Submit your post

Follow Us

'जब पूरा पेज पढ़कर हटा, तो मेरा चेहरा आंसुओं में डूबा हुआ था'

2016 में ‘दी लल्लनटॉप’ ने आपको महेंद्र मोदी के संस्मरणों पर आधारित श्रृंखला ‘रेडियो ज़ुबानी’ की 20 किस्तें पढ़ाई थी. महेंद्र जी की व्यस्तताओं के चलते ये सिलसिला थोड़ा रुक गया था, जिसे अब फिर से चलाया जा रहा है. इस सीरीज में महेंद्र मोदी के लिखे रेडियो से जुड़े किस्से पढ़ने मिलेंगे. बीकानेर में पैदा हुए महेंद्र मोदी मुंबई में रहते हैं. विविध भारती के अवकाशप्राप्त चैनल हेड हैं. mahendra modi-2

अभी दशक भर पहले तक रेडियो हमारी ज़िंदगी का अहम हिस्सा हुआ करता था. बदलते समय में रेडियो भले ही थोड़ा साइडलाइन हो गया हो लेकिन हमारी यादों में इसकी जगह हमेशा के लिए महफूज़ है. 90 के दशक से पहले पैदा हुए हर शख्स के पास रेडियो को लेकर एक कहानी ज़रूर-ज़रूर होती है. रेडियो के श्रोता रहे लोगों के पास ही जब कहने के लिए बहुत कुछ होता है, तो उस शख्स के संस्मरणों की गठरी कितनी समृद्ध होगी, जिसने ज़िंदगी के 40 साल रेडियो को दिए हो! रेडियो के नॉस्टैल्जिया की सैर कराने के लिए महेंद्र मोदी बिल्कुल फिट शख्स हैं. तो पढ़े जाए रेडियो से जुड़े किस्से महेंद्र मोदी की ज़ुबानी. 

ये 21वीं किश्त है.


ज़िंदगी का वो वक्त बड़ा अजीब सा होता है, जब इंसान 15-16 बरस की वय में पहुंचता है. बड़े उसे कहते हैं, अमां मियां जाओ बच्चों के साथ खेलो, अभी तो बच्चे हो, अभी तो दाढ़ी मूंछ भी ठीक से फूटी नहीं है. बच्चे अपने पाले में से पहले ही निकाल चुके होते हैं. इधर स्कूल में अध्यापक बोर्ड की परीक्षा का नाम लेकर डराते हैं, उधर घर में कोई न कोई अच्छा करियर चुनने का दबाव बढ़ने लगता है. आजकल तो गली गली में इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज खुल गए हैं. साठ के दशक में पूरे राजस्थान में तीन इंजीनियरिंग और चार मेडिकल कॉलेज हुआ करते थे. आज तो हर प्राइवेट कॉलेज एमबीए का पाठ्यक्रम शुरू किये बैठा है. उस वक्त पूरे राजस्थान में शायद एक भी कॉलेज में एमबीए नहीं था. शायद इसलिए कह रहा हूं क्योंकि मैंने तो उस वक्त तक एमबीए का नाम भी नहीं सुना था.

radiomubarak

रेडियो ज़ुबानी’, यहां पढ़ें पहली किस्त 

ये तो हर माता पिता जानते थे कि इतने कम कॉलेजों में सबके बच्चों का दाखिला होना तो मुमकिन नहीं है. मगर हर मां बाप की जी तोड़ कोशिश तो यही रहती थी कि किसी और का नंबर आए चाहे न आए, उनके बच्चे का तो नंबर आना ही चाहिए. ये ‘चाहिए’ वाला भाव बच्चों पर भयंकर दबाव डालता था. मुसीबत इतनी ही नहीं थी. यही वो उम्र होती है जब कि शरीर में हार्मोन्स में कुछ बदलाव आते हैं, दाढ़ी मूंछ फूटने लगती है. आज की पीढ़ी शायद इसे नहीं समझ पाएगी कि ये हलकी-हलकी उगती दाढ़ी मूंछे भी हमारे ज़माने में एक अजीब सा कॉम्प्लेक्स पैदा करते थे मन में. एक अरसे तक मैंने अपने माता-पिता के सामने शेव नहीं बनाई. नहाने के लिए बाथरूम में घुसता था, तो वहीँ एक रेज़र और ब्लेड का पैकेट छुपाए रखता था. शेविंग क्रीम की जगह नहाने वाली साबुन के झागों से ही काम चल जाता था. ब्लेड्स न तो आज के स्तर की होती थी और न ही आज की कीमत की. आज की पीढ़ी दोनों की तुलना करना चाहे तो बता दूं, आज एक अच्छी ब्लेड लगभग १२० रुपये की आती है. उस वक्त १० भारत ब्लेड का एक पैकेट एक आने का आता था. यानि एक रुपये के १६ पैकेट या १६० ब्लेड्स.

रेडियो ज़ुबानी 2

हालांकि मेरे घर का माहौल ऐसा था कि बच्चों पर कोई दबाव नहीं डाला जाता था. लेकिन भाई साहब का दाखिला मेडिकल कॉलेज में हो चुका था, इसलिए मुझपर एक तरह का मनोवैज्ञानिक दबाव तो था ही कि मुझे कुछ करके दिखाना है. लिहाजा कुछ दिनों के लिए मैंने खेल, संगीत, नाटक सब कुछ छोड़ दिया और पढाई में जुट गया. लेकिन थोड़े दिन की पढाई से क्या होने वाला था? कुल मिलाकर 55% अंक आए.

राजस्थान के दो इंजीनियरिंग कॉलेजों में तो इन अंकों से कहीं एडमीशन होने का सवाल ही नहीं था. राजस्थान के बाहर के कॉलेजों में फॉर्म भरे गए. एक कॉलेज ने सिविल इंजीनियरिंग के डिग्री कोर्स में एडमिशन दिया. उन दिनों सिविल इंजीनियरिंग लोगों की आख़िरी पसंद थी. सिविल इंजीनियर्स में भयंकर बेरोजगारी भी थी. मेरी रूचि मैकेनिकल इंजीनियरिंग में थी. मुझे ये भी लगा कि अगर मैंने सिविल शाखा को चुन लिया, तो मेरा संगीत, मेरा ड्रामा सब ईंट पत्थरों के नीचे दफ्न हो जायेंगे. एक और बात मुझे परेशान कर रही थी कि पिताजी रिटायर होने वाले थे, भाई साहब के नौकरी में आते-आते ही उन्हें रिटायर होना था. ऐसे में अगर मैं कहीं बाहर रहकर पढूं तो उसका खर्च कहां से आएगा? घर का पूरा खर्च और मेरे बाहर रहकर पढ़ने का खर्च भाई साहब के कन्धों पर आएगा और अगर उससे गुज़ारा नहीं होता है, तो पिताजी को कर्ज़ लेना पडेगा. लिहाजा मैंने तय किया कि नहीं, मैं कुछ भी करूंगा मगर सिविल इन्जीनियरिंग नहीं करूंगा.

रेडियो ज़ुबानी 3

इसी समय मेरे दोस्त ब्रजराज सिंह के बड़े भाई शिवराज सिंह जी मेरे घर आए. वो पॉलिटेक्निक कॉलेज में पढ़ाते थे. उन्होंने आकर मेरे पिताजी से कहा “हमारी कॉलेज में कई सीट्स खाली पडी हैं, जो मार्क्स महेंद्र के हैं, उनके आधार पर आराम से उसका एडमिशन मेरे यहां हो सकता है.” ब्रजराज सिंह और मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला नंबर नौ में कक्षा चार से कक्षा नौ तक साथ ही पढ़े थे, उनका घर हमारे घर के सामने की तरफ था. मेरे पिताजी ने जवाब दिया “देखो शिवराज, मैं बच्चों पर ज़बरदस्ती कुछ लादने के पक्ष में नहीं हूँ, अगर वो पॉलिटेक्निक में एडमिशन लेना चाहे, तो मुझे कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन मैं उसपर ज़बरदस्ती नहीं कर सकता.” शिवराज सिंह जी ने मुझसे बात की तो मैंने उनके यहां एडमिशन लेने से इनकार कर दिया.

रेडियो ज़ुबानी 4

अब सवाल ये था कि मैं आखिर करूं क्या? घर के सब लोगों का मानना था कि अगर मैं फर्स्ट ईयर टी डी सी में बायो ग्रुप ले लूं, तो सिर्फ गणित की जगह मुझे बायोलॉजी पढ़ना पडेगा, बाकी दोनों विषय भौतिक शास्त्र और रसायन शास्त्र तो मैं नौवीं से पढता ही आ रहा था. एक साल की पढाई के बाद, पी एम टी देकर मैं मेडिकल कॉलेज में एडमिशन ले सकूंगा और मैं भी भाई साहब की तरह डॉक्टर बन जाऊंगा. सबसे पहला फायदा तो ये होगा कि मुझे पढ़ने के लिए कहीं बाहर नहीं जाना पडेगा. दूसरा फायदा ये होगा कि भाई साहब की किताबें मेरे काम आ जाएंगी और भाई साहब पढाई में मेरी मदद भी कर सकेंगे.

रेडियो ज़ुबानी 5

मेरा मन अभी भी संगीत में अटका हुआ था. मैं चाहता था कि मैं संगीत के क्षेत्र में पढाई करूं मगर समस्या ये थी कि उन दिनों लडकियां इंजीनियरिंग में नहीं जाती थीं और लड़कों के लिए बीकानेर में किसी भी कॉलेज में संगीत पढ़ने की व्यवस्था नहीं थी. इस श्रृखला के नौवें एपिसोड मैं मैंने विस्तार से वर्णन किया है कि संगीत की पढाई करने के लिए किस प्रकार दुःसाहस करके मैं लड़कियों के कॉलेज में एडमिशन लेने जा पहुंचा था और वहां की प्रिंसीपल और लेक्चरर ने मेरे प्रति सहानुभूति तो प्रकट की, लेकिन मुझे एडमिशन नहीं दे पाईं. बहुत सोच विचार के बाद मैंने सबकी राय मानकर कॉलेज में बायो ग्रुप लेने का निर्णय लिया. अब गणित की जगह मुझे जीव विज्ञान और वनस्पति विज्ञान विषय पढ़ने थे. डूंगर कॉलेज में एडमिशन लिया और कक्षाएं लगने लगीं. मुझे जीव विज्ञान और वनस्पति विज्ञान पढ़ने में ज़रा भी अच्छा नहीं लगता था. खास तौर पर मेंढक का डिसेक्शन करना मुझे कभी रुचिकर नहीं लगा.

रेडियो ज़ुबानी 6

जीवन बहुत नीरस हो चला था. मुझे लग रहा था कि शायद मैं जीवन में कुछ नहीं कर पाऊंगा. आस-पास के लोग जले पर नमक छिडकने के लिए कहीं क्लर्क की कोई वैकेंसी की सूचना लाकर देते थे, तो कभी पिताजी को समझाते थे कि मुझे एस टी सी करवा दें या फिर पटवारी की ट्रेनिंग दिलवा दें. ताकि आने वाले जीवन में दो रोटी तो कमा कर खा सकूं. पिताजी सुनते सबकी थे मगर मुझसे कुछ नहीं कहते थे. मन ही मन मुझे आभास हो रहा था कि उन्हें भी ये चिंता सता रही है कि मेरा भविष्य क्या होगा? और शायद वो मुझसे नाराज़ भी हैं. इसी बीच एक ऐसी छोटी सी घटना हुई, जिसने मेरे दिमाग से इस गलतफहमी को निकाल दिया कि पिताजी मुझसे नाराज़ हैं. हुआ ये कि एक दिन ब्रजराज सिंह के पिताजी नारायण सिंह जी आकर मेरे पिताजी के पास बैठे. मुझे उनके लिए चाय पानी लेकर जाना ही था. जैसे ही मैं बैठक में पहुंचा, नारायण सिंह जी बोले “ लीजिए ये आ गए आपके लाडले कँवर साब, मोदीजी, आपका ये बेटा और मेरा ब्रजराज, ये दोनों तो बिलकुल निकम्मे ही हैं. खा-खा कर सांड हो रहे हैं और करने को कुछ नहीं. पढाई-वढ़ाई इनके बस की बात नहीं है, इन दोनों को मैं अपने गांव ले जाता हूं. खेत में काम करवाऊंगा तो सारी हीरोगिरी भूल जाएंगे.”

रेडियो ज़ुबानी 7

मैं चाय के ट्रे लिए खडा सब सुन रहा था. मुझपर मानो किसी ने घडों पानी डाल दिया. मेरी समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं ? इस तरह से, इन कटु शब्दों में अपनी आलोचना मैंने कभी किसी के मुंह से नहीं सुनी थी. हालांकि अभी इस से दो-तीन दिन पहले ही ताऊ जी के एक बेटे यानि मेरे एक भाई साहब ने मेरी मां से कहा था “काकी, राजा (भाई साहब का घर का नाम) तो खैर पढ़ने में अच्छा निकल गया, डॉक्टर बन ही जाएगा, लेकिन महेंदर कुछ बनेगा तब जानेंगे हम लोग तो, देखना वो हम लोगों जैसा ही रहेगा.” और आज नारायण सिंह जी मेरे पीछे हाथ धोकर पड गए हैं.

मैं असमंजस में वहां खडा हुआ ही था कि मैंने पिताजी की गुस्से से तमतमाती हुई आवाज़ सुनी और मैंने देखा वो अपनी कुर्सी से उठ खड़े हुए थे. उनका चेहरा गुस्से से लाल था. वो हाथ जोड़े हुए बोले

“माफ करें नारायण सिंह जी, आप अपने बेटे को सांड कहें या ऊंट मुझे इस से कोई मतलब नहीं है, लेकिन खबरदार अगर मेरे बेटे के बारे में आगे एक शब्द भी बोला तो… आपको शायद पता नहीं कि इसका इंजीनियरिंग कॉलेज में आराम से एडमिशन हो रहा था और आपके बड़े कँवर साहब अपने कॉलेज में दाखिला देने के लिए मेरे घर आये थे, लेकिन मैं अपने बच्चों को बच्चे समझ कर व्यवहार करता हूं, आपकी तरह गुलाम समझ कर नहीं. मैं क्या जानता नहीं कि आपने किस तरह ब्रजराज को अलवर से ये कहकर बुलाया कि शिवराज की शादी है और उस बेचारे दसवीं में पढ़ रहे बच्चे की बंदूक की नोक पर शादी कर दी. आप क्या समझते हैं? आपके ये बच्चे आपको माफ कर देंगे? आप गलतफहमी में हैं. एक दिन आएगा जब ये बच्चे आपसे इतनी नफरत करेंगे कि आपका बुढापा नर्क बन जाएगा. अब आपके लिए बेहतर ये होगा कि आप यहां से उठकर चले जाएं और आइंदा कभी मेरे घर की तरफ का रुख न करे.”

रेडियो ज़ुबानी 8

मैं अवाक रह गया. मैंने पिताजी को इस तरह किसी से भी बोलते हुए नहीं सुना था. नारायण सिंह जी गुस्से से मुंह में बडबडाते हुए उठे और घर से बाहर निकल गए. मैं पिताजी के सामने खडा था, मैंने कहा “सॉरी”. उन्होंने मुझे हाथ पकड़कर बिठाया और कहा,

“सॉरी क्यों कह रहे हो? ऐसे लोगों की बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिए. देखो हर बच्चा डॉक्टर या इंजीनियर नहीं बन सकता. इस दुनिया में और भी बहुत काम हैं करने के लिए. तुम्हें जो भी फील्ड पसंद है, तुम उसे चुनो, मुझे कोई दिक्कत नहीं है. ये दो रोटी कमाकर खाने की बात करने वाले भूल जाते हैं कि पेट भरने को दो रोटी तो कुत्ते को भी मिल ही जाती है, मैं तो चाहता हूं कि तुम जो भी फील्ड चुनो उसमे कुछ ऐसा करो कि लोग तुम्हें जानें.”

इस घटना ने मुझे बहुत सहारा दिया. मेरे मन में पल रहा एक तरह का कॉम्प्लेक्स मेरे दिमाग से निकल गया कि मेरे पिताजी की नज़र में मैं एक नाकारा इंसान हूं और वो मुझसे नाराज़ हैं. मैं पढाई में जुट गया. इस नीयत के साथ कि मैं पूरी ईमानदारी से पीएमटी दूंगा और अगर चयन हो जाता है, तो इन सब लोगों को डॉक्टर बनकर दिखाऊंगा. विधाता ऊपर कहीं सातवें आसमान पर बैठा मेरी बातें सुनकर ठहाका लगाकर हंस पड़ा था क्योंकि मेरे लिए उसने कुछ और ही योजनाएं बना रखी थीं.

रेडियो ज़ुबानी 9

इस घटना के कुछ ही दिन बाद एक रविवार को दिन में खाना खाकर बैठा अखबार देख रहा था कि किसी ने घर की कुंडी खटखटाई. मैंने दरवाजा खोला तो देखा सामने मेरा सहपाठी और दोस्त मोहन प्रकाश शर्मा खडा हुआ था. मैंने कहा “आओ”. वो अंदर आते हुए बोला “तुम कपडे चेंज कर लो, ज़रा बाहर चलेंगे”. मैंने उसे बैठने को कहा और अंदर जाकर पांच मिनट में कपडे बदलकर आ गया. साइकिल की चाबी उठाते हुए कहा “लेकिन हम चल कहां रहे हैं और कितनी देर में लौटेंगे ये तो बताओ, ताकि मैं घर में बता सकूं.”

उसने मेरी बात का जवाब देने की बजाय उलटा सवाल किया “ तुमने रेडियो सुना?” मैंने कहा “हां रेडियो तो हमेशा ही सुनता हूं लेकिन तुम कहना क्या चाहते हो, साफ़-साफ़ बताओ ना यार.”

“अच्छा! तो तुम्हें मालूम नहीं है. ऐसा है रेडियो पर पिछले दो-तीन दिन से एक अनाउंसमैंट हो रहा है कि आकाशवाणी में नाटकों का एक स्वर परीक्षण होने वाला है. अब तक ये स्वर परीक्षण सिर्फ जयपुर में ही होता था, पहली बार बीकानेर में होने जा रहा है.”

मैं उसका मुंह देख रहा था. और सोच रहा था, अरे मैं तो इतने बरसों से आकाशवाणी के नाटकों को बिला नागा सुनता आ रहा हूं. नंदलाल जी, सुलतान सिंह जी, देवेन्द्र मल्होत्रा जी, ओम शिवपुरी जी, सुधा शिवपुरी जी, लता गुप्ता जी, असरानी जी, माया जी, मदन शर्मा जी . सारे नाम तो ज़ुबानी याद हैं मुझे. मैंने उससे कहा “तो तुम क्या चाहते हो?”

वो बोला,

“देखो यार मेरे एक रिश्ते के मामा जी आकाशवाणी, बीकानेर में अफसर हैं, उनका नाम श्री सुरेन्द्र विजय शर्मा है. हम लोग उनके घर चलते हैं, मुझे इस स्वर परीक्षण का फॉर्म भरना है. मेरे मामाजी हैं, तो कुछ तो काम आएंगे ही.”

मैं मन ही मन सोच रहा था कि आज तक कभी सुना नहीं कि मोहन नाटक करता है, या रेडियो पर नाटकों को सुनने का शौक़ीन है. ये अचानक उस पर नाटक के स्वर परीक्षण का भूत कैसे सवार हो गया. फिर मैंने सोचा , हो सकता है, ये भी नाटक का शौक़ीन हो. दरअसल हमारी कॉलेज की नई-नई दोस्ती थी, स्कूल में तो हम लोग साथ थे नहीं, इसलिए एक दूसरे के बारे में ज़्यादा नहीं जानते थे. मैं चुपचाप तैयार होकर उसके साथ साइकिल उठा कर चल पड़ा. रथखाने में मोहन के मामा जी रहते थे. हम दोनों ने जाकर अपनी अपनी साइकिलें खडी कीं और दरवाज़े पर लगी घंटी बजाई. दो ही मिनट बाद एक सुदर्शन व्यक्ति ने दरवाजा खोला. मोहन प्रणाम मामा जी कहते हुए उनके पैरों में झुका तो मैंने भी उसका अनुसरण किया. आशीर्वाद देते हुए वो बोले “ आओ आओ मोहन अंदर आ जाओ.”

रेडियो ज़ुबानी 10

हम दोनों उनके ड्राइंग रूम में बैठ गए, इतने में मामी जी पानी के ग्लास लेकर आ गईं. हम दोनों ने उनके भी पांव छुए और बैठ गए. मामाजी कुछ गुनगुना रहे थे, जैसे कोई धुन बना रहे हों और मोहन तथा मैं चुपचाप बैठे हुए थे. अचानक मामाजी ने गुनगुनाना बंद किया और कहा,

“हां मोहन, घर में सब लोग ठीक हैं?”

“जी मामा जी, आप बहुत दिन से घर नहीं आए और….. मुझे एक काम भी था आपसे.”

“क्या करें बेटा आजकल काम बहुत है ऑफिस में. ऊपर से पहली बार यहां एक ऑडिशन भी होने वाला है नाटक का, तो उसकी तैयारी में लगे हुए हैं हम लोग. खैर उसे छोडो, तुम बताओ, भाइयों की दुकान के सेठ जी के बेटे को हम कलाकारों से क्या काम पड गया?”

मोहन थोड़ा लड़ियाता हुआ सा बोला “ मामाजी मुझे भी नाटक का स्वर परीक्षण देना है.”

मामाजी हंसे. “देखो बेटा ये कोई आम परीक्षा नहीं होती, जिसमे 36 अंक लाकर पास हुआ जा सकता हो. ये एक प्रोफेशनल परीक्षा है. इसके लिए हमारे जयपुर के डिरेक्टर अपनी टीम के साथ आ रहे हैं.”

“लेकिन मुझे भी रेडियो आर्टिस्ट बनना है.”

“अच्छा तुम कल ऑफिस में आकर फॉर्म भर दो.”

मैं अब तक खामोशी से दोनों की बातचीत सुन रहा था कि मामा जी ने मोहन से एक सवाल किया,

“अच्छा मोहन तुम रेडियो के नाटक सुनते हो?”

“जी कभी कभी.”

“अच्छा नन्दलाल जी का नाम सुना है?”

अब मोहन चुप. मामाजी को लग गया कि मोहन नाटक सुनता-वुनता कुछ नहीं, बस यूंही हांक दी है कि हां सुनता हूं.”

पता नहीं कैसे मेरे मुंह से निकल गया, “जी मैंने नंदलाल जी के कई नाटक सुने हैं.” और मैंने एक के बाद एक उनके कई प्रसिद्ध नाटकों के नाम गिनवा दिए.

मामाजी ने आंखें बंद कर लीं. मैं जैसे ही चुप हुआ, बोले “बेटा बोलते जाओ, बोलते जाओ.”

मैं एक दम सकपका गया. मुझे लगा कि मैं बिना पूछे बीच में बोलने लगा, वो शायद उन्हें बुरा लगा. मैंने कहा “जी सॉरी मुझे बीच में नहीं बोलना चाहिए था.”

वो हंसकर बोले, “अरे नहीं बेटा, मैं तो तुम्हारी आवाज़ का आनंद ले रहा था. बहुत दिनों बाद एक अच्छी आवाज़ सुनने को मिली है. देखो बेटा अब सुनो ध्यान से मेरी बात.”

मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि ये सब क्या हो रहा है? क्या मेरी आवाज़ अच्छी आवाजों की श्रेणी में आती है? आज तक तो किसी ने भी नहीं कही ये बात? मैं सहमा हुआ सा मामा जी की तरफ देख रहा था कि वो फिर बोले “ये मोहन फॉर्म भरे या न भरे, तुम्हें स्वर परीक्षण का फॉर्म ज़रूर भरना है.”

मैने कहा “जी.”

रेडियो ज़ुबानी 11

मन ही मन मुझे लग रहा था कि मोहन को ज़रूर बुरा लगा होगा कि मैं बीच में बोल पड़ा और मामा जी की पूरी तवज्जो मेरी तरफ हो गई. हम लोग प्रणाम कर वहां से चल पड़े. रास्ते में मैंने मोहन से माफी मांगते हुए कहा, “यार माफ कर देना वो नंदलाल जी के बारे में बात करने लगे, तो मुझसे चुप नहीं रहा गया क्योंकि वो मेरे सबसे प्रिय कलाकार हैं.”

मोहन भी बड़े दिलवाला निकला. बोला, “कोई बात नहीं यार, फॉर्म तो हम दोनों भरेंगे, देखते हैं कौन पास होता है कौन फेल.”

अगले ही दिन हम दोनों ने ऑडिशन के फॉर्म भरे. ऑफिस में कलाकारों की भीड़ लगी हुई थी. बीकानेर के इतिहास में पहली बार नाटक का ऑडिशन हो रहा था. उम्र की कोई पाबंदी थी नहीं, लिहाजा 17-18 साल से लेकर 70 साल का हर कलाकार फॉर्म भर रहा था. फॉर्म तो भर दिया लेकिन क्या तैयारी करनी है ये किससे पूछा जाए? क्योंकि जब ऑडिशन हो ही पहली बार रहा था, तो कोई अनुभवी कलाकार कहां से आता? एक दिन मोहन ने मुझे बताया कि वो मामाजी के घर गया था और उनसे कुछ सीख कर आया है. मुझे उससे ये पूछना ठीक नहीं लगा कि उसने मामाजी से क्या सीखा? फिर भी मुझे अंदर ही अंदर अपने पर थोड़ा विश्वास था कि जिस तरह की एक्टिंग नंदलाल जी करते हैं, मैं थोड़ी बहुत तो उसकी नक़ल कर ही सकता हूं. दूसरे मुझे थोडा भरोसा था अपने उच्चारणों पर, जो उस्ताद जी से उर्दू सीखने की वजह से और लोगों से बेहतर हो गए थे.

रेडियो ज़ुबानी 12

कुछ ही दिनों में ऑडिशन का कॉल लैटर आ गया. मेरा बहुत मन हुआ कि एक बार अपनी आवाज़ रिकॉर्ड करके सुनूं तो सही, लेकिन बहुत हाथ पैर मारने पर भी इसकी कोई व्यवस्था नहीं हो सकी. क्योंकि सिवाय रेडियो स्टेशन के टेप रिकॉर्डर कहां होते थे उन दिनों? आज की पीढ़ी को ये बात भी एक अजूबा ही लगेगी कि मुझे अपनी आवाज़ रिकॉर्ड करने के लिए कोई साधन नहीं मिला लेकिन ज़रा सोचिये कहां से आता कोई साधन? कैसेट रिकॉर्डर तो तब तक भारत में आया ही नहीं था.

बस 1962 से सुने नाटकों और खासतौर पर नंदलाल जी की थोड़ी बहुत नक़ल करने की कूव्वत के बल पर जा पहुंचा मैं ऑडिशन देने.

रेडियो ज़ुबानी 13

पहले मोहन का नंबर आया. वो अंदर गया और दो मिनट बाद बाहर आ गया. कलाकारों का हुजूम उमड़ा हुआ था. कोई कह रहा था 300 लोग हैं, तो कोई कह रहा था 500 लोगों ने फॉर्म भरे हैं. चार पांच दिन तक चलने वाला था ऑडिशन.

मुझे भी एक 7-8 पेज की स्क्रिप्ट पकड़ा दी गयी थी, जिसमे अलग-अलग तरह के अलग-अलग मूड के नाटक के 9-10 टुकड़े थे. थोड़ी ही देर में मेरा बुलावा आ गया. मैं स्टूडियो में घुसा. एक अजीब सी सांय-सांय की आवाज़ ने मेरा स्वागत किया. पहली बार महसूस किया कि सन्नाटे की भी अपनी एक ध्वनि होती है. मेरी कल्पना में ऑडिशन का जो स्वरुप था उसके अनुसार वहां 5-7 कलाकारों को होना चाहिए था, जिनके साथ मुझे नाटक करना था. लेकिन वहां तो ऐसा कुछ नहीं था. स्टूडियो के बीचोबीच दो माइक खड़े हुए थे. मैंने अंदर घुसते ही देखा उन में से एक के सामने मोहन के मामाजी खड़े हुए थे. मुझे देखते ही वो हलके से मुस्कुराए. मेरा तनाव थोड़ा कम हुआ. तभी एक बड़े से स्पीकर पर एक गंभीर आवाज़ गूंजी. “अपने रोल नंबर बताइये और पहले पेज पर लिखे हुए शब्दों को पढ़िए.” मैं पढ़ गया.

रेडियो ज़ुबानी 14

उर्दू की जो जानकारी थी, वो काम आई, सारे शब्द पढ़ गया. अब एक रोमांटिक पीस था, जिसमे मुझे पुरुष वाले डायलॉग बोलने थे और मामाजी स्त्री वाले डायलॉग बोल रहे थे. मुझे जैसा समझ में आया मैं बोलता चला गया. मुझे नहीं पता था कि मैं क्या बोल रहा था, कैसा बोल रहा था, लेकिन बीच बीच में मामाजी इशारे से मुझे शाबाशी दे रहे थे, तो मेरा उत्साह बढ़ता जा रहा था और मैं खूब खुलकर एक्टिंग करने की कोशिश कर रहा था. पेज पर पेज पूरे होते गए और फिर आया एक बहुत ही सीरियस पीस, जिसमे एक पागल का चरित्र मुझे करना था जिस पर लोग बहुत ज़ुल्म करते हैं. न जाने कैसे अचानक मेरी आंखों के सामने सरदारशहर के कसाइयों के मोहल्ले में हलाल होते बकरों की चीख, कल्याण सिंह की आधी गर्दन कटी लाश और कुर्ती के फटने पर रंजू के गले से निकली चीख आ गई और मुझे खुद पता नहीं, उन डायलॉग्स में मैं क्या कर गया कि जब वो पेज पूरा हुआ, मैंने देखा, मेरा चेहरा पूरा आंसुओं में डूबा हुआ था.

मोहन के मामाजी मुझे ताज्जुब से घूरे जा रहे थे, मानो उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था कि ये सब मैं कर रहा था. थैंक्स कहा गया तो मैं बाहर आया और मामाजी ने आते-आते हलके से मेरे कंधे को थपथपा दिया. इस ऑडिशन के कई दिन बाद जब मैं उनसे मिला था तो वो बोले, “महेंद्र, ऑडिशन वाले दिन मैं तो घबरा गया था, मुझे लगा तुम सचमुच पागल हो गए हो.”

मेरा ऑडिशन उस दिन के ऑडिशंस में सबसे लंबा चला था. मैं जैसे ही बाहर आया, एक हाथ मेरे कंधे पर पड़ा. मैंने देखा एक लंबे से सज्जन मेरे कंधे पर हाथ रखकर मुस्कुरा रहे हैं. मैंने सवालिया निगाह से उनकी तरफ देखा तो वो मुस्कुराते हुए बोले,

“मेरा नाम विश्वंभर नाथ तिलक है. मैं आकाशवाणी जयपुर में प्रोग्राम एक्सिक्यूटिव हूं. अभी आप ही अंदर थे न?”

मैं मुंह बाए उन्हें देख रहा था. जल्दी से बोला,

“जी सर.”

“अरे आप हैं तो बहुत छोटे से, लेकिन माशाल्लाह आपकी आवाज़ बहुत मैच्योर्ड आती है माइक पर.”

मैं क्या कहता? मैंने आज तक अपनी आवाज़ सुनी ही कहां थी? मैंने बस इतना सा कहा, “जी थैंक्स.”

वो फिर प्यार से बोले “नाम क्या है आपका ?”

“जी महेंद्र मोदी.”

“देखिए महेंद्र जी, मैं आपको बताना चाहता हूं कि आपकी आवाज़ बहुत अच्छी है. उस कमरे में हमारे डिरेक्टर मंजूरूल अमीन साहब बैठे हैं. उन्होंने आपके लिए एक संदेश भिजवाया है.”

मैं तो जैसे सपना देख रहा था. मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जयपुर स्टेशन के डिरेक्टर ने मेरे लिए कोई संदेश भिजवाया है. जी मेरे लिए, जिसे नारायण सिंह जी ने बिलकुल नाकारा करार देकर सांड के नाम से पुकारा था. मैंने कहा,

“जी फरमाएं.”

“उन्होंने कहा है कि आप चाहें तो अनाउंसर की पोस्ट पर हम आपको लेना चाहेंगे.”

“जी…….जी……..जी…..”

मेरी कुच्छ समझ नहीं आया कि मैं क्या जवाब दूं? तभी वो बोले, “ नहीं-नहीं आप घबराइए मत. आराम से सोच लीजिए. अपने माता-पिता से भी सलाह कर लीजिए. उसके बाद अगर आपका मन बनता हो तो जयपुर आकर जॉइन कर लीजिए. ये एक परमानेंट पोस्टिंग होगी, आप चाहेंगे तो हम आपका ट्रांसफर बीकानेर कर देंगे.”

मैंने कहा, “जी मुझे तो अभी पढाई करनी है, अभी तो सिर्फ हायर सैकेंडरी पास हूं.”

“देखिए हमारे लिए इसमें कोई प्रॉब्लम नहीं है क्योंकि इस पोस्ट के लिए ज़रूरी योग्यता सिर्फ दसवीं पास है. फिर भी आप सोच लीजिए. अगर आप चाहें तो अगले सोमवार के बाद कभी भी जयपुर आकर ड्यूटी जॉइन कर लीजिए.”

रेडियो ज़ुबानी 15

मैंने उन्हें धन्यवाद दिया और बाहर आ गया. मुझे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर ये सब हो क्या रहा है ? एक तरफ मुझे किसी लायक नहीं समझा जा रहा और दूसरी तरफ मुझे आगे होकर हाथोंहाथ लिया जा रहा है. हालांकि उस वक्त मैंने उन्हें जॉइन करने से मना कर दिया था. घर आकर जब सबको बताया तो सबने यही कहा कि अभी नौकरी की क्या जल्दी है, अभी पढाई करो, लेकिन कहां पता था मुझे और कहां पता था मेरे घर के लोगों को कि विधि ने मुझे बनाया ही इस काम के लिए है, जिसे मैं अभी ठुकरा रहा हूं. और कहां पता था विश्वंभर नाथ जी को कि मैं फिर उनके सामने आऊंगा और वो नहीं पहचान पाएंगे कि ये सामने खडा अधेड वही लड़का है, जिसे मैंने नौकरी ऑफर की थी.


रेडियो ज़ुबानी की 16 से आगे की किस्तें:

रेडियो ज़ुबानी 16

रेडियो ज़ुबानी 17

रेडियो ज़ुबानी 18

रेडियो ज़ुबानी 19

रेडियो ज़ुबानी 20 

वीडियो: कैसे बिठाई इरशाद ने ‘इस्क-रिस्क’ की जुगलबंदी और रेडियो को किया फिट?

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

गंदी बात

अपने गांव की बोली बोलने में शर्म क्यों आती है आपको?

ये पोस्ट दूर-दराज गांव से आए स्टूडेंट्स जो डीयू या दूसरी यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे हैं, उनके लिए है.

बहू-ससुर, भाभी-देवर, पड़ोसन: सिंगल स्क्रीन से फोन की स्क्रीन तक कैसे पहुंचीं एडल्ट फ़िल्में

जिन फिल्मों को परिवार के साथ नहीं देख सकते, वो हमारे बारे में क्या बताती हैं?

चरमसुख, चरमोत्कर्ष, ऑर्गैज़म: तेजस्वी सूर्या की बात पर हंगामा है क्यों बरपा?

या इलाही ये माजरा क्या है?

राष्ट्रपति का चुनाव लड़ रहे शख्स से बच्चे ने पूछा- मैं सबको कैसे बताऊं कि मैं गे हूं?

जवाब दिल जीत लेगा.

'इस्मत आपा वाला हफ्ता' शुरू हो गया, पहली कहानी पढ़िए लिहाफ

उस अंधेरे में बेगम जान का लिहाफ ऐसे हिलता था, जैसे उसमें हाथी बंद हो.

PubG वाले हैं क्या?

जबसे वीडियो गेम्स आए हैं, तबसे ही वे पॉपुलर कल्चर का हिस्सा रहे हैं. ये सोचते हुए डर लगता है कि जो पीढ़ी आज बड़ी हो रही है, उसके नास्टैल्जिया का हिस्सा पबजी होगा.

Lefthanders Day: बायां हाथ 'उल्टा' ही क्यों हैं, 'सीधा' क्यों नहीं?

मेरा बाएं-हत्था होना लोगों को चौंकाता है. और उनका सवाल मुझे चौंकाता है.

फेसबुक पर हनीमून की तस्वीरें लगाने वाली लड़की और घर के नाम से पुकारने वाली आंटियां

और बिना बैकग्राउंड देखे सेल्फी खींचकर लगाने वाली अन्य औरतें.

'अगर लड़की शराब पी सकती है, तो किसी भी लड़के के साथ सो सकती है'

पढ़िए फिल्म 'पिंक' से दर्जन भर धांसू डायलॉग.

मुनासिर ने प्रीति को छह बार चाकू भोंककर क्यों मारा?

ऐसा क्या हुआ, कि सरे राह दौड़ा-दौड़ाकर उसकी हत्या की?

सौरभ से सवाल

दिव्या भारती की मौत कैसे हुई?

खिड़की पर बैठी दिव्या ने लिविंग रूम की तरफ मुड़कर देखा. और अपना एक हाथ खिड़की की चौखट को मजबूती से पकड़ने के लिए बढ़ाया.

कहां है 'सिर्फ तुम' की हीरोइन प्रिया गिल, जिसने स्वेटर पर दीपक बनाकर संजय कपूर को भेजा था?

'सिर्फ तुम' के बाद क्या-क्या किया उन्होंने?

बॉलीवुड में सबसे बड़ा खान कौन है?

सबसे बड़े खान का नाम सुनकर आपका फिल्मी ज्ञान जमीन पर लोटने लगेगा. और जो झटका लगेगा तो हमेशा के लिए बुद्धि खुल जाएगी आपकी.

'कसौटी ज़िंदगी की' वाली प्रेरणा, जो अनुराग और मिस्टर बजाज से बार-बार शादी करती रही

कहां है टेलीविज़न का वो आइकॉनिक किरदार निभाने वाली ऐक्ट्रेस श्वेता तिवारी?

एक्ट्रेस मंदाकिनी आज की डेट में कहां हैं?

मंदाकिनी जिन्हें 99 फीसदी भारतीय सिर्फ दो वजहों से याद करते हैं

सर, मेरा सवाल है कि एक्ट्रेस मीनाक्षी शेषाद्री आजकल कहां हैं. काफी सालों से उनका कोई पता नहीं.

‘दामिनी’ के जरिए नई ऊंचाई तक पहुंचा मीनाक्षी का करियर . फिर घातक के बाद 1996 में उन्होंने मुंबई फिल्म इंडस्ट्री को बाय बोल दिया.

ये KRK कौन है. हमेशा सुर्खियों में क्यों रहता है?

केआरके इंटरनेट एज का ऐसा प्रॉडक्ट हैं, जो हर दिन कुछ ऐसा नया गंधाता करना रचना चाहता है.

एक्ट्रेस किमी काटकर अब कहां हैं?

एडवेंचर ऑफ टॉर्जन की हिरोइन किमी काटकर अब ऑस्ट्रेलिया में हैं. सीधी सादी लाइफ बिना किसी एडवेंचर के

चाय बनाने को 'जैसे पापात्माओं को नर्क में उबाला जा रहा हो' कौन सी कहानी में कहा है?

बहुत समय पहले से बहुत समय बाद की बात है. इलाहाबाद में थे. जेब में थे रुपये 20. खरीदी हंस...

सर आजकल मुझे अजीब सा फील होता है क्या करूं?

खुड्डी पर बैठा था. ऊपर से हेलिकॉप्टर निकला. मुझे लगा. बाबा ने बांस गहरे बोए होते तो ऊंचे उगते.