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कहानी अमरू की, जो बेटियों की शादी से हासिल रकम से ज़िंदगी चलाता था

2016 में ‘दी लल्लनटॉप’ ने आपको महेंद्र मोदी के संस्मरणों पर आधारित श्रृंखला ‘रेडियो ज़ुबानी’ की 20 किस्तें पढ़ाई थी. महेंद्र जी की व्यस्तताओं के चलते ये सिलसिला थोड़ा रुक गया था, जिसे अब फिर से चलाया जा रहा है. इस सीरीज में महेंद्र मोदी के लिखे रेडियो से जुड़े किस्से पढ़ने मिलेंगे. साथ ही वो किस्से-कहानियां भी जिनपर आधारित नाटक रेडियो पर प्रसारित हुए. बीकानेर में पैदा हुए महेंद्र मोदी मुंबई में रहते हैं. विविध भारती के अवकाशप्राप्त चैनल हेड हैं. mahendra modi-2

अभी दशक भर पहले तक रेडियो हमारी ज़िंदगी का अहम हिस्सा हुआ करता था. बदलते समय में रेडियो भले ही थोड़ा साइडलाइन हो गया हो लेकिन हमारी यादों में इसकी जगह हमेशा के लिए महफूज़ है. 90 के दशक से पहले पैदा हुए हर शख्स के पास रेडियो को लेकर एक कहानी ज़रूर-ज़रूर होती है. रेडियो के श्रोता रहे लोगों के पास ही जब कहने के लिए बहुत कुछ होता है, तो उस शख्स के संस्मरणों की गठरी कितनी समृद्ध होगी, जिसने ज़िंदगी के 40 साल रेडियो को दिए हो! रेडियो के नॉस्टैल्जिया की सैर कराने के लिए महेंद्र मोदी बिल्कुल फिट शख्स हैं. तो पढ़े जाए रेडियो से जुड़े किस्से महेंद्र मोदी की ज़ुबानी. 

ये 22वीं किस्त है.


पैसा चाहे कितना भी हो अगर उसे सिर्फ खर्च किया जाए, तो एक दिन वो शून्य हो जाता है. ये हम सभी जानते हैं लेकिन कुछ लोग इस सत्य को जानते हुए भी न जाने क्यों समझते नहीं. मैंने भी अपने जीवनकाल ऐसे कई उदाहरण देख लिए. मेरे पिताजी के दो दोस्त कम रिश्तेदार थे, छगन जी और राम जी. दोनों को खूब पुश्तैनी धन मिला. अच्छे मकान, दुकानें, फैक्टरियां, ज़मीन, जायदाद. सब कुछ था दोनों के पास. लेकिन दुकानें या फैक्टरियां अपने आप तो कमाकर देती नहीं. उनपर बैठना पड़ता है, मेहनत करनी पड़ती है. अगर दुकान खोली ही न जाए या उसे सिर्फ नौकरों के भरोसे छोड़ दिया जाए, तो बेचारी दुकान क्या कमाकर देगी और अगर थोड़ी बहुत कमाई होगी भी तो नौकर मिल बांटकर खा जायेंगे.

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राम जी और छगन जी की दुकानों में भी यही होता था. मैंने उन्हें बहुत बेदर्दी से पैसा खर्च करते हुए देखा. हर वक्त नशे में धुत रहते थे और एक के ऊपर दूसरा नशा और दूसरे के ऊपर तीसरा नशा. यानि भांग भी, शराब भी, अफीम भी. और इन सबके बाद मैंड्रेक्स की गोलियां भी. फिर जुआ, सट्टा. यानी हर वो शौक़ जो इंसान को बर्बाद कर देता है. इतनी तेज़ी से ये दोनों बर्बाद हुए कि मेरे देखते देखते इनकी दुकानें, फैक्टरियां, ज़मीन जायदाद सब कुछ बिक गए और अपने अंतिम समय में दोनों ही सड़क पर आ गए.

जब इतने रईस देखते-देखते कंगाल हो गए तो भंवरी की दूसरी शादी से कमाए दस हज़ार रुपये अमरू का कितना साथ देते? हालांकि इस बार उसने पूरे रुपये अपने पास ही रखे थे और जैना के बहुत गालियां देने पर आटा-दाल के पैसे देता था. लेकिन उसे तो रोज दारू भी चाहिए होती थी और गोश्त भी. कठौती (लकड़ी की थाली) में रोटियां और दाल डालकर अमरू को देती तो उसका पारा चढ जाता. गंदी-गंदी गालियां बकता हुआ वो अक्सर कठौती को गुस्से में ठोकर मारकर उठ खडा होता और कहता “फिर साळी ने दाळ बणा कर रख दी. नहीं खाऊंगा मैं दाळ. मुझे गोस चाहिए गोस. हरामजादी इतने सारे रुपए लिए थे सुबह मुझसे और अब ये सड़ी हुई दाळ बणाकर छोड़ दी.”

जैना भी जवाब देने में पीछे नहीं रहती. कहती “पीटणै पड़ियो. हत्तो तत्तो (राजस्थानी गालियां), मरै ई कोनी, कठियां लाऊं थारै वास्तै गोस? जित्ता पेइसिया दिया बियां में तो बळगी दाळ ई कोनी आवै. खावणी हुवै तो खा नईं तो जा मर.”

अमरू का गुस्सा और बढ़ जाता. “मुझे तो गोस ही खाणा है”

जैना भी चंडी बन जाती और दांत पीसते हुए कहती “लै हरामी मनै ई काट’र म्हारो गोस बणा लै.”

और वो ज़ोर-ज़ोर से रोने लगती थी. अमरू वहां से निकल जाता था. सब जानते थे कि अब ये सीधा रेलवे फाटक के पास, काली माई महरी की गोश्त की दुकान जाएगा और वहां चार रोटियां और दो रुपये का गोश्त लेकर भकोस लेगा. काली माई की छोटी सी दुकान जिसमें वो सिर्फ गोश्त और रोटियां रखती थी, और कोई डिश नहीं, कोई तामझाम नहीं. अंदर बैंचे लगी हुई, चाहे वहां बैठकर खालो या पैक करवाकर घर ले जाओ, कोई फर्क नहीं. अमरू जैसे न जाने कितने ऐसे लोगों के लिए सहारा थी ये दुकान जिन्हें घर के खाने से संतुष्टि नहीं मिलती थी. वहां बैठकर खाने वालों में तो ज़्यादातर लोअर या लोअर मिडिल क्लास के लोग ही होते थे. लेकिन पैक करवाने वाले अपर मिडिल क्लास और उससे कुछ ऊपर के लोग भी हुआ करते थे. कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि हर श्रेणी के, हर जाति के हर वर्ग के लोग कालीमाई की इस छोटी सी दुकान के ग्राहक थे. कोई खुलेआम तो कोई चोरी छुपे. तब से अब तक गंगा में जाने कितना पानी बह गया. दो पीढियां गुजर गईं.

अमरू भी कब का चला गया और कालीमाई भी, लेकिन आज भी पूरे बीकानेर के किसी भी कोने में खड़े किसी भी आदमी से पूछ लीजिए, “भाई साहब ये काली माई की दुकान कहां है?” वो आपको उस छोटी सी धुंए से काली हुई दुकान के सामने छोड़ जाएगा, जिसे देखकर आप सोचेंगे, अरे इतनी छोटी, इतनी मामूली सी दुकान में ऐसा क्या है कि पिछले साठ-सत्तर साल में आस पास की कितनी दुकानें खुलकर बंद हो गईं, कितनों के दिवाले निकल गए और कितनों के मालिक बीस-बीस बार बदल गए, लेकिन ये दुकान आज भी अपने उसी रूप में अटल खडी है जिस रूप में साठ सत्तर साल पहले हुआ करती थी. बस फर्क इतना सा है कि पहले दुकान की गद्दी पर काली माई या उनके पति बिराजमान रहते थे, अब गद्दी के ऊपर उनके माला पहने हुए चित्र लग गए हैं और गद्दी पर उनके बेटे-पोते बैठते हैं. तो अमरू जब काली माई की दुकान के लिए निकल जाता तो जैना बड़बड़ाने लगती “गेईवाळ(गिरा हुआ इंसान) अब जा’र दो रिपियां रो गोस खासी, हरामी नै समझ नईं आवै के दो रिपिया में आधा सेर काचो गोस आ जावै, जिकै में घर रा सारा जणाँ खा सकाँ.”

भंवरी को गए काफी अरसा गुजर गया था, अमरू कभी काम पर जाता कभी नहीं. उसके पास रुपये खत्म हो रहे थे और अब वो घर के हर फरद पर बहुत बुरी तरह झल्लाने लगा था. अमरू पूरा जोर लगा रहा था कि दूसरे नंबर की बेटी काळकी के लिए भी कोई ऐसा दूल्हा मिल जाए, जो उसे दस-बीस हज़ार दे दे. लेकिन काळकी ‘यथा नाम तथा गुण’ थी. काली कलूटी, एक दम दुबली-पतली अनाकर्षक. जो भी उसे देखने आता, नापसंद कर मना कर जाता. इधर तीसरे नंबर की बेटी मुनकी भी बड़ी होने लगी थी. वो अमरू की सब औलादों में सबसे सुंदर थी. जैसे-जैसे उम्र बढ़ रही थी उसकी सुंदरता भी बढ़ती जा रही थी.

उसे इसका पूरा अहसास भी था कि वो अपनी सारी बहनों में सबसे सुंदर है. शायद ये अहसास ही था कि उसके चेहरे पर एक तरह का घमंड भी नज़र आने लगा था और आत्मविश्वास भी. अब जब अमरू खाने की कठौती फेंकता या जैना को मारने के लिए दौडता तो मुनकी उसके सामने जा खडी होती. अमरू का हाथ पकड़ लेती और चिल्लाती  “तू म्हारो बाप है या बैरी? अरे म्हारी माँ तो बापड़ी पैली ई मरियोडी पडी है, अबै बीरी जान ई लेसी काँई? लै पैली मनै मार पछै म्हारी माँ नै मारे.” अमरू लाख जोर लगा लेता लेकिन अपना हाथ नहीं छुडा पाता. कहाँ तो दारू, भांग और भी न जाने कौन कौन से नशों से कमज़ोर हुआ उसका बूढा शरीर और कहाँ मुनकी का चढती उम्र का शरीर ? ऐसे में जब उसका कोई बस नहीं चलता तो वो मुनकी और जैना को और भी गंदी गंदी गालियाँ निकालता हुआ वहाँ से भागकर ताजिये की चौकी के पास बैठ जाता था.

काळकी का कहीं सम्बन्ध तय नहीं हो पा रहा था. अब एक और दिक्कत अमरू के सामने आ रही थी. जब भी कोई काळकी को देखने आता तो काळकी को तो नापसंद कर देता और मुनकी के लिए के लिए मोल भाव करने लगता. बस मुनकी का नाम सुनते ही अमरू के आग लग जाती और वो चिल्लाने लगता,

“आ गए साळे काणे खोडे. मेरी मुनकी पर राळ टपकाने. उठो भागो यहाँ से. हीया फूट गया तुम्हारा? अरे मुनकी के पूरे एक लाख रुपये लूंगा एक लाख. है तुम्हारी अंटी में?”

और लड़की देखने आए लोग भाग खड़े होते. एक झोंपडा ही तो था अमरू के पास. उसकी समस्या ये थी कि काळकी को देखने जब लोग आयें तो मुनकी को कहाँ छुपाए ताकि वो लोगों के सामने न पड़े. इसी तरह एक बार कुछ बहावलपुरी मिएँ काळकी को देखने आने वाले थे, तो जैना भागी हुई आई और मेरी माँ से बोली, “काकी जी अबकी काळकी नै देखण आळा आसी, तो थोड़ी देर मुनकी नै थांरे घर राख लेसो कईं? अै बळिया आवै काळकी नै देखण नै अर राळ टपकाण लाग जावै मुनकी वास्तै.”

मेरी मां ने हां भर दी. ये शायद जैना के घर के लोगों का हमारे घर में पहला प्रवेश था. इससे पहले इन लोगों की बस हमारी दहलीज़ तक ही पहुंच थी. बड़ा अजीब ज़माना था वो. संचार माध्यमों की बात करें तो उस ज़माने में सिवाय पत्र और तार के कोई ऐसा साधन नहीं था, जिस के द्वारा समाचार एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाए जा सके. और जानते हैं गाँवों में तो तार यानि टेलिग्राम भी साधारण डाक द्वारा ही पहुंचते थे. छतरगढ़ से समाचार आया था कि अगले जुम्मे काळकी को देखने कुछ लोग आयेंगे. गुरुवार को ही रात में जैना हमारे घर आयी और मेरी माँ से बोली, “काकी जी एक दस रिपिया दे दो काल काळकी ने देखण वास्तै लोग आ रिया है. अर दिन ऊगता ईं मैं मुनकी नै थाँरै कने भेज देसूं, कुण जाणै लोग कद आ जावै.”

अलस्सुबह मैंने देखा घर के दरवाज़े के पास ही मुनकी बैठी थी. चेहरे पर एक अजीब सा दर्प था. उस दिन मेरी माँ की तबियत खराब थी. उनके पेट में दर्द था, इसलिए खाना बनाने की जिम्मेदारी मेरी थी. नहा धोकर मैं किचन में गया. माँ की चारपाई आँगन में बिछा दी. वो वहाँ लेट गईं और मुनकी जो कि दरवाज़े के पास बैठी थी, उसे अपने पास बुला लिया. मुनकी माँ के पैरों के पास ज़मीन पर बैठ गयी और बोली,

“एई ले कँवर साब खाणो बणासी ? आप लोक तो म्हारे हाथ रो खाणो खाओ नईं. वरना मैं अभी नरम-नरम फलका(फुल्के) बणा’र खिला दूं काकी जी.” बात सही थी उसकी. हम लोग इन मोहल्ले वालों का छुआ खाया नहीं करते थे. पहले तो उनके पल्ला भी लग जाए तो घर के बुज़ुर्ग नहला कर छोड़ते थे लेकिन धीरे धीरे स्थितियां बदल रही थीं और लोगों की सोच भी. अब वो माँ से बोली “काकी जी पेट मसळ दूं? धरण सिरक ग्यो हुसी ठीक हूँ जासी.”

माँ ने मुझे कटोरी में थोड़ा तेल देने को कहा. मैंने तेल मुनकी को पकड़ा दिया और वो बड़े सधे हाथों से उनके पेट पर मालिश करने लगी. उस ज़माने में कुछ रोग और कुछ इलाज ऐसे हुआ करते थे, जिनका अब कहीं नामोनिशान भी नहीं है. आज की पीढ़ी ने न तो उन बीमारियों के बारे में सुना होगा औ न ही उन इलाजों के बारे में. ये माना जाता था कि पेट के बीचोबीच एक गोला होता है, जिसे धरण कहा जाता था. अगर वो गोला अपनी जगह से ज़रा भे दायें-बाएं खिसक जाए, तो बहुत शदीद पेट दर्द होने लगता है. ऐसे में कुछ लोग पेट पर मालिश करके उस गोले को अपनी जगह ले आया करते थे और कुछ लोग पेट पर एक दीपक जलाकर उसपर उलटा कटोरा रखते थे. थोड़ी देर बाद झटके से उस कटोरे को हटाने से गोला अपनी जगह आ जाता था.

इसी तरह हर तीसरे-चौथे रोज सुनने में आता था कि आज फलां के गिल्लारी (राजस्थानी में वैसे छिपकली को गिल्लारी कहते हैं) उठ गयी, आज फलां के गिल्लारी उठ गयी. ऐसा माना जाता था कि किसी की भी पीठ में छिपकली के आकार की कोई चीज़ बनती है और वो धीरे-धीरे ऊपर की और खिसकने लगती है. कुछ जानकार लोग मालिश से उसे तोड़ते थे, कुछ दांतों से तोड़ते थे. लोगों का विश्वास था कि अगर उसे समय पर न तोड़ा जाए, तो वो खिसकते खिसकते गले तक आ सकती है और गले तक आने का अर्थ है उस व्यक्ति की मृत्यु.

इसी तरह हर शहर में गली-गली कई लोग एक अजीब तरह की पोशाक पहने झोला लटकाए आवाज़ लगाते थे “सींगी लगवा लो, सींगी लगवा लो.” ये माना जाता था कि जैसे-जैसे बुढ़ापा आता है घुटनों में गंदा खून जमा होने लगता है, जिससे घुटनों में दर्द रहने लगता है. इसी का इलाज हुआ करता था सींगी लगवाना . सींगी दरअसल हिरण का खोखला सींग होता था, जिसका बिलकुल पतला सिरा घुटने में छोटा सा छेद करके उसमे डाला जाता था और इलाज करने वाला मुंह से खून खींच खींच कर बाहर गिराता था. इस क्रिया को कई बार दोहराने के बाद घुटने पर पट्टी बाँध दी जाती थी. माना जाता था कि घुटने का गंदा खून निकल गया है और अब दर्द कम हो जाएगा. कई बार सोचता हूँ कि कितनी अवैज्ञानिक सोच हुआ करती थी उस समय लोगों की. और मैं किसी गाँव की बात नहीं कर रहा हूँ. शहर के अच्छे पढ़े लिखे लोग भी इन बातों पर विश्वास करते थे. मैं धन्यवाद दूंगा अपने पिताजी को जिन्होंने शुरू से हमें यही शिक्षा दी कि जो भी चीज़ विज्ञान की कसौटी पर खरी न उतरे उस पर विश्वास नहीं करना चाहिए.

मेरी माँ फिर भी धरण पर विश्वास करती थीं. वो तो जब मेरे भाई साहब का मेडिकल कॉलेज में दाखिला हुआ और वो एनाटोमी पढ़ने लगे तो उन्होंने माँ को समझाया कि हम लोग इंसान का पूरा शरीर चीर कर देखते हैं. धरण नाम का कोई गोला पेट में कहीं नहीं होता. खैर मुनकी ने माँ के पेट पर मालिश की तो उन्हें थोड़ा आराम मिला.  दिन में काळकी को देखने वाले तो आये, लड़का विधुर था और उसके तीन बच्चे थे.

वो लोग शादी के लिए तैयार तो हो गए, लेकिन उन्होंने साफ़ कह दिया, हम लोग गरीब लोग हैं. हमारे पास देने को धन नहीं है. हाँ, इतना वादा करते हैं कि आपकी बेटी भूखी नहीं रहेगी. आपकी बेटी को दो वक्त की रोटी मिल जायेगी और हमारे बच्चों को एक सम्हालने वाली माँ नसीब हो जायेगी. अमरू को ये कैसे कुबूल होता कि वो अपनी बेटी मुफ्त में किसी को सौंप दे? उसने भी साफ़ इनकार कर दिया कि मुफ्त में तो वो बेटी नहीं देगा. बहुत खींच तान के बाद दो हज़ार में सौदा तय हुआ और अगले जुम्मे को शादी का दिन तय हो गया.

एक बार फिर अमरू के घर में शादी हो रही थी मगर इस बार न तो घर की पुताई हुई और न घर पर लाऊड स्पीकर लगा. जैना ने तो अमरू को मना किया कि भंवरी को बुलाने की भी क्या ज़रूरत है, लेकिन अमरू के दिमाग में कुछ और ही खिचड़ी पक रही थी इसलिए उसने जैना को डाँट तक कर चुप करवा दिया. बुलावा पहुँचने पर भंवरी अपने पति और बच्चे के साथ शादी से दो दिन पहले बीकानेर आ गयी. नियत दिन काळकी का निकाह हो गया और “कोयलडी सिध चाली.” गीत के सुरों के बीच काळकी अमरू के घर से विदा हो गयी.

काळकी तो विदा हो गयी लेकिन अमरू ने भंवरी के शौहर को हाथ जोड़कर कहा

“हुकुम भंवरी ब्यांव पछै इत्तै बरसां में अेकर ई अठै नईं रैयी. काळकी रै जा’ण सूं घर सूनो सूनो हूयग्यो है थोड़ा’क दिन भंवरी नै अठै ई छोड दो”(हुकुम भंवरी शादी के बाद इतने बरस में कभी हमारे घर दस-पांच दिन के लिए भी नहीं रही, काळकी के जाने से घर भी सूना सूना हो गया है. इस बार भंवरी को कुछ दिन यहीं रहने दो).

भंवरी का शौहर अल्ताफ बेचारा क्या बोलता? वो बेचारा चुपचाप अपना बक्सा लेकर रवाना हो गया. दामाद को विदा कर अमरू भंवरी को लेकर बैठा और उससे पूछने लगा कि वो अपने ससुराल में खुश है या नहीं? भंवरी ने बताया कि उसका पहला ससुराल भी अच्छा था और पहला शौहर भी. यहाँ शौहर तो सीधा है लेकिन सास कभी कभी उसकी पिटाई कर देती है. बस अमरू को तो यही सुनना था. वो बोला,

“बस अब तनै बीं घरै नईं जाणो है. तनै छोरां री कमी है कांईं ? अनूपगढ़ में एक परवार है. छऊ मइना हुया, बीं घर री लुगाई मरगी. डैढ सौ बीघा ज़मीन है अर हज़ार बारै सौ पशु. मुनकी नै मांग रिया है पण म्हैं थारो ब्यांव कर देसूं बठै. मुनकी हाल छोटी है. थोड़ी बड्डी हुजावै तो और घणा ई मिलसी”(बस फिर अब तुझे उस घर में नहीं जाना है. अभी तुझे लड़कों की कोई कमी है? अनूपगढ़ में एक परिवार है. उनकी बहू का छः महीने पहले इन्तेकाल हो गया है. डेढ़ सौ बीघा ज़मीन है और हज़ार बारह सौ पशु हैं घर में. वो तो मुनकी को मांग रहे हैं लेकिन मुनकी थोड़ी बड़ी हो जाए तो उसे और बहुत मिलेंगे. यहाँ मैं तेरी शादी कर देता हूँ.”

उसने कहना चाहा “अब्बू मेरा पहला शौहर बहुत अच्छा था, मुझे तो उसके पास भेज दो”, मगर वो जानती थी कि उसका बाप उसे बार बार नीलाम कर अपने लिए दारू और गोश्त का इंतजाम करना चाहता है. इसलिए वो उसे शफी के पास किसी हालत में नहीं भेजेगा. उसने अनूपगढ़ वाली शादी से इनकार कर दिया.

कुछ ही दिन बाद अल्ताफ ने पहले अपने भतीजे को भेजा फिर तीन चार लोगों को लेकर खुद आया. सभी छः छः फुट के लंबे चौड़े बहावलपुरी. सबके कन्धों पर बारह बोर की दुनाली लटकी हुई. मोहल्ले वालों ने सोचा आज तो मार काट होगी आपस में लेकिन इन बहावलपुरियों को जो लोग अच्छी तरह जानते थे उन्होंने पहले ही कह दिया कि कुछ नहीं होगा. एक कारतूस भी नहीं चलेगा. और यही हुआ भी. एक भी गोली नहीं चली मगर भंवरी जिद पर अड़ गयी कि मुझे तो अल्ताफ के साथ ही जाना है. इस बार अमरू की नहीं चली, वो देखता रह गया और भंवरी अल्ताफ के साथ रवाना हो गयी.

काळकी की शादी से मिले रुपयों से घर चल रहा था. अमरू को कमाने जाने की फिलहाल ज़रूरत नहीं थी. उसने पूरा हिसाब लगा रखा था. काळकी की शादी से आये पैसे खत्म होंगे, तब तक वो भंवरी की शादी अनूपगढ़ तय कर देगा. उसे उम्मीद थी कि उस पैसे को खर्च करेगा उससे पहले ही वो मुनकी का भी सौदा करने में कामयाब हो जाएगा और उसे विश्वास था कि मुनकी के वो एक लाख वसूल कर ही लेगा. एक लाख में तो उसकी पूरी ज़िंदगी निकल जायेगी लेकिन भंवरी उसका पूरा हिसाब किताब गड़बड़ा कर अल्ताफ के साथ चल दी थी. उसके बाद कई दिन तक उसका एक ही काम था, रोज दारू पीकर भंवरी को घंटों तक कोसते रहना.

ज़िंदगी क्या है? कोई समझ पाया है आज तक ? बड़े बड़े दार्शनिक इस प्रश्न में उलझे-उलझे ही ये दुनिया छोड़कर चल दिए. बेचारा अनपढ़ अमरू ज़िंदगी को क्या समझ पाता ? उसके लिए तो दो वक्त मिल जाए तो ठीक है वरना एक वक्त भरपेट गोश्त रोटी और एक पव्वा दारू का नाम ही ज़िंदगी था. वो कहाँ जानता था कि उसने भंवरी और मुनकी की शादियाँ करके उनसे मिलने वाले रुपयों से अपने अंतिम समय तक का जो इंतजाम कर रखा था, विधि को मंज़ूर नहीं था. विधि तो अमरू, भंवरी और मुनकी को लेकर कुछ और ही सोचे बैठी थी.


रेडियो ज़ुबानी की 16 से आगे की किस्तें:

रेडियो ज़ुबानी 21 

रेडियो ज़ुबानी 16

रेडियो ज़ुबानी 17

रेडियो ज़ुबानी 18

रेडियो ज़ुबानी 19

रेडियो ज़ुबानी 20 

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