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कौन था बगदादी? कैसे खड़ा किया उसने अपना स्टेट? जानिए शुरुआत से अंत तक की उसकी पूरी कहानी

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अबू बकर अल-बगदादी. इस्लामिक स्टेट, शॉर्ट में ISIS का सरगना. मारा गया. उसकी मौत का ऐलान किया अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने. ट्रंप ने बताया, अमेरिका के स्पेशल फोर्स के एक ऑपरेशन के दौरान बगदादी ने ख़ुद के शरीर में बंधे बम वाला जैकिट को डेटोनेट किया और उसके परखच्चे उड़ गए.

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48 बरस लंबी उम्र ही सही, बगदादी दुनिया का काफ़ी नुकसान कर गया है. उसने आतंकवाद की एक ग्लोबल चेन बनाई. इंटरनेट को अपने टेरर के विस्तार का ज़रिया बनाया. दुनिया के कई देशों में आतंकवाद एक्सपोर्ट किया. हज़ारों युवाओं का ब्रेनवॉश करके उन्हें आतंकवादी बनाया. हज़ारों लोग मारे गए उसकी वजह से. और, इस्लामिक ख़िलाफ़त कायम करने के अपने ऐलान से उसने दुनियाभर के निर्दोष मुसलमानों को मुसीबत में डाला. जो बस इसलिए निशाना बनाए जाते हैं कि बगदादी का और उनका मजहब एक है. जबकि बगदादी और उसके ISIS के हाथों मारे जाने वाले, बर्बाद होने वालों में सबसे ज़्यादा तादाद मुसलमानों की ही है.

कौन था बगदादी?
भारत से उत्तर-पश्चिम की तरफ. अरब सागर के पार. मध्यपूर्व एशिया में बसा है इराक. इरान, सऊदी, सीरिया इन सबके बीच. मध्य इराक में एक ज़िला है- सामरा. यहीं गांव है- अल जल्लाम. जहां का रहने वाला था बगदादी. पैदाइश का साल 1971. पिता भेड़ बेचकर घर चलाते. बच्चों को क़ुरान भी पढ़ाते. पैदाइश के समय उन्होंने बच्चे का नाम रखा- इब्राहिम अव्वाद इब्राहिम अल-बदरी. ‘अबू बकर अल-बगदादी’ ये नाम तो आगे चलकर उसने दिया ख़ुद को. अल जल्लाम, इस गांव में अल-बदरी नाम के एक कबीले की खासी संख्या है. इस कबीले का दावा है कि ये अरब के क़ुरैश कबीले से वास्ता रखते हैं. पैगंबर मुहम्मद भी इसी क़ुरैश कबीले से ताल्लुक रखते थे. ख़लीफ़ा बनने वाले का क़ुरैश कबीले से खून का रिश्ता ज़रूरी है. बाद में जब बगदादी ने ख़ुद को ख़लीफ़ा बताया, तो उसका भी यही दावा था.

दो चीजों में दिलचस्पी थी- धर्म और फुटबॉल
पढ़ाई-लिखाई में बहुत औसत था बगदादी. बताते हैं कि वो बचपन में काफी शर्मीला हुआ करता था. चुप रहता. अलग-थलग सा. उसका बहुत सारा वक़्त उस मस्जिद में बीतता, जहां उसके पिता बच्चों को क़ुरान पढ़ना सिखाते. मस्जिद के कामों में दिलचस्पी थी उसकी. न्यू यॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, बचपन में उसे जानने वाले बताते हैं कि उसका गला काफी मीठा था. हाई स्कूल पहुंचते-पहुंचते ऐसा होता कि इमाम की ग़ैरमौजूदगी में वो नमाज लीड करता.

इस वक़्त तक उसे लगने लगा था कि इस्लाम अपने कट्टर तौर-तरीके में ही माना जाना चाहिए. वो अपने तौर-तरीके, अपनी नज़र का ‘सच्चा इस्लाम’ औरों पर थोपने भी लगा था. उसके एक पड़ोसी ने NYT को बताया कि एक बार उसने टैटू गुदवाया. बगदादी ने जब उसका टैटू देखा, तो उसे ख़ूब भाषण पिलाया. बोला, टैटू हराम है इस्लाम में. एक बार मस्जिद के मालिक को सिगरेट पीता हुआ देखकर बगदादी ने कह दिया था कि जब आप नमाज पढ़ने के लिए खड़े होते हैं, तो आपके सांस की गंध से फरिश्ते दूर भाग जाते हैं. ये सब टीनएज की बातें हैं. इन बातों से लगता है कि अब तक उसका दिमाग ‘सच्चा इस्लाम’ वाले फंडामेंटलिज़म की तरफ मुड़ चुका था. बगदादी को फुटबॉल का खेल बेहद पसंद था. खेल का पसंदीदा हिस्सा, जब वो गोल दागता. जब गोल मिस हो जाता, तो वो बेहद निराश हो जाता.

पढ़ाई का खर्च निकालने को क़ुरान पढ़ाता, फुटबॉल की कोचिंग देता
साल 1991 में सामरा हाई स्कूल से पढ़ाई पूरी की उसने. यूनिवर्सिटी की पढ़ाई के लिए इसी साल बगदादी गया बगदाद. उम्र, 20 साल. शरिया कॉलेज ऑफ बगदाद यूनिवर्सिटी में विषय चुना- क़ुरानिक रिसाइटेशन. फिर मास्टर्स की पढ़ाई के लिए सद्दाम यूनर्विसिटी में दाखिला लिया. पढ़ाई का ख़र्च निकालने के लिए वो बगदाद के ही अल-हाजी ज़ैदान मस्जिद में क़ुरान पढ़ाता. यहां उससे पढ़ने वाले उसको बुलाते- शेख इब्राहिम. इसके अलावा वीकेंड्स पर वो एक फुटबॉल टीम को भी कोचिंग देता. यहां मौका देखकर वहाबिज्म से जुड़ी पर्चियां भी बांटता.

कट्टरपंथियों के संपर्क में कैसे आया?
एक इस्लामिक मूवमेंट था- मुस्लिम ब्रदरहुड. मिस्र में शुरू हुआ. साल था 1928. शुरू किया था हसन अल-बन्ना ने. हसन का कहना था कि इस्लाम को एक रिवाइवल की ज़रूरत है. इससे मुस्लिम समाज पश्चिम की बराबरी में आ सकेगा और साम्राज्यवादी ताकतों से आज़ाद हो सकेगा. ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ आधुनिक इस्लामिक समाज को क़ुरान और हदीस की बताई राह पर चलाना चाहते थे. ये मूवमेंट मिस्र से निकलकर सीरिया, लेबनान, सूडान कई जगहों पर फैला. इसकी कुछ शाखाएं हिंसा के रास्ते पर भी चलीं. ऐसी ही एक शाखा को जॉइन किया था बगदादी ने. जहां वो इस्लामिक लड़ाकों के संपर्क में आया. शायद यहीं से बगदादी सलफ़ी नेटवर्क से जुड़ा.

क्या है सलफ़ी इस्लाम?
सलफ़ी इस्लाम की एक कट्टरपंथी शाखा है. सलफ़ी शब्द बना है अरबी के ‘अल-सलफ़ अल-सलीह’ से. जिसका मतलब होता है, मुस्लिमों की पहली तीन पीढ़ियां. जिसकी शुरुआत होती है पैगंबर मुहम्मद के साथियों, सहयोगियों से. शुरुआती मुसलमान. सलफ़ी मानते हैं कि पैगंबर मुहम्मद के समय मुसलमानों के लिए जो तौर-तरीके कायम हुए थे, वही सच्चा इस्लाम है. इस्लाम का शुद्ध रूप है. उसे ही माना जाना चाहिए. ऐसा नहीं कि सलफ़ी विचारधारा मानने वाले सारे लोग हिंसा और आतंक के रास्ते पर हों. हां, इसे मानने वाले कई लोग, जैसे बगदादी ख़ुद, एक इस्लामिक विश्व बनाने की बात करते हैं. हिंसा और आतंक के दम पर.

इराक पर अमेरिका का हमला
जॉर्ज बुश और टोनी ब्लेयर. दोनों की विरासत- 2003 में इराक पर हुआ हमला. इस समय तक बगदादी का खासा लिंक बन चुका था सलफ़ी जिहादियों के नेटवर्क में. वो जैश अल-सुन्ना नाम के एक इनसर्जेंट ग्रुप से भी जुड़ा था. 2004 में एक दिन जब बगदादी अपनी ससुराल में था, तब अमेरिकी सेना ने वहां छापेमारी की. छापेमारी हुई थी बगदादी के साले के लिए. उसने अमेरिका के खिलाफ हथियार उठाया था. साथ में बगदादी भी अरेस्ट कर लिया गया. गिरफ़्तार कैदियों को अमेरिका में संतरी रंग के कपड़े पहनाते हैं. जो कि बगदादी को भी पहनने पड़े. आगे चलकर वो जब ISIS का सरगना बना और उसके लोग विदेशियों के गला काटने वाला विडियो बनाकर इंटरनेट पर डालते, तो उनमें भी मारे जाने वाले शख्स को नारंगी रंग का ही जंपसूट पहनाया गया होता था.

ये बगदादी के डिंटेशन के समय का फॉर्म है. जब वो 11 महीने अमेरिकी कैद में रहा था (फोटो: Norddeutscher Rundfunk)
ये बगदादी के डिंटेशन के समय का फॉर्म है. जब वो 11 महीने अमेरिकी कैद में रहा था (फोटो: Norddeutscher Rundfunk)

11 महीने अमेरिका की कैद में रहा बगदादी
US आर्मी को बगदादी के जिहादी कनेक्शन की जानकारी नहीं थी. उन्होंने उसको सिविलियन अरेस्ट जैसा बरता. अरेस्ट के रेकॉर्ड में इब्राहिम को नौकरीपेशा बताया गया है. लिखा है- अडमिनिस्ट्रेटिव वर्क (सेक्रटरी). बगदादी डिटेंशन सेंटर में रखा गया. वो धार्मिक गतिविधियों में मन लगाता. उसने ज़ाहिर भी नहीं होने दिया कि उसका जिहाद से कोई ताल्लुक है. यहां कैंप में लोग फुटबॉल खेलने में उसके गुर देखकर उसको ‘मराडोना’ पुकारते थे. यहां उसकी मुलाकात बड़े जिहादी लड़ाकों से हुई. जिनकी मदद से आगे चलकर बगदादी को जिहादी नेटवर्क में ख़ूब तरक्की मिली. कैदियों की सज़ा की समीक्षा होती थी समय-समय पर. ये देखने के लिए कि फलां कैदी को अभी बंद रखना है कि रिहा करना है. ये तय करने के लिए था कम्बाइंड रिव्यप ऐंड रिलीज़ बोर्ड. इसने बगदादी के स्टेटस पर विचार करते हुए राय दी थी- लो लेवल प्रिज़नर. 11 महीने की कैद के बाद दिसंबर 2004 में बगदादी को रिहाई मिल गई. आने वाले सालों में अमेरिका को इस बात का बहुत अफ़सोस होने वाला था.

अल-क़ायदा चैप्टर
इराक में चल रही अमेरिकी लड़ाई में अमेरिका के विरुद्ध ख़ूब सारे जिहादी जुड़े. बगदादी इसी नेटवर्क का हिस्सा था, मगर साथ-साथ पढ़ाई भी चालू थी उसकी. साल 2007 में उसने अपनी PhD पूरी की. ये वो समय था, जब इराक़ में अल-क़ायदा की ब्रांच का सरगना अबू मूसाब अल-ज़रक़ावी अमेरिका के हवाई हमले में मारा गया. ज़रक़ावी पढ़ा-लिखा नहीं था. क्रूर भी हद था. उसकी क्रूरता को लानतें मिला करती थीं. अल-क़ायदा को लगा, ऐसे सरगनाओं के होते तो पब्लिक सपोर्ट मिलने से रहा. ऐसे में क़ुरान की पढ़ाई-लिखाई में डिग्री हासिल किए बगदादी को ख़ूब तरक्की मिली. हालांकि ये अलग बात थी कि आगे चलकर यही बगदादी दुनिया का सबसे क्रूर आतंकी होने वाला था. ख़ैर, तो ज़रक़ावी की जगह ली अबू अयूब अल-मरसी ने. मरसी ने अक्टूबर 2006 में इस्लामिक स्टेट इन इराक (ISI) शुरू किया. इसका सरगना बनाया बगदादी को. अप्रैल 2010 में एक अमेरिकी हमले में मरसी मारा गया. मरसी की जगह ली बगदादी ने.

गोल्डन अपॉरच्यूनिटी: सीरिया का सिविल वॉर
इराक की पश्चिमी सीमा जुड़ी है सीरिया से. वहां सत्ता थी बशर अल-असद की. 2011 में असद विरोधी लहर शुरू हुई सीरिया में. गृह युद्ध छिड़ गया. सब लड़ रहे थे एक-दूसरे से. असद और विरोधी गुट. फिर असद के विरोध में अमेरिका और उसके सहयोगी. असद के समर्थन में रूस और ईरान. सुपरपावर्स का नया अड्डा बन गया सीरिया. इसमें एक ऐंगल बना बगदादी. बगदादी को लगा, सीरिया की इस मार-काट में उसके लिए मौका है. इराक और सीरिया की सीमाएं जुड़ी हुई थीं. आर-पार होना मुश्किल नहीं था. बगदादी के भेजे उसके एक सहयोगी अबू मुहम्मद अल-जुलानी ने 2012 में सीरिया जाकर ‘जभात अल-नुसरा’ नाम का आतंकी नेटवर्क खड़ा किया. ये सीरिया में अल-क़ायदा की फ्रेंचाइजी थी.

अप्रैल 2013 में बगदादी ने ISI का नाम बदलकर रखा- इस्लामिक स्टेट इन इराक ऐंड अल-शम. ये 'अल-शम' सीरिया के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक नाम है (फोटो: AP)
अप्रैल 2013 में बगदादी ने ISI का नाम बदलकर रखा- इस्लामिक स्टेट इन इराक ऐंड अल-शम. ये ‘अल-शम’ सीरिया के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक नाम है (फोटो: AP)

ISI से ISIS
2012 से 2013 के बीच बगदादी ने एक खास ऑपरेशन चलाया. उसका ISI जेल में बंद आतंकियों को भगा लाता था. इनमें से ज़्यादातर ऐसे आतंकी थे, जो अल-क़ायदा इराक का हिस्सा हुआ करते थे. बगदादी लगातार अपनी ताकत बढ़ा रहा था. मार्च 2013 में सीरिया के रक्का में असद के विरोधी गुट को जीत मिली. मगर रक्का में अकेले विरोधी गुट नहीं था. नुसरा फ्रंट और ISI भी था यहां. बगदादी भी इराक से सीरिया पहुंच गया. अप्रैल 2013 में उसने ऐलान किया, अब से नुसरा उसके संगठन का हिस्सा है. इसका नाम बदलकर ‘इस्लामिक स्टेट इन इराक ऐंड सीरिया’ (ISIS) रख दिया बगदादी ने. मगर जुलानी इसके लिए राज़ी नहीं था. इस समय अल-क़ायदा का सरगना था जवाहिरी. इससे वफ़ादारी थी जुलानी की. अब जुलानी और बगदादी की ठन गई. अल-क़ायदा और ISIS की अपनी लड़ाई छिड़ गई.

बगदादी एक साथ इराकी सेना और विरोधी जिहादी नेटवर्क्स, दोनों को टारगेट कर रहा था. इराक की अराजकता और सीरिया में छिड़ी मारा-मारी का फ़ायदा उठाया उसने. उसे कामयाबी भी मिली. इराक के फल्लुजाह और रमादी जैसे इलाके ISI के कब्जे में चले गए. जनवरी 2014 आते-आते रक्का भी ISIS का हो गया. बगदादी की मनमानी से नाराज़ जवाहिरी ने फरवरी 2014 में बगदादी के संगठन को अल-क़ायदा से अलग कर दिया. ISIS और विस्तार करता गया. हालांकि रक्का बहुत माकूल जगह नहीं थी. बहुत कन्फ्लिक्ट ग्रुप थे यहां. बगदादी को इससे सुरक्षित, इससे मुनासिब जगह चाहिए थी. जो उसे मिली सरहद पार इराक में.

ये जुलाई 2014 की तस्वीर है. बगदादी मोसुल की अल-नूरी मस्जिद से अपने खलीफा होने का ऐलान कर रहा है. 2017 में मोसुल जंग के खात्मे से कुछ दिनों पहले ISIS ने इस मस्जिद में धमाका किया. बिल्कुल बर्बाद हो गई इमारत.
ये जुलाई 2014 की तस्वीर है. बगदादी मोसुल की अल-नूरी मस्जिद से अपने खलीफा होने का ऐलान कर रहा है. 2017 में मोसुल जंग के खात्मे से कुछ दिनों पहले ISIS ने इस मस्जिद में धमाका किया. बिल्कुल बर्बाद हो गई इमारत.

…और जब दुनिया ने पहली बार बगदादी को जाना
इराक के उत्तरी हिस्से में तिगरिस नदी के किनारे बसा एक प्रांत है- मोसुल. जून 2014. बगदादी के करीब 700 लड़ाके ट्रकों में भरकर मोसुल की तरफ रवाना हुए. वहां इराकी सेना की पांच डिवीज़न तैनात थीं. आतंकियों का सामना करने की जगह वो सिर पर पांव रखकर भाग गए. और इस तरह मोसुल और वहां रहने वाली तकरीबन 14 लाख की आबादी बगदादी की गुलाम बन गई. यहीं मोसुल की अल-नूरी मस्जिद में बगदादी ने ऐलान किया. कि वो दुनियाभर के मुसलमानों का नया खलीफ़ा है. मोसुल उसकी राजधानी है. अगर आपने बगदादी की तस्वीर देखी हो, तो संभावना यही है कि आपने उसी दिन वाली उसकी तस्वीर देखी होगी. इसके बाद बगदादी और उसके ISIS को दुनिया जानने लग गई. ISIS का काला झंडा आतंक का पर्यायवाची बन गया. पूरब में निनवा के मैदानों से उत्तर में सिनजर की पहाड़ियों तक. दक्षिण में सीरिया के देर अल-ज़ार के ऑइल फील्ड से पलमायरा तक. ISIS ने साम्राज्य खड़ा कर लिया. इसके और भी नाम थे. जैसे- ISIL. दाएश.

ISIS: आतंक
मोसुल से भागी इराकी सेना अपने पीछे अमेरिका से मिले हथियार भी छोड़ गई थी. सब लूट लिया ISIS ने. तेल के कुओं पर कब्जा कर लिया इन्होंने. सीरिया और तुर्की को कच्चा तेल बेचने लगे. टैक्स वसूलने लगे. सोशल मीडिया को औज़ार बनाकर लोगों का ब्रेनवॉश किया. सपोर्टर्स को फील दिया कि वो कहीं भी हों, ISIS के नागरिक हैं. दुनियाभर से हज़ारों लोगों ने इराक पहुंचकर ISIS जॉइन किया. अपना एक स्टेट बना लेना, इतने बड़े स्तर पर अपनी समानांतर अर्थव्यवस्था खड़ी कर लेना, ये शायद ISIS की सबसे बड़ी कामयाबी थी.

ISIS के राज में घोर नृशंसता हो रही थी. सबसे बुरा हाल था यजिदी समुदाय का. लोग ज़िंदा जलाए जा रहे थे. चौराहे पर लोगों को फांसी लटकाया जा रहा था. पत्थर मारकर जान ली जा रही थी. चोरी करने वालों के हाथ काट दिए जाते थे. लोगों का गला काटने वाले विडियो ऑनलाइन पोस्ट किए जा रहे थे. औरतें और बच्चे सेक्स के लिए गुलाम बनाए जा रहे थे. उनके इलाके में लोगों को शादी करने पर ISIS से लाइसेंस लेना पड़ता. वो बच्चों का बर्थ सर्टिफिकेट बनाते थे. उसके समर्थकों के लिए इराक-सीरिया आकर संगठन जॉइन करने के अलावा भी विकल्प था. वो जहां हैं, वहीं वुल्फ अटैक करें. अटैक से पहले कोई विडियो या कोई मेसेज छोड़ जाएं, जिसमें बगदादी के प्रति समर्थन जताया गया हो. कहीं चाकू चलाकर लोगों की जान ले लें. कभी भीड़ पर गाड़ी चढ़ा दें. दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में ISIS से प्रेरित लोन अटैकर्स आतंकी हमले करने लगे. पैरिस. बेल्जियम. बेरूत. और, फिर वो मोमेंट भी आया जब इन्होंने रूसी विमान को उड़ाकर 224 लोगों की जान ले ली.

अमेरिका ने कब शुरू किया डायरेक्ट हमला?
22 सितंबर, 2014. ISIS के प्रवक्ता अबू मुहम्मद अल अदनानी ने अमेरिका और फ्रांस जैसे मुल्कों के नागरिकों पर हमले की अपील जारी की. और इसके एक दिन बाद अमेरिका ने सीरिया में ISIS पर पहला हवाई हमला किया. इसके बाद ISIS का डाउनफॉल शुरू हुआ. उसका आख़िरी स्ट्रॉन्गहोल्ड बचा मोसुल. यहां ISIS को हराने के लिए जंग शुरू हुई अक्टूबर 2016 में. ज़मीन पर इराकी सेना. आसमानी हमला अमेरिका. ISIS मोसुल के हज़ारों लोगों को अपनी ढाल बनाकर इस्तेमाल कर रहा था. जो भागने की कोशिश करते, उन्हें मार दिया जाता. बहुत मुश्किल थी ये जंग. हज़ारों जानें गईं. आख़िरकार 9 जुलाई, 2017 को इराक के PM हैदर अल-अबदी ने ऐलान किया. कि मोसुल को ISIS से आज़ाद करा लिया गया है. मगर बगदादी हाथ नहीं आया था. वो मोसुल से भाग चुका था. दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में भी ISIS को तगड़ी चोट मिल रही थी. उसके हज़ारों आतंकी मारे गए. बड़े-बड़े कमांडर मारे गए. मगर इराक-सीरिया से तितर-बितर हुए उसके आतंकी दुनिया के कई हिस्सों में फैल गए हैं. नए बेस बना रहे हैं.

श्रीलंका में हुए सीरियल ब्लास्ट के बाद बगदादी का एक विडियो आया. उसी का एक फ्रेम है ये (फोटो: AP)
 अप्रैल 2019 में श्रीलंका के अंदर हुए सीरियल ब्लास्ट के बाद बगदादी का एक विडियो आया. उसी का एक फ्रेम है ये (फोटो: AP)

 

जाते-जाते
लंबे समय तक बचने के बाद अब बगदादी के मारे जाने की पुष्टि हुई है. वो अपने पीछे हज़ारों प्रशिक्षित आतंकी छोड़ गया है. एक आतंकी संगठन, एक आतंकी सरगना के मारे जाने से आतंकवाद ख़त्म नहीं होता. उसके आतंकी अलग-अलग जगहों पर फैल जाते हैं. अपने लिए पनाहगाह खोज लेते हैं. नए संगठन बना लेते हैं. और इस तरह आतंक का नेटवर्क फैलता जाता है. ISIS के पांव जमाने के लिए इराक और सीरिया में बेहद उपजाऊ ज़मीन थी. गृह युद्ध. कमज़ोर सरकार. अराजकता. सांप्रदायिक नफ़रत. सेक्टेरियन डिवाइड. करप्ट सिस्टम. बेरोज़गारी. ये सारे तत्व दुनिया के कई हिस्सों में मौजूद हैं. ऊपर से ISIS ने सोशल मीडिया को अपना हथियार बनाकर, इसके सहारे ख़ुद का नेटवर्क इतना ग्लोबल बनाकर आतंकियों के सामने एक सक्सेस स्टोरी रखी है. सोशल मीडिया कंपनियों को अपना सिस्टम दुरुस्त करना होगा. ताकि टेरर ऑर्गनाइजेशन रिक्रूटमेंट के लिए, अपनी आतंकी विचारधारा फैलाने के लिए और लोगों का ब्रेनवॉश करने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल न कर सकें. कुल मिलाकर चुनौतियां बहुत हैं दुनिया के सामने. इतनी कि एक बगदादी का मारा जाना काफी नहीं है.


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