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पार्टियां पुराने नोट अपने खाते में जमा कर सकती हैं और टैक्स भी नहीं लगेगा

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कालाधन खत्म करने के लिए प्रयास कर रही केंद्र सरकार ने शुक्रवार को एक ई-मेल आईडी blackmoneyinfo@incometax.gov.in जारी की, जिस पर आप किसी के भी कालेधन की जानकारी दे सकते हैं. साथ ही, शनिवार यानी 17 दिसंबर से केंद्र सरकार की ‘प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना’ भी शुरू हो गई, जिसके तहत अगले 105 दिनों तक कोई भी अपनी बेहिसाब ब्लैक मनी को 50 फीसदी पेनाल्टी भरकर वाइट करा सकता है. इस स्कीम में टैक्स भरने वाले को 25% पैसा तुरंत मिल जाएगा, जबकि 25% चार साल बाद मिलेगा. स्कीम और ई-मेल आईडी के बारे में बताने आए रेवेन्यू सेक्रटरी हंसमुख अधिया ने इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक और घोषणा की कि राजनीतिक पार्टियां अपने बैंक खातों में कितने भी पुराने नोट जमा करा सकती हैं और उन पर कोई टैक्स नहीं लगेगा.

भारत में सभी राजनीतिक पार्टियां इनकम टैक्स और RTI के दायरे से बाहर हैं. उन्हें किसी भी तरह से मिलने वाले कितने भी डोनेशन पर कोई टैक्स नहीं देना पड़ता है और वो डोनेशन की बेहद सीमित जानकारी ही सार्वजनिक करती हैं. चूंकि वो RTI के दायरे से भी बाहर हैं, तो इससे ज्यादा जानकारी हासिल भी नहीं की जा सकती. राजनीतिक पार्टियों को RTI के दायरे में लाने पर अब तक काफी बहस हो चुकी है, लेकिन ये बहस सिर्फ चीख ही साबित हुई है.

समस्या कहां/क्या है

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8 नवंबर को नोटबंदी के फैसले के बाद वित्त मंत्रालय ने कहा था कि अगर किसी खाते में अचानक ज्यादा पैसा जमा कराया जाता है, तो उसकी जांच की जाएगी. इसकी वजह से हजार और पांच सौ के पुराने कई नोट बाजार से बाहर हो गए. जिनके पास ब्लैक मनी वाइट कराने का ‘जुगाड़’ नहीं था, उन्होंने इससे पीछा छुड़ाना ही बेहतर समझा. देशभर में कई जगहों से पुराने नोट फेंके जाने की खबरें आईं. हालांकि, इससे अर्थव्यवस्था को कितना फायदा हुआ, इस पर एक्सपर्ट्स से लेकर जनता तक में असहमति है.

अब एक बार फिर साफ किया गया कि राजनीतिक पार्टियां कितने भी पुराने नोट अपने खातों में जमा करा सकती हैं. ऐसे में ये सुनिश्चित करना मुश्किल है कि पार्टियों को दान में मिला ये पैसा कितना वाइट है और कितना नहीं. अगर आम लोगों के पास मौजूद पुराने नोटों की जांच की जा सकती है, तो राजनीतिक पार्टियों को इस दायरे से बाहर रखना कितना सही है. आखिर वो कौन सा तरीका होगा, जिससे पार्टियों को मिलने वाले फंड की ठीक-ठीक जांच हो पाएगी.

राजनीतिक पार्टियों को डोनेशन

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इनकम टैक्स ऐक्ट, 1961 का सेक्शन 13(A) राजनीतिक पार्टियों को टैक्स से छूट देता है. इसके मुताबिक पार्टियों को अपने डोनेशन का हिसाब-किताब रखना होता है, लेकिन उस पर कोई टैक्स नहीं देना होता है. अगर किसी पार्टी को कहीं से 20 हजार रुपए या इससे कम का डोनेशन मिला है, तो पार्टी डोनेशन देने वाले की जानकारी न देने के लिए स्वतंत्र है. पार्टियों को मिलने वाला डोनेशन हाउस प्रॉपर्टी, पूंजीगत लाभ (कैपिटल गेन्स) या किसी व्यक्ति से मिला ऐच्छिक योगदान हो सकता है.

पार्टियां इनकम टैक्स डिपार्टमेंट और चुनाव आयोग को सिर्फ उस डोनेशन की जानकारी देती हैं, जो 20 हजार रुपए से ऊपर का होता है. पार्टियों को मिलने वाले कुल डोनेशन का 75% फीसदी हिस्सा इस 20 हजार वाली कैटिगरी में ही होता है, जिसकी वजह से उन्हें मिलने वाले टोटल फंड के 3/4 हिस्से का कोई हिसाब ही नहीं होता है. ऐसे में ये पैसा कितना वैध है और कितना अवैध, ये भी पता नहीं चलता है.

संदेह कहां है

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मान लीजिए कोई राजनीतिक पार्टी किसी जगह काउंटर लगाकर चंदा लेने बैठती है, जैसा कि सभी पार्टियां करती हैं. अब कोई शख्स उन्हें ब्लैक मनी डोनेट कर रहा है या वाइट, ये कैसे पता चलेगा? 20 हजार से कम के डोनेशन का हिसाब तो पार्टियां रखती ही नहीं हैं. मुमकिन है कि एक ही शख्स कई बार 20-20 हजार रुपए डोनेट कर सकता है. और अब पार्टियां इस तरह मिले पुराने नोटों को अपने खातों में डालने के लिए स्वतंत्र हैं. सीए अभय शर्मा बताते हैं कि अगर इस डोनेशन की रसीद काटी जाती है, तो डोनेशन देने वाले की पहचान उजागर हो सकती है, लेकिन अगर डोनेशन बिना रसीद या बिना लिखा-पढ़ी के लिए गया है, तो उसके वैध या अवैध होने का हिसाब कौन और कैसे रखेगा?

इतने डोनेशन के बाद क्या

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यूपी में मौजूदा मुख्य विपक्षी पार्टी बीएसपी की मुखिया मायावती कैश डोनेशन के लिए चर्चित/बदनाम रही हैं. रैलियों में उन्हें हजार के नोटों की विशालकाय मालाएं पहनाई जाती रही हैं और कैश में भर-भरकर डोनेशन दिया जाता रहा है. कमोबेश यही हाल देश की दूसरी पार्टियों का भी है. कांग्रेस और बीजेपी जैसी राष्ट्रीय पार्टियों को तो न जाने कहां-कहां से डोनेशन मिलता है. नाम न जाहिर करने की शर्त पर या निजी बातचीत में कई नेता ये स्वीकार कर चुके हैं कि चुनाव प्रचार में पैसे खर्च करने की जो टोटल लिमिट होती है, उतना तो वो एक दिन में ही खर्च कर देते हैं.

ऐसे में जाहिर सा सवाल है कि आखिर इतना पैसा आता कहां से है? और दूसरी बात, अगर कोई शख्स पार्टियों को इतना भर-भरकर डोनेशन दे रहा है, तो स्वाभाविक है कि बाद में उसकी भी कुछ न कुछ राजनीतिक लाभ उठाने की मंशा होगी. अगर उसका डोनेट किया हुआ पैसा अवैध हो सकता है, तो फायदा उठाने के उसके इरादे कितने साफ होंगे?

अगर पार्टियां ब्लैक मनी का गेटवे बन गईं तो

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मौजूदा नियम के मुताबिक किसी पार्टी के खाते में कितने भी पुराने नोट जमा कराए जा सकते हैं. ऐसे में आशंका है कि कहीं राजनीतिक पार्टियां ब्लैक मनी को वाइट करने का गेटवे न बन जाएं. आज अगर कोई शख्स हवाला के जरिए कमाई हुई पुरानी नोटें बीजेपी को डोनेट करता है, तो क्या बीजेपी इस पैसे को स्वीकार करके अपने खाते में जमा कराएगी? और उससे भी पहले, अगर ये पैसा 20-20 हजार की कई किस्तों में डोनेट किया गया है, तो क्या पार्टी पता भी लगा पाएगी कि ये पैसा कहां से कमाया गया है.

125 करोड़ की आबादी और 2.1 ट्रिलियन डॉलर GDP वाले भारत में कोई आतंकवादी या दलाल किसी पार्टी को कैश में डोनेशन दे दे, तो पार्टियां उसके खिलाफ क्या एक्शन ले पाएंगी. वित्त मंत्रालय, इनकम टैक्स डिपार्टमेंट और चुनाव आयोग तो तब कुछ करेंगे न, जब उन्हें पता हो कि पैसे किसने और कहां दिया है. साफ आशंका है कि मौजूदा नियम राजनीतिक पार्टियों को ब्लैक मनी को वाइट बनाने का गेटवे बना सकता है.

खुद कितनी पाक-साफ हैं पार्टियां और नेता

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डोनेशन से मिलने वाले पैसे को अगर एक तरफ रख दिया जाए, तो खुद राजनीतिक पार्टियां और उनके नेता भी कालेधन के संदेह के घेरे में हैं. पार्टियां और नेता अक्सर अपने विरोधियों पर स्विस बैंकों में खाते रखने और कालाधन जमा करने के आरोप लगाते हैं. कई बार सबूत पेश किए जाते हैं, तो कई बार आरोप सही भी साबित होते हैं. ऐसे में सवाल है कि क्या नेता-मंत्री अपनी पार्टी के खाते के जरिए ब्लैक मनी को वाइट कराने की कोशिश नहीं करेंगे?

अगर कोई नेता अपना कालाधन पार्टी के खाते में जमा कराएगा, तो काफी संभावना है कि पार्टी अध्यक्ष और कोषाध्यक्ष वगैरह को इसकी जानकारी होगी. एक बार पैसा पार्टी के खाते में पहुंच गया, वो सफेद हो जाएगा. इसके बाद वो नेता अनेक तरीकों से वो पैसा वापस पा सकता है या उसका फायदा उठा सकता है.

साथ ही, अगर पार्टियां कैश में मिले डोनेशन को बिना खाते में जमा कराए, कैश में ही उसका इस्तेमाल करती हैं, तो इसकी जांच कौन करेगा. नोटबंदी लागू होने के कुछ दिनों पहले ही बीजेपी ने कैश देकर पार्टी ऑफिस के लिए जमीनें खरीदी थीं, जो बाद में विवाद की वजह बन गई थी.

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डोनेशन और फंड के नाम पर राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाली टैक्स की सहूलियत बंद करने और उन्हें RTI के दायरे में लाने की मांग लंबे समय से उठ रही है. बीते दिनों जब बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से पूछा गया कि क्या वो इसके लिए तैयार हैं, तो उन्होंने बड़ा डिप्लोमैटिक जवाब देते हुए कहा कि ये तभी होगा, जब सभी पार्टियां राजी होंगी और तब बीजेपी भी इसमें साथ रहेगी.

कालेधन के खिलाफ आवाज उठा रही सरकार के पीछे खड़ी ‘दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी’ ये पहल करने में हिचक क्यों रही है.


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