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वो तीन मौके, जब रॉ एजेंट्स की ऐय्याशी वतन को बहुत महंगी पड़ी

दिल्ली के हाई प्रोफाइल हनी ट्रैप का मामला रोज नए खुलासे लेकर आ रहा है. अब इस कहानी में कई किरदार नए आ गए हैं. इस मामले में पकड़ी गई महिला से पूछताछ में सामने आया है कि इस गिरोह में एक और महिला सक्रिय थी. ये लोग मुजफ्फरनगर के एक अपराधी से भी संपर्क में थे. महिला 5 साल पहले दिल्ली आई थी, राजस्थान पब्लिक सर्विस कमीशन की तैयारी करने के लिए, बाद में इसने upsc का एग्जाम भी दिया, लेकिन सफल नहीं हो सकी, दिल्ली पुलिस को इसकी पढ़ाई पर भी शक है. महिला के मुताबिक उसने BA, MA इंग्लिश, MA पॉलिटिकल साइंस, LLB और LLM किया है, लेकिन जब पुलिस ने महिला से अंग्रेजी के कुछ शब्द लिखने को कहा तो वो लिख नहीं पाई.

गुजरात सांसद के मामले में महिला अपनी अलग कहानी सुना रही है. महिला ने दावा किया है कि वो सांसद के बुलावे पर उनसे मिलने गई थी. महिला का ये भी कहना है कि वो कुछ दिन पहले एयरपोर्ट पर सांसद को लेने गई थी और उसी दिन सांसद ने नार्थ एवेन्यू के घर पर रेप किया था और गाजियाबाद में भी रेप किया था. जांच में पता चला है कि महिला हर समय खुफिया कैमरे लेकर चलती थी और उसने घर में सीसीटीवी कैमरे लगाए हुए थे. पुलिस ने महिला की निशानदेही पर कुछ CD और ऑडियो क्लिप भी बरामद की है.

ये हनी ट्रैप का पहला मामला नहीं है. भारत ही नहीं, दुनिया भर में राजनीतिक और खुफिया जानकारियों के लिए हनी ट्रैप का इस्तेमाल होता रहा है. रूस की खुफिया एजेंसी KGB तो इस हथियार के इस्तेमाल के लिए बदनाम रही है. तकरीबन हर एजेंसी ने इस हथकंडे को आजमाया है. हम आपको बताने जा रहे हैं हनी ट्रैप के तीन किस्से. दो भारतीय और एक परदेस का.

1. उसकी ऐय्याशी वतन को बहुत महंगी पड़ी

बात 2010 की है. केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी. रक्षा सौदों से जुड़ी हुई एक खबर आती है और लोगों के जेहन में बोफोर्स घोटाला पसर जाता है. रक्षा मंत्री एके एंटनी बैकफुट पर आ जाते हैं. हमारा नौसेना का एक अधिकारी कुख्यात रशियन हनी ट्रैप में फंस चुका था. नाम था कोमोडोर सुखजिंदर सिंह.

20 जनवरी, 2004 को एक साल लंबी सौदेबाजी के बाद भारत और रशिया के बीच एक विमानवाहक पोत का सौदा तय हुआ था. पोत का नाम था एडमिरल गोर्शकोव. सोवियत दौर का यह जंगी जहाज 1987 में रशियन नौसेना का हिस्सा बना था. 1991 में रशियन नौसेना ने अपने प्यारे एडमिरल को शुक्राना पेश करते हुए इसका नाम उनके नाम पर रख दिया. रूसी नौसेना को मजबूती से खड़ा करने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने का श्रेय एडमिरल गोर्शकोव के खाते में जाता है. लेकिन इसी साल सोवियत रशिया टूट गया. नई सरकार ने इस जंगी बेड़े को चलाने से इनकार कर दिया. कहा गया कि बहुत खर्चा-खाऊ है. इस तरह 1996 में बड़े बेआबरू हो कर यह जहाज किनारे लगा. भारत ने इसे खरीद लिया. इसे नया नाम मिला INS विक्रमादित्य.

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तो हज़रात, यह डील सील हुई थी 800 मिलियन डॉलर में. रुपए में नापें तो 51 अरब 33 करोड़. इसमें मरम्मत भी शामिल है. 2005 में भारत ने अपना एक टेक्निकल स्टाफ रूस भेजा. मरम्मत के काम को देखने के लिए. सुखजिंदर उस समय कैप्टन हुआ करते थे. वो इस भारतीय दल को हेड कर रहे थे. इसी समय वो एक रूसी महिला के संपर्क में आए और उसके जाल में फंस गए. यही वो दौर था जब मरम्मत की कीमतें बढ़ती जा रही थीं. 800 मिलियन से तीन गुणा बढ़कर कीमत पहुंच गई 2.3 बिलियन डॉलर. इस वजह से दोनों देशों के बीच कूटनीतिक स्तर पर काफी नोकझोंक हुई. CAG ने इस सौदे पर सवाल खड़े करते हुए कहा,

“INS विक्रमादित्य जो कि एक सेकंड हैंड विमानवाहक पोत है और वो हमें नए पोत से 60 फीसदी ज्यादा महंगा पड़ रहा है.”

उस समय चीफ ऑफ नेवल स्टाफ एडमिरल सुरेश मेहता ने अनोखे तरीके से इस डील का बचाव किया था. मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा था,

“मैं कैग के बारे में कोई कमेंट नहीं कर सकता. लेकिन एक रक्षा विश्लेषक के तौर पर मैं आपसे पूछता हूं कि क्या आप मेरे लिए 2 बिलियन से कम में कोई विमानवाहक पोत लाकर दे सकते हैं? अगर दे सकते हैं, तो मैं तुरंत आपके नाम से चेक काटने को तैयार हूं.”

मार्च 2010 में जाकर कीमत बढ़ने का असली राज सामने आया. नेवल हेडक्वॉर्टर पर एक सीडी आती है. इसमें सुखजिंदर और एक रूसी महिला की आपत्तिजनक हालात में फोटो थीं. इसके बाद जांच बैठी. सुखजिंदर इस मामले में दोषी पाए गए. उन्हें 2011 में सेवा से बर्खास्त कर दिया गया.

 

INS विक्रमादित्य
INS विक्रमादित्य

ये हमारे लिए नई बात हो सकती है, लेकिन रूस की खुफिया एजेंसी के पास ऐसे कई सारे शिकारों की कहानियां है. सुखजिंदर का मामला सामने आने से साल भर पहले ही ब्रिटिश डिप्लोमेट जेम्स हडसन इनका शिकार बन गए थे. दो रूसी लड़कियों ने हडसन की आपत्तिजनक तस्वीरें इंटरनेट पर डाल दी थीं. इसका टाइटल था “दी एडवेंचर ऑफ़ मिस्टर हडसन इन रशिया.” ये तो सरासर बेइज्जत करना हुआ. इससे कुछ महीनों पहले अमेरिकी डिप्लोमेट केल हेचर भी इनके जाल में फंस गए थे. 1967 में तो इन्होंने टेलीग्राफ के मॉस्को संवाददाता जेरेमी वुल्फेंडन के लिए समलैंगिक हनी ट्रेप का इस्तेमाल किया था.

2. वो जाल में फंसा नहीं, जा कर कूद गया

ये 1981 का साल था. भारतीय पुलिस सेवा का 1962 बैच का एक अधिकारी उस समय रॉ में नया-नया आया ही था. उसकी पोस्टिंग हुई बाजू के देश श्रीलंका में. कोलम्बो में रहने के दौरान उसकी मुलाकात अमेरिकी दूतावास के एक शख्स से होती है. दोनों में अच्छी दोस्ती कायम हो जाती है. दोनों साथ-साथ औरतों के पास जाते और पैसे देकर संबंध बनाते. उन्नीकृष्णन को उस समय कोई अंदाजा ही नहीं था कि वो किस तरह जाल में फंसते जा रहे हैं.

एक अच्छे खुफिया हैंडलर की तरह उन्नी के उस दोस्त ने सही समय का इंतजार किया. 1985 में उनकी नियुक्ति दिल्ली में होती है. इसके बाद रॉ उन्हें उस दौर के सबसे महत्वपूर्ण मिशन की कमान सौंपता है. तमिल हथियारबंद आंदोलन और श्रीलंका में भारत की शांति सेना के ऑपरेशन. इसके लिए वो मद्रास नियुक्त किए जाते हैं. इस समय उनके पास बॉम्बे से एक फोन आता है. एक लड़की जो कि खुद को पेन अमेरिकन एयरवेज की एयरहोस्टेस बताती है. लड़की उन्नी को बताती है कि उसे ये नंबर उनके पुराने अमेरिकी दोस्त ने ये कह कर दिया था कि अगर वो भारत में अकेला महसूस करे, तो इस नंबर पर फोन कर ले.

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राजीव गांधी की हत्या पर बनी फिल्म में मद्रास कैफे में बाला का रोल उन्नी पर ही आधारित है.

 

उन्नी लड़की की बातों में फंस गए. वो मद्रास से फ्लाइट पकड़ के बॉम्बे गए. यहां पर दोनों के बीच जिस्मानी संबंध बन गए. इसके बाद लड़की ने उन्हें सिंगापुर की मुफ्त टिकट दी. इस टिकट पर दोनों छुट्टियां बिताने के लिए सिंगापुर गए. यहां पर उन्नी के अंतरंग पल कैमरे पर कैद कर लिए गए. उन्नी पूरी तरह जाल में फंस चुके थे.

अपनी पोस्टिंग के दौरान उन्होंने अमेरिकी इंटेलिजेंस एजेंसी सीआईए को बहुत सी खुफिया जानकारी उपलब्ध करवाई. इसमें तमिल चीतों की ट्रेनिंग, हथियार मुहैय्या करवाने से लेकर भारत की शांति सेना के ऑपरेशन के संवेदनशील दस्तावेज शामिल थे. इसके अलावा उन्होंने श्रीलंका सरकार के साथ भारत की शांतिवार्ता के लिए तय होने वाले रुझानों के संबंध में भी सूचनाएं लीक कीं. उन्नी की इस धोखाधड़ी को भारत के श्रीलंका मिशन की नाकामयाबी की बड़ी वजह माना जाता है. उस समय रॉ के इतिहास में उन्नी पहले अफसर थे, जो हनी ट्रैप में फंस कर अपनी एजेंसी के लिए इतने नुकसानदेह साबित हुए थे.

राजीव गांधी की हत्या पर बनी फिल्म में मद्रास कैफे में बाला का रोल उन्नी पर ही आधारित है. हालांकि फिल्म में यह दिखाया गया है कि बाला खुद को गोली मार लेता है. सच्चाई इससे थोड़ी अलग है. 1986 में उन्नी की सच्चाई खुफिया एजेंसियों के सामने आती हैं. 1987 में उनको गिरफ्तार कर लिया जाता है. बिना मुकदमे के उन्हें लंबे समय तक तिहाड़ में रखा गया. फिलहाल वो चेन्नई में लो-प्रोफाइल जिंदगी जी रहे हैं.

3. जब रॉ अंधों सा बर्ताव करने लगी 

बात अक्टूबर 2007 की है. रॉ का जॉइंट सेक्रेट्री स्तर के अधिकारी को कोलम्बो से भारत भेजा जा रहा था. यह कोई ऑफिशियल दौरा नहीं था. उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गई थीं. अफसर का नाम था रवि नायर और वजह थी हनी ट्रैप. लेकिन ये कहानी आपको बताएगी कि कैसे भारत की सबसे चौकन्नी एजेंसी कई बार अपने एजेंट्स के मामले में अंधों सा बर्ताव करने लगती है.

1975 बैच के नायर के लच्छन शुरुआती दौर में ही ठीक नहीं थे. अपनी शुरुआती पोस्टिंग में उन्हें रॉ के चेन्नई स्टेशन भेजा गया. वहां मैसूर की रहने वाली कोई मिसेज राव नाम की महिला अपने वीकेंड्स रवि के बंगले पर गुजारती थीं. उस समय के रॉ चीफ पीके होर्मिस थराकान ने सेकंड इन कमांड अशोक चतुर्वेदी को इस मामले में जांच करने के आदेश दिए. कोई कार्रवाई करने की बजाए उन्हें कोलम्बो जैसी संवेदनशील जगह भेज दिया गया.

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90 के दशक का आखिरी दौर था. उस समय रॉ के चीफ एके वर्मा हुआ करते थे. रवि नायर एक बार फिर से संदेह के घेरे में आ गए थे. उस समय उन पर फंड में सेंधमारी के आरोप लगे थे. वर्मा ने अपनी फ़ाइल में नायर के बारे में दर्ज किया कि ये एजेंट संदेह के दायरे में है और इसका लाई डिटेक्टर टेस्ट करवाया जाना चाहिए. लेकिन रवि फिर से कार्रवाई से बच गए. उन्हें नई पोस्टिंग पर हॉन्ग कॉन्ग भेज दिया गया.

ये 2003 और 2004 के दरम्यान की बात है. एक दिन हॉन्ग कॉन्ग से रॉ के दिल्ली दफ्तर फोन आया. लाइन पर नायर की पत्नी थीं. उन्होंने जानकारी दी कि यहां पर रवि किसी चीनी महिला के चक्कर में पड़ चुके हैं. उस समय रॉ के चीफ हुआ करते थे सीडी सहाय. नायर को तुरंत भारत बुला लिया गया. सहाय के कार्यकाल के दौरान उन्हें विदेश की पोस्टिंग से दूर ही रखा गया.

2005 में सहाय के रिटायरमेंट के बाद रवि नायर को फिर से विदेश में पोस्टिंग मिल गई. जगह वही पुरानी थी, कोलम्बो. रवि ने बांकेलाल वाला रुख अख्तियार कर लिया था. “हम नहीं सुधरेंगे. तेरी फूं की फूं.” उसी चाइनीज महिला के साथ वो यहां फिर से एंगेज हो गए. अंत में पता चला कि वो महिला चीन की खुफिया एजेंसी की एजेंट थी. आप खुद अंदाजा लगाइए कि जॉइंट सेकेट्री स्तर का अधिकारी किसी भी दुश्मन एजेंसी के लिए सूचनाओं की कितनी बड़ी खान साबित हो सकता है.

आम नागरिकों के मन में रॉ को लेकर एक भरोसा है. एक आम धारण है कि रॉ का अनुशासन बहुत ही कड़ा होगा. लेकिन रवि नायर की कहानी दूसरी ही तस्वीर सामने रखती है. वैसे रॉ के खाते में गद्दारों की लंबी लिस्ट है. सिकंदर लाल मालिक, अशोक साठे, एनवाई भास्कर, बीआर बच्चर, माधुरी गुप्ता, आरएस सोनी जैसे कई नाम हैं, जिन्होंने किसी ना किसी लालच में आ कर अपनी वफादारी बदल ली.


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