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पंजाब का वो दलित गायक, जो आतंकवाद के दौर में अखाड़े जमाता था

पंजाब का आइकॉनिक दलित सिंगर चमकीला, जिसे परफॉर्मेंस पर जाते हुए गोली मार दी गई. उस दौर में जब पंजाब आतंकवाद से डरा-सहमा था और श्मशान की शांति थी, चमकीला को सुनने के लिए भीड़ जमा होती थी. आज जन्मदिन है.

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पहले ललकारे नाल… वो गाना है जिसमें तत्कालीन राजनैतिक हालातों और उग्रवाद से जूझ रहे पंजाब के बेचैन समाज के संदर्भ हमेशा के लिए गुंथे हुए हैं. तब ऐसे नए तरह के गाने और परफॉर्मेंस को लाने वाले सिंगर थे चमकीला. अमर सिंह चमकीला. मां-बाप ने नाम रखा था धनी राम, लेकिन जीवन इतना धनी न था. महज़ 28 की उम्र में एक स्टेज शो से पहले उनकी छाती में गोलियां दाग दी गईं. उनकी स्टेज पार्टनर और पत्नी को भी मार दिया गया. जिस सिंगिंग ने चमकीला को पहचान दी थी, उसी के कारण उन्हें क़त्ल किया गया. सिर्फ 10 साल के अपने सिंगिंग करियर में चमकीला ने आखिर ऐसा क्या किया था, जो वो पंजाबियों में आज भी ज़िंदा हैं? उनके गाने आज भी अमर क्यों हैं?
पहले वो गाना, जहां से बात शुरू होती है:

चमकीला. मतलब जो चमकता हो. अमर सिंह को इसी नाम से जाना जाता है. 21 जुलाई 1960 को उनका जन्म हुआ. बचपन लुधियाना के पिंड डुगरी में बीता. और जवानी पूरे पंजाब में. सपना था इलेक्ट्रिशियन बनने का, लेकिन पैसों की तंगी के चलते कपड़े की मिल में काम करना पड़ा. पर किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था, शायद वो जिसकी उम्मीद खुद चमकीले को भी नहीं होगी. म्यूज़िक का शौक बचपन से था. शौक के चलते हारमोनियम और ढोलकी भी सीख ली. लेकिन स्टेज तक आते-आते हाथ में तुम्बी आ गई. कपड़े की मिल में काम करते-करते गाने भी लिखने लगे. ये वो दौर था जब सुरिंदर शिंदा और कुलदीप मानक जैसे सिंगर पंजाबियों के फेवरेट थे और गुरदास मान उसी ट्रैक पर चलने की तैयारी में थे. सुरिंदर शिंदा का कहना है कि चमकीला ने उन्हें ही सबसे पहले एप्रोच किया था. तब चमकीला की उम्र 18 थी. उन्होंने शिंदा के लिए गाने लिखने शुरू किए, जिसका अच्छा रिस्पॉन्स मिला. लेकिन घर का खर्च निकालने में अभी भी दिक्कत आ रही थी. ऐसे में चमकीला ने शिंदा का दामन छोड़ खुद से गाने की सोची. और कुछ ही टाइम बाद साथ गाने का भी मौका मिला. धीरे-धीरे अकेले गाने का हौसला बढ़ता गया.

उनका अब तक का सफर तो वैसा ही था, जैसा शायद हर स्ट्रगलर का होता है. लेकिन एक बार चमकीले ने गाना क्या शुरू किया, उन्होंने पंजाबी गायकी में सभी को पछाड़ के रख दिया. लेकिन आखिर ऐसा क्या खास था इस जवान लड़के में, जिसने सुरिंदर शिंदा, कुलदीप मानक और गुरदास मान जैसे स्थापित सिंगर्स को बैकफुट पर ला खड़ा कर दिया? दरअसल लिरिक्स के साथ-साथ चमकीले की स्टेज प्रैज़ेंस भी काफी अलग थी. उनके लिरिक्स में उस दौर के पंजाब की सच्चाई थी. सूबे में बढ़ता हुआ नशा हो या घर में औरतों से मार-पिटाई, चमकीला हर बात बेबाकी से अपने गानों के ज़रिए ज़ाहिर कर दिया करता था. गाते-गाते बीच में कमेंट्री करने लगता. कभी एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर की बात या फिर गाली-गलौज. हर बात ज्यों की त्यों लोगों के सामने रख देता. एक लाइन में कहें तो वो पंजाबियों को आईना दिखाता था. उनके समाज का, उनकी लाइफस्टाइल का, उनमें जाति के रुआब का. गानों के लिरिक्स में “तेरी मां दी”, “तेरी पैण दी” (तेरी मां की, तेरी बहन की) भी आ जाता था, पर साथ ही कटाक्ष करता हुआ कहता था कि बुरा मत मानना, घर में भी तो सब ऐसे ही बोलते हैं! ये सब कहना तब ज़्यादा महत्व रखता है जब आप लाइव गा रहे हों. चमकीले के ज़्यादातर गाने लाइव स्टेज परफॉर्मेंस के ही हैं. 5-6 फुट की स्टेज सजती थी. चमकीला गाते और सामने बैठे लोग कभी हंसते, कभी नाचते, कभी हो-हल्ला मचाते और कोई टाइट (शराबी) होता सो वहीं उनसे लड़ भी पड़ता. ये सब चीज़ें हिस्सा थी चमकीले के अखाड़े की. और इन्हीं अखाड़ों के चलते चमकीला 4-5 साल में ही हर पंजाबी के मुंह पर चढ़ गए.

बात चमकीले की हो और अमरजोत कौर का ज़िक्र न हो! संभव नहीं. अमरजोत, जो हर स्टेज परफॉर्मेंस में चमकीले के साथ नज़र आती थीं. उतनी ही एनर्जेटिक और जोशीली. पतली और तीखी आवाज़ वाली अमरजोत का चमकीला से वास्ता सन 1980 में पड़ा. तब तक चमकीला कुछेक गाने गा चुके थे. लेकिन चमकीले को ज़रूरत थी स्टेज पार्टनर की. सोनिया और मिस ऊषा नाम की गायिका के साथ पहले ही काम कर चुके थे, लेकिन खोज अभी भी जारी थी. एक ऐसी गायिका की जो चमकीले के तेवरों को मैच कर सके. खोज रुकी अमरजोत पर जाकर. शादीशुदा थीं. लेकिन सिंगिग के पैशन के चलते, पति को तलाक दे दिया और जुड़ गईं चमकीले के साथ. कुछ महीने स्टेज पर साथ बिताने के बाद ज़िंदगी भी साथ बिताने का फैसला कर लिया. चमकीले ने भी कुछ समय बाद अपनी पत्नी को तलाक दे दिया. अमरजोत इससे पहले कुलदीप मानक के साथ भी गाना गा चुकी थीं. लेकिन असल पहचान चमकीले के साथ ही मिली.

चमकीला के बारे में एक बात काफी कही जाती है कि उसका कोई दिन खाली नहीं जाता था. रोज़ कहीं न कहीं शो होता था. एक फिल्म की रिसर्च के दौरान भी इस बात की पुष्टि हुई. रिसर्च के मुताबिक चमकीला ने 365 दिनों में 366 शो परफॉर्म किए. और इस दौरान चमकीला की आवाज़ पंजाब और देश से बाहर निकल विदेशों तक जा पहुंची. कनाडा, अमेरिका और दुबई जैसे कई देशों में भी चमकीला की ललकार गूंजी. ये एक ऐसा गायक था, जो गाते-गाते कुछ भी कहने लगता था. ऐसे, जैसे कोई अपने दोस्त से बात कर रहा हो. बिना किसी झिझक के. आवारा लड़के की बात करता-करता बीच में गुरबाणी का ज़िक्र कर जाता था. शादी-ब्याह में भी गाता था. और 80 के दशक में भी 4000-4500 रुपए प्रति शो लिया करता था.

मिड 80s तक खूब फेमस हो चुका था चमकीला. ये पंजाब में आतंकवाद का दौर था. तनाव का माहौल था. ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद हर तरफ मायूसी पसरी हुई थी. आतंकवादियों और पुलिस के बीच एनकाउंटर जारी थे. उन दिनों लोग घर से बाहर नहीं निकलते थे. अखबारों में रोज़ किसी न किसी की मौत की खबर होती थी. ऐसे समय में चमकीला के अखाड़े में 200-300 लोगों का इकट्ठा होना ही एक बहुत बड़ी कामयाबी थी. और इसी से ये भी पता चलता है कि वो लोगों के कितने फेवरेट थे.

एक और चीज़ थी जो चमकीला को उसके साथ के सिंगर्स से अलग बनाती थी. जट्टों के गढ़ पंजाब में एक दलित लोगों के दिलों पर छाया हुआ था. चमकीला एक पिछड़ी जाति से थे. लेकिन फिर भी लोगों ने (खासकर जट्टों ने) उनको उनकी कला के लिए मान बख्शा. और इसी मान के चलते चमकीला अपने साथ के जट्ट सिंगर्स से काफी आगे निकल गए. हालांकि वो अपने गानों में जट्टों का खूब ज़िक्र करते थे. उनके गाने पंजाबी फोक सिंगिंग को ऐसी पहचान देकर गए कि आज भी लोग उन्हें उतने ही चाव से सुनते हैं. और शायद चमकीला ही आज के दौर में गिन्नी माही जैसे दलित सिंगर्स को फख्र से अपनी पहचान खुलकर जाहिर करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं.

चमकीला ने कुल मिलाकर केवल नौ साल गाने गाए. और इन 9 सालों में अपनी गायिकी की वजह से जहां उन्होंने कइयों का दिल जीता, वहीं समाज की सच्चाई बयां करते उनके गानों के बोल कइयों के दिमाग में खटकने लगे. फिर आया मंगलवार का दिन. तारीख थी 8 मार्च, 1988. जगह महसामपुर, जलंधर से करीब 40 किलोमीटर दूर. चमकीला अपनी पत्नी और स्टेज पार्टनर अमरजोत कौर के साथ यहां परफॉर्म करने आए थे. गाड़ी से परफार्मेंस वाली जगह तक जा रहे थे. इसी बीच कुछ युवक मोटर साइकिल पर आए और अंधाधुंध गोलियां चलाईं. कुछ पलों में वे युवक फरार हो गए. पीछे छोड़ गए चमकीला और अमरजोत के मृत शरीर. दोनों के सीने छलनी थे.
चमकीला के कातिल न तो कभी पकड़े गए और न ही कोई खबर लगी. कई अंदेशे लगाए गए. जैसे कि खालिस्तानी आतंकियों ने उनके गानों के बोल की वजह से उन्हें मारा होगा. उनके साथ के प्रतियोगियों ने उन्हें मरवा दिया होगा. एक और एंगल उनकी मौत को दिया गया. वो ये कि अमरजोत जट्ट कौम से थी और चमकीला दलित. इस वजह से भी उन्हें मार दिया गया. करियर के टॉप पर चमकीला और अमरजोत चले गए. पीछे छोड़ गए ऐसे 200 गीतों के बोल भी, जिन्हें गाया जाना बाकी रह गया.

जाते जाते आप चमकीला और उनकी टीम की ये जुगलबंदी देखिए.


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