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'मेरी लाइफ में सब कुछ नॉर्मल रहा है, 20 की उम्र में अबॉर्शन को छोड़कर'

ये आर्टिकल हमें हमारी एक रीडर ने लिख भेजा है. आर्टिकल अंग्रेजी में था. इसे दी लल्लनटॉप के लिए प्रतीक्षा पीपी ने हिंदी में ट्रांसलेट किया है.


मैं आज 25 साल की एक स्वस्थ औरत हूं. मेरे पास नौकरी है, अच्छे दोस्त हैं. जिनके साथ मैं घूमती-फिरती हूं, शराब पीती हूं, पार्टी करती हूं. ये भले ही हमारे समय में दिल्ली में रहने वाली एक लड़की की परफेक्ट नहीं, लेकिन नॉर्मल लाइफ है. मेरी लाइफ में सब नॉर्मल ही रहा है, 20 साल की उम्र में अबॉर्शन को छोड़कर. 5 साल हो गए. और उसके बाद हुई शारीरिक, मानसिक और सेक्शुअल तकलीफ से अब उबर चुकी हूं. लेकिन आज भी हम कभी अबॉर्शन से जुड़ी कोई बातचीत नहीं करते और ये मुझे परेशान करता है. मसला व्यक्ति-विशेष है: एक जवान लड़की, जिसकी उम्र 20 साल के आस-पास हो, जो दिल्ली में पढ़ाई या नौकरी कर रही हो, घर से दूर रह रही हो, जिसका जीवन दो भागों में बंटा हुआ हो, ऐसी हालत में वो कहां जाएगी? परिवार के पास तो जा नहीं सकती. सहेलियों की उम्र उसकी उम्र की तरह कच्ची है. इसलिए जानकारी भी कच्ची है. इस आर्टिकल को लिखने वाली लड़की यानी मेरा नाम यहां नहीं है. ये चुनाव और मजबूरी दोनों है. या यूं कहें, मजबूरी से उपजा चुनाव है. अगर शादी से पहले किया गया सेक्स इतना बवाल मचा देता है, तो शादी के पहले किया गया अबॉर्शन क्या कर सकता है, ये आप जानते ही हैं.

जिस रिश्ते ने मुझे प्रेगनेंट किया, वो असल में रिश्ता नहीं था. अंग्रेजी में कहें तो एक ‘फ्लिंग’ था. कोई मिला, अच्छा लगा, सेक्स कर लिया. जो दुनिया को ज्यादा खटकता है. बॉयफ्रेंड के साथ सेक्स करने को फिर भी ठीक मान लिया जाता है. लेकिन वन नाइट स्टैंड तो हर तरह से अस्वीकृत है. एक ऐसी चीज है, जिसके लिए आपके करीबी दोस्त तक आपको जज कर सकते हैं. उस रात के बाद जब मेरा पीरियड मिस हुआ, तो मुझे ज्यादा डर नहीं लगा. क्योंकि पीरियड का आगे-पीछे होते रहना मेरे साथ आम समस्या थी. जिस लड़के के साथ मैं उस रात सोयी थी, उसने मुझे इसके बारे में याद दिलाया. मैंने उसे भरोसा दिलाया कि सब ठीक होगा. लेकिन जब 15 दिन बीत गए, मैंने प्रेग्नेंसी किट खरीदने का फैसला लिया. मैंने पेशाब कर इंतजार किया. उस पर एक रेखा उभरती हुई आई और गुलाबी हो गई. मैं किट फेंकने वाली थी कि दूसरी रेखा उभर आई. मुझे धक्का लगा. आंखों के आगे अंधेरा छा गया. मैं दवाई की दुकान पर गई. 3 और किट खरीदकर लाई. थोड़े-थोड़े वक़्त पर चेक किया. तीनों बार 2 गुलाबी रेखाएं दिखीं. मैं चाह रही थी कि ये किसी तरह झूठ साबित हो जाए. लेकिन ऐसा नहीं हो सकता था. मेरे दिमाग में हजारों चीजें चलने लगीं. अब मैं क्या करूं? पैसे कितने लगेंगे? किससे बात करूं? मेरे पास कोई जवाब नहीं था. सबसे ख़राब बात, मैं महज 20 की थी, गैर-शादीशुदा, हाथ में कोई नौकरी नहीं और मेरे अंदर एक नया जीवन पल रहा था. मुझे नहीं पता था कि ये मुझे किस तरह बदलने वाला था.

मैंने उस लड़के को फ़ोन किया. उसने पहले नाराजगी जताई, फिर बात से भागने की कोशिश की. और अंत में मुझे पैसे देने की बात कही. उसने कहा, वो किसी भी और तरीके से मुझे सहारा नहीं दे सकता. मुझे बेइज्जत महसूस हुआ. मैंने फोन काट दिया. अपनी बचत देखी. पार्ट टाइम नौकरियां कर कुछ 3 हजार रुपये पड़े थे. मैं पैसे निकालकर दिल्ली में उस इकलौती डॉक्टर के पास गई, जिसे मैं जानती थी. मैंने उसे बताया कि इस महीने पीरियड नहीं आया. उसने पूछा, ‘तुम्हारा बॉयफ्रेंड है?’ जिसका मतलब था कि मैंने सेक्स किया है या नहीं. मैंने स्वीकृति में सर हिला दिया. उसने मुझसे प्रेग्नेंसी टेस्ट करने को कहा. मैंने जाकर फिर से उस प्लास्टिक के टुकड़े पर पेशाब की बूंदें डालीं. मुझे नतीजा मालूम था. अब तक आदत सी होने लगी थी. डॉक्टर ने सहानुभूति से ज्यादा गुस्से में कहा, ‘तुम प्रेगनेंट हो.’ मेरे चेहरे पर कोई भाव नहीं था. बस सर हिला दिया. उसने पूछा, मुझे गोलियां चाहिए या सर्जरी. सर्जरी शब्द की ध्वनि ने मुझे डरा दिया. मैंने थूक गटकते हुए कहा ‘गोलियां’. मैंने पूछा, खर्च कितना आएगा. उसने कहा 1700. मुझे किसी से पैसे नहीं मांगने पड़ेंगे, इस बात ने कुछ राहत दी. उसने मुझे एक गोली दी. मैंने गटक ली. उसने कहा 2 दिन बाद आना.

क्लिनिक से पीजी की ओर लौटते हुए मेरे दिमाग में क्या था, मुझे याद नहीं है. पीजी खाली पड़ा था. एग्जाम के बाद लड़कियां घर गई हुई थीं. पार्ट टाइम नौकरी और एंट्रेंस एग्जाम की पढ़ाई करने के लिए मैं घर नहीं गई थी. मैं खुद को दोष दे रही थी. मैंने उस लड़के से कॉन्डम यूज करवाया था. क्या वो फट गया था? फिर मैंने गूगल पर चेक किया तो मालूम पड़ा कि लड़के का वीर्य निकलने के पहले जो लिक्विड आता है, उसमें भी स्पर्म होता है. और रेयर केस में लड़की उससे भी प्रेगनेंट हो सकती है. ये वही रेयर केस था. मैं कुछ भी खा नहीं पाई. अपराधबोध का बोझ मेरा कलेजा भारी किए हुए था. मैं रो भी नहीं रही थी. मैं दिमागी शॉक में थी.

दो दिन बाद मैं फिर से गई. डॉक्टर ने दूसरी खुराक देते हुए हुए कहा, इस गोली को लेने के बाद भयानक दर्द होगा. और कम से कम 10 दिनों तक ब्लीडिंग. वापस आने के आधे घंटे के बाद दर्द शुरू हुआ. दर्द कितना और कैसा था, उसको बताने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं. बस इतना बता सकती हूं कि तीन घंटे पेट में घुटने डाले दर्द के मारे चीख रही थी. जमीन पर लोट रही थी. उल्टी सी आई. अंधेरा सा छाने लगा. चलने की शक्ति नहीं थी. प्यास लगने पर या पेशाब जाने के लिए जमीन पर रेंगते हुए जाती थी.

जब दर्द बर्दाश्त के बाहर हो गया, मैंने डॉक्टर को फ़ोन किया. उसने कहा, मैं दर्द की गोली ले लूं. लेकिन उस हालत में मैं गोली खरीदने कैसे जाती. मैंने खुद को समझाया कि ये ठीक हो जाएगा. दर्द थोड़ा घटा तो दवा लेकर आई. लेकिन कोई आराम नहीं हुआ. 2 हफ्ते से ज्यादा ब्लीडिंग चली. इस दौरान घर पर बात करने की रस्म के तहत मैंने केवल घर पर फ़ोन किया. और किसी से बात नहीं की. उस लड़के का नंबर ब्लॉक कर दिया. ये उसकी गलती नहीं थी. पर मुझे ऐसा लगता है कि उसे होना चाहिए था. मानसिक रूप से सहारा देने के लिए ही सही.

5 साल हो गए. मैं उन दिनों के बारे में आज भी सोचती हूं. ये भी सोचती हूं कि आज तक किसी को खुलकर इसके बारे में बता न सकी. मगर क्यों? क्या वजह है? शर्मिंदगी? हां. अपराधबोध? हां. दिमाग में ख़याल आता है, मैं तो पढ़ी-लिखी, स्मार्ट लड़की थी. मैंने ऐसा कैसे होने दिया? जवाब आसान है. मेरी पूरी सेक्स एजुकेशन किताबों, फिल्मों और बायोलॉजी के दसवीं क्लास के उस चैप्टर से आई, जिसे टीचर ने बिना पढ़ाए छोड़ दिया था. उत्तेजना और सेक्स कोई मशीनी काम नहीं है कि सोच-समझकर कदम-दर-कदम चला जाए. मैं उबरी, धीरे-धीरे, दर्द के साथ. मैंने पढ़ाई पूरी की, नौकरी मिली, बॉयफ्रेंड रहे. मैंने दो साल पहले, कुछ दोस्तों को ये बात बताई. वो चुप थे. उन्हें भी नहीं मालूम था, कहना क्या है. मुझे ये फीलिंग पता है.

मैंने आज इन बातों को लिखना चुना क्योंकि इसी तरह की परिस्थितियों में मैंने कई लड़कियों को मशविरा दिया है. कभी-कभार पैसे भी. लोग उन लड़कियों के बारे में नहीं जानते. मैं जरूरी भी नहीं समझती कि वो जानें. लेकिन चुप्पी क्यों? मैं अब अपने आपको दोषी नहीं मानती. दुर्घटनाएं हो जाती हैं. कभी-कभार सावधानी लेने के बावजूद. मैं अपने जैसी लड़कियों से बस इतना कहना चाहती हूं कि खुद को दोषी मत ठहराओ. अगर तुम्हारा पार्टनर तुमसे जिम्मेदारी नहीं बांटता, तो भी तुम अकेली नहीं हो. हालांकि लड़की की प्रेग्नेंसी लड़की और लड़के दोनों की जिम्मेदारी होती है. लेकिन तुम अकेली होकर भी कमजोर नहीं हो. मुझे खुद पर गर्व है क्योंकि मैं इसे झेलकर इससे बाहर आई. मैं सकारात्मक सोच रखती हूं. मैं केयर करती हूं, प्रेम करती हूं और सेक्स मुझे ख़ुशी देता है. मैं एक सर्वाइवर हूं. क्योंकि मेरी प्रेग्नेंसी या अबॉर्शन मेरी परिभाषा नहीं हैं.

हमें जरूरत है औरतों के अबॉर्शन और उनके सेक्शुअल स्वास्थ्य के बारे में बात करने की. मेरी डॉक्टर ने मुझे गोली के साइड इफ़ेक्ट नहीं बताए थे. कई बार गोली खाकर अबॉर्शन नहीं हो पाता है. शायद आपको जिया खान का केस याद को. और गैर शादीशुदा औरतों को सर्जरी कराने के बाद दोबारा प्रेगनेंट न हो पाने के चांस रहते हैं. या फिर आने वाली प्रेग्नेंसी में कॉम्प्लेक्सिटी हो सकती हैं. प्रेग्नेंसी कन्फर्म करने के लिए अल्ट्रासाउंड जरूरी है. ब्लड टेस्ट भी जरूरी है. अबॉर्शन के पहले ही नहीं, बाद में भी. डॉक्टर ने मुझे नहीं बताया कि मैं दोबारा कब सेक्स करना शुरू कर सकती हूं. इन्फेक्शन का चांस कब ख़त्म होगा. मुझे नहीं मालूम नहीं था कि ये सवाल भी पूछे जा सकते हैं. ऐसे कई लोग हैं जो प्रेग्नेंसी ख़त्म करने को बेचैन लड़कियों का फायदा उठाते हैं, पैसे लूटते हैं. इसलिए इस पर बातचीत होनी और सपोर्ट करना बहुत जरूरी है. सपोर्ट केवल मेडिकल नहीं, इमोशनल भी. उस तरह का सपोर्ट जो लड़की को जज न करे. इंडिया में ‘मारी स्टॉप्स’ जैसी हेल्पलाइन मौजूद हैं. सरकारी अस्पतालों में अबॉर्शन फ्री है. और हां, ये शरीर तुम्हारा है. तुम्हें इसके साथ क्या करना है, ये फैसला तुम लोगी, कोई और नहीं. तुम्हें इसके लिए किसी को कोई जवाब नहीं देना होगा.

ये मेरा अनुभव है. हो सकता है, तुम्हारा अनुभव बिलकुल अलग हो. हो सकता है अबॉर्शन ने तुम पर उस तरह का प्रभाव न डाला हो, जिस तरह का मुझ पर डाला. हम सबकी सेक्शुअल लाइफ अलग-अलग तरह की होती है और होनी भी चाहिए. मैंने अपने आप को दोष दिया. अब लगता है कि नहीं देना चाहिए था. पर वो भी मेरी गलती नहीं थी, क्योंकि हम इसी तरह की सोच के साथ बड़े होते हैं कि गलती हमेशा औरत की होती है. मैं कोई प्रवचन नहीं देना चाहती. बस सलाह दे रही हूं कि अबॉर्शन के बारे में बात करो. जिस पर भरोसा हो, उसके साथ डिस्कस करो. वो चाहे दोस्त हो, कोई बड़ा या फिर फोन पर तुमसे बात करता/करती कोई अज्ञात काउंसलर. अकेली मत होना, वरना इससे उबरना एक लंबी, दर्दनाक प्रक्रिया हो सकती है.


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