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अगर आज अम्बेडकर होते तो संविधान में अपने हाथ से संशोधन कर ये चीजें बैन कर देते

क्या डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर के नाम के साथ भी वही हो रहा है जो हिंदुस्तान के इतिहास में नायकों के साथ होता आया है? सहारनपुर के दूधली गांव में अम्बेडकर की शोभा-यात्रा को लेकर सांप्रदायिक घटना हो गई. पूरा गांव छावनी बना हुआ है. क्या ये कल्पना में भी सोचा जा सकता था कि मूर्ति-विसर्जन और मुहर्रम की लड़ाइयों से होते-होते सेक्युलर संविधान देने वाले की ‘शोभा-यात्रा’ पर सांप्रदायिक घटना होगी?

घटना इसी अंबेडकर जयंती की है. पूरा देश बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर को याद कर रहा था. पीएम मोदी भी नई घोषणाएं कर रहे थे. उधर यूपी के कासगंज के पालिका अध्यक्ष रूप किशोर कुशवाहा ने भी इस मौके की बधाई देते हुए पोस्टर शहर भर में लगवा दिए. उनके साथ उनकी पत्नी अंगूरी कुशवाहा की तस्वीर भी लगी थी. पर शाम होते-होते शहर में तनाव की स्थिति पैदा हो गई. इन पोस्टरों को फाड़ दिया गया.

रूप किशोर कुशवाहा से गलती ये हुई कि उन्होंने बधाई संदेश के पोस्टर में अपनी पार्टी के बड़े नेताओं के फोटो सबसे ऊपर वाले कोने में छपवा दिए थे. उसके नीचे बाबा साहेब की फोटो लगी हुई थी. दोनों किनारों पर कुशवाहा दंपति के फोटो लगे हुए थे. दलित कार्यकर्ताओं की नजर में ये बाबा साहेब का अपमान था. उनकी फोटो सबसे ऊपर लगाई जानी चाहिए थी.

अंबेडकर जयंती से एक दिन पहले 13 अप्रैल की शाम को जयपुर में ‘भजन संध्या’ का प्रोग्राम था. वहीं अगले दिन राजस्थान के ही भीलवाड़ा में उनकी 126वीं जयंती के उपलक्ष्य में 126 किलो दूध से उनका अभिषेक किया गया. इस आयोजन के दौरान मन्त्रों के साथ उनकी प्रतिमा का पंचगव्य से अभिषेक भी किया गया.

भीमराव आंबेडकर
भीमराव अंबेडकर

यह दौर अंबेडकर को इंसान से देवता बनाए जाने का दौर है. जबकि वही अंबेडकर 1943 में लिख रहे थे:

“भारत आज भी मूर्ति पूजा के लिए बेहतरीन जगह है. धर्म में मूर्ति पूजा है. राजनीति में मूर्ति पूजा है. नायक और नायक पूजा का सच कठोर और दुर्भाग्यपूर्ण है.”

सामाजिक कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी कहते हैं, “अम्बेडकर को एक इंसान की बजाए उनका दैवीकरण करने की प्रक्रिया में तेजी आई है. अब बात मूर्ति स्थापित करने तक नहीं रही है. उससे आगे बढ़ गई है. कुछ ही सालों में हम देखेंगे कि उनके मंदिर बनवाए जा चुके हैं. यह पहली बार नहीं है. इतिहास में पहले भी बहुजन परम्पराओं को इसी अंजाम पर ला कर खड़ा कर दिया गया. अगर इसके खिलाफ अभी नहीं बोला गया तो यह इतिहास अपने को प्रहसन के रूप में फिर से दोहराता नजर आएगा.”

बुद्ध ने जिस खाई से समाज को खींचना चाहा, उनको भी उसी में खींच लाया गया

गया जिले में नरैनी गांव है. गांव के बौद्ध स्तूप को गौरैया स्थान के नाम से जाना जाता है. शादी या किसी अन्य धार्मिक आयोजन में गांव के लोग बुद्ध प्रतिमा पर चढ़ावा चढ़ाते हैं. चढ़ावे में बकरा, मुर्गा, कबूतर और कई मामलों में शराब भी होती है. गांव के लोगों के लिए यह प्रथा सदियों से चली आ रही है. किसी भी शुभ आयोजन से पहले यहां तापवान चढ़ाना जरूरी रस्म है. बोधगया के महाबोधि प्रांगण में बुद्ध की पांच मूर्तियों को पांच पांडव के रूप में पूजा जाना एक चौंका देने वाला तथ्य है.

buddh
बुद्ध तो भगवान के अवतार हो गए

देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय के मुताबिक बुद्ध की इस दुर्दशा की शुरुआत दूसरी शताब्दी में हुई. नागार्जुन नाम का एक महायानी बौद्ध भिक्षु था जो महायान सम्प्रदाय में नई विचार पम्परा की शुरुआत करने के कगार पर खड़ा था. इसे मध्यमका के नाम से पहचाना जाना था. यहां से बौद्ध धर्म में शून्यवाद और द्विसत्य सिद्धांत की नींव पड़ती है. जो बुद्ध के सिद्धांतों से अलग हो जाता है. देवी प्रसाद अपनी पुस्तक ‘व्हाट इज लिविंग एंड व्हाट इज डेड इन इंडियन फिलॉसफी’ में नागार्जुन के समय को बौद्ध दर्शन के अवैज्ञानिकता की तरफ मुड़ने की शुरुआत मानते हैं.

नागार्जुन से आगे की तरफ बढ़ने पर हमें 13वीं शताब्दी में वैष्णव कवि जयदेव मिलते हैं. उनकी किताब गीत गोविंद भक्ति परम्परा में खास जगह रखती है. इस एक हजार साल के दरम्यान बुद्ध के साथ क्या हुआ, उनकी किताब में दर्ज है. यहां आते-आते बुद्ध विष्णु के दस अवतारों में से एक बन जाते हैं. इस तरह बुद्ध सनातन धर्म के विलयन में घोल लिए जाते हैं. उसी सनातन धर्म से, जिससे अलग उन्होंने अपने सिद्धांत दिए थे.

तब तक एक और इंसान आ गया: कबीर, पर इनको भी नहीं छोड़ा गया

लेकिन नई चीजें आती रहती हैं. इसके बाद एक और कवि जाति-व्यवस्था और कठमुल्लेपन के खिलाफ खड़ा होता है: कबीर. बनारस की सड़कों पर खड़ा यह विद्रोही कवि मंदिरों को नकार देता है. दुनिया को पागल बताता है. धीर-धीरे कबीर एक इंसान से एक आन्दोलन में तब्दील हो जाते हैं. एक कबीर के नाम से हजारों आवाजें देश भर में गूंजने लगती हैं.

“साधू देखो जग बौराना..
बहुत मिले मोहि नेमी, धरमी, प्रात करे असनाना
आतम बहुत मिले मोहि नेमी, धर्मी, प्रात करे असनाना
आतम-छांड़ि पषानै पूजै, तिनका थोथा ज्ञाना.
बहुतक देखे पीर-औलिया, पढ़ै किताब-कुराना
करै मुरीद, कबर बतलावैं, उनहूं खुदा न जाना.”

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कबीर की ऐसी इमेज चलती है अब

ये 15वीं सदी की बात है. बांधवगढ़ का एक व्यापारी यात्रा पर था. एक शाम को उसने अपना डेरा मथुरा के पास डाल दिया. शाम को खाने के लिए खिचड़ी चढ़ा दी. जब खिचड़ी बन कर तैयार हुई तो उसने देखा कि एक जलावन लकड़ी से चींटियां निकल रही है. उस वैष्णव व्यापारी के लिए वो खाना हराम हो चुका था. लेकिन खाना बर्बाद भी तो नहीं किया जा सकता है. खाना ठिकाने लगाने की उहापोह में जब उसने आस-पास देखा तो पाया कि दूर पेड़ के नीचे एक फकीर बैठा हुआ है. उसने वो खाना फकीर दे दिया. फकीर ने थाली पकड़ी और वो व्यापारी दंग रह गया. गर्म खिचड़ी में से जिंदा चींटियां बाहर निकलने लगीं. उसे अपनी गलती का अहसास होता है और उसने फकीर के पांव पकड़ लिए.

इस व्यापारी का नाम धरमदास था. कबीरपंथी परम्परा में इन्हें धनी धरमदास के नाम से जाना जाता है. ये उनकी कबीर से पहली मुलाकात थी. कबीरपंथी मान्यताओं में इस किस्म की किंवदंतियां भरी पड़ी हैं. हालांकि कई इतिहासकारों का मानना है कि धरमदास और कबीर समकालीन नहीं थे. कई लोग ये भी मानते हैं कि हमारे हाथ में बीजक का संकलन करने वाले भी यही धरमदास साहेब हैं. कबीर को निर्गुण भक्ति धारा के विद्रोही कवि की बजाए ‘परमपुरुष-परमात्मा’ के रूप में स्थापित करने में इनका काफी योगदान रहा है. ये कबीर के मिथक को राम के त्रेता युग तक खींच ले जाते हैं:

“रहे नल-नील यत्न करी हार, तबे राघुबीरन करी पुकार
जाय सतरेखा लिखी सुधार, सिन्धु में सिला तिराने वाले.
धन-धन सतगुरु सत्य कबीर, भक्त भवपीर मिटाने वाले.”

धरमदास ने कबीर को जैसे स्थापित किया, वैसे ही बाकी लोगों के साथ भी हुआ

छत्तीसगढ़ में एक छोटा सा शहर है दामाखेड़ा. यहां कबीरपंथ की सबसे बड़ी गद्दी या फिर पीठ है. प्रकाश मुनि यहां के महंत हैं. हर साल जेठ की पूनम पर यहां कबीर जयंती को ‘कबीर प्राकट्य दिवस’ के रूप में मनाया जाता है. इस दिन हजारों श्रद्धालु यहां जुटते हैं. कबीर की आरती होती है. भोग लगाया जाता है और भंडारे में प्रसाद बांटा जाता है. इस मौके पर धरमदास का लिखा हुआ एक भजन गाया जाता है:

“धन्य कबीर कुछ जलवा दिखाना हो तो ऐसा हो
बिना माँ बाप के दुनिया में आना ह तो ऐसा हो
उतर आसमान के एक नूर का गोला कमदल पर
वो आके बन गया बालक, बहाना हो तो ऐसा हो”

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कबीर के नाम पर बना मठ

प्रकाश मुनि से पहले उनके पिता इस मठ के महंत थे. ये धरमदास की पंद्रहवीं पीढ़ी है. महंती के वंशानुक्रम के पीछे का किस्सा इस परम्परा के लोग कुछ यूं बयान करते हैं.
धरमदास के इकलौते बेटे का नाम नारायण था. पिता के बहुत कहने पर भी उसने कबीर साहेब से नाम की दीक्षा नहीं ली. इसके बाद धरमदास को पता लगा कि नारायण दरअसल काल का दूत है. इससे वो चिंतित हो गए. इस पर कबीर साहेब ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि उन्हें एक और पुत्र होगा. उसका नाम चूड़ामणि रखा जाए. इससे धरमदास का वंश चलता रहेगा. धरमदास की अगली 42 पीढ़ियां पंथ पर राज करेंगी. इस तरह पीठ की गद्दी उनके अपने गढ़े हुए परमात्मा कबीर के जरिए इस परिवार के पास सुरक्षित हो गई. आज लाखों लोग इस पंथ से जुड़े हुए हैं. इनमे सबसे बड़ी तादाद दलित वर्ग की है. अनुराग सागर में यह किस्सा कुछ इस तरह से दर्ज है:

“संवत पंद्रह सौ सत्तर सारा, चूरामणि गादी बैठारा
वंश बयालीस दिनहु राजु, तुमसे होय जिव जंहा काजू
तुमसे वंश बयालीस होई, सकल जीव कहां तारे सोई”

कबीर विद्रोही जरूर थे लेकिन नास्तिक नहीं थे. उनकी रचनाओं में रहस्यवाद को पर्याप्त जगह दी गई है. वो आध्यात्मिक तो कहे जा सकते हैं लेकिन धार्मिक नहीं. खास तौर पर जिस किस्म के कर्मकांडी खांचों में उन्हें तोड़ा गया है, वो तो कतई नहीं थे. इतिहास इस बात का गवाह है कि किस तरह निर्गुण भक्ति धारा से पैदा हुई जन चेतना को सम्प्रदाय बना दिया गया. यह सिर्फ कबीर के मामले में नहीं हुआ. नानक, दादू, पीम्पा, रैदास सहित सभी संतों के विरसे में ऐसे ही सम्प्रदाय दर्ज हैं.

आधुनिक हिंदुस्तान में अंबेडकर को भी इसी तरीके से लपकने की कोशिश जारी है

ये साल 1985 की बात है. अहमदाबाद में होने वाली 15 किलोमीटर लंबी रथयात्रा के दौरन सांप्रदायिक हिंसा एक रस्मी घटना हो गई थी. इस साल तनाव कुछ ज्यादा था. अनुमति ना होने के बावजूद रथयात्रा निकाली गई. हिंदूवादी संगठनों की जिद थी कि रथ यात्रा जमालपुर, दरियापुर और दूसरे मुस्लिम बाहुल्य वाले इलाके से निकाली जाए. अंत में वही हुआ. इस रथ यात्रा के दौरान हुई हिंसक झड़प में आठ लोग पुलिस की गोली का शिकार हुए. इस साल फरवरी से अक्टूबर तक चले दंगों में 275 लोग मारे गए.

फिर  2010 में मौका था रविदास जयंती का.सहारनपुर से सटे सड़क दूधली गांव में तनाव का माहौल था. आसपास के दलित इस मौके पर गुरु रविदास की शोभायात्रा निकालने के लिए इकट्ठा हुए थे. इलाके के अल्पसंख्यकों ने इस जुलूस का विरोध किया. मामला काफी तनावपूर्ण होने के बाद इस इलाके में इस किस्म के किसी भी आयोजन पर रोक लगा दी गई थी. इससे कुछ साल पहले अंबेडकर जयंती पर भी माहौल तनावपूर्ण हो गया था.

सात साल बाद फिर वही कहानी दुहराई गई. 21 अप्रैल 2017 को सहारनपुर में सुबह से गहमा-गहमी का माहौल बना हुआ था. यहां से बीजेपी सांसद राघव लखनपाल शर्मा लगातार अंबेडकर जयंती की शोभायात्रा के लिए प्रशासन से अनुमति लेने की कवायद में लगे हुए थे. अंत तक उन्हें इसकी अनुमति नहीं दी गई. फिर इस बात पर सहमति दी गई कि शोभायात्रा निकाली जाए लेकिन दूधली गांव के बाहर से.

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दूधली गांव का सीन

शोभायात्रा निकाली गई. ऐन मौके पर बीजेपी नेता अपने वादे भूल गए. शोभायात्रा को गांव की ओर मोड़ दिया गया. प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं कि अल्पसंख्यक समुदाय के कुछ लोगों ने इसका विरोध किया और यात्रा के रास्ते पर ट्रैक्टर ला कर खड़े कर दिए. इसके बाद दोनों गुटों के बीच पत्थरबाजी शुरू हो गई. इसके बाद डीएम की गाड़ी तोड़ दी गई. पुलिस के कई जवान चोटिल हुए. एसएसपी के आवास पर तोड़-फोड़ हुई. कैमरे तोड़ डाले गए. एसएसपी लव कुमार की पत्नी का बयान है कि उन्होंने अपनी जिंदगी में इतना खौफनाक मंजर और अपने बच्चों को इतना भयभीत पहले कभी नहीं देखा.

अंबेडकर के विचार आज के दौर में कई राजनीतिक दलों के लिए असहज स्थिति खड़ी कर देते हैं. लेकिन इतिहास के नायकों की तरह उनको भगवान बनाकर अपना मतलब साधने की कोशिश में कमी नहीं है. लेकिन इसके अपने खतरे हैं. सहारनपुर इसका पहला उदाहरण नहीं हैं.

जो अम्बेडकर ने कहा, वो भी नहीं मान रहे लोग

25 नवम्बर 1949. संविधान सभा के भंग होने से एक ठीक एक दिन पहले की बात है. अम्बेडकर के सामने संविधान का अंतिम ड्राफ्ट पड़ा हुआ था. यह लगभग तीन साल की मेहनत के बाद संभव हो पाया था लेकिन अम्बेडकर के चेहरे पर काम खत्म करने की राहत नहीं दिखाई दे रही थी. उन्होंने आखिरी बार संविधान सभा को संबोधित किया और इस नए-नवेले लोकतंत्र के लिए तीन चिंताएं जाहिर कीं. इसमें से एक चिंता नायक पूजा की भी थी. कहा:

“हो सकता है कि किसी धर्म में भक्ति आत्मा की मुक्ति की डगर हो. लेकिन भक्ति या फिर नायक पूजा हमें निश्चित तौर पर अधोगति और तानाशाही की तरफ ले जाएगी.”

संत रविदास के मंदिर के आगे रखी डॉ. अबेंडकर की फोटो
संत रविदास के मंदिर के आगे रखी डॉ. अंबेडकर की फोटो

अंत में राजदीप सरदेसाई के साथ कांशीराम की मुलाकात का जिक्र किए बिना बात पूरी नहीं होगी. राजदीप लिखते हैं:

“90 के दौर में कांशीराम अपने उरूज पर थे. उनकी शर्ट के बटन खुले रहते थे. बाल बिखरे हुए और गले के चारों ओर एक रुमाल लगा हुआ होता था. एक बहुजन समाजवादी पार्टी के नेता के रूप में वो अपनी इस पहचान को बनाए रखने के लिए काफी संवेदनशील थे. उन्होंने एक बार मुझसे कहा,
मैं महाराष्ट्र के दलित नेताओं की तरह नहीं हूं, जो बाबा साहेब के नाम पर मूर्तियां बनाने में अपना वक़्त जाया करते हैं. जब हम सत्ता में आएंगे तो हम मूर्तियां बनाने और विश्वविद्यालयों का नाम बदलने की बजाए दलितों को सशक्त करेंगे.”

2007 में आई बसपा सरकार ने प्रेरणा स्थल के नाम पर जो गढ़ा उसे इस कहानी के क्षेपक के रूप में पढ़ा जा सकता है. और अब 2017 में यूपी चुनाव हारने के बाद मायावती ने अपने भाई आनंद कुमार को जिस तरह से पार्टी में बड़ा पद दिया है, वो कहानी के डायरेक्शन को ही मोड़ रहा है.


 

विनय ने ये स्टोरी की है.

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