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गुजरात में शंकर सिंह वाघेला अपने ही ईजाद किए दांव में घिर गए हैं?

1 मई 2014, गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का दूरदर्शन पर इंटरव्यू प्रसारित हुआ. लोकसभा चुनाव का माहौल था. इस इंटरव्यू के प्रसारित होने से पहले ही विवाद शुरू हो गया था. आरोप लगा कि दूरदर्शन के उच्च अधिकारियों ने इस इंटरव्यू के एक ख़ास हिस्से को काट देने का दबाव बनाया था. इंटरव्यू प्रसारित होने पर नया विवाद खड़ा हो गया.

दरअसल नरेंद्र मोदी ने इस इंटरव्यू में राजनीतिक जीवन में शुचिता की बात करते हुए बताया कि पार्टी से बाहर भी उनके कई दोस्त हैं. उन्होंने आगे कहा कि किसी दौर में कांग्रेस के अहमद पटेल उनके अच्छे दोस्त हुआ करते थे. पटेल उनके ही गृहराज्य से आते हैं. पटेल ने इस बात खंडन करने में देरी नहीं की. पटेल ने मीडिया से कहा-

“1980 में मैंने आखिरी बार उनके साथ लंच किया था. लेकिन 2001 में उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद मैंने उनके साथ कभी चाय तक नहीं पी. जब मैंने मोदी जी के बयान के बारे में सुना, मुझे हंसी आ गई. उस आदमी का अपनी पार्टी में कोई दोस्त नहीं है. तो मैं उनका दोस्त कैसे हो सकता हूं. अगर नरेंद्र भाई यह साबित कर दें कि मैं उनके सीएम बनने के बाद उनके घर या दफ्तर गया था, तो मैं राजनीति छोड़ दूंगा. “

नरेंद्र मोदी ने बाद में इस बात को कोई ख़ास तूल नहीं दिया. लेकिन यह एक बयान का मामला नहीं था. 2007 और 2012 के गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद प्रदेश के नेताओं ने केंद्रीय नेतृत्व के सामने आपनी नाखुशी ज़ाहिर की थी. उस समय प्रदेश के कद्दावर नेता शंकर सिंह वाघेला ने पटेल और नरेंद्र मोदी में मिली-भगत होने का आरोप लगाया था. वाघेला ने यह भी कहा कि नरेंद्र मोदी के इशारे पर उन्होंने कई सीटों पर साजिशन कमज़ोर उम्मीदवारों को टिकट दिया. लेकिन उस समय सोनिया गांधी की ओट के चलते अहमद पटेल पर कोई आंच नहीं आई.

विदाई समारोह में नरेंद्र मोदी और शंकर सिंह वाघेला
विदाई समारोह में नरेंद्र मोदी और शंकर सिंह वाघेला

राजनीति में स्थितियां बदलते वक़्त नहीं लगता. शंकर सिंह वाघेला आज विरोधी गुट में खड़े हैं और डेढ़ दशक से ज़्यादा सत्ता के केंद्र में रहे अहमद पटेल अपनी संसद सदस्यता बचाने की जुगत में लगे हुए हैं. शंकर सिंह वाघेला और मोदी की दोस्ती चर्चा का विषय बनी हुई है. चुनाव जीतने के बाद नरेंद्र मोदी का गुजरात विधान सभा में विदाई समारोह रखा गया था. विधान सभा में दिए गए अपने आखिरी भाषण में बोलते हुए नरेंद्र मोदी ने वाघेला के साथ बिताए अपने पलों को यूं साझा किया था-

“शंकर भाई गौरव के साथ कह सकते हैं कि देश के प्रधानमंत्री मेरी मोटर साइकिल पर घूमा करते थे. गुजरात का ऐसा कोई ज़िला नहीं है, जहां हम दोनों ने मोटर साइकिल पर प्रवास ना किया हो. शंकर सिंह जी के पास जीप थी, लेकिन इन्हें बुलेट चलाने का बड़ा शौक हुआ करता था. मैं तो उस समय राजनीति में नहीं था, लेकिन हमारी दोस्ती पक्की हुआ करती थी. आज भी हमारे सम्बन्ध वैसे ही हैं.”

इसके तीन साल बाद 21 जुलाई को शंकर सिंह वाघेला ने कांग्रेस का साथ छोड़ दिया. 17 साल पहले बीजेपी से टूट कर कांग्रेस में आए वाघेला की इस किस्म की विदाई की उम्मीद किसी ने नहीं की थी. शंकर सिंह वाघेला सूबे के वो नेता हैं, जिनका अपना जनाधार है और यह किसी एक क्षेत्र तक सिमित नहीं है. किसी दौर में उन्होंने केशुभाई भाई पटेल और उस समय संघ के प्रचारक रहे नरेंद्र मोदी के साथ गुजरात के 18000 गांवों का दौरा किया था. उनके समर्थक उन्हें ‘बापू’ कह कर बुलाते हैं. उनका दावा है कि इन 18000 गांवों में से हर गांव में उन्हें कम से कम 10 आदमी व्यक्तिगत तौर पर जानते हैं.

पटेल आंदोलन और ऊना दलित आंदोलन के बाद बीजेपी बैकफुट पर है. नरेंद्र मोदी जैसा लोकप्रिय चेहरा भी अब प्रदेश बीजेपी के पास नहीं है. इसके अलावा 19 साल के शासन के बाद बीजेपी को सत्ता विरोधी लहर का सामना भी कर पड़ सकता है. ऐसे में राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी वाघेला को पता था कि कांग्रेस के पास सत्ता में वापसी का इससे बेहतर मौका नहीं है. वो हाई कमान पर उन्हें मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित करने का दबाव बना रहे थे.

भरे मानसून में हुए राष्ट्रपति चुनाव में हुई क्रॉस वोटिंग शायद खतरे का वो निशान था, जिसे वाघेला ने लांघ दिया. अपने 77वें जन्मदिन पर वो अपने समर्थकों की भीड़ के ज़रिए पार्टी से अपनी बात मनवाना चाहते थे. इससे ठीक एक दिन पहले पार्टी ने उन्हें अलविदा कह दिया. हाई कमान की इस कार्रवाई के पीछे के सूत्रधार माने गए अहमद पटेल. शंकर सिंह वाघेला को पार्टी के इस कदम का अंदाज़ा था. उन्हें इस बात का भी अंदाजा था कि राज्यसभा चुनाव वो मौका होगा जब वो स्कोर बराबर कर सकते हैं.

क्यों सांसत में है पटेल?

2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के पास 57 सीट हैं. बीजेपी के पास हैं 116. दो सीट एनसीपी के पास हैं. गुजरात परिवर्तन पार्टी के पास भी दो सीट हैं. जेडीयू के पास है एक सीट और एक सीट ‘निर्दलीय’ के खाते में है. गुजरात से राज्यसभा में 3 सीटें हैं. इनका कार्यकाल अगस्त 2017 में खत्म हो रहा है. लिहाजा यहां राज्यसभा के लिए चुनाव होने जा रहे हैं.

सोनिया गांधी और अहमद पटेल
सोनिया गांधी और अहमद पटेल

एक राज्यसभा सीट के लिए कम से कम 47 विधायकों का वोट हासिल करना ज़रूरी है. अहमद पटेल फिलहाल गुजरात से ही राज्यसभा के सांसद हैं. कांग्रेस के छह विधयक बीजेपी में शमिल हो चुके हैं. ऐसे में कांग्रेस के पास बचते हैं 54. यह संख्या राज्यसभा के लिए ज़रूरी वोट से कहीं ज्यादा है. राष्ट्रपति चुनाव में 11 विधायक क्रॉस वोटिंग कर चुके हैं. बीजेपी यह उम्मीद कर रही है कि शंकर सिंह वाघेला कांग्रेस में और बड़ी फूट डालने में कामयाब हो जाएं. राजनीतिक पंडित मान रहे हैं कि कांग्रेस की तरफ से कम से कम 12 से 15 विधायक क्रॉस वोटिंग कर सकते हैं. ऐसे में पटेल की राज्यसभा सांसदी पर खतरा मंडरा रहा है.

इधर हाई कमान भी अहमद पटेल से खुश नहीं है. सूत्र बताते हैं कि राहुल गांधी अपनी मां के इस सबसे भरोसेमंद सेनापति को खास पसंद नहीं करते हैं. 1985 से गांधी परिवार का हिस्सा रहे अहमद पटेल के लिए यह कठिन समय है. राजीव गांधी की हत्या के बाद यही अहमद पटेल थे, जिन्होंने ना सिर्फ सोनिया को इस हादसे से बाहर निकलने में मदद की बल्कि वो उनके राजनीतिक अंगरक्षक के तौर पर भी साथ रहे. इस कठिन दौर में पटेल खुद पर सोनिया गांधी का भरोसा कब तक कायम रख पाते हैं, यह देखने वाली बात होगी.

मोदी और शाह: एक तीर और दो शिकार

नरेंद्र मोदी गुजरात की नाड़ी पढ़ सकते हैं. सूबे में बीजेपी की हालत गंभीर है. वहां की सबसे बड़ी बिरादरी पाटीदार तेजी से बीजेपी के खिलाफ झुक रही है. नरेंद्र मोदी अब तक गुजरात में दो दर्जन जनसभा कर चुके हैं. राजकोट और सूरत में रोड शो कर चुके हैं. यह आंकड़ा उनके भीतर पैदा हुई अनिश्चितता की गवाही देता है. गुजरात में बीजेपी की हार के मायने किसी और सूबे में हार से ज़्यादा बड़े साबित हो सकते हैं. इस सब में वाघेला का कांग्रेस से टूटना उनके लिए राहत की खबर है.

शंकर सिंह वाघेला फिलहाल एकसूत्रीय कार्यक्रम पर काम कर रहे हैं, ‘अहमद पटेल.’

वाघेला किसी भी कीमत पर पटेल का बोरिया-बिस्तर बंधवाने पर तुले हुए हैं. अमित शाह को इसी मौके की तलाश थी. वो भी पटेल को राजनीतिक तौर पर ठिकाने लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते. कहा यह भी जा रहा है कि शंकर सिंह वाघेला की कांग्रेस से विदाई के असल सूत्रधार शाह ही हैं. कांग्रेस के बागी विधयक बलवंत सिंह राजपूत को राज्यसभा के लिए बीजेपी का उम्मीदवार बना कर अमित शाह ने पटेल को ठिकाने लगाने की भूमिका लिखना शुरू कर दिया है. इसके अलावा बीजेपी के दो दूसरे उम्मीदवार स्मृति ईरानी और खुद अमित शाह हैं. यह अमित शाह के लिए संसदीय करियर की शुरुआत होगी. पटेल और शाह के आमने-सामने होने की वजह से मुकाबला और दिलचस्प हो गया है. दोनों नेता पॉलिटिकल मैनेजर के तौर पर अपनी काबिलियत के लिए जाने जाते हैं.

क्या शंकर सिंह वाघेला की चाल ही उन्हें चित्त करेगी?

48 घंटे में छह विधायकों का कांग्रेस छोड़ना खेल की शुरुआत भर है. गुजरात में कांग्रेस के मुख्य सचेतक शैलेष परमार के नेतृत्व में कांग्रेस के 44 विधायक फिलहाल बेंगलुरु में हैं. कहा जा रहा है कि वो तिरुपति के दर्शन करने जा रहे हैं. करीब 22 साल पहले भी ऐसा ही हुआ था. तब शंकर सिंह वाघेला बीजेपी के कद्दावर नेता हुआ करते थे.

केशुभाई पटेल और नरेंद्र मोदी
केशुभाई पटेल और नरेंद्र मोदी

1995 के गुजरात विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 182 सीटों वाली विधानसभा में 121 सीटों पर बहुमत हासिल हुआ था. शंकर सिंह वाघेला को उम्मीद थी कि उन्हें मुख्यमंत्री बनाया जाएगा. नरेंद्र मोदी के दबाव के चलते केशुभाई पटेल राज्य के मुख्यमंत्री बने. मंत्रीमंडल में वाघेला और उनके समर्थकों की अनदेखी की गई.

सितम्बर 1995 में शंकर सिंह वाघेला ने बीजेपी के 27 विधायकों को अपने साथ लिया और हवाई जहाज़ में सवार होकर मध्यप्रदेश के खजुराहो पहुंच गए. वहां उस समय दिग्विजय सिंह की सरकार थी. उनके दबाव में केशुभाई पटेल को इस्तीफा देना पड़ा. उनके विश्वस्त सुरेश मेहता को नया मुख्यमंत्री बनाया गया और नरेंद्र मोदी की गुजरात से विदाई हुई. 22 साल बाद कांग्रेस शंकर सिंह वाघेला के खिलाफ उन्हीं का दांव अज़मा रही है. राज्यसभा चुनाव से पहले इन विधायकों के प्रदेश लौटने की कोई संभावना नहीं है.


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