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देश के प्रधानमंत्री चुनाव हार गए हैं!

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2015 में भाजपा के पुराने नेता लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी एक बात में संकेत दिया था कि इमरजेंसी जैसा माहौल बन रहा है. तुरंत देश में हल्ला हो गया. लोग भाजपा की सरकार पर इमरजेंसी का माहौल बनाने का आरोप लगाने लगे. सरकार भी सकते में आ गई. तुरंत कहा गया कि आप लोग वो दौर याद करिए, याद आएगा तो नहीं कहेंगे हमको.

1977 में दिल्ली में एक जनसभा हो रही थी. जनता पार्टी के नेता आकर स्पीच देते थे. पर सब थके हुए से लगते थे. जेल से निकले थे, कमजोर लग रहे थे. फिर भी जनता हिल नहीं रही थी. ठंड थी. बारिश भी हल्की-हल्की होने लगी थी. पर लोग जमे बैठे थे. एक नेता ने बगल वाले से पूछा कि लोग जा क्यों नहीं रहे. बोरिंग स्पीच हो रही है और ठंड भी है. तो जवाब मिला कि अभी अटल बिहारी वाजपेयी का भाषण होना है. इसीलिए लोग रुके हुए हैं.

अटलजी आये. शुरू किया –

बाद मुद्दत के मिले हैं दीवाने, कहने-सुनने को बहुत हैं अफसाने, 
खुली हवा में जरा सांस तो ले लें, कब तक रहेगी आजादी कौन जाने.

इमरजेंसी खत्म हुई थी और चुनाव होने वाले थे. ये वही दौर था.

25 जून, 1975 से लेकर 21 मार्च, 1977 तक भारत में इमरजेंसी लगी रही. इसी दौरान 23 जनवरी, 1977 को इंदिरा गांधी ने अचानक से ऐलान कर दिया कि देश में चुनाव होंगे. 16 से 19 मार्च तक चुनाव हुए. 20 मार्च से काउंटिंग शुरू हुई और 22 मार्च तक लगभग सारे रिजल्ट आ गए.

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चुनाव के बाद टाइम्स ऑफ इंडिया ने ये खबर लगाई थी

ये पहला मौका था कि कांग्रेस भारत में बुरी तरह हारी थी. मात्र 153 सीटें मिली थीं कांग्रेस के गठबंधन को. विपक्ष इस चुनाव में एक हो गया था. जनता पार्टी कहा गया इस गठबंधन को. पर ये लोग लड़े भारतीय लोक दल के सिंबल पर. इनको 295 सीटें मिली थीं. मोरारजी देसाई इस गठबंधन के नेता थे. सूरत से जीते थे. इंदिरा गांधी रायबरेली से खुद से एक छोटे नेता राजनारायण के हाथों हारीं. संजय गांधी भी हार गए.

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ये सीन था जब जनता पार्टी की सरकार में इंदिरा गांधी को गिरफ्तार किया जा रहा था (फोटो: रघु रॉय)

चुनाव से पहले विपक्ष को ज्यादा वक्त नहीं मिला था प्रचार करने के लिए. पर सारे लामबंद थे. जनता में भी इंदिरा गांधी को लेकर बहुत क्रोध था. इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक इंटेलिजेंस के अफसरों ने चुनाव से पहले ही इंदिरा को बता दिया था कि कांग्रेस चुनाव हार रही है. तो लोगों को लगने लगा था कि कहीं फिर से इमरजेंसी ना लगा दी जाए. पर ऐसा नहीं हुआ.

क्या अलग हुआ था इस चुनाव में?

जनता पार्टी के गठबंधन में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया, शिरोमणि अकाली दल, पेजैंट्स एंड वर्कर्स पार्टी ऑफ इंडिया, रिवॉल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी, ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक, रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया, डीएमके पार्टियां थीं. सबने भारतीय लोकदल के चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ा.

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चुनाव प्रचार के दौरान संजय गांधी (फोटो: रघु रॉय)

कांग्रेस के गठबंधन में एआईडीएमके, सीपीआई, जम्मू एंड कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग, केरल कांग्रेस, रिवॉल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी शामिल थे. दोनों ही गठबंधन को दो-दो निर्दलियों का समर्थन प्राप्त था.

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चुनाव प्रचार करतीं इंदिरा गांधी (फोटो: रघु रॉय)

अभी देश में भाजपा की लहर है. कांग्रेस के नेता पार्टी छोड़कर भाजपा जॉइन कर रहे हैं. एस एम कृष्णा जैसे सीनियर नेता भी भाजपा में आ रहे हैं. बूढ़े नेता एन डी तिवारी का भी बहुत मन था आने का. ठीक यही स्थिति 1977 में हुई थी. कांग्रेस के कई नेता जनता पार्टी के साथ आ गए थे. इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गांधी के साथ रहे जगजीवन राम ने कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी नाम से पार्टी बना ली और जनता पार्टी के साथ आ गए. हेमवती नंदन बहुगुणा और नंदिनी सत्पथी भी जनता पार्टी के साथ आ गए. संयोग की बात हेमवती के बेटे विजय बहुगुणा कांग्रेस छोड़कर पिछले साल भाजपा में आ गए और उत्तराखंड में भाजपा की सरकार में शामिल हैं. वहीं यूपी में हेमवती की बेटी रीता बहुगुणा भी कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आ गईं और भाजपा की सरकार में शामिल हैं.

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पटना में रैली करते जेपी, इसी के बाद उनको गिरफ्तार किया गया था

तो 1977 के चुनाव में देश का सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश इंदिरा गांधी के खिलाफ था. 2014 में भी यही हुआ था. लोकसभा के जो निर्वाचन क्षेत्र 1977 में थे वो 2004 तक रहे. 2004 में कांग्रेस की सरकार बनी जो 2014 तक रही. पर यूपी के हाथ से निकलने के बाद कांग्रेस एकदम ध्वस्त हो गई. 1977 से शुरू हुआ 2014 में भी कायम रहा.

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उन दिनों के अटल बिहारी वाजपेयी

1977 में इमरजेंसी के दौरान नेताओं पर हुए अत्याचार, नसबंदी और जनता में डर बड़े मुद्दे रहे थे. वहीं इंदिरा गांधी के समर्थक कहते थे कि हमने पॉपुलेशन कंट्रोल किया, ट्रेनें टाइम पर चलीं, गरीबी के लिए बहुत काम किया. पर ये सब काम नहीं आया. 1971 में रायबरेली से इंदिरा गांधी ने राजनारायण को हराया था. उस वक्त इंदिरा गांधी की पहचान कड़े नेता की थी. इन्होंने बैंकों के राष्ट्रीयकरण और बांग्लादेश की लड़ाई के बाद अपनी इमेज बहुत तगड़ी बना ली थी. पर उसी चुनाव के बाद राजनारायण ने इन पर चुनाव के दौरान धांधली का आरोप लगाया था. ये मामला कोर्ट में गया. जस्टिस जगमोहन सिन्हा ने इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध करार दे दिया. यहीं से शुरू हुआ इमरजेंसी का दौर. इंदिरा गांधी डेमोक्रेसी को भूल गईं और उन्होंने बहुत ही अप्रत्याशित कदम उठा लिए.

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प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई चुनाव के बाद

1977 के चुनाव में कई बड़े लोग हारे थे. नॉर्थ इंडिया में तो कांग्रेस के लगभग सारे बड़े नेता हार गए थे. वहीं साउथ इंडिया में कांग्रेस को इतनी बुरी हार नहीं झेलनी पड़ी. वहां पर जनता पार्टी के भी कुछ कैंडिडेट हार गए थे. अटल बिहारी वाजपेयी नई दिल्ली से जीते थे. वहीं इलाहाबाद से जनता पार्टी के जनेश्वर मिश्रा ने कांग्रेस के विश्वनाथ प्रताप सिंह को हराया था. मिर्जापुर से फकीर अली जीते थे. इस सीट से राजनाथ सिंह भी लड़े थे. 7 हजार वोट के साथ चौथे नंबर पर रहे थे. बलिया से चंद्रशेखर जीते थे, जो बाद में भारत के प्रधानमंत्री बने.

लखनऊ से हेमवती नंदन बहुगुणा जीते जहां से उनकी बेटी अभी विधायक हैं. मुरली मनोहर जोशी अल्मोड़ा से जीते थे. मद्रास साउथ से भविष्य के राष्ट्रपति आर वेंकटरमण ने मुरासोली मारन को हराया था. बॉम्बे नॉर्थ वेस्ट से वकील रामजेठमलानी जीते थे. हालांकि उस वक्त वो इमरजेंसी की वजह से कनाडा में रहते थे. भोपाल से कांग्रेस के नेता और भविष्य के राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा हार गए थे. छपरा से लालू प्रसाद यादव जीते थे. कर्नाटक के कनारा से जनता पार्टी के बड़े नेता रामकृष्ण हेगड़े हार गए थे. अहमदाबाद से कांग्रेस के एहसान जाफरी जीते जिनको 2002 के दंगों में जलाकर मार दिया गया था. पेडापल्ली से जनता पार्टी के बंगारू लक्ष्मण हार गए. बाद में ये भाजपा के अध्यक्ष बने थे और घूस कांड में फंसे थे.

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जनता पार्टी के नेता शपथ लेते हुए

इस चुनाव के हीरो ये थे:

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जॉर्ज फर्नांडीज

जयप्रकाश नारायण
1974 में बिहार में इन्होंने टोटल रिवॉल्यूशन का नारा दिया था. और इस चीज को वो पूरे देश तक ले गए. इनको विपक्ष ने धुरी बनाया और इनके इर्द-गिर्द सारी पार्टियां इकट्ठा हुईं.

राज नारायण
1971 में इंदिरा गांधी से चुनाव हारे. पर हारने के बाद इंदिरा गांधी के खिलाफ इन्होंने मोर्चा खोला. ये कह सकते हैं कि ये इमरजेंसी और उसके बाद कांग्रेस की हार की जड़ में थे.

जॉर्ज फर्नांडीज
1974 में इन्होंने रेलवे स्ट्राइक की. इसके बाद वो अंडरग्राउंड हो गए. 1976 में ये पकड़े गए थे. हथकड़ियों में लिपटे जॉर्ज की फोटो इंदिरा के अत्याचार की तस्वीर बन गई थी.

नानाजी देशमुख
जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में नानाजी ने पटना में विरोध प्रदर्शन किया था. पुलिस लाठीचार्ज में जेपी को बचाते हुए इनको बहुत मार पड़ी थी.

मोरारजी देसाई
12 मार्च 1975 से ये आमरण अनशन पर गए थे. इन्होंने गुजरात में इंदिरा के खिलाफ माहौल बनाया था. इमरजेंसी के दौरान ये जेल भी गए थे. चुनाव जीतने के बाद ये प्रधानमंत्री बने.

जस्टिस जगमोहन सिन्हा
इन्होंने ही इंदिरा गांधी की लोकसभा सदस्यता रद्द की थी.

शांतिभूषण
प्रशांत भूषण के पिताजी. इंदिरा गांधी के खिलाफ राजनारायण का केस इन्होंने ही लड़ा था.

इस चुनाव के विलेन ये थे:

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चुनाव बाद इंदिरा गांधी और संजय गांधी (फोटो: रघु रॉय)

इंदिरा गांधी
इनके खिलाफ बहुत गुस्सा था. जज इग्नोर किए जाने से नाराज थे. नेता जेल जाने से नाराज थे. कर्मचारी कड़ाई होने से नाराज थे. जनता नसबंदी होने से नाराज थी. मीडिया मुंह बंद होने से नाराज थी. बुद्धिजीवी संविधान में संशोधन होने से नाराज थे. व्यापारी हर बात में पुलिस के पहुंच जाने से नाराज थे.

संजय गांधी
5 पॉइंट प्रोग्राम लेकर आए थे. देश को बदलने. इनके हिसाब से हर चीज की जानकारी इनको ही थी. कोई एक्सपर्ट, कहीं कुछ नहीं था इनके सामने. इनका आलम ये था कि इमरजेंसी के दौरान इंदिरा के साथ रहे लोग भी इनसे नाराज थे.

सिद्धार्थ शंकर रे
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रह चुके इस नेता के दिमाग की ही उपज थी इमरजेंसी. यही थे जिन्होंने इंदिरा को सलाह दी थी.

वी सी शुक्ला
ये सूचना मंत्री थे. मीडिया पर प्रतिबंध इन्होंने ही लगाया था. फिल्मों पर भी लगाया. किशोर कुमार के गानों पर भी लगाया था क्योंकि किशोर ने इनकी बात मानने से इंकार कर दिया था.

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चुनाव के बाद की आइकॉनिक तस्वीर जिसे रघु रॉय ने खींची थी, इंदिरा के पोस्टर बहारे जा रहे हैं

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