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बड़े गुलाम अली खां के 'याद पिया की आए' का किस्सा

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रामसिया दुबे तेजी से चले जा रहे थे. बंबा चल रहा था. रात भर पलेवा करके लौट रहे थे. मगर तला के पास रुक गए. दक्खिनी बबूल का टूंग धंसा था. भड़बड़ियों से पहले. वहां शिलाजीत वालों ने डेरा डाल रखा था. अबकी बार दो बरस बाद लौटे थे पछइया लोहार. उन्होने बलब वाले खंभे पर नीचे कील गाड़ रेडियो भी टांग दिया था.
आवाज आई. ये आकाशवाणी का छतरपुर केंद्र है. फिर कुच बगड़म अगड़म. और उसके बाद एक रुआंस पसर गई.
दुबे जी ने पुलिया पर ही पालथी मार ली. आंख मुंदने को थी. तभी डिस्टर्ब कर दिए गए. लंबरदार के लाल चले आ रहे थे. गोलू महाराज. गुच्च कर दिए.
क्या दुबे जी. आज यहीं मजीरा बजने लगा. दुबे जी ने आंख खोली. बोले.
लला. हम का मजीरा बजाएंगे. बजा तो गया विशंभर.
गोलू ठिठक गया. वो का है कि गांव में तो कोई इस नाम का था नहीं. और दुबे जी अकसर इलांव बिलांव में बतियाते रहते थे. फिर उसे दद्दा की बात याद आ गई. ऊ कहते थे. रामसिया दुबे को सिद्धि हो गई है. उनकी कही बातें सरोट के पी जाना चाहिए.
तो गोलू रुक गया. बोला. कक्का. पूरी बात बताओ. तभी गोले तक जाएंगे.
दुबे जी को दर्शक मिल गया. बाजा खुल गया. अब आगे उन्हीं का सीधा प्रसारण.


यही कोई सवा आठ सौ साल हुए होंगे. विशंभर को लौ लग गई थी. हरिनाम की. रात दिन मंजीरा पीटता रहता. गाता तो लगता टिटुहरी ताल मिला रही है. कोई टोकता तो फिक्क से हंस देता. मुंह पंजीरी भर रह गया था. दांत बस पट्टीदार की पुरानी बखरी के गुम्मों से हो गए थे. एक आध इधर उधर. मरने के पहले स्वामी को कौल दे गया. मैं आ रहा हूं. तुम जो डोलची भेजो, तो राग भर देना. सट्टा बट्टा हो जाएगा.
रामजाने, ये किस्सा किसने बनाया. या असल में ही यूं हुआ. विशंभर की पीढ़ी में हरि हुआ. उसने सब राग साध लिए. आज किसी को कहो तो लपकके बोले. फैजल था का. जो बाप दादा सबका बदला लिया.
पर ये कुछ ठहरी हुई बात है. इसलिए लफर लफर की यहां गुंजाइश नहीं.
तो हरि ने हरि को खूब पूजा. पर अकेले नहीं. राधा के संग. डेरा जमाया मथुरा से कुछ दूर. वृंदावन में. जमुना जी के किनारे. बीहड़ जंगल. कालिंदी से भी काला. यहां हरिदास गाता तो लगता, राधा के किरदार को आवाज मिल गई. हजारों बरस मौन साधने के बाद. किसी ने उस रोज इंदराजी की. स्वामी हरिदास गाते हैं. स्वयं राधा किसिन सुनने आते हैं.
रात को एक और राज नसीब हुआ मनुज से.
हरिदास को याद किया जाता है. वो गुड़ हुए जाते हैं. चेला शक्कर सा मिल गया था. तानसेन नाम का. पर क्या बखत खपाना. राधा की आवाज को राह मिल गई थी. राख मलती रही. गले मंजते रहे. रस्ते चलते रहे. जान देओ.

इत्ता कह रामसिया दुबे रुक गए. गोलू अब भी नहीं गया. बस इत्तीयई. विशंभर से उठाई तो यहां पटकी दुबे जी.
पंडित ने फिर आंख टिका दी. बमूरा पर टंगे रेडियो पर. रुंआस अभी जारी थी. दुबे उवाच.

विशंभर के खानदान में ही एक लड़का हुआ. अल्लादिया खां. अब जे न पूछना कि बाभनों में खां साहेब कैसे. वो कहीं और का मुद्दा है. मुद्दा ही है. जचगी तक तो सब वैसे भी जंचा रहता है. खां अजब जिद्दी था. मन की धरता. करता. इसके चलते कई ठौर बदले. अतरौली. जयपुर. आखिर में कोल्हापुर टिका. बाना भी वहीं का धर लिया.
कोल्हापुरी पगड़ी बांधता. पोशाक भी उसी मुताबिक. गले में जनेऊ पहनता. और ठसक के साथ नमाज पढ़ने जाता. पांचों टैम की. सुबह शाम की अदायगी के बाद किले के किनारे बने मंदिर का कोना पकड़ लेता. महादेव की एक सूक्त न पढ़ता, तो जैसे कदम ऐहसानफरामोश हो जाते. लहू न लौटने देते.
एक दिन अल्ला एक महफिल में गए. उमर की ढलान थी. पर अब भी संगत नजर आती तो मील न गिनते. एक नए लड़के का बड़ा हल्ला था. बड़े मियां. डील डौल बैंसवाड़े के पहलवानों सा. आवाज. पूनौ की रात में धेनु के पहले दूध से काढ़ी रबड़ी सी.
किसी ने अल्ला से कहा. ये आपकी अच्छी आमद ठहरी. बड़े दिनों बाद पट्ठा अखाड़े की माटी मल रहा है. उस्ताद ने नजर तिरछी की. चेले ने सिरा पकड़ लिया. बोला. गुरुवर. बड़े खां साहेब की बेगम गुजर गईं कुछ महीने पहले. जी सा न रहा तब से. मियाद बीती, पर तकलीफ नहीं. उनका नाम भी आप ही का ठहरा.
खां साहेब की नजर नम हो गई. और बड़े ने जो गाया तो लगा कि अब रुलाई न रुकेगी. राग जयजयवंती में उसी की बंदिश. उसी के बोल.

याद पिया की आए, ये दुख सहा न जाए

उस रोज अल्ला ने बड़े को अपनी बाड़ी के लिए टेरा दिलवाया. ऐसे जिमाया, जैसे अपना जाया हो. बरोठा छोड़ने से पहले बड़े बोल दिया. उस्ताद. जब से बेगम गईं थीं. चौका भूल गया था. आज घर आया तो साग मिला. अब सुर भी लौट आएगा.
तारीख कभी ईमानदारी में बड़बड़ाने लगे. तो बताएगी. बड़े गुलाम अली खां उस दिन के बाद सुर की डोर पकड़ सितारों तक चला जाता था. नीचे जो सब सुनते थे. उन्हें बस सब सपना लगता था.
और उधर अल्ला थे. अपनी तैयारी करते. सितारा उनका भी इंतजार कर रहा था. बिदाई का वक्त आया. तो औलाद से बोले. सब कर गुजरा. महाराज साहू जी का भी सनेह खूब रहा. तुम सब अपनी जमीन पा गए. पर एक गांठ न खोल पाया. खां साहेब का इत्ता कहते कहते छोटा वाला और करीब सरक आया. भुर्जी कहते थे सब उसे.
बूढ़े की बुदबुदाहट जारी रही.
कोई राधा गान सिखा दे.
किसी को समझ न आया. उस वक्त तक. पर साल भर में ही भुर्जी भांप गया. बेलगाम की एक चेली थी. अब्बा से गंडा बंधवाया था उसने. उसकी मुलगी (बेटी) भानुमती ने कांसे सा दुरुस्त स्वर पाया था. एक दिन कुछ यूं हुआ. कि भुर्जी को दीवानखाने तक जाना पड़ा. बीच क्लास में. लौटे तो देखा. भानुमती आंख मूंद आलाप भर रही थी. कुछ कच्चा पर जबर सच्चा. दो पंक्ति गा रुक गई. नसें अभी पक्की न हुई थीं. मुरकी सधते सधते फंस गई. मगर सुर के पार या कहें कि बाद एक सुर होता है. सन्नाटे से छनता. बहुत गौर करने पर ही सुन पाते हैं. उस्ताद भुर्जी को सुनाई दे गया.
अब्बा का कौल मीलों का सफर कर आ रहा था. कोई राधा गान सिखा दे.
भानुमती पर अमृत बरसा उस घड़ी. गुरु नेह का थान लटपटा गिरा. उन्होंने भानु को खूब सिखाया. बाज दफा कुछ बड़ी हुई तो कन्या ने मुरकी भी साध ली. और तब जब गाती. तो एक साथ अल्लादिया खां और बड़े गुलाम अली खां कब्र में सुकून की करवट बदलते.

बैरी कोयलिया कुहूक सुनाए. मुझ बिरहन का जियरा जलाए.

तो क्या वाकई सिलसिला होता है. सब मन से मीर औ मीरा हैं. क्या पता. वहम करो तो हजार कुंदे हैं टंगने के.

इत्ता कह दुबे जी पूरा चुप हो गए. गोलू को कुछ पल्ले पड़ा. कुछ नहीं. उसने दद्दा को फोन घुमाया. सब हाल बताया. फिर पूछ दिया. तुम तो कह रहे थे दुबे सिद्ध हैं. हमें तो लग रहा कि धतूरा भी पीने लगे भांग संग. बातें ऐसी दिए जा रहे थे, जैसे हजार साल जीकर ही जाएंगे.

दद्दा सुने जा रहे थे और चादर हुए जा रहे थे. उनको भी एक कुंदा मिल गया था.
उस रात जेएनयू के हॉस्टल में दद्दा खूब रोए. गोलू ने नहीं बताया था. पर उन्हें पता था. दुबे जी रेडियो पर क्या सुन रहे थे. यहां टू इन वन पर भी वही बजा फिर.

Shobha gurutu card

उस रात उन्होंने डायरी में लिखा. कान्हा करिया ही रह गए. राधा रौशन बिना

सोने से पहले दद्दा बुदबुदाए. दुबे जू के कान में. गुरु ये तो तुम जाने ही हो कि शोभा जब तक सांस लेती रहीं. राधा पद जरूर गातीं. कभी कजरी. कभी ठुमरी. कभी दादरा. दादा गुरु का कौल जो रखना था. टीपना हम जोड़े दे रहे हैं. परंपरा का बरगदा हरिआया है अब भी. एक शाख धानश्री है.

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