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क्या है 'नर्मदा घोटाला' जिसके चलते शिवराज चौहान ने बाबाओं को मंत्री बना दिया?

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मध्य प्रदेश में 2018 के अंत में चुनाव होने वाले हैं. कहा जाता है कि जो मुख्यमंत्री सिंहस्थ करा लेता है, उसकी कुर्सी जाकर रहती है. सिंहस्थ उज्जैन में होने वाले कुंभ को कहते हैं. शिवराज सिंह के कार्यकाल में सिंहस्थ हुआ था, 2016 में. इसलिए ‘मामा’ इस साल के अंत में होने वाले चुनाव जीतने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं. ‘किसी भी हद’ की एक बानगी मध्य प्रदेश सरकार के उस आदेश में नज़र आई, जिसमें उसने पांच बाबाओं (धर्मगुरुओं) को राज्यमंत्री का दर्जा दे दिया है.

ये बाबा हैं नर्मदानंद महाराज, हरिहरानंद महाराज, पंडित योगेंद्र महंत, भैयूजी महाराज और कम्प्यूटर बाबा. ये सारे बाबा 31 मार्च को नर्मदा नदी के संरक्षण के लिए बनी खास कमेटी के सदस्य बनाए गए थे. 3 अप्रैल, 2018 को जारी हुए एक आदेश के तहत इन सभी का दर्जा अब मध्य प्रदेश शासन के राज्यमंत्री का हो गया है. अब इन सभी को 7,500 रुपए मासिक भत्ते के साथ-साथ 1000 किलोमीटर तक का डीज़ल, 15,000 रुपए मकान का किराया, 3000 रुपए सत्कार भत्ता और सरकारी खर्च पर पीए और अन्य स्टाफ मिलेगा. ये जहां भी जाएंगे, राज्य सरकार के प्रोटोकॉल के मुताबिक इनकी आवभगत होगी.

जब से सरकार के आदेश के बारे में मीडिया को भनक लगी है, तभी से राज्य सरकार हर ओर से आलोचना झेल रही है. कहा जा रहा है कि राज्य सरकार ने नर्मदा घोटाला यात्रा से डरकर साधुओं को मंत्री का दर्जा दे दिया है. 28 मार्च को इंदौर में एक मीटिंग में इस यात्रा का संकल्प लिया गया था और पोस्टर-बैनर छप चुके थे. मध्य प्रदेश सरकार ने ‘नर्मदा सेवा’ में जितनी मेहनत ‘पीआर’ (पब्लिक रिलेशन) को लेकर की थी, ये यात्रा उसका कबाड़ा कर सकती थी. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में सरकार के इस फैसले के खिलाफ याचिका भी लग गई है. याचिकाकर्ता की दलील है कि मध्य प्रदेश पर 90,000 करोड़ का कर्ज़ पहले से है. तो इन बाबाओं को मंत्री का दर्जा देकर खर्च बढ़ाना गलत है.

नर्मदा घोटाला यात्रा का संकल्प भाजपा के सबसे मज़बूत गढ़ों में से एक इंदौर में लिया गया था.
नर्मदा घोटाला यात्रा का संकल्प भाजपा के सबसे मज़बूत गढ़ों में से एक इंदौर में लिया गया था.

क्या है नर्मदा घोटाला?

मध्य प्रदेश में आप किसी भी दिशा से उन इलाकों की ओर बढ़ेंगे, जहां से नर्मदा होकर बहती है तो आपको बहुत पहले से आभास हो जाएगा कि नर्मदा आने वाली है. गाड़ियों और दुकानों के बाहर आपको ‘मात् नर्मदे हर’ और ‘नमामि देवी नर्मदे’ लिखा नज़र आने लगेगा. और बात नर्मदा के प्रति धार्मिक आस्था पर खत्म नहीं होती है. मध्य प्रदेश में नर्मदा का बेसिन 98,976 वर्ग किलोमीटर में फैला है और राज्य के 51 में से 24 ज़िलों को छूता है. नर्मदा पर ही वो सारे बांध हैं जिनसे मध्य प्रदेश को बिजली और सिंचाई के लिए पानी का बड़ा हिस्सा मिलता है. करोड़ों लोगों की ज़िंदगी का कोई न कोई हिस्सा इस नदी से जुड़ा है. मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर पीने के पानी के लिए लगभग पूरी तरह नर्मदा पर आश्रित है.

नर्मदा की सेवा में नज़र आना आपको उन सवा सौ विधानसभाओं में वोट भी दिला सकता है, जो नर्मदा किनारे बसी हैं. पश्चिम मध्य प्रदेश में नर्मदा की लंबाई में बड़ी संख्या में आदिवासी और दलित बसते हैं जिनके वोट भाजपा चाहती है. शिवराज ये बात जानते हैं और इसीलिए उन्होंने दिसंबर 2016 से मई 2017 तक (माने पूरे छह महीने) ‘नमामि देवी नर्मदे सेवा यात्रा’ निकाली जिसके समापन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अमरकंटक पहुंचे थे. इस यात्रा पर 40 करोड़ रुपए खर्च हुए. यात्रा के दौरान 148 दिनों तक सुबह शाम नर्मदा तट पर आरती हुई जिनमें से कई में खुद शिवराज ने शिरकत की. महेश्वर में हुई ऐसी ही एक आरती के खर्च का ब्योरा खरगौन के महिमाराम भार्गव ने सूचना के अधिकार के तहत मांगा था. सरकार ने महिमाराम को जो आंकड़ा बताया, वो था 58,650 रुपए. ये सिर्फ और सिर्फ एक दिन की आरती का खर्च था. इसमें लोगों के आने-जाने ठहरने और बाकी व्यवस्थाओं का खर्च शामिल नहीं था. इस खबर के मीडिया में आने के बाद खूब हंगामा हुआ.

नर्मदा यात्रा के दौरान नर्मदा आरती करते शिवराज सिंह चौहान, उनकी पत्नी साधना सिंह, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्रसिंह रावत, केंद्र में राज्यमंत्री अर्जुन राम मेघवाल और अन्य भाजपा नेता. (फोटोःपीटीआई)
नर्मदा यात्रा के दौरान नर्मदा आरती करते शिवराज सिंह चौहान, उनकी पत्नी साधना सिंह, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्रसिंह रावत, केंद्र में राज्यमंत्री अर्जुन राम मेघवाल और अन्य भाजपा नेता. (फोटोःपीटीआई)

लेकिन शिवराज इस सब से कतई हतोत्साहित नहीं हुए. उन्होंने एक और महत्वाकांक्षी योजना बनाई. उन्होंने घोषणा की कि राज्य सरकार नर्मदा बेसिन में पड़ने वाले 24 ज़िलों में एक साथ 6 करोड़ पौधे लगाएगी, ताकि नर्मदा बेसिन को पहुंचे नुकसान की भरपाई हो सके. इसके लिए दिन तय हुआ 2 जुलाई, 2017. इस दिन रविवार था. बावजूद इसके पूरे राज्य का सरकारी अमला 15 लाख स्वयंसेवियों और सरकारी स्कूल के बच्चों वगैरह के साथ सुबह 7 बजे से नर्मदा किनारे पौधे रोपने में लगा रहा. खुद शिवराज हेलिकॉप्टर से अमरकंटक (नर्मदा का उद्गम), जबलपुर, सीहोर और ओंकारेश्वर पहुंचे, जहां उन्होंने कैमरों के आगे पौधे ज़मीन में खोंसे. ये सब शाम के 7 बजे तक चला. रात को सवा दस बजे तक सभी पौधों की गिनती भी हो गई और शिवराज ने रात 10.16 मिनट पर ट्विटर पर लिखा,

”मैं बड़े गर्व के साथ आपसे ये खुशी बांट रहा हूं कि मध्य प्रदेश के लोगों ने आज 6 करोड़ 63 लाख पौधे रोप दिए.”

इसके साथ मध्य प्रदेश शासन ने दावा किया कि उसने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा एक दिन में 5 करोड़ पौधे लगाने के गिनीज़ रिकॉर्ड को तोड़ दिया है. मध्य प्रदेश सरकार के मुताबिक रोपे गए पौधों में सागौन के करीब 20%, बांस के 15%, आंवला, अर्जुन, बेल, नीम, हर्रा और बहेड़ा को मिलाकर 20% और जामुन, अमरूद, सीताफल, नींबू, आम, अनार और शहतूत जैसे फलदार किस्मों के करीब 5% पौधे थे. देशभर की मीडिया ने इस कवायद को कवर किया था. कम्प्यूटर बाबा और पंडित योगेंद्र महंत का कहना था कि इतने पेड़ लगे ही नहीं और सरकार का बयान ज़मीनी हकीकत से दूर है. उन्होंने इस पूरी कवायद को एक बड़ा घोटाला कहा था. नर्मदा घोटाला रथ यात्रा इसी घोटाले को उजागर करने वाली थी.

नर्मदा घोटाला यात्रा का पोस्टर.
नर्मदा घोटाला यात्रा का पोस्टर.

यात्रा शुरू होने से ऐन पहले 31 मार्च को राज्य सरकार ने आनन-फानन में नर्मदा संरक्षण के लिए बनी खास कमिटी में पांच बाबाओं को शामिल कर लिया. इसी दिन कम्प्यूटर बाबा और कुछ दूसरे संत भोपाल में सीएम आवास भी पहुंचे, जहां शिवराज के साथ उनकी एक मीटिंग हुई. इसके बावजूद सरकार को पूरी तसल्ली नहीं हुई कि वो बाबाओं के कोप का भाजन बनने से बच जाएगी. तो मध्य प्रदेश शासन के सामान्य प्रशासन विभाग ने राज्यपाल के नाम से 3 अप्रैल को एक और नोटिस निकाला, जिसके नतीजे में घोटाला यात्रा निकालने वाले दोनों बाबाओं को राज्यमंत्री का दर्जा दे दिया गया. इनके साथ तीन और बाबाओं की लॉटरी लग गई.

‘घोटाला यात्रा’ अब ‘जन जागरूकता यात्रा’ हो गई है

राज्यमंत्री का दर्जा मिलने के बाद से सारे बाबा काफी खुश बताए जाते हैं. कम्प्यूटर बाबा तो टीवी पर छाए भी हुए हैं. कभी संघ, भाजपा और शिवराज को दांत पीस-पीसकर कोसने वाले कम्प्यूटर बाबा संत समाज के प्रति दिखाई इस सहृदयता से खुश हो गए हैं और उन्होंने नर्मदा घोटाला यात्रा को ठंडे बस्ते में डाल दिया है. पत्रकारों ने उनके मुंह में माइक ठूंसकर सवाल किए तो उन्होंने कह दिया कि यात्रा शुरू ही नहीं की तो खत्म कैसे कर देते! कहा ये भी जा रहा है कि कम्प्यूटर बाबा अब ‘जन जागरूकता यात्रा’ में हिस्सा लेंगे जो नर्मदा तट पर लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करेगी.

कम्प्यूटर बाबा अब रिबूट हो गए हैं. सरकार की तरफदारी करने लगे हैं.
कम्प्यूटर बाबा अब रिबूट हो गए हैं. सरकार की तरफदारी करने लगे हैं.

‘घोटाले का पता नहीं, लेकिन इतने पेड़ तो नहीं ही लगे हैं’

बाबाओं के मुताबिक अब नर्मदा घोटाला नहीं हुआ है. लेकिन ‘दी लल्लनटॉप’ ने मध्य प्रदेश में जितने वरिष्ठ पत्रकारों से बात की, उन्होंने यही कहा कि इस बात की बहुत कम उम्मीद है कि साढ़े छह करोड़ पेड़ एक दिन में लग गए हों. मान भी लें कि लगे थे, तो आज नज़र नहीं आते. कई जगह ये कवायद पूरी तरह फेल हुई है. इसे घोटाला कहा जाए या नहीं, ये और बात है.

पेड़ लगाने का आइडिया असल में था किसका?

राज्य सरकार ने नर्मदा के किनारे पेड़ लगाने का खूब प्रचार किया. रिकॉर्ड का दावा किया और श्रेय भी लिया. लेकिन ये बात कहीं छिप गई कि असल में ये महत्वाकांक्षी योजना बनाई किसने थी. पर्यावरणविद् और केंद्र में पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन राज्यमंत्री रहे भाजपा नेता अनिल माधव दवे मध्य प्रदेश के बड़नगर से थे और उन्होंने नर्मदा बेसिन में बहुत काम किया था. नर्मदा बेसिन को पहुंचे नुकसान पर वो लगातार अपने इंटरव्यू में बात करते रहे थे. उनका मानना था कि नर्मदा को एक लंबी ‘क्रिकेट पिच’ बनने से तभी रोका जा सकता है, जब उसके कैचमेंट एरिया (माने वो इलाका जहां से नदी में पानी आकर मिलता है) में हरियाली को हुए नुकसान की क्षतिपूर्ति के लिए एक बड़ा वृक्षारोपण अभियान चलाया जाएगा. वो 2007 से इसका खाका बनाने में लगे भी हुए थे, लेकिन मई 2017 में उनका निधन हो गया.

नर्मदा बेसिन में लंबे समय तक समाजसेवा करते रहे पर्यावरणविद् और भाजपा नेता अनिल माधव दवे ने नर्मदा किनारे जंगलों के सफाए पर बहुत पहले चिंता जताई थी.
नर्मदा बेसिन में लंबे समय तक समाजसेवा करते रहे पर्यावरणविद् और भाजपा नेता अनिल माधव दवे ने नर्मदा किनारे जंगलों के सफाए पर बहुत पहले चिंता जताई थी.

‘मात् नर्मदे’ की ‘हर’ जपने की होड़

नर्मदा का प्रतीकात्मक महत्व इतना है कि मध्य प्रदेश में नर्मदा-नर्मदा जपने और नर्मदा के प्रति वफादार दिखने की होड़ लगी हुई है. शिवराज सिर्फ नर्मदा सेवा यात्रा निकालने और पेड़ लगाने पर ही नहीं रुके. उन्होंने नदी महोत्सव भी जोर-शोर से आयोजित करवाया. नदी महोत्सव भी अनिल माधव दवे की शुरू की एक कवायद थी जिसमें देशभर में नदियों पर काम करने वाले साल में एक बार होशंगाबाद के बंद्राभन में नर्मदा के किनारे जुटते हैं. ये कवायद नर्मदा संरक्षण के लिए शुरू हुई थी और बड़ी होते-होते देशभर की नदियों के लिए हो गई. दवे के जाने के बाद इस साल ये आयोजन मध्य प्रदेश सरकार ने करवाया. लेकिन इसमें दवे से ज़्यादा ज़िक्र शिवराज का हुआ. जब इस बात पर मीडिया में हल्ला मचा तो आनन-फानन में दवे के नाम के कैलेंडर छपवाए गए और भाषणों में जगह-जगह ‘दवे जी’ कहना शुरू किया गया.

‘नर्मदा सेवा’ में कांग्रेस भी पीछे नहीं है. सितंबर 2017 से ही पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह सपत्नीक नर्मदा परिक्रमा पर हैं. शिवराज अपनी नर्मदा सेवा यात्रा में हेलिकॉप्टर से चले, लेकिन दिग्विजय पूरी सावधानी बरत रहे हैं. वो सवा तीन हज़ार किलोमीटर की पूरी यात्रा पैदल कर रहे हैं. ये यात्रा 9 अप्रैल को नरसिंहपुर में पूरी होगी. दिग्विजय का फोकस नर्मदा के किनारे पर्यावरण का गिरता स्तर और अवैध उत्खनन को उजागर करने पर भी है. बावजूद इसके वो इस कवायद को एक ‘आध्यात्मिक’ और ‘गैरराजनीतिक’ यात्रा बता रहे हैं.

दिग्विजय सिंह पैदल नर्मदा परिक्रमा पर निकले हुए हैं. साथ में हैं पत्नी अमृता राय.
दिग्विजय सिंह पैदल नर्मदा परिक्रमा पर निकले हुए हैं. साथ में हैं पत्नी अमृता राय. (फोटोः दिग्विजय सिंह डॉट इन)

कितना फलेगा बाबाओं को राज्यमंत्री का दर्जा देना?

ये आदेश नर्मदा पर होने वाली राजनीति को साधने के लिए था. लेकिन हुआ इसका ठीक उलटा है. राज बब्बर कह रहे हैं कि भाजपा बाबाओं के भगवा चोले के सहारे चुनाव जीतना चाहती है. उसे देखना चाहिए कि जब यूपी में उन्होंने एक भगवाधारी बाबा को मुख्यमंत्री बनाया तो क्या हुआ. लेकिन इससे तगड़ा बयान मध्य प्रदेश कांग्रेस की ओर से आया है. पार्टी ने भाजपा के इस कदम को तुष्टीकरण की राजनीति कह दिया है. तुष्टीकरण वही आरोप है जो भाजपा कांग्रेस पर लगाती है. इसके जवाब में मध्य प्रदेश भाजपा के प्रवक्ता रजनीश अग्रवाल इतना ही कह पाए,

”राज्य सरकार प्रोटोकॉल से भटकी नहीं है. बाबाओं को कमेटी में जनभागीदारी बढ़ाने के लिए लिया गया है और उन्हें राज्यमंत्री इसलिए बनाया गया है कि उन्हें नर्मदा संरक्षण के काम में आसानी हो.”

शिवराज सिंह चौहान अमित शाह को लेकर कार्यकर्ताओं के यहां खाना भी खा रहे हैं. चाहे जैसे हो, वो ये चुनाव जीतना ही चाहते हैं. (फोटोःपीटीआई)
शिवराज सिंह चौहान अमित शाह को लेकर कार्यकर्ताओं के यहां खाना भी खा रहे हैं. चाहे जैसे हो, वो ये चुनाव जीतना ही चाहते हैं. (फोटोःपीटीआई)

कमोबेश यही बात शिवराज ने अपने बयान में भी कही. लेकिन 4 अप्रैल को जिस तरह प्राइम टाइम टीवी पर कम्प्यूटर बाबा के बयान का ‘बिफोर-आफ्टर’ वाला वीडियो चला, उससे मध्य प्रदेश सरकार की भद्द ही पिटी. राज्य सरकार के इस अजीबोगरीब फैसले पर भोपाल के एक वरिष्ठ पत्रकार ने कहा,

”मध्य प्रदेश शासन बाबाओं को ‘राज्य अतिथि’ बनाता रहा है. शंकराचार्य वगैरह आते हैं तो कलेक्टर उनके स्वागत के लिए चले जाते हैं, उनकी गाड़ी पर हूटर भी लग जाता है. लेकिन पत्रकारिता के अपने 20 साल के करियर में मैं पहली बार देख रहा हूं कि पांच-पांच बाबाओं को इस तरह मंत्री पद दे दिया गया हो.”

शिवराज को चाहिए कि वो थोड़े आहिस्ता चलें. क्योंकि ”बताया जाता है” की शैली में एक किस्सा उनके युवा मोर्चा के दिनों का भी सुनाया जाता है. वो नया-नया चुनाव जीते थे और नर्मदा में खड़े होकर उन्होंने एक कसम खाई थी जो उन्होंने बाद में तोड़ दी. नर्मदा के किनारे कहा जाता है कि नर्मदा की कसम किसी हालत में तोड़नी नहीं चाहिए. शिवराज अब नर्मदा को लेकर फिर दिक्कत में फंसते नज़र आ रहे हैं. बाबाओं को मंत्री बनाकर मामला रफा-दफा करने का उनका ये दांव बुरी तरह मिसफायर कर चुका है.

इस वीडियो में कम्प्यूटर बाबा अपने पुराने बयानों से पलटते देखे जा सकते हैं-


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