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बायां हाथ 'उल्टा' ही क्यों हैं, 'सीधा' क्यों नहीं?

TARINIतारिनी कानपुर से आती हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में बीए और एमए किया. आजकल वापस कानपुर जाकर पढ़ा रही हैं. इन्हें डांस करना और चाऊमीन खाना पसंद है. लिखने के लिए इन्हें थोड़ा ठेलना पड़ता है. पर जो चीज इन्हें तंग करती है, उपसर दिल खोल कर लिखती हैं. जैसे ये पीस जो इन्होंने अंग्रेजी में लिखा, जिसे ट्रांसलेट कर हम आपको पढ़ा रहे हैं. 


एक सवाल है जो मुझसे जाने कब से पूछा जा रहा है. मतलब, याद करने बैठो तो याद भी नहीं आता कि कब से. सवाल है:तो तुम कबसे लेफ्ट-हैंडर हो? और ऐसे पूछते हैं जैसे कुछ फेंक के मार दिया हो. और सवाल अकेला नहीं आता. सवाल के साथ चौंकने जैसी एक भावना होती है. मेरा बाएं-हत्था होना लोगों को चौंकाता है. और उनका सवाल मुझे चौंकाता है. क्योंकि इस सवाल का कोई मतलब नहीं है. कि मैं ‘कबसे’ लेफ्ट-हैंडर हूं.

ज़ाहिर सी बात है, किसी के मां-बाप एक उम्र के बाद जबरन अपने बच्चे को लेफ्ट हाथ से काम करना नहीं सिखाएंगे. हालांकि इसका ठीक उल्टा सच होता है. मां-बाप और टीचर बच्चों को पीट-पीट दाहिने हाथ से काम लेने के लिए मजबूर करते हैं. तो हां, मैं पैदाइशी लेफ्ट-हैंडर हूं, हर लेफ्ट-हैंडर कि तरह.

बाएं का मतलब हमेशा निगेटिव रहा है. हर बुरी, गंदी और नसुड्डी चीज को बाएं से जोड़ते हैं. और इसीलिए बाएं से जुड़ी हर चीज का अस्तित्व या तो होता ही नहीं है. या न के बराबर होता है. और ये तो हमारे कल्चर में साफ़-साफ़ दिखाई देता है. बाएं हाथ से किया गया काम शैतान का होता है. और हर अच्छी चीज दाहिने हाथ से. बाएं हाथ का काम टट्टी धोना होता है. और दाएं का पूजा करना. बस कंडक्टर को बोहनी के समय बाएं हाथ से पैसे दे दो, तो कहता है दाहिने से दो. अब दुनिया में ज्यादा लोग दाहिने हाथ से काम करते हैं, तो दाहिने हाथ को ही सबसे ज्यादा शुद्ध मान लिया गया.

समस्या सिर्फ विचारों पर ही ख़त्म नहीं होती. हमारी जीवनशैली में इस कदर हावी है, कि सारे प्रोडक्ट दाहिने हाथ वालों को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं. कैंची हो, चाकू, नेल कटर, कलम या फिर दरवाजों का हैंडल. हर चीज को यही मान कर बनाया जाता है कि इसे राइट-हैंडर यूज करेगा. ऐसे में बाएं-हत्थों के लिए एक ही विकल्प बचता है, समझौता.

क्लासरूम में होना बाएं-हत्था बच्चों के लिए बहुत बड़ी परेशानी होती है. इतनी, कि स्कूल उन्हें अपना दुश्मन लगने लगता है. अगर आप लेफ्टी हैं, और राईटी के बगल में बैठते हैं, मुमकिन हैं आपकी कुहनियां टकराएंगी. आपके दोस्त आपको देख कर मुस्कुराएंगे. और आपको ये महसूस होगा की आप उनसे अलग हैं. फिर अगली बार वो आपको ‘लुक’ देंगे जिससे आपको खुद के बाएं-हत्था होने पर शर्मिंदगी महसूस हो. लेफ्टी बच्चे इसी सोच के साथ बड़े होते देखे जाते हैं, कि वो बाकी सभी दोस्तों से अलग हैं. और हो भी क्यों न. नोटबुक से लेकर डेस्क लगी कुर्सियों तक, कोई भी चीज उसके लिए नहीं बनी है.

बच्चों को दाहिने हाथ से काम करने के लिए मजबूर करना मां-बाप को एक सरल और शायद अनिवार्य काम लगता है. पर असल में उन्हें अंदाजा नहीं होता की वे अपने बच्चे के साथ कितना गलत कर रहे हैं. अगर नैसर्गिक रूप से बच्चे के बाएं हाथ में ज्यादा ताकत है. और आप उस दाहिना हाथ यूज करने के लिए मजबूर करते रहें, तो बच्चा न इधर का रहता है, न उधर का. और उसके दोनों हाथ कमज़ोर रह जाते हैं. और अगर आप डॉक्टरों की मानें, तो 6 साल कि उम्र तक बच्चों के दोनों हाथों में बराबर ताकत होती है. 6 की उम्र के बाद ही वो ये जानना शुरू करते हैं कि किस हाथ से काम करेंगे.

बाएं हाथ से काम करने वाले, किसी भी तरह से दाएं हाथ वालों से अलग नहीं होते. बाएं हाथ वाले बेवकूफ होते हैं, जीनियस होते हैं, बुरे होते हैं, या अच्छे होते हैं. ये सब मिथक हैं.

लेकिन बाएं-हत्थों से होने वाला ये भेद-भाव सिर्फ बाकी दुनिया नहीं, खुद बाएं-हत्थे भी नॉर्मल मानते हैं. ये वही देश है जहां आज हम LGBT राइट्स की बात करते हैं. जब इतने सालों में हम अपने बाएं हाथ को नॉर्मल नहीं पाए. तो इन मुद्दों को वैलिडिटी दिलाने के लिए मीलों चलना पड़ेगा.


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आरामकुर्सी

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