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मगर बैचलर्स की मजबूरी कोई नहीं समझता है

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जैसा कि मनोज वाजपेयी ने ‘अलीगढ़’ में पूछा है. ‘क्या बैचलर आदमी टेररिस्ट होता है?’ पता नहीं! पर जाने क्यों मकानमालिकों को लगता है. इन्हें लगता है. बैचलर है. जाने किस रात सामान समेत निकल ले. जाते-जाते पंखा भी खोल ले जाएगा. ट्यूबलाईट का इलेक्ट्रिक चोक भी छोड़े न छोड़े. यही दिक्कत उन्हें शादीशुदा या फैमिली वालों के साथ कभी नहीं होती. उन्हें तो डबल बेड निकालने में ढ़ाई दिन लगेंगे, किराया मार के भाग तो न जाएंगे

बैचलर लड़का या लड़की किसी के घर मकान लेने जाए तो सबसे पहले तो ऐसे सहम जाते हैं मानो घिचकी पर एके-47 धरकर अलकायदा ने ट्रेनिंग कैंप लगाने कि घोषणा कर दी हो. बाद में इत्ती लंबी-चौड़ी पूछताछ होगी कि महसूस होता है ये अमेरिका के किसी एयरपोर्ट के सुरक्षाकर्मी हैं और हम ससुरे शाहरुख खान.

माथे पर गिट्टी घुसने के निशान से लेकर अंगूठे में अंगूठी काहे पहनते हो तक पूछ लिया जाता है. सारी जांच ऐसी होती है कि किसी भी निशानदेही से ये तय कर दें कि तुम सुसरे जरायमपेशा हो. क़त्ल होते वक़्त मरने वाला निशान दे गया है. कुछ तो बाकायदा जाति भी पूछ लेते हैं, गोया आप घर किराए से लेने नहीं. इनके लहुरे बेटे के लिए अपनी मंझली बिटिया का रिश्ता लेकर आए हो.

ले-देकर किसी जिगर वाले ने घर दे भी दिया तो उसकी पहली शर्त यही होती है कि लड़के-लड़कियां नहीं आएंगे. लड़कियां काहे नहीं आएंगी बे? लड़कियां आने से तुम्हारी दीवारें प्रेग्नेंट हो जाएंगी क्या? इनकी टोका-टाकी और तांका-झांकी इतनी होती है कि आपको कभी रिश्तेदारों की कमी महसूस नहीं होती. बेडरूम में कैमरा लगाने के अलावा ये आपकी जिंदगी में घुसने के हर संभव प्रयास कर डालते हैं. आप रात दस के पहले घर आ जाओ, मां-बाप भी मिलने आएं तो दस दिन पहले बताओ. कुछ मकानमालिक तो चेस्टिटी बेल्ट सरीखे लगने लगते हैं. उनका एकमात्र लक्ष्य रहता है आपका कौमार्य अक्षुण्ण रहे.

आप चाहे पानी के टुल्लू का बिल मीटर के हिसाब से दे रहे हों और खाने से ज्यादा खर्च बिजली में कर रहे हों. मकान मालिक की समस्या नहीं टलती. उन्हें हमेशा संसाधनों का फूंका पड़ा रहेगा. बिल के पैसे देने के बाद भी ये बिल ज्यादा आने पर लिए ऐसे कल्लाएंगे मानो बिल पर इनसे चक्रवृद्धि ब्याज वसूला जा रहा हो. ये आप गिनकर बता सकते हैं आप आज सुबह साट मिनट तेईस सेकंड नहाए हैं. जिसमें ब्रश करने वाले साढ़े तीन मिनट अलग से गिनाएंगे.

इंदौर में रहता था. अग्रवाल जी के यहां. एक तारीख को महीना पुजता. एक बार पैसे थे तो 25 तारीख को ही किराया दे दिया. अगली बार वो 20 तारीख को कुंडी खटखटा बैठे. भिया पेसे! ऐसे भी मकान मालिक मिलते हैं. आप कलेजा निकालकर इनको परोस दो, जवाब आएगा जीरावन होता तो ज्यादा मजा आता.

फिर मनाइए कि अगल-बगल वाले सही निकलें. सबसे ज्यादा दुःख उन लोगों के पड़ोस में रहना होता है. जिनके हिस्से की दुनिया खुलते ही ऐसा भभका आता है कि नथुने अपनी सारी कोशिशों के बाद भी गोबर में दते बम्ब सरीखे फट जाए. मैं कहता हूं आप किराए के मकानों से आने वाली बदबुओं पर रिसर्च करा लो. सूंघते-सूंघते पीरियोडिक टेबल में 5-7 एलीमेंट तो ऐसे ही जुड़ जाएंगे. किसी को बहुत भूख लगती हो तो किसी के किराए वाले मकान के किचन में टहला दो. सरबजीत के लिए रणदीप ने खाक वजन घटाया होगा, ऐसा खाना छूटेगा.

वैलेंटाइन वाला हफ्ता गुजरा. जब कॉलेज में थे तो ऐसे टाइम पर सबसे ज्यादा डिमांड उस दोस्त की होती थी जिसके पास खुद का कमरा हो. किराए वाला. जहां घरवालों का झमेला न हो. किराए के कमरे वाला दोस्त खुदा की नेमत सा लगता था. उन तमाम दोस्तों के लिए सलाम निकलता है. आपका भी ऐसा कोई दोस्त हो तो उसके चरणामृत लेकर पीजिए. ये करने में जी घिनाता हो तो चद्दर का ख्याल रखिए. आप निकल जाते हैं. बाद में उसी चद्दर पर सोया नहीं जाता.

पर त्रास दोस्त नहीं देते. त्रास वो देते हैं जिनका बैंक पीओ का एक्जाम होता है. और सुबह-सुबह पापा से फोन करा देते हैं. कुछ इतना उलझाना बी जरुरी नहीं समझते. भईया दिल्ली में हो? एयरफ़ोर्स का एक पेपर था. स्टेशन पर गोलू खडा है लेने चले जाओ. कल जाना तो इग्जाम भी दिला लाना. गोलू घर आकर आपके आगे नीली चड्डी निकालकर नहाने की तैयारी कर रहा होता है. और आप ये सोच रहे होते हैं कि अपने वजूद में कसमसाएं या पास्ट में लौटकर गोलू की मम्मी को एबॉर्शन कराने की सलाह दे आएं? क्योंकि गोलू को लाल किला भी देखना है पेपर देने के बाद.

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