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किस्से उस नेता के, जिसके चलते मोदी को 6 साल के लिए गुजरात छोड़ना पड़ा था

एक गुजराती बापू फिर चर्चा में हैं. शंकरसिंह वाघेला. एक वक्त पर नरेंद्र मोदी के मित्र और बाद में राजनीतिक दुश्मन हुआ करते थे. कालांतर में कांग्रेस में शरण मिली. पर 14 मई को उन्होंने राहुल गांधी को ट्विटर पर अनफॉलो कर दिया. और पुराने एंटी-बीजेपी ट्वीट डिलीट कर दिए. इसके बाद भी हिम्मत रखते हैं कहने की कि पार्टी जो कहेगी, मैं वही करूंगा. ये भी कह रहे हैं कि मुख्यमंत्री कैंडिडेट साल भर पहले ही घोषित कर देना चाहिए था, अब लेट हो गया है. कुछ दिन पहले ही गुजरात विधानसभा के कुल 57 कांग्रेसी विधायकों में से 36 ने मांग की थी कि वाघेला को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर देना चाहिए. पर गुजरात कांग्रेस के इंचार्ज अशोक गहलोत ने चुप्पी साध ली. कुछ दिन पहले वडोदरा में 77 साल के वाघेला के होर्डिंग्स लगे थे. लिखा था कि चाहे भाजपा आए, चाहे कांग्रेस आए, 2017 में गुजरात में बापू की सरकार बनेगी. वाघेला को गुजरात में बापू कहा जाता है. उनका वैरिफाइड ट्विटर हैंडल भी @ShankersinhBapu है.

# जब नरेंद्र मोदी जिला स्तर के नेता हुआ करते थे, तब वाघेला सांसद हो गए थे.

# जब गुजरात में पहली बार भाजपा की सरकार बनी तो बड़े नेता वाघेला साइड में आ गए, मोदी सुपर सीएम बन गए.

# वाघेला ही वो व्यक्ति थे जिनकी वजह से मोदी को गुजरात 6 साल के लिए छोड़ना पड़ा.

# जब मोदी पीएम बने तो गुजरात विधानसभा में मोदी की प्रशंसा में भाषण देने वाले वाघेला ही थे.

ये गुजरात के बापू शंकरसिंह वाघेला की कहानी है. कड़ी दर कड़ी. सत्तर के दशक से शुरू हुई. अब तक जारी.

‘चिमन चोर’ के नारे तले पनपी जनसंघ

 

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गुजरात छात्र आंदोलन का एक दृश्य

गुजरात में कांग्रेस ही हुआ करती थी. पर जनसंघ ने वहां अपना रास्ता बनाना शुरू कर दिया था. इसके दो स्तंभ बने. एक महाराष्ट्र में आरएसएस का प्रभुत्व और दूसरा पाकिस्तान से आए शरणार्थी. हिंदू नेशनलिज्म जनसंघ का मुख्य राजनीतिक हथियार बना. इसके अलावा कांग्रेस के नेता चिमन पटेल ने भी इनको मौका दे दिया.

1973 में कांग्रेस के चिमन पटेल कांग्रेस के ही घनश्याम ओझा की सरकार को सत्ताच्युत कर खुद मुख्यमंत्री बन बैठे. इस राजनीतिक जीत का जवाब जनता ने दिया. उनको चिमन चोर कहा गया, क्योंकि करप्शन के आरोप थे. मोरबी इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्रों ने मेस को लेकर जो बवाल काटा कि वो नवनिर्माण आंदोलन गुजरात और बिहार होते हुए देश भर में फैल गया. गुजरात के उस छात्र आंदोलन में नरेंद्र मोदी भी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सदस्य के तौर पर शामिल थे. चिमनभाई की सरकार गई. देश में इमरजेंसी लगी. राजनीति बदल गई. आडवाणी और अटलबिहारी की पार्टी जनसंघ से बदलकर भारतीय जनता पार्टी हो गई. इसी इमर्जेंसी के दौर में शंकरसिंह वाघेला भी आरएसएस के सदस्य के तौर पर जेल गए थे. 11 महीने जेल में रहे थे.

पर जनसंघ को ये मौका सिर्फ अपने दम पर नहीं मिला. पूर्व कांग्रेसी नेता मोरारजी देसाई ने इंडियन नेशनल कांग्रेस (ऑर्गनाइजेशन) बना ली थी. 1975 के गुजरात विधानसभा चुनाव में मोरारजी की पार्टी के साथ जनसंघ, भारतीय लोकदल और समता पार्टी भी लड़ीं. 182 में से 75 सीटें कांग्रेस को मिलीं. 56 मिलीं मोरारजी को और वो साथियों के साथ मिलकर सरकार बना ले गए. जनसंघ भी सत्ता में पहुंचा. 1971 के लोकसभा चुनाव में मोरारजी देसाई की पार्टी ने गुजरात की 24 लोकसभा सीटों में से 11 जीती थीं. कांग्रेस को भी 11 ही मिली थीं.

1975 में ही नरेंद्र मोदी ‘पब्लिक राजनीति’ में घुसे. जनआंदोलन के दौरान बनी लोकसंघर्ष समिति के जनरल सेक्रेटरी के पद पर आए. उधर 1977 में हुए लोकसभा चुनाव में आरएसएस कार्यकर्ता शंकरसिंह वाघेला जनता पार्टी से कापड़वंज सीट से सांसद हुए. मोरारजी गुजरात से निकलकर देश के पीएम बने. पर कांग्रेस के विपक्ष में बनी जनता पार्टी का ये प्रयोग फेल हुआ. 1979-80 में फिर लोकसभा चुनाव हुए और वाघेला हार गए. और उसी साल बनी पार्टी भाजपा में शामिल हो गए. 1980 से 1991 के दौरान वाघेला गुजरात में भाजपा जनरल सेक्रेटरी और अध्यक्ष पद पर रहे. इस दौरान नरेंद्र मोदी आरएसएस के प्रचारक के रूप में वो तमाम काम कर रहे थे, जिनकी वॉट्सऐप कहानियां बन गई हैं.

1985 के बाद भाजपा गुजरात में मजबूत होने लगी थी. उसी दौरान भाजपा ने राम मंदिर का मुद्दा भी लपक लिया था. फिर आडवाणी ने गुजरात के ही सोमनाथ मंदिर से अपनी रथ-यात्रा शुरू की. इसका फायदा मिला. गुजरात में पहली बार 1990 में भाजपा सहभागिता में ही सही, सत्ता में आई. विडंबना ये थी कि चिमनभाई पटेल के ही नेतृत्व में ये सरकार बनी थी. चिमन ने फिर ये गठबंधन तोड़ कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बना ली थी. भाजपा को थोड़ा इंतजार करना पड़ा और 1995 के चुनाव में केशुभाई पटेल के नेतृत्व में भाजपा ने गुजरात में सरकार बना ली.

इस दौरान वाघेला का कद बढ़ गया था. वो 1984 से 1989 तक राज्यसभा में रहे. 1989 के लोकसभा चुनाव में वो गांधीनगर से सांसद भी बन गए. 1991 के लोकसभा चुनाव में वो गोधरा से जीते. पर परदे के पीछे ही सही, गुजरात की राजनीति में नरेंद्र मोदी का कद भी बढ़ चुका था. कार्यकर्ताओं में नरेंद्र भाई की खूब धूम थी.

भाजपा की सरकार बनी, पहली बाजी मोदी ने जीती, दूसरी वाघेला ने

 

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शंकरसिंह वाघेला

 

1995 में गुजरात में विधानसभा चुनाव हुए. क्रिस्टोफर जैफरलोट लिखते हैं कि भाजपा ने पिछले दशक के हिंदू नेशनलिज्म को थोड़ा सा घुमा दिया. कम्युनल घटनाओं को देखते हुए केंद्र की कांग्रेस सरकार ने विश्व हिंदू परिषद को बैन कर दिया था. पर ये उलटा पड़ा गया. साधुओं और जोगियों ने गुजरात में हिंदू कैंपने चला दिया. साध्वी ऋतंभरा और कई साधु कांग्रेस पर एंटी-हिंदू होने का आरोप लगाने लगे. इसका भाजपा को फायदा हुआ. पर ज्यादा फायदा इस बात से हुआ कि कांग्रेस पर करप्शन और महंगाई बढ़ाने के आरोप लग रहे थे. भाजपा को ईमानदार प्रशासन के तौर पर देखा जाने लगा था. ये सफल प्रयोग था. हिंदू नेशनलिज्म और ईमानदार प्रशासन, एकदम रामराज का वादा हो रहा था.

1995 में गुजरात में भाजपा की सरकार बनी और सीएम केशुभाई के दाहिने हाथ बने नरेंद्र मोदी. क्योंकि 1988 से 1995 तक सरकार बनने के पीछे मोदी की बहुत बड़ी कोशिश थी. कार्यकर्ताओं को इकट्ठा करने में मोदी का उत्साह बहुत फेमस था. पर ये चीज वाघेला को पसंद नहीं आई. इतने दिन काम करने के बाद भी वो ना तो नंबर एक बन पाए और ना ही नंबर दो. 27 सितंबर को शंकरसिंह वाघेला ने 46 विधायकों के साथ विद्रोह कर दिया. केशुभाई उस वक्त विदेश गए थे इनवेस्टर खोजने. इधर वाघेला गवर्नर नरेश चंद्रा को मेमो दे चुके थे. भाजपा चकित रह गई. आडवाणी ने तुरंत दूत भेजे. पर मामला ठंडा नहीं हुआ. यहां तक कहा गया कि गुजरात भाजपा के जनरल सेक्रेटरी नरेंद्र मोदी को बर्खास्त कर वहां से हटाया जाएगा और वाघेला को मुख्यमंत्री बनाया जाएगा. मोदी के समर्थकों ने हंगामा मचा दिया. केशुभाई को हटाकर वाघेला पक्ष के सुरेश मेहता को गुजरात का मुख्यमंत्री बना दिया गया. अक्टूबर 1995 में नरेंद्र मोदी को दिल्ली भेज दिया गया. वाघेला जीत गए. 2007 में जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब इन्हीं सुरेश मेहता के नेतृत्व में तख्तापलट की भी कोशिश हुई थी.

 

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केशुभाई पटेल और नरेंद्र मोदी

 

1995 में जब भाजपा गुजरात में सत्ता में आई तो वाघेला सीएम पद की दौड़ से खुद को ‘बाहर’ कर चुके थे. पर कुछ महीनों बाद उन्होंने 48 विधायकों को लेकर विद्रोह किया. मध्य प्रदेश के सीएम दिग्विजय सिंह की मदद से खजुराहो में इन 48 विधायकों के रहने का इंतजाम किया गया था. विधायकों को ‘अगवा’ कर समर्थन जुटाने की भारतीय राजनीति की परंपरा में ऐसे कई वाकये हुए हैं. ताजातरीन तमिलनाडु में शशिकला के नेतृत्व में ये हुआ था.

पर साल भर के अंदर ही उन्होंने पार्टी तोड़ ली और अपनी राष्ट्रीय जनता पार्टी बना ली. कांग्रेस के सपोर्ट से मुख्यमंत्री बन गए. उनका राज बढ़िया चला नहीं. 1997 में कांग्रेस प्रेसिडेंट सीताराम केसरी अहमदाबाद गए थे. वहां पर गरजे कि चरित्रहीनता और भ्रष्टाचार होगा तो वाघेला हों या वाघेला, जाना पड़ेगा. इस बार वाघेला को नरम होना पड़ा. पर ये भी चला नहीं. उनको रिजाइन करना पड़ा और उनके साथी विद्रोही दिलीप पारिख मुख्यमंत्री बने. दिलीप पारिख को कुछ दिन पहले उनकी ही विधानसभा में भाजपा के ही समर्थक पीट चुके थे. पुलिस ने उनको बचाया था. मुख्यमंत्री बनने के बाद दिलीप पारिख ने पहला काम किया कि अपनी पत्नी के साथ केशुभाई का आशीर्वाद लेने उनके घर गए. उनकी पत्नी ने कहा कि सब भूलकर मेरे पति को आशीर्वाद दें. केशुभाई नाराज तो थे ही, कहा कि लंच पर फिर आइएगा कभी.

शंकरसिंह वाघेला के मुख्यमंत्री रहते ही कुख्यात गैंगस्टर अब्दुल लतीफ का अहमदाबाद के नरोदा पाटिया में एनकाउंटर हुआ था. लतीफ पर ही शाहरुख खान की फिल्म रईस बनी थी. लतीफ पर 1993 के मुंबई बम ब्लास्ट में शामिल होने के आरोप थे. बाद में लतीफ के बेटों ने शंकरसिंह वाघेला के खिलाफ 2009 और 2014 का लोकसभा चुनाव भी लड़ा था.

पर नरेंद्र मोदी के आगे कोई टिका नहीं, वक्त आया कि वाघेला ने गले लगाकर शुभकामना भी दी

 

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शंकरसिंह वाघेला और नरेंद्र मोदी

 

1998 में फिर विधानसभा चुनाव हुए. इस बार वाघेला लड़े नहीं. उनकी पार्टी को 4 सीटें मिलीं. उन्होंने पार्टी कांग्रेस में मर्ज कर दी. भाजपा दबा के जीती और केशुभाई पटेल फिर मुख्यमंत्री बने. किस्मत की बात केशुभाई फिर सरकार नहीं चला पाए और उसी वक्त भुज में भूकंप आ गया. उनको सीएम पद से हटना पड़ा और नरेंद्र मोदी को ड्रामेटिक अंदाज में तत्कालीन पीएम अटल बिहारी वाजपेयी ने दिल्ली से हटाकर गुजरात का सीएम बना दिया. कहा जाता है कि वाजपेयी ने मोदी से कहा था कि दिल्ली में रहकर मोटे हो गए हो, अब गुजरात जाओ. 1995 से 2001 तक मोदी ने खुद को हर जगह साबित किया था. 1991 में हरियाणा विधानसभा चुनाव में भाजपा को दो सीटें मिली थीं, 1996 में मोदी के अंडर 11 मिलीं. हिमाचल प्रदेश में मोदी के अंडर में 8 से बढ़कर 31 सीटें हो गईं. भाजपा के जनरल सेक्रेटरी के तौर पर मोदी ने पार्टी को मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, झारखंड, बिहार और महाराष्ट्र में खूब फैलाया था. कार्यकर्ताओं में इनकी पॉपुलैरिटी का ही ये आलम था कि पीएम पद के लिए बेजोड़ समर्थन मिला.

 

भाजपा की वेबसाइट से नरेंद्र मोदी की गुजरात विधानसभा में आखिरी स्पीच, इसमें वाघेला ने मोदी की प्रशंसा की थी

उधर कांग्रेस में वाघेला लगातार आगे बढ़ते रहे. 1999 और 2004 में कपड़वंज से लोकसभा पहुंचे. 2004 में वो कैबिनेट मिनिस्टर भी बने. 2009 में कपड़वंज सीट को बदलकर पंचमहल कर दिया गया. इस बार के चुनाव में वाघेला हार गए. 2014 के लोकसभा चुनाव में साबरकंठा से खड़े हुए और फिर हारे. हालांकि 2012 की विधानसभा में विधायक बने थे और लीडर ऑफ अपोजिशन रहे. नरेंद्र भाई मोदी उस वक्त तक मुख्यमंत्री रहे थे. गुजरात में कांग्रेस कमजोर होती रही, क्योंकि उनका चेहरा वाघेला ही थे, जो एक वक्त में आरएसएस कार्यकर्ता थे. नरेंद्र भाई मोदी के लिए ये एम्यूजिंग मोमेंट था क्योंकि कांग्रेस एक प्रचारक से निबटने के लिए पूर्व संघ सदस्य को सामने ला रही थी.

 

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नरेंद्र मोदी की एक तस्वीर, इंडिया टुडे

 

2014 में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो गुजरात विधानसभा में उनको शानदार विदाई दी गई थी. तब नेता प्रतिपक्ष शंकर सिंह वाघेला ने कहा था: अब आपके पास बहुमत है, जाइए और राम मंदिर बनाइए. कश्मीरी पंडितों को वापस बसाइए और दाऊद को वापस लाइए. उनके अंदर का आरएसएस कार्यकर्ता जाग उठा था उस दिन. उस दिन दोनों लोग गले भी मिले थे. 80 के दशक में मोदी और वाघेला एक ही मोटरसाइकिल पर घूमा करते थे. और बाद में बीबीसी के साथ एक इंटरव्यू में वाघेला से पूछा गया था कि मोदी को तो गुजरात दंगों में क्लीन चिट मिल गई है. तो वाघेला ने कहा कि मैं तो यह कहना चाहता था कि अगर उन्होंने गोधरा ना कराया होता तो वो आज पीएम ना होते.

पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने अपनी किताब 2014 द इलेक्शन दैट चेंज्ड इंडिया में लिखा है कि 1995 के गुजरात विधानसभा चुनाव को उन्होंने कवर किया था. भाजपा ने 182 में से 121 सीटें जीती थीं. केशुभाई पटेल सीएम बनने की खुशी मना रहे थे. वहीं बड़े नेता शंकरसिंह वाघेला और कांशीराम राणा भी पार्टी कर रहे थे. वहीं कोने में खड़े थे नरेंद्र मोदी जिन्होंने संगठन के स्तर पर काम कर जीत की स्क्रिप्ट लिखी थी. मोदी ने राजदीप से कहा था कि ये मेरी जिंदगी का सबसे खुशी वाला पल है. 19 मार्च 1995 को केशुभाई जब सीएम बने तो चारों तरफ यही खुसर-फुसर चल रही थी कि सुपर सीएम तो नरेंद्र मोदी हैं. फिर मोदी को गुजरात छोड़कर जाना पड़ा. पर राजदीप से उनके एक दोस्त ने कहा था कि मोदी ने सब छुपा लिया, पर दिल में गुजरात का सीएम बनने की चाहत लिए बाहर गए थे.

गुजरात की जाति का समीकरण

1. 1995 में केशुभाई के मुख्यमंत्री बनते ही नरेंद्र मोदी पर उनको हटाने के षड़यंत्र का आरोप लगने लगा था. केशुभाई, मोदी और वाघेला की लड़ाई में भाजपा टूटने लगी थी. पर मोदी ने सबको पीछे छोड़ा और 2002 में चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बने. 2001 में तो वो पैराट्रूपर की तरह आए थे. इस बार खुद को साबित किया. 2007 में भी जीते और 2012 में भी जीते. 2012 में ही मोदी ने डिक्लेयर किया था कि 182 में से 151 सीटें जीतेंगे. उनका इरादा था कांग्रेस पार्टी से पूर्व मुख्यमंत्री माधवसिंह सोलंकी के 1985 के 149 सीटों के रिकॉर्ड को तोड़ना. सोलंकी ने खाम (KHAM) फॉर्मूले यानी क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और मुस्लिम को मिलाकर बेजोड़ जीत हासिल की थी.

2. केशुभाई पटेल के बाहर होने के बाद नरेंद्र मोदी से पटेल समुदाय नाराज हो गया था. हालांकि आनंदीबेन पटेल को पार्टी में बड़े पद पर लाकर पटेल लोगों को अपने पक्ष में लाने की कोशिश की. ये पाटीदार समुदाय खुद को राजपूत और ओबीसी की तुलना में साइडलाइन मानने लगा था. मोदी खुद ओबीसी समुदाय से आते हैं. इस बार के चुनाव में पटेल या पाटीदार वोट महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले हैं. गुजरात में भाजपा को हार्दिक पटेल के नेतृत्व वाले पाटीदार आंदोलन का सामना करना पड़ा है.

3. गुजरात में क्षत्रिय ओबीसी में आते हैं. वहीं डॉमिनान्ट कास्ट पटेल फॉरवर्ड में आते हैं. कांग्रेस के मुख्यमंत्री माधवसिंह सोलंकी और शंकरसिंह वाघेला क्षत्रिय जाति से आते हैं. ये कास्ट मुसलमानों से उतनी दूर नहीं रहती जितनी कि पटेल कास्ट रहती है.

4. पटेल सरनेम है और समुदाय का नाम पाटीदार है. आर्थिक रूप से ये मजबूत हैं. इनमें भी अपर कास्ट पाटीदार हैं जिनको लेउवा कहा जाता है. लोवर पाटीदार को कडवा कहा जाता है. एक अंजना है जो खुद को चौधरी कहते हैं. ये मेहसाणा, साबरकंठा और बनासकंठा में पाए जाते हैं. चौधरी ओबीसी में आते हैं. तो पाटीदारों में भी एकता नहीं है. सरदार पटेल लेउवा में आते थे. उसमें भी सबसे ऊपर चा-गौम पाटीदार में.

5. आदिवासी वोट इकट्ठा करने के लिए आरएसएस ने एकल विद्यालय आंदोलन चलाया था. इसके माध्यम से आदिवासी लोगों को हिंदुत्व के फोल्ड में लाया गया. कई जगह ये रिपोर्ट्स आईं कि दंगों के दौरान गुजराती आदिवासी बहुत एक्टिव थे. तो कांग्रेस का खाम समीकरण टूट गया.

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