दी. किताब का नाम था ‘झील के उस पार’.

‘झील के उस पार’ का करिश्मा

हिंदी प्रकाशन के इतिहास में ‘झील के उस पार’ अद्भुत घटना थी. इस किताब का ‘न भूतो न भविष्यति’ प्रचार हुआ. भारतभर के अखबारों, पत्रिकाओं के साथ-साथ रेडियो, बिल बोर्ड्स का इस्तेमाल हुआ इसके प्रमोशन में. चौक-चौराहों पर, बस, रेलवे स्टैंड्स पर बड़े-बड़े पोस्टर चिपकाए गए. इस बात पर ख़ास ज़ोर दिया गया कि पहली बार किसी हिंदी किताब का पहला एडिशन ही पांच लाख का है.

किताब छपी भी और बंपर बिकी भी. ऐसी धुआंधार कि जिसकी मिसाल मिलना नामुमकिन है. लाखों प्रतियां बिकीं. हिंदी उपन्यासों में लाखों का ऐसा आंकड़ा सिर्फ दो ही अन्य किताबें छू पाईं. वेदप्रकाश शर्मा की ‘वर्दी वाला गुंडा‘ और सुरेंद्र मोहन पाठक की ‘पैंसठ लाख की डकैती’. दोनों की क्रमशः 15 और 25 लाख प्रतियां बिकी हैं.

इस उपन्यास का इंग्लिश ट्रांसलेशन भी आया.
इस उपन्यास का इंग्लिश ट्रांसलेशन भी आया.

‘झील के उस पार’ किताब के साथ ही इसी नाम से एक फिल्म भी आई, जिसमें धर्मेंद्र और मुमताज थे.

किताब और फिल्म लगभग एक ही समय में आई.
किताब और फिल्म लगभग एक ही समय में आई.

वो जो उन्होंने रचा

उपन्यासों में ‘नीलकंठ’, ‘लरज़ते आंसू’, ‘कलंकिनी’, ‘जलती चट्टान’, ‘घाट का पत्थर’, ‘गेलॉर्ड’ आदि उनकी प्रमुख कृतियां रहीं. फिल्मों में उनकी कलम ने और धमाल मचाया. कितनी ही हिट फिल्मों के क्रेडिट में बतौर कहानीकार उनका नाम दर्ज है. ‘काजल’(1965), सावन की घटा’ (1966), ‘पत्थर के सनम’ (1967), ‘नील कमल’ (1968), ‘खिलौना’ (1970), ‘कटी पतंग’ (1970), ‘शर्मीली’ (1970), ‘नया ज़माना’ (1971), ‘दाग़’ (1973), ‘झील के उस पार’ (1973), ‘जुगनू’ (1973), ‘जोशीला’ (1973), ‘अजनबी’ (1974), ‘भंवर’ (1976), ‘महबूबा’ (1976) वग़ैरह-वग़ैरह. इनमें से ज़्यादातर फ़िल्में बंपर हिट रहीं. एक समय तो ऐसा भी रहा कि पहले फिल्म आती और उसके बाद उसकी कहानी किताब रूप में पब्लिश होती. ऐसी उल्टी गंगा बहने के बावजूद उन किताबों को पसंद किया जाता.

यशराज बैनर ने भी गुलशन नंदा को आज़माया.
यशराज बैनर ने भी गुलशन नंदा को आज़माया.

1987 में रिलीज़ हुई राजेश खन्ना, श्री देवी की फिल्म ‘नज़राना’ उनकी आख़िरी फिल्म थी, जो उनकी मौत के बाद रिलीज़ हुई और हिट रही. वो सलीम-जावेद की जोड़ी से काफी पहले स्टार राइटर का दर्जा पा चुके थे. एक दौर तो ऐसा आया था कि फिल्म को हिट कराने के दो अचूक टोटके बताए जाते थे. या तो राजेश खन्ना को हीरो ले लो, या गुलशन नंदा से कहानी लिखवा लो. दोनों साथ हो तो सोने पे सुहागा. ‘दाग’ इसका शानदार उदाहरण है.

ये किवदंती तो बहुत मशहूर है कि उनके इंतज़ार में प्रकाशक मंडली हाथ में अटैचियां लिए खड़ी रहती थीं. वो जिसकी भी अटैची थाम लेते, उसकी लाइफ बन जाती. एक और दिलचस्प बात उनके बारे में मशहूर है. कहते हैं कि हिंदी उपन्यास जगत का ये सूरज अपनी रचनाएं उर्दू में लिखता था. जिसे बाद में उनके बहनोई बृजेंद्र सान्याल हिंदी में ट्रांसलेट करते थे.

एक समय था जब गुलशन नंदा का नाम हर पढ़ने-पढ़ाने वाला जानता था. फिर चाहे वो लोकप्रिय साहित्य का रसिया हो या गंभीर साहित्य को चाहने वाला पाठक. अब तो ये हाल है कि 20 लोगों से भरे कमरे में अगर ये नाम उछाल दो तो 19 लोग पलट कर पूछेंगे, ‘कौन गुलशन नंदा’?
बाक़ी सब ठीक है.


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