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क्या भारत जनसंख्या के दबाव से गुब्बारे की तरह फट जाएगा?

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1989 से लगातार हर साल 11 जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस मनाया जाता है. इस दिन देश-दुनिया की आबादी को धरती के सर्फेस एरिया से भाग देकर बताया जाता है कि जनसंख्या कितनी बढ़ गई है और एक आदमी के लिए ज़मीन कितनी कम हो गई है. और भी ढेर सारे आंकड़े होते हैं जिन्हें समझने के लिए आपके पास मैथ्स और स्टैटिस्टिक्स में डबल एमए होना चाहिए. लेकिन इतना हर बार बड़ा ज़ोर देकर कहा जाता है कि जनसंख्या पर काबू की ज़रूरत है. तो क्या भारत जनसंख्या के तले एक गुब्बारे की तरह फूल रहा है जो किसी दिन फट पड़ेगा.

पहले समझें कि हमारे देश में सवा सौ करोड़ (134 करोड़ टू बी प्रिसाइज़) मानवी हुए कैसे?

कॉलिन मैकएवडी
कॉलिन मैकएवडी

कॉलिन पीटर मैकएवडी नाम का एक बड़ा काम का बंदा था. बहुत सारी खूबियां थीं उसमें. हिस्टोरियन भी था और डेमोग्राफर भी. डेमोग्राफी माने जनसंख्या से जुड़े आंकड़ों की स्टडी. हां, तो मैकएवडी ने अंदाज़ा लगाया था कि भारत की जनसंख्या इतिहास में कब और कितनी बढ़ी. मैकएवडी के मुताबिक आज से 12 हज़ार साल पहले भारत की आबादी रही होगी एक लाख. इसे 10 लाख होने में 6 हज़ार साल लगे. अगर हम मान लें कि आबादी एक स्थिर रफ्तार से बढ़ती रही तो इस 10 लाख को 1 करोड़ होने में लगभग ढाई हज़ार साल लगे. इस एक करोड़ को 10 करोड़ होने में लगभग तीन हज़ार साल लगे. और इस 10 करोड़ को 100 करोड़ होने में सिर्फ 500 साल लगे. माने हमारे देश की आबादी सबसे तेज़ी से बढ़ी जब हमारे यहां अंग्रेज़ आए.

अंग्रेज़ आए तो अपने साथ एंटीबायोटिक्स जैसी अंग्रेज़ी दवाएं लाए. इससे बीमारी वगैरह के चलते होने वाली मौतें बहुत कम हो गईं. लेकिन हमारा प्रॉडक्शन उतना ही रहा. भगवान का प्रसाद मानकर बच्चों पर बच्चे पैदा किए जाते रहे. तो हमारी जनसंख्या बढ़ने लगी. ये जनसंख्या बढ़ने का सबसे सीधा कारण है. लोग ज़्यादा पैदा हुए और मरे कम.

ये 1942 की तस्वीर है. भारत छोड़ों आंदोलन में शामिल लोगों की. इस वक्त तक भारत की जनसंख्या बड़ी तेज़ी से ऊपर जाने लगी थी. (फोटोःविकीमीडिया कॉमन्स)
ये 1942 की तस्वीर है. भारत छोड़ों आंदोलन में शामिल लोगों की. इस वक्त तक भारत की जनसंख्या बड़ी तेज़ी से ऊपर जाने लगी थी. (फोटोःविकीमीडिया कॉमन्स)

आज़ादी के बाद हम और तेज़ी से बढ़े. और इस तेज़ी ने सरकार का ध्यान खींचा 1952 में. सरकार ने कहा बस. बहुत हुआ. 36 करोड़ लोग हो चुके हैं. और हुए तो खिलाने के लिए खाना नहीं होगा और पहनने के लिए कपड़ा नहीं होगा. अगर देश को आगे बढ़ना है तो आबादी कम से कम होनी चाहिए. 60 के दशक में सरकार ने लोगों से अपील करनी शुरू की –

‘बच्चे दो या तीन ही अच्छे’.

लेकिन लोगों ने सरकार को सीरियसली नहीं लिया और 1971 तक आबादी निकल गई 56 करोड़ के ऊपर. तो सरकार ने अपनी अपील में से तीसरे बच्चे को गायब कर दिया. कहा,

‘हम दो, हमारे दो.’

पब्लिक फिर भी सीरियस नहीं हुई तो संजय गांधी के राज में इमरजेंसी के दौरान लोगों को घर से उठा-उठाकर नसबंदी करा दी गई. इसका खूब विरोध हुआ.

फिल्म का पुोस्टर जिसमें नसबंदी का विरोध किया गया
फिल्म का पोस्टर जिसमें नसबंदी का विरोध किया गया

इमरजेंसी के बाद सरकार गिरी इंदिरा गांधी की. लेकिन लोगों को भगवान बच्चा पैदा करने से रोकने की हिम्मत फिर किसी राजनैतिक पार्टी की नहीं हुई. घर में बिस्तर हो या बस से लेकर कॉलेज की सीट, सब कम पड़ने लगा. नौकरी तो सपने से भी गायब होने लगी. इसी तरह के हालात से उन दिनों चीन भी गुज़र रहा था. वहां ऐसे नियम बना दिए गए कि माता-पिताओं के लिए 1 से ज़्यादा बच्चा पैदा करना लगभग असंभव हो गया. लेकिन फैमली प्लानिंग के नाम पर भारत की सरकारें सिनेमाघरों में फिल्म से पहले फैमिली प्लानिंग का इश्तेहार दिखान कॉनडोम और गर्भनिरोधक गोलियां बांटने से आगे नहीं बढ़ीं.

इससे हुआ ये कि भारत में बर्थ रेट नीचे तो आया. मसलन पिछले 50 साल पहले हिंदुस्तान में औसतन हर औरत पांच से ज़्यादा बच्चे पैदा करती थी. आज ये आंकड़ा 2.4 है. लेकिन इस सफलता के बावजूद हम 134 करोड़ मानवी हो गए. कहने को हम दूसरे नंबर पर हैं और चीन पहले नंबर पर. लेकिन हम ये भूल जाते हैं कि चीन के पास हमसे जगह भी तीन गुना है और पैसा चार गुना.

भारत में सरकारों ने जनसंख्या पर काबू के लिए कभी सख्त नियम नहीं बनाए. हमेशा आग्रह किया. मानें तो ठीक. न मानें तो भी ठीक. निरोध कॉन्डॉम भी ऐसा ही आग्रह था.
भारत में सरकारों ने जनसंख्या पर काबू के लिए कभी सख्त नियम नहीं बनाए. हमेशा आग्रह किया. मानें तो ठीक. न मानें तो भी ठीक. निरोध कॉन्डॉम भी ऐसा ही आग्रह था.

जनता से समस्या क्या है?

एक बच्चे का पैदा होना कभी समस्या नहीं होता. भारत की आबादी है लगभग 132 करोड़. ये लोग एक दूसरे से सटकर खड़े हो जाएं तो सब के सब भोपाल शहर में समा जाएंगे. जी हां. लेकिन इस गुणा भाग में एक दिक्कत है. हमें मानना पड़ेगा कि कुछ लोग भोपाल की बड़ी झील पर भी खड़े हो लेंगे. फिर ये सारे लोग पूरे दिन खड़े नहीं रहना चाहते. ये सब अपने लिए अलग घर चाहते हैं. जिसके लिए चाहिए ज़मीन. इन्हें खाने के लिए खाना है, जिसे उगाने के लिए चाहिए ज़मीन. खाकर बड़े हो जाएंगे तो बदन ढंकने के लिए कपड़ा चाहिए जिसके लिए कपास उगाना पड़ेगा, जिसके लिए चाहिए ज़मीन. ऐसे ही स्कूल के लिए ज़मीन, कंपनी के लिए ज़मीन और श्मशान के लिए भी ज़मीन. ज़मीन ज़रूरी संसाधन का एक उदाहरण बस है. वैसे ही पानी और हवा भी चाहिए. और ये सारी चीजें अपने यहां लिमिटेड हैं. और हर पैदा होने वाले बच्चे के साथ इनपर बोझ बढ़ जाता है.

एक बड़ी आबादी लोगों की संख्या की वजह से मुसीबत बनती है या फिर संसाधनों की बंदरबांट से (जैसे भारत के 1% लोगों के पास देश की 70 % से ज़्यादा दौलत है), ये तय करना मुश्किल है. इस सवाल पर दुनिया भर के ज़हीन लोग माथा खपाकर देख भी चुके हैं. तो समाधान किस चीज़ का दिया जाए, ये अपने आप में सवाल है. हां, ये तय है कि धरती को सबसे ज़्यादा नुकसान इंसानों ने पहुंचाया है. इस लॉजिक से एक छोटी आबादी इंसानों और कुदरत दोनों के हित में है. हमारा देश इसमें कैसे चूका और अब आगे क्या कर सकता है, ये आप आगे पढ़ेंगे.

लोग ज़्यादा हैं कि ट्रेनें कम? इस सवाल का जवाब यक्ष ने पहले चार भाइयों से पूछा था. चारों अचेत हो गए थे. (फोटोःरॉयटर्स)
लोग ज़्यादा हैं कि ट्रेनें कम? इस सवाल का जवाब यक्ष ने पहले चार भाइयों से पूछा था. चारों अचेत हो गए थे. (फोटोःरॉयटर्स)

भारत में फैमिली प्लानिंग के विफल होने की कुछ बड़ी वजहें हैं –

1. हमारे यहां पढ़ाई के दौरान सेक्स एजुकेशन ही बड़ी ‘शर्म’ के साथ पढ़ा-पढ़ाया जाता है. तो फैमिली प्लानिंग का संस्कार लोगों में नहीं पड़ पाता. इसीलिए फैमिली प्लानिंग को हमारे यहां एक सामाजिक रूप से ज़रूरी गुण नहीं माना जाता. लोग बजट के हिसाब से बच्चे पैदा करते हैं.

2. फैमिली प्लानिंग की लड़ाई हमने हमेशा एक हाथ बांधकर लड़ी. पूरी ज़िम्मेदारी डाली औरतों पर. औरतें गर्भनिरोधक गोलियां खाएं, वही कॉपर टी लगाएं, वही नसबंदी कराएं. मर्द अपनी ‘मर्दानगी’ से समझौता करना पसंद नहीं करते. कॉन्डोम छोड़ दें तो मर्द गर्भनिरोधक उपाय (कॉन्ट्रासेप्टिव) से बचते हैं. बावजूद इसके औरतों तक गर्भनिरोधक उपायों (या सुरक्षित अबॉर्शन के उपाय) की पहुंच बहुत कम है. 2016 में गरीब देशों में (जिनमें भारत आता है) 35 करोड़ औरतें ऐसी थीं जो अपना आखिरी बच्चा नहीं चाहती थीं, फिर भी वो प्रेगनेंट हुईं और उन्हें बच्चे को जन्म देना पड़ा.

फीमेल कॉन्डॉम. भारत में सुरक्षित गर्भनिरोधकों तक आज भी सारी महिलाओं की पहुंच नहीं है. (फोटोः रॉयटर्स)
फीमेल कॉन्डॉम. भारत में सुरक्षित गर्भनिरोधकों तक आज भी सारी महिलाओं की पहुंच नहीं है. (फोटोः रॉयटर्स)

3. बच्चे पारंपरिक रूप से औरतों की ज़िम्मेदारी समझे जाते हैं. लेकिन उनके गर्भ पर उनका हक नहीं समझा जाता. बच्चा पैदा करना एक पारिवारिक निर्णय समझा जाता है. परिवार की संस्था इस तरह बनी है कि वो अपना क्लोन तैयार करते रहना चाहती है. इसीलिए शादिशुदा जोड़ों की ज़िम्मेदारी समझी जाती है कि वो बच्चे पैदा करें ही. ढेर सारे बच्चे इसी तरह दुनिया में आते हैं.

4. लगभग सभी धर्मों में पुरुषों को औरतों से श्रेष्ठ बताया गया है. कई कर्मकांड ऐसे हैं जिन्हें सिर्फ मर्द कर सकते हैं. या ऐसा नियम न भी हो तो कम से कम लोग ऐसा ही मानते हैं (जैसा कि हिंदुओं में पिंडदान के मामले में है). इसलिए भी लोग बेट की चाह में बच्चे पैदा करते रहते हैं.

जनसंख्या बढ़ने की इन चारों वजहों को मात्र एक चीज़ से खत्म किया जा सकात है. जागरूकता और भागीदारी. और ये कोई सरकार या एनजीओ अकेले नहीं कर सकते.

भारत में करोड़ों औरतें परिवार के दबाव में मां बनती हैं. (फोटोः रॉयटर्स)
भारत में करोड़ों औरतें परिवार के दबाव में मां बनती हैं. (फोटोः रॉयटर्स)

क्या हम और आबादी नहीं झेल सकते?

पॉप्युलेशन डे को लेकर विकिपीडिया पर एक बड़ी दिलचस्प बात लिखी है. वो ये कि दुनियाभर में पॉप्युलेशन को लेकर हल्ला तब मचता है, जब जनसंख्या में अरब का आंकड़ा जुड़ता है. लेकिन दुनिया की जनसंख्या में हर 14 महीनों में 10 करोड़ लोग जुड़ जाते हैं. ये वैसा ही है जैसे दुनिया में हर साल 4 ऑस्ट्रेलिया जुड़ जाएं. चार ऑस्ट्रेलिया मतलब एक बिहार. और इन चार में ढाई ऑस्ट्रेलिया हिंदुस्तान की आबादी में जुड़ते हैं. इसीलिए भारत की जनसंख्या को लेकर बहुत चेतावनियां जारी होती हैं.

लेकिन हमारा भारत (या ये धरती) कितनी आबादी को बिना किसी नुकसान सह सकता है, इसका कोई सटीक जवाब नहीं है. क्योंकि ये इस बात पर निर्भर करता है कि आप एक इंसान के लिए कितनी चीज़ों को ज़रूरी मानते हैं. उदाहण के लिए मान लीजिए कि बिना कुदरत को नुकसान पहुंचाए हम एक तय मात्रा में बिजली बना सकते हैं. अब अगर आप मानते हैं कि हर आदमी को सेहतमंद ज़िंदगी के लिए एक कूलर की ज़रूरत होती है तो आप भारत में ज़्यादा लोगों को जगह दे पाएंगे. लेकिन अगर आप एसी को ज़रूरी मानते हैं तो भारत में कम लोगों को जगह दे पाएंगे. क्योंकि एसी कूलर से ज़्यादा बिजली खाएगा. तो सवाल लोगों की संख्या से हटकर उनकी लाइफस्टाइल पर आ जाता है.

जनसंख्या चीन की भी बहुत बड़ी है. इस तस्वीर में एक स्कूल का सेशन दिखाया गया है. इतने सारे बच्चे एक साथ एक चीज़ सीख रहे हैं. लेकिन चीन ने अपनी आबादी को मैनेज बहुत अच्छी तरह किया है. (फोटोः रॉयटर्स)
जनसंख्या चीन की भी बहुत बड़ी है. इस तस्वीर में एक स्कूल का सेशन दिखाया गया है. इतने सारे बच्चे एक साथ एक चीज़ सीख रहे हैं. लेकिन चीन ने अपनी आबादी को मैनेज बहुत अच्छी तरह किया है. (फोटोः रॉयटर्स)

फिर दुनिया में जापान, रूस और कुछ यूरोपियन देश ऐसे हैं जहां जनसंख्या का घटना समस्या माना जा रहा है. यहां समस्या ये है कि काम-धंधे-व्यापार के लिए लोग ही नहीं बच रहे हैं. इसीलिए डर है कि मंदी आ जाएगी और पूरा देश ही बरबाद हो जाएगा. इसीलिए यहां सरकारें बच्चे पैदा करने के लिए पैसे तक दे रही हैं. ऐसा इसलिए कि इन देशों (और भारत ने भी) ने कैपिटलिज़म या पूंजिवाद को अपनी अर्थव्यवस्था और अपने जीवन में पिरो लिया है. पूंजिवाद ज़्यादा उत्पादन और खपत में विश्वास करता है. यहीं से ‘ग्रोथ’ के लिए पागलपन उपजता है. तो हालत ये है कि जो सिस्टम हमने बना लिया है, उसी को चलाने के लिए फैक्ट्रियों को चलाने और फिर उनका माल खरीदने के लिए लोग पैदा करने पड़ रहे हैं. वर्ना सब बरबाद हो जाएगा.

तो हमारे पास कोई मैजिक नंबर नहीं है जिसके आधार पर हम कह सकें कि जनसंख्या को इतना बढ़कर या घटकर फ्रीज़ कर देना चाहिए. लेकिन इतना तय है कि धरती पर संसाधन सीमित हैं. ये संसाधन कितने लोगों के लिए बने हैं, इसपर चर्चा हो सकती है. लोग कम हों या ज़्यादा, वो संसाधनों का ज़्यादा भोग करेंगे तो जल्दी खत्म होंगे. धीमे या कम करेंगे तो देर तक चलेंगे. तो जब तक एक दूसरी धरती नहीं खोज ली जाती, तब तक हमें संयम की आदत डाल लेनी चाहिए.

भारत में जनसंख्या से बड़ी समस्या संसाधनों का समान वितरण न होना है. (फोटोःरॉयटर्स)
भारत में जनसंख्या से बड़ी समस्या संसाधनों का समान वितरण न होना है. (फोटोःरॉयटर्स)

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