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फ्रांस में जो प्रेसिडेंट बने हैं, उनको वहां का अरविंद केजरीवाल कह सकते हैं

39 साल के मैक्रन फ्रांस के प्रेसिडेंट बन गए हैं. इंडिया में पैरेंट्स कहेंगे कि इस उम्र में तुम क्या कर रहे हो. लेकिन जब उनको ये बता दें कि मैक्रन ने अपने से 24 साल बड़ी लड़की से शादी भी की है तो पैरेंट्स चप्पल ले के दौड़ा लेंगे.

फ्रांस के प्रेसिडेंशियल चुनाव में इमैनुएल मैक्रन जीत गए हैं. प्रबल उम्मीदवार मानी जानेवाली राइटिस्ट मरीन ला पैन हार चुकी हैं. आज जब दुनिया में राइटिस्ट कैंडिडेट हर जगह जीत रहे हैं, मैक्रन की जीत एक अलग रास्ता बनाती है. क्योंकि मैक्रन राइटिस्ट लोगों के अपोजिट लेफ्ट नहीं हैं. मैक्रन एक अलग राजनीति लेकर आए हैं. फ्रांस ने हमेशा ही दुनिया की राजनीति को रास्ता दिखाया है. मैक्रन की जीत फिर से एक नया रास्ता है. हालांकि ये कहना मुश्किल है कि यही सही रास्ता होगा. पर नई चीज तो हुई है.

मैक्रन ना तो लेफ्ट हैं, ना ही राइट, वो अपॉर्चुनिस्ट हैं

6 अप्रैल 2016 को मैक्रन ने अपनी पार्टी एन मार्शे लॉन्च की थी. एक छोटे से कमरे से. लोगों ने कहा था कि सब हवा-हवाई है. साल भर बाद मैक्रन प्रेसिडेंट बन चुके हैं. मौकापरस्त इसलिए कहा गया क्योंकि जब सारे लोग ला पैन को हराने में लगे थे और खुद हार रहे थे, इन्होंने वही बातें बोलीं जो इनको सबसे अलग कर रही थी. थक-हार के बाकी पार्टियों ने मैक्रन को सपोर्ट किया. क्योंकि उनको ला पैन को हराना था. ऐसा नहीं था कि मैक्रन की नीतियां उनको पसंद हैं, पर कोई चारा नहीं था. अभी असेंबली में मैक्रन की पार्टी का एक भी सांसद नहीं है. जून में इसके लिए चुनाव होगा. तब देखना होगा कि मैक्रन क्या करते हैं.

 

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15 साल के मैक्रन

रिफ्यूजी लोगों के मुद्दे पर ला पैन ने बेहद कड़ी बातें बोली थीं. इसलिए फ्रांस के लिबरल समाज में उनकी लोकप्रियता चुनाव जीतने लायक नहीं बढ़ी. पर इसका मतलब ये नहीं है कि मैक्रन ने रिफ्यूजी लोगों के पक्ष में बोला था. मैक्रन ने भी कहा था कि माइग्रेंट क्राइसिस का कोई आसान उपाय नहीं है. अगर होता तो मिल गया होता. इसके नियम देखे जाएंगे. मैक्रन ने ये बात उतनी तीखी नहीं बोली थी.

15 साल की उम्र में मैक्रन के डॉक्टर पैरेंट्स ने उनको पैरिस भेज दिया. क्योंकि इनका अफेयर खुद से 24 साल बड़ी इनकी ड्रामा टीचर ब्रिजिट से चल रहा था. पर मैक्रन ने वादा किया था कि शादी तो करेंगे ही. ब्रिजिट इसके लिए तैयार नहीं थीं. लेकिन मैक्रन लगातार बात करते रहे. समझाते रहे और अंत में इनकी इंटेलिजेंस और ईमानदारी पर तीन बच्चों की मां ब्रिजिट ने अपने पति से तलाक लेकर इनसे शादी कर ही ली. उस वक्त मैक्रन 30 के थे और ब्रिजिट 54 की. आज मैक्रन की हर सभा में ब्रिजिट सबसे आगे ही बैठी रहती हैं. मैक्रन के विरोधियों ने ये आरोप लगाया था कि मैक्रन गे हैं और पत्नी से शादी का नाटक कर रहे हैं. पर मैक्रन ने एक सभा में क्लियरली बात करते हुआ कहा कि ऐसा कुछ नहीं है.

 

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मैक्रन फ्रैंक हॉलैंड के साथ

 

मैक्रन पिछले प्रेसिडेंट फ्रैंक हॉलैंड की सरकार में मंत्री थे. उनको फ्रैंक का प्यारा कहा जाता था. लोग ये भी कहते थे कि फ्रैंक के दिमाग पर मैक्रन का पूरा अधिकार रहता है. फ्रैंक बेहद अनपॉपुलर हो गए थे. इसलिए चुनाव लड़े भी नहीं. और मौके को भांपते हुए मैक्रन ने मंत्री पद से रिजाइन देकर अपनी राजनीति खड़ी कर ली.

पर हर तरह की पॉलिटिक्स को समझते चले गए

मैक्रन ने कभी पॉलिसी को लेकर क्लियर बात नहीं की. भारत के नेताओं की ही तरह लंबे-चौड़े वादे किए. जैसे कि 4 लाख करोड़ रुपये का प्लान जिससे जॉब की ट्रेनिंग होगी. किस तरह की, पता नहीं. रिन्यूएबल एनर्जी और इन्फ्रास्ट्रक्चर का मॉडर्नाइजेशन करेंगे. उन्होंने ये भी कहा कि कॉर्पोरेशन टैक्स कम करेंगे, बेरोजगारी 9.7 प्रतिशत से कम कर के 7 प्रतिशत करेंगे. और जो वादा अरविंद केजरीवाल ने एमसीडी चुनाव में किया कि हाउसिंग टैक्स खत्म करेंगे, वो वादा मैक्रन ने भी किया था. ये भी कहा था कि स्कूलों में 15 साल के कम उम्र के बच्चों पर फोन के इस्तेमाल को लेकर पाबंदी लगेगी.

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पहले राउंड की वोटिंग में मैक्रन को 24 प्रतिशत वोट मिले थे और दूसरे राउंड में 66 प्रतिशत वोट मिले थे.

केजरीवाल से उनकी साम्यता काफी है. पहले तो उन्होंने सारी पॉलिटिक्स समझी और मौका देखकर अपनी पॉलिटिक्स खड़ी कर ली. जिसमें किसी भी पुरानी राजनीति की बात नहीं की गई. केजरीवाल की ही तरह उन्होंने अपनी वाइफ को हमेशा प्रधानता दी. और केजरीवाल की ही तरह वादे भी किए. ऐसा भी नहीं है कि दोनों लोग एक-दूसरे की परछाईं हैं, लेकिन राजनीति काफी हद तक मिलती-जुलती है. तीन साल पहले मैक्रन को फ्रांस की पब्लिक में कोई नहीं जानता था. ठीक इसी तरह 2011 से पहले अरविंद की पब्लिक में कोई पहचान नहीं थी.

24 अप्रैल 2017 को मरीन ला पैन और इमैनुएल मैक्रन ने टीवी डिबेट की तैयारी शुरू कर दी. क्योंकि पहले राउंड में जनता ने देश की पुरानी दो पार्टियों को छोड़कर इन नए लोगों को चुना था अगले राउंड के लिए. इसी के बाद मुद्दा जोर पकड़ने लगा कि ला पैन ने शरणार्थियों पर कड़ी टिप्पणी की है. ये भी कहा है कि मस्जिद और मदरसे बंद कर दिए जाएंगे. हालांकि एक प्रयास मैक्रन पर भी हुआ. इनकी पार्टी के खिलाफ कई ईमेल 6 मई को रिलीज किये गए. ये ईमेल पार्टी की वेबसाइट को हैक कर के निकाले गये थे. पर वहां के इलेक्शन कमीशन ने इस ईमेल को रिलीज होने से रोक दिया. ठीक यही तरीका हिलेरी क्लिंटन के खिलाफ अमेरिका में अपनाया गया था. और लीक्ड ईमेल के चलते बहुत फेक न्यूज जेनरेट हुई जो कि हिलेरी की हार के तमाम कारणों में से एक बना.

पहले राउंड की वोटिंग में मैक्रन को 24 प्रतिशत वोट मिले थे और दूसरे राउंड में 66 प्रतिशत वोट मिले थे.
मैक्रन के मुताबिक जब वो सिविस सर्विस में थे और नाइजीरिया में पोस्टेड थे, तब उन्होंने टीवी पर एक प्रोग्राम देखा जिसने उनकी राजनीतिक जिंदगी बदल दी. ये साल 2002 था. उस वक्त मरीन ला पैन के पापा जॉन मैरी ला पैन प्रेसिडेंशियल इलेक्शन के फाइनल राउंड तक पहुंचे थे. उस वक्त मैक्रन को एहसास हुआ कि अगर मेनस्ट्रीम पॉलिटिकल पार्टियां खुद को नहीं बदलेंगी तो राइटिस्ट और नेशनलिस्ट पार्टियां सत्ता में आ जाएंगी.

 

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मैक्रन अपनी पत्नी के साथ

2006 में मैक्रन ने फ्रेंच सोशलिस्ट पार्टी जॉइन कर ली. पर उन्होंने पार्टी को बदलने की कोशिश नहीं की. द गार्जियन के मुताबिक आज वो कहते हैं कि मैं सोशलिस्ट नहीं हूं. जब राइट विंग के निकोलस सारकोजी प्रेसिडेंट बने तो मैक्रन उनकी हेल्प के लिए बने कमीशन में शामिल थे. वहीं पर उनकी मुलाकात देश के टॉप बिजनेसमेन, बैंकर्स, बिजनेस लीडर्स, ट्रेड यूनियन के नेताओं सबसे मुलाकात हुई और रिश्ते बने. लोग कहते हैं कि यहीं पर मैक्रन ने हर तरह की पॉलिटिक्स से डील करना सीख लिया. बाद में वो रोथ्सचाइल्ड इन्वेस्टमेंट बैंक में शामिल हो गए. जहां पर आर्ट ऑफ सेडक्शन सीखा. कि लोगों को कैसे समझा के अपने पक्ष में लाया जाए. वॉल स्ट्रीट जर्नल से बात करते हुए मैक्रन ने कहा कि यहां पर आप एक वेश्या की तरह हैं. लोगों को सेड्यूस करना आपका काम है.

द गार्जियन के मुताबिक इनके क्लोज दोस्त मार्क फेरेक्की बताते हैं कि मैक्रन को पैसों की भूख नहीं है. उनको महंगी घड़ियां नहीं चाहिए. उनको पैसा बस इसलिए चाहिए कि फ्रीडम मिल जाए काम करने की. शुरू से ही मैक्रन बस फ्री रहना चाहते हैं. जब अपना शहर छोड़ा तो बस इसलिए कि फ्री होकर ब्रिजिट से अपने रिश्ते बना सकें. जब रोथ्सचाइल्ड गए तो बस इसलिए कि पैसों की झंझट से फ्रीडम मिल जाए. और जब मंत्री पद छोड़ा तो बस इसलिए कि पॉलिटिकल फ्रीडम मिल जाए. ये फ्रीडम ही उनकी चॉइस डिसाइड करती है.

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