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केवल सिक्किम आने-जाने के लिए नहीं, इस एयरपोर्ट की अहमियत कुछ और भी है

सिक्किम देश का इकलौता ऐसा राज्य था, जिसके पास अपना एक भी एयरपोर्ट नहीं था. सिक्किम जाने का एक ही रास्ता था. ट्रेन से न्यू जलपाईगुड़ी (पश्चिम बंगाल) तक. फिर वहां से प्राइवेट टैक्सी या शेयर्ड सूमो. न्यू जलपाईगुड़ी से गंगटोक (सिक्किम की राजधानी) की दूरी तकरीबन 120 किलोमीटर है. हवाई जहाज से आए हैं, तो बागडोगरा एयरपोर्ट (दार्जिलिंग, पश्चिम बंगाल) पर उतरकर टैक्सी या शेयर में चलने वाली सूमो पर बैठिए. बागडोगरा एयरपोर्ट से गंगटोक की दूरी 124 किलोमीटर है. यही एक सड़क थी, जो सिक्किम को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ती थी. ये रास्ता बंद, तो सिक्किम भी आउट ऑफ नेटवर्क. अब ऐसा नहीं होगा. सीधे सिक्किम तक के लिए आसमान की राह खुल गई है. सिक्किम को उसका ब्रैंड न्यू एयरपोर्ट मिल गया है.

पूर्वी सिक्किम में एक छोटा सा शहर है- पाक्किम. यहीं पर बनकर तैयार हुआ है ये सिक्किम का हवाईअड्डा. पाक्किम से करीब दो किलोमीटर ऊपर एक पहाड़ी के ऊपर बना है ये. एक हेलिकॉप्टर में बैठकर नरेंद्र मोदी सिक्किम की राजधानी गंगटोक पहुंचे. 24 सितंबर को उन्होंने हवाईअड्डे का उद्घाटन कर दिया. इसकी कुछ बातें पॉइंट्स में जान लीजिए-

इसका एक नाम पाक्यॉन्ग भी है. स्थानीय भाषा में पाक्यॉन्ग को ही ‘पाक्किम’ कहते हैं.
इसे बनाने में 605 करोड़ रुपये की लागत आई है.
  इसे बनकर तैयार होने में नौ साल लगे हैं. इसका काम 2008-09 में शुरू हुआ था.
1.75 किलोमीटर लंबा रन-वे है इसका.
लगभग 201 एकड़ के इलाके में फैला हुआ है ये एयरपोर्ट.
भारत के हवाईअड्डों की गिनती के हिसाब से देखें, तो ये देश का 100वां ऑपरेशनल एयरपोर्ट होगा.
ये एयरपोर्ट भारत-चीन सीमा से लगभग 60 किलोमीटर दूर है.
4 अक्टूबर को यहां से पहली कर्मशल फ्लाइट उड़ेगी.
फिलहाल दिल्ली, कोलकाता और गुवाहाटी से यहां की रोजाना फ्लाइट उपलब्ध होगी.

नॉर्थ-ईस्ट से जुड़े रहने के इकलौते रास्ते की हिफाजत में मददगार होगा
सिक्किम आने-जाने में लोगों को मिलने वाली सहूलियत, कारोबार को फायदा, ये सारी सिविल चीजें अलग हैं. मगर इस एयरपोर्ट से सबसे बड़ा फायदा होगा सामरिक तौर पर. भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य भौगोलिक स्थिति के हिसाब से बहुत अलग-थलग हैं. एक पतला सा जमीन का हिस्सा है, जो इसे भारत के बाकी हिस्सों से जोड़ता है. इसका नाम है- सिलीगुड़ी कॉरिडोर कहते हैं. आपने मुर्गी की गर्दन देखी है. एकदम पतली सी होती है. ये रास्ता भी ऐसा ही है. इसीलिए अंग्रेजी में इसे ‘चिकन्स नेक’ कहते हैं. ये रास्ता 200 किलोमीटर लंबा और 60 किलोमीटर चौड़ा है. एक जगह तो ये बस 17 किलोमीटर ही चौड़ा है. ये रास्ता बंगाल के तराई वाले इलाकों से शुरू होकर नॉर्थ-ईस्ट को जाता है. सड़क हो चाहे रेलवे की पटरियां, सब इसी रास्ते से गुजरती हैं. व्यापार हो कि इंसानों का आना-जाना, सब इसी रास्ते से होता है. इस सिलिगुड़ी कॉरिडोर के दक्षिण में बांग्लादेश पड़ता है और उत्तर में चीन. भूटान और नेपाल का रास्ता भी इधर से जाता है. भारत को अगर अपने उत्तर-पूर्वी राज्यों से जुड़े रहना है, तो इस कॉरिडोर का खुले रहना बेहद जरूरी है. इस कॉरिडोर को सुरक्षित रखने के लिए भारत को इसके आस-पास एक सुरक्षा जाल बनाने की जरूरत है. ताकि किसी भी इमरजेंसी की स्थिति में वो कई रास्तों से इसकी हिफाजत कर सके. इस लिहाज से भी सिक्किम का ये एयरपोर्ट काफी मददगार साबित होगा.

ये न्यू जलपाईगुड़ी से गंगटोक का रास्ता है. आने-जाने का वक्त साढ़े पांच घंटे लिखा है. लेकिन इस सफर में आधे दिन से ज्यादा लग जाता है (फोटो: गूगल मैप्स)
ये न्यू जलपाईगुड़ी से गंगटोक का रास्ता है. आने-जाने का वक्त साढ़े पांच घंटे लिखा है. लेकिन इस सफर में आधे दिन से ज्यादा लग जाता है (फोटो: गूगल मैप्स)

सिक्किम की अहमियत क्या है?
सिक्किम सिलिगुड़ी के उत्तर में है. भूगोल के हिसाब से देखें तो सिक्किम नेपाल, चीन और भूटान के बीच में पड़ता है. क्षेत्रफल के लिहाज से ये भारत का दूसरा सबसे छोटा राज्य है. मगर इसकी भौगोलिक स्थिति इसे सामरिक तौर पर बेहद संवेदनशील बनाती है. सिक्किम पार चीन बसा है. पिछले कुछ समय से डोकलाम को लेकर भारत-चीन के बीच काफी तनातनी रही. सिक्किम वाले बॉर्डर के पास भूटान-चीन सीमा के नजदीक ही है ये डोकलाम. जिस जगह पर भारत, चीन और भूटान की सीमाएं एक-दूसरे से मिलती हैं, उसका नाम है डोका-ला. ये ‘डोका-ला’ डोकलाम का ही हिस्सा है, जो कि सिक्किम सेक्टर में पड़ता है. चीन डोकलाम को तिब्बत का हिस्सा बताता है. चूंकि तिब्बत पर उसका कब्जा है, तो उसके हिसाब से डोकलाम भी उसका ही हुआ. इसके अलावा चीन ये भी कहता है कि तीनों देशों की सीमाएं डोका-ला में नहीं, बल्कि इसके दक्षिण में स्थित गामोचेन में मिलती हैं. ये दावा तो वो बहुत वक्त से कर रहा था. मगर चूंकि विवाद सुलझाने के लिए बातचीत हो रही थी, सो जमीन पर यथास्थिति बनी हुई है.

फिर चीन ने क्या किया कि गामोचेन नाम की जगह तक सड़क बढ़ाने लगा. ये जगह भूटान की सीमा में आती है. भारत और भूटान ने इसपर आपत्ति जताई. जवाब में चीन की सेना डोका-ला में घुस गई. चूंकि भारत भूटान का सामरिक पार्टनर है, सो भूटान की तरफ से इस जगह की पहरेदारी भी भारतीय सेना ही करती है. चीनी सैनिकों ने डोका-ला में घुसकर भारत के कुछ बंकर भी तबाह कर दिए. इसके बाद ही दोनों देशों में तनातनी शुरू हुई. ऐसा लगा कि अब जंग शुरू हुई, तब शुरू हुई. भारत को दिक्कत ये थी कि अगर चीन गामोचेन तक रोड ले आता, तो सिलिगुड़ी कॉरिडोर के काफी नजदीक पहुंच जाता. वैसे डोकलाम पर अपना दावा करने के पीछे भी चीन की यही मंशा है. वो सिक्किम समेत पूरे नॉर्थ-ईस्ट राज्यों में भारत की स्थिति कमजोर करना चाहता है. भारत के इसी हिस्से में अरुणाचल भी है, जिसे चीन तिब्बत का दक्षिणी हिस्सा बताता है.

चीन की बराबरी में आने को बहुत काम करना है हमें
चीन ने इस इलाके में काफी तरक्की की है. चौड़ी सड़कें, रेलवे लाइन्स, हवाईपट्टी, हाई-वे सब बना लिया है. किसी टकराव की स्थिति में उसके लिए अपने सैनिकों को यहां तक पहुंचाना बेहद आसान होगा. सैनिक ही क्या, टैंक और युद्ध से जुड़ी बाकी चीजें यहां तक लाना भी उसके लिए बेहद आसान है. जबकि भारत को जमीन के रास्ते रेंगते-रेंगते वहां तक पहुंचना पड़ता. चूंकि सिक्किम तक पहुंचने में वक्त लगता है, इसीलिए भारत यहां पर अच्छी-खासी तादाद में सैनिकों को तैनात रखता है. भारतीय सेना के अलावा असम रायफल्स, सीमा सुरक्षा बल (BSF) सब होते हैं यहां पर. जंग की स्थिति में भारत को इस इलाके तक अपनी कनेक्टिविटी बढ़ानी होगी. ऐसा नहीं हुआ, तो बहुत कुछ दांव पर लग जाएगा. ऐसा नहीं कि इस एक एयरपोर्ट के सहारे भारत चीन से बराबरी में आ गया हो. सीमा से जुड़े इलाकों में बुनियादी ढांचा तैयार करने के लिहाज से हम अभी भी चीन से बहुत पीछे हैं. अच्छी बात यही है कि हमें अब चौड़ी सड़कें, एयरपोर्ट, हर मौसम में कनेक्टिविटी जैसे इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित करने की अहमियत समझ आ गई है. इस पर गंभीरता से काफी काम भी हो रहा है. ये सिक्किम का एयरपोर्ट इसी काम की एक निशानी है.


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