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जिसने 'आज मेरे यार की शादी है' का म्यूज़िक दिया, जमाना उसे चुटकी में भूल गया

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ये स्टोरी वेबसाइट डेली ओ के लिए अजय मनकोटिया ने लिखी थी. हम इसे वेबसाइट की इजाज़त से ट्रांसलेट कर आपको पढ़वा रहे हैं.


अगर आप किसी भी अधेड़ उम्र के संगीतप्रेमी से 60 के दशक के 7 मशहूर संगीतकारों के नाम पूछेंगे तो उनमें से शायद ही कोई ‘रवि’ का नाम लेगा, पर ऐसा क्यों है ये एक अबूझ पहेली है. और मैं इस बारे में इतना हैरान इसलिए हूं क्योंकि जब मैं 90 के दशक में उनसे मिला तो उन्होंने मुझे बड़े गर्व के साथ बताया कि कोई भी भारतीय शादी उनके दो गानों के बिना पूरी नहीं होती. वो गाने हैं ‘बाबुल की दुआएं लेती जा'(नीलकमल) और ‘आज मेरे यार की शादी है’ (आदमी सड़क का). उनका ये कहना काफी हद तक सही भी है.

इसी कड़ी में ‘मेरा यार बना है दूल्हा’ (चौदहवीं का चांद) और ‘डोली चढ़ के दुल्हन ससुराल चली'(डोली) जैसे गाने भी आते हैं. साथ ही ‘ऐ मेरी ज़ोहरा ज़बीं’ (वक़्त) जैसा गाना भी आता है जिसके बिना शायद ही कोई मेंहदी या संगीत जैसे कार्यक्रम पूरे होते हों. अगर वैवाहिक संगीत परिदृश्य में बैंड वाले रवि के गाने ना बजाएं तो ये उनकी रोजी-रोटी पर असर डालने वाली बात हो सकती है.

60 के दशक में सड़कों, लोकल ट्रेनों में भीख मांगने वालों की अगर बात करें तो दो गाने जो हमें इनके मुंह से सबसे ज्यादा सुनने को मिलते हैं, वो हैं ‘अम्मा एक रोटी दे’ (समाज को बदल दो) और ‘गरीबों की सुनो’ (दस लाख) और ये दोनों ही गाने रवि के खजाने से निकले हैं. अगर बात लोरियों की हो तो दो लोरियां जो सबसे ज्यादा गाईं और सुनी जाती हैं  वो हैं ‘चंदा मामा दूर के’ (वचन) और ‘टिम-टिम करते तारे’ (चिराग कहां रौशनी कहां), इन दोनों लोरियों के रचयिता भी रवि ही हैं.

जो व्यक्ति अधेड़ हो चले हैं, जिनका बचपन रवि के गाने सुनकर गुजरा है, और उनकी स्मृति में भी रवि शेष ना रहें तो दुख होता है. और ये इस बात को भी पुख्ता करती है कि 112 फिल्मों में बेजोड़ और यादगार संगीत देने के बावजूद रवि कमतर ही आंके गए. शायद उनको वो सम्मान या स्थान नहीं मिला जो जिसके वो असल हकदार थे.

अगर हम उनके 20 साल लम्बे करियर की कृतियों पर नज़र डालें तो शायद ही वो संगीत जॉनर हमें मिले जिसमें रवि ने हिट गाना नहीं दिया होगा, वो चाहे रोमांटिक हो (चौदहवीं का चांद), जोशीला हो (बार-बार देखो), नटखट हो (कैट कैट माने बिल्ली), सम्मोहक हो (शीशे से पी), प्रोत्साहक हो (सब कुछ लुटा कर होश), ह्रदय विदारक हो (चलो एक बार फिर से) या फिर भक्ति हो (बड़ी देर भई नंदलाला). वे वास्तव में बेजोड़ थे. ‘घराना’ और ‘खानदान’ के लिए दो फिल्मफेयर अवार्ड उन्हें इस बात को साबित करने की मान्यता भी देते हैं. मो. रफ़ी हमेशा उनके आभारी रहे, क्योंकि रवि के बनाये गाने ‘चौदहवीं का चांद हो’ (चौदहवीं का चांद) 1960 के लिए ही उन्हें सर्वश्रेष्ठ गायक का पहला फिल्मफेयर अवार्ड मिला था.

नीले
नीले गगन के तले गाने का एक सीन

रवि के बनाये गाने ‘तुम्हीं मेरे मंदिर’ के लिए ही लता को 1965 में सर्वश्रेष्ठ गायिका का फिल्मफेयर अवार्ड दिया गया था. महेंद्र कपूर को भी यही पुरस्कार रवि के ही गाने ‘चलो एक बार’ के लिए 1964 और ‘नीले गगन के तले’ के लिए 1968 में मिला. ‘दिल के अरमां’ (निकाह) के लिए सलमा आगा को भी इस पुरस्कार से सम्मानित किया गया. बेशक ये एक बड़ी उपलब्धि थी.

80 और 90 के दशक में रवि मलयालम फिल्मों में भी बॉम्बे रवि के नाम से काम करने लगे और सफल हुए. 1994 में उन्हें मलयालम फिल्म ‘परिन्नायम और सुकृथं’ के लिए बेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला. इसके अलावा उन्हें ‘सरगम’ (1992) और ‘परिनायम’ (1994) के लिए 2 बार मलयालम फिल्मफेयर अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया.

रवि (रवि शंकर शर्मा) का जन्म 1936 में हुआ था. 24 साल की उम्र में वो गायक बनने के लिए मुंबई आ गए. उन्होंने एस.डी बर्मन के ‘नौजवान’ और हेमंत कुमार के ‘आनंदमठ’ में कोरस गाया. कुछ सालों तक हेमंत कुमार के असिस्टेंट रहने के बाद, वो खुद को एक अलग संगीतकार के रूप में स्थापित करने लगे. उनकी पहली फिल्म देवेन्द्र गोएल की ‘वचन’ (1955) थी. गोएल और रवि ने कई सफल फिल्मों में साथ काम किया. बी.आर. चोपड़ा के साथ भी उन्होंने बहुत फिल्मों में काम किया. रवि ने साउथ के भी कई बड़े फिल्मकारों के साथ भी काम किया. उनमें एस एस वासन, ए वी मेयप्पन, वासु मेनन और शिवाजी गणेशन खास हैं.

रवि को ज्यादा लाइम लाइट में रहने का शौक नहीं था. उनका ऑर्केस्ट्रा भी काफी अलग तरह का होता था. उनके संगीत ने कभी भी गायकों को अभिभूत नहीं किया. वो गायकों को पूरा स्पेस देते थे ताकि वो अपनी कला का क्षमतानुसार प्रदर्शन कर पाएं. उनके गानों के बीच में डाले गए धुन कभी भी बाधक नहीं लगते. जैसे ‘ज़ोहरा ज़बीं’ गाने में तेज़ ढोलक और तालियां गाने को ख़राब नहीं करती बल्कि उसको और कर्णप्रिय बनाती हैं. गानों को मूड के हिसाब से ढालने में उनको जैसे महारत हासिल थी.

रफ़ी और रवि ने साथ में बॉलीवुड को ढेरों हिट गाने दिए हैं. साथ मिलकर उन्होंने 79 फिल्मों में 235 गाने दिए हैं. कुछ बेहद यादगार संगीत रवि ने बॉलीवुड को दिए हैं जैसे चौदहवीं का चांद हो (चौदहवीं का चांद), मुझे प्यार की ज़िन्दगी देने वाले (प्यार का सागर), बार बार देखो (चाइना टाउन), ना झटको जुल्फ से पानी (शहनाई), छू लेने दो नाज़ुक होठों को, ये जुल्फ अगर खुल के (दोनों काजल), तुझको पुकारे मेरा प्यार (नीलकमल), ये वादियां ये फिज़ाएं (आज और कल ), ज़िन्दगी के सफ़र में (नर्तकी), लिस्ट काफी लम्बी है.

आज मेरे
आज मेरे यार की शादी है गाने का एक सीन

आशा भोसले रवि की मेन फीमेल लीड सिंगर थी. उन्होंने तक़रीबन 385 गाने साथ में किए हैं. गाने तो ढेरों हैं, लेकिन कुछ ख़ास गानों का जिक्र हम यहां कर रहे हैं जैसे हे रोम रोम में बसने वाले (नीलकमल), शीशे से पी (फूल और पत्थर), आज ये मेरी ज़िन्दगी (ये रास्ते हैं प्यार के), मुझे गले से लगा लो (आज और कल), उलझन सुलझे ना (धुंध), तोरा मन दर्पण कहलाये (काजल), आगे भी जाने ना तू (वक़्त), जब चली ठंडी हवा (दो बदन), ज़िन्दगी इत्तेफाक है (आदमी और इन्सान).

लता ने रवि के साथ हालांकि कम ही काम किया है लेकिन जो भी किया है वो बेहद मधुर और कर्णप्रिय है, उनके कुछ गाने जैसे वो दिल कहां से लाऊं(भरोसा), ऐ मेरे दिल ए नादान तू ग़म से ना घबराना (टावर हाउस), लागे न मोरा जिया (घूंघट), गैरों पे करम (आंखें) जैसे गाने बेहद सुपरहिट हुए थे.

साहिर लुधियानवी और रवि की जोड़ी ने बी. आर चोपड़ा की फिल्मों में बेहद उम्दा संगीत दिए हैं. महेंद्र कपूर रवि के मेन लीड सिंगर थे और रवि को पता था कि उनसे उनका बेस्ट कैसे निकलवाना है. उनके गाने जो आज भी इतने ताज़े और मधुर लगते हैं जैसे चलो एक बार, आप आये, इन हवाओं में, आ भी जा (सभी गुमराह फिल्म के), नीले गगन के तले, किसी पत्थर की मूरत, ना मुंह छुपा के जियो (हमराज़), इस बात के सबूत हैं कि इनकी जोड़ी श्रोताओं को किस कदर पसंद थी.

मैं रवि की मृत्यु के कुछ साल पहले ही उनसे मिला, उनकी तबीयत खराब होने के बावजूद मानसिक रूप से अब भी वो काफी सक्रिय थे. हमने पूरे दिन उनकी ज़िन्दगी और संगीत के बारे में बात किया. उन्होंने मुझे ये भी बताया कि ये वही कमरा है जिसमें ‘बाबुल की दुआएं लेती जा’ गाने को बनाते वक़्त मो. रफ़ी रो पड़े थे. रवि ने रफ़ी के साले, सेक्रेटरी और मैनेजर ज़हीर बारी से इस बारे में पूछा. तो उन्होंने बताया कि हाल ही में रफ़ी साहब की बेटी की शादी हुई है शायद इसी वजह से वो भावनात्मक हो गए हों. और वही इमोशन गाने में भी आया.

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चौदहवीं का चांद हो गाने का एक सीन

उन्होंने ‘ये ज़ुल्फ़ अगर खुल के’ गाने से जुड़ा एक किस्सा भी बताया. उन्होंने बताया कि उस गाने में ‘अच्छा’ शब्द कई बार इस्तेमाल हुआ था लेकिन समस्या ये थी हर बार उसे अलग तरीके से कैसे गाया जाए. फिर रफ़ी साहब ने कहा कि उन्हें एक मौका दीजिये, और इसके बाद उन्होंने बड़ी ही खूबसूरत तरीके से उस गाने को निभाया. मैं खुद को बेहद भाग्यशाली मानता हूं कि रवि साहब ने मेरे लिए अपने कुछ बेहतरीन गीत गाये. फिर उन्होंने मुझे उस गाने का टेप भी सुनाया जो उन्होंने रफ़ी साहब को समर्पित करते हुए खुद ही बनाया और गाया था.

मैंने रवि से उनके ‘भजन दर्शन दो घनश्याम'(नारसी भगत), जो हेमंत कुमार ने गाया था, से जुड़े विवादों के बारे में भी बात की जिसे उनकी अनुमति के बगैर ‘स्लमडॉग मिलेनियर’ फिल्म में इस्तेमाल किया गया था. और उससे भी बड़ी और बुरी बात ये है कि फिल्म में दिखाए गए दृश्य में इस गाने के लेखक का नाम सूरदास दिखाया गया, जो गलत है. उस गाने को गोपाल सिंह नेपाली ने लिखा है. इस बारे में रवि का कहना था की मैंने उस फिल्म के निर्माताओं के खिलाफ अदालती कार्रवाई की लेकिन फिर वो बात कोर्ट के बाहर ही हमने आपस में मिलकर सुलझा ली. उन्होंने हमें ये भी बताया कि फिल्म ‘नारसी भगत’ के मेकरों ने उन्हें 40 के दशक का भजन ‘राग केदार’ सुनने को कहा लेकिन उन्हें शास्त्रीय संगीत की कोई जानकारी नहीं थी लेकिन बाद में वो भजन फिल्म के संगीत में काफी मददगार रहा. रवि की सादगी और नम्रता वो दो चीज़ें है जो फिल्म इंडस्ट्री में बेहद कम देखने को मिलती हैं.

मुझे रवि की उनके बेटे के साथ चल रही निजी समस्याओं की जानकारी थी. और वो चीज़ें उनके चेहरे और झुके कंधों से भी साफ़ नज़र आ रहीं थी. जब मैं वहां से निकला तो मुझे रवि के ही फिल्म ‘भरोसा’ का एक गाना याद आ रहा था ‘इस भरी दुनिया में कोई भी हमारा ना हुआ’.

कैसे रवि को आज भी देश के दूर-दराज़ इलाकों में भी याद किया जाता है इसका उदाहरण मैं आपको देता हूं. मैं असम से करीब 3 घंटे की दूरी पर बसे डिब्रूगढ़ में रुका हुआ था जहां के यूरिया प्लांट के प्रोडक्शन हेड ने रात्रिभोज पर मुझे आमंत्रित किया था. जब मैं वहां खाना खाने गया तो वहां के लोगों ने मुझसे ‘दो बदन’ फिल्म से रफ़ी साहब का गाना गाने की गुजारिश की, जबकि उस इलाके में किसी को हिंदी समझ तक नहीं आती. मैंने उनको टेस्ट करने के लिए पूछा की कौन सा गाना तो उन्होंने ने कहा कि तीनों में से कोई भी. उन्होंने ‘मुझे भरी दुनिया में’ गाने को कहा फिर हम सब ने मिलकर वो गाना शुरू किया और मैं हैरान था कि उनको उस गाने के एक एक शब्द याद थे. कौन कहता है कि रवि साहब इस दुनिया में नहीं हैं, वो आज भी अपने गीतों के द्वारा हमारे दिलों में जिंदा हैं और हमेशा ही रहेंगे.

रवि की ही फिल्म ‘उस्तादों के उस्ताद'(1963) का एक गाना मुझे अभी याद आ रहा है :

सौ बार जन्म लेंगे, सौ बार फना होंगे
ऐ जाने वफ़ा फिर भी, हम तुम न जुदा होंगे .


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