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फूलपुर: जब चुनाव में नेहरू ने लोहिया से किया वादा तोड़ दिया

“फूलपुर अजीब सा संसदीय क्षेत्र है. इसने बड़े-बड़े नेताओं को जिताकर संसद भेजा है और कई तीसमारखानों को ठिकाने लगा दिया है.” पेशे से वकील रहे 73 साल के विनोद दुबे जब ये बात कहते हैं तो उनकी आवाज में अनुभव साफ़ झलकता है. कहने को तो फूलपुर इलाहाबाद की छोटी सी तहसील है, लेकिन आप यहां रहने वाले किसी भी शख्स से उसके कस्बे के बारे में पूछेंगे तो तपाक से जवाब देगा, “हमने देश को दो प्रधानमंत्री दिए हैं.” यह सही भी है. पंडित जवाहरलाल नेहरू और विश्वनाथ प्रताप सिंह इस सीट का संसद में प्रतिनिधित्व कर चुके हैं.

पंडित नेहरू और फूलपुर के रिश्ते के बारे में सबको पता है. वो यहां से लगातार तीन दफा सांसद रहे थे. राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले किसी भी शख्स के मन में यह सवाल उठना लाजमी है कि इलाहाबाद के रहने वाले नेहरू पास की फूलपुर सीट पर चुनाव लड़ने क्यों गए थे? इस सवाल का जवाब खोजने की गरज से हमने 1951-52 के लोकसभा चुनाव के नतीजों को खंगालना शुरू किया. इन दस्तावेजों में हमें कहीं पर भी फूलपुर का नाम नहीं दिखाई दिया. जिस सीट के आगे जवाहर लाल नेहरू का नाम छपा हुआ था, उस सीट का नाम था, “इलाहबाद डिस्ट्रिक्ट (ईस्ट) कम जौनपुर डिस्ट्रिक्ट (वेस्ट)”. लेकिन उससे भी ज्यादा जिस बात ने हैरान किया, वो ये कि इस चुनाव में दूसरे नंबर पर रहे मसूरिया दीन भी इंडियन नेशनल कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे थे. आखिर यह कैसे हो सकता था?

चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस का एक पोस्टर. उस समय कांग्रेस का चुनाव चिन्ह हुआ करता था ,"डॉ बैलों का जोड़ा."
चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस का एक पोस्टर. उस समय कांग्रेस का चुनाव चिन्ह हुआ करता था ,”दो बैलों की जोड़ी”

दरअसल देश का पहला चुनाव बहुत सलीके से नहीं हुआ था. देश उस समय आकार ले रहा था. उसके प्रशासनिक ढांचे को कायदे से गढ़ा जाना था. ऐसे में अंग्रेजों के छोड़े गए ढांचे से काम चलाया जा रहा था. चुनाव आयोग को मतदाता और जनप्रतिनिधि के बीच के अनुपात में संतुलन कायम करने में काफी मशक्कत करनी पड़ रही थी. लोकसभा के लिए कुल 489 सीटें थी, लेकिन चुनाव हुआ महज 401 सीट पर. इस चुनाव में कुल 86 सीट ऐसी थीं, जहां से एक ही सीट से दो सांसद चुनकर आए थे. एक सीट ऐसी थी, जहां से तीन सांसदों को चुना जाना था. दो सांसदों वाली सीट पर हर पार्टी को दो प्रत्याशी और तीन सांसदों वाली सीट पर हर पार्टी को 3 प्रत्याशी लड़ाने का हक़ था. “इलाहाबाद डिस्ट्रिक्ट (ईस्ट) कम जौनपुर डिस्ट्रिक्ट (वेस्ट)” भी ऐसी ही सीट थी, जहां से एक ही सीट से दो सांसदों को चुना जाना था. 10 फ़रवरी, 1952 के रोज घोषित नतीजों के हिसाब से जवाहर लाल नेहरू 2,33,571 वोट हासिल करके पहले स्थान पर रहे और उनकी ही पार्टी के मसूरिया दीन 1,81,700 वोट हासिल करके दूसरे स्थान पर रहे. ये दोनों ही लोग फूलपुर के पहले सांसद बने.

1957 के चुनाव में इस सीट का नाम बदलकर फूलपुर कर दिया गया. 1957 के चुनाव में नेहरू का जलवा जस का तस कायम रहा. 2,27,448 वोट हसिल करके वो पहले स्थान पर रहे. कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे मसूरिया दीन 1,98,430 वोट के साथ दूसरे स्थान पर रहे. 1960 में चुनाव आयोग ने एक सीट पर एक से ज्यादा प्रतिनिधि वाली व्यवस्था को समाप्त कर दिया और मसूरिया दीन को नेहरू के लिए फूलपुर की सीट छोड़नी पड़ी.

दो दोस्तों की लड़ाई

1962 का चुनाव प्रचार अपने जोरों पर था. नेहरू के सबसे बड़े राजनीतिक आलोचक राम मनोहर लोहिया उन्हें उनके घर में चुनौती दे रहे थे. फूलपुर उस समय देश की सबसे दिलचस्प सीट बन गई थी. फूलपुर संसदीय क्षेत्र में इलाहाबाद शहर का भी एक हिस्सा आता था. इलाहाबाद शहर में कटरा के पास एक बहुत पुराना सिनेमा हॉल है ‘लक्ष्मी टॉकीज’. इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले ज्यादातर छात्र उस दौर में कटरा में रहा करते थे. अक्सर शाम के वक़्त छात्र यहां सिनेमा देखने के लिए जुटा करते थे. प्रचार अभियान के दौरान एक शाम लोहिया सिनेमा देखने आए हुए छात्रों के समूह को संबोधित कर रहे थे. अपने भाषण के दौरान उन्होंने बड़े जोश के साथ कहा,

“मैं कांग्रेस की सबसे मजबूत चट्टान से टकरा रहा हूं. मैं इसे तोड़ तो नहीं पाऊंगा लेकिन इसमें दरार जरूर डाल दूंगा.”

राम मनोहर लोहिया और नेहरू बीच राजनीतिक मतभेदों के बावजूद उनकी दोस्ती हमेशा बरकरार रही
राम मनोहर लोहिया और नेहरू बीच राजनीतिक मतभेदों के बावजूद उनकी दोस्ती हमेशा बरकरार रही

इस सभा में मौजूद विनोद दुबे याद करते हुए कहते हैं कि जैसे ही लोहिया ने यह बात कही वहां मौजूद छात्रों का हुजूम ‘राम मनोहर लोहिया जिंदाबाद’ के नारे लगाने लगा. लोहिया नेहरू के खिलाफ चुनाव लड़ रहे थे और देशभर के समाजवादी कार्यकर्ता उनके लिए प्रचार करने फूलपुर पहुंचने लगे. मधु लिमये, मधु दंडवते, जॉर्ज फर्नांडिस जैसे कई नेता लोहिया के लिए सभा कर चुके थे. इस धुआंधार प्रचार अभियान का नतीजा यह हुआ कि नेहरू कुछ ही दिन पहले किए अपने वायदे पर कायम नहीं रह पाए.

नेहरू और राम मनोहर लोहिया में कितने भी वैचारिक मतभेद रहे हो उनके व्यतिगत संबंध हमेशा दोस्ताना रहे. इस सिलसिले में एक घटना का जिक्र किया जाना जरूरी है. मई 1949 में राणा द्वारा नेपाल के अधिग्रहण के खिलाफ लोहिया और उनके समाजवादी साथी भारत में नेपाली दूतावास के सामने प्रदर्शन कर रहे थे. उन्हें और उनके तकरीबन 50 दूसरे साथियों को धारा 144 को तोड़ने के जुर्म में जेल में डाल दिया गया. लोहिया इस मामले में एक महीने तक जेल में रहे. नेहरू जानते थे कि लोहिया को आम बहुत पसंद हैं. जब तक वो जेल से बाहर आएंगे, आम का मौसम जा चुका होगा. उन्होंने अपने घर से लोहिया के लिए एक पेटी आम जेल में भेजे. जब सरदार पटेल को इस मामले के बारे में पता चला तो वो इस बात से काफी नाराज हुए. उन्होंने गुस्से में नेहरू को खत लिखा कि एक तरफ सरकार लोहिया को गिरफ्तार कर रही है और दूसरी तरफ आप उन्हें आम भेज रहे हैं. नेहरू ने पटेल को इस खत का जवाब देते हुए लिखा कि उन्हें राजनीति और व्यक्तिगत जीवन को एक दूसरे के साथ नत्थी नहीं करना चाहिए. नेहरू खत में लिखी बात का पूरी जिंदगी पालन करते रहे.

1962 के चुनाव में पर्चा भरने के बाद लोहिया ने अपने दोस्त नेहरू को एक खत लिखा. इसका मजमून कुछ इस तरह था.

“डियर प्रेसिडेंट,

आप इस खत को पढ़कर आश्चर्यचकित हो जाएंगे. जिस रोज मैंने हमेशा के लिए कांग्रेस कमिटी को छोड़ा था, मैंने उस इमारत को भी अलविदा कह दिया था. उस समय अरुणा आसिफ अली मेरे साथ थीं. वो हमारी आखिरी मुलाकात थी. इस चुनाव में आपकी जीत निश्चित है. लेकिन इस निश्चित जीत पर अनिश्चितता के बादल छाते हैं और आखिरकार यह आपकी हार में तब्दील होती है तो मुझे इससे बेहद खुशी मिलेगी. साथ ही यह हमारे मुल्क के लिए भी बहुत फायदेमंद साबित होगी.

इससे आपको अपने भीतर सुधार लाने और एक बेहतर इंसान बनने का मौका मिलेगा. आखिर में मैं आपकी लंबी उम्र की कामना करता हूं, ताकि मुझे आपमें सुधार लाने की सलाहियत हासिल हो सके.

आपका
राम मनोहर लोहिया

इस खत का जवाब जवाहर लाल नेहरू ने कुछ इस तरह से दिया,

“डियर राम मनोहर 

आपका जो खत मुझे मिला, उस पर ना तो पता लिखा हुआ था और ना ही तारीख. मैं उस खत का जवाब इलाहाबाद के सोशलिस्ट पार्टी के दफ्तर के पते पर लिखकर भेज रहा हूं.

मुझे खुशी है कि आप जैसी विनम्र शख्सियत इस चुनाव में मेरे मुकाबिल है. मैं सोचता हूं कि इस चुनाव में पूरी बहस राजनीतिक कार्यक्रमों पर केंद्रित रहेगी. इस बात का एहतियात बरतें कि यह चुनाव व्यक्तिगत आक्षेपों पर सिमटकर ना रह जाए. मेरी तरफ से यह वायदा रहा कि मैं अपने लोकसभा क्षेत्र में एक भी दिन प्रचार के लिए नहीं आऊंगा.

आपका
जवाहर लाल नेहरू

राम मनोहर लोहिया कांग्रेस की सबसे मजबूत चट्टान में दरार डालने के लिए फूलपुर पहुंचे थे. वो ऐसा करने में कामयाब भी रहे. विनोद दुबे उस समय इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष हुआ करते थे और लोहिया के प्रचार अभियान में सक्रिय थे. विनोद दुबे याद करते हुए कहते हैं-

“उस समय इलाहाबाद में कुल जमा चार पक्की सड़क थीं. एक कानपुर जाने वाली सड़क, दूसरी बनारस की तरफ जाने वाली ग्रांड ट्रंक रोड और दो रास्ते जो लखनऊ तक जाते थे. इसके अलावा पूरे संसदीय क्षेत्र में कहीं भी पक्की सड़क नहीं थी. डॉ. लोहिया नेहरू के मुकाबले संसाधनहीन नेता थे. उनके पास अपनी गाड़ी भी नहीं थी. दूर की सभाओं में जाने के लिए उनके लिए जीप का इंतजाम करने में हमारी काफी ऊर्जा खर्च होती थी. गांवों में प्रचार करने के लिए वो इक्के (टांगे) का सहारा लिया करते थे. उनके इक्के पर लाउड स्पीकर लगा हुआ होता था. अक्सर एक गांव से दूसरे गांव में जाने के वक़्त लोग उन्हें बीच में रोक लिया करते. उस समय उनका इक्का, उनका चलता-फिरता मंच बन जाता और वो बीच सड़क पर खड़े-खड़े भाषण दिया करते.

उस दौर में बिजली की व्यवस्था नहीं थी. अंधेरा पड़ते-पड़ते बाजार बंद हो जाया करते थे. अक्सर चुनाव अभियान से लौटते-लौटते हमें देर हो जाया करती थी. ऐसे में अक्सर कार्यकर्ताओं को खाना भी मय्यसर नहीं हुआ करता था. सोशलिस्ट पार्टी के दफ्तर में खाने के नाम पर लाई और चना रखा होता था. वही हम लोगों का रात का खाना होता था.

लोहिया का चुनाव प्रचार इतना प्रभावी था कि नेहरू को अपना वायदा तोड़कर फूलपुर प्रचार करने के लिए आना पड़ा. वो पूरे लाव-लश्कर के साथ फूलपुर पहुंचे. उस समय उनके साथ गाड़ियों का काफिला चला करता था.”

चुनावी मैदान में एक-दूसरे के विरोधी रहे लोहिया और नेहरू किसी दौर में कांग्रेस पार्टी के झंडे के नीचे कंधे से कंधा जोड़कर चला करते थे. उस दौर से कांग्रेस में सक्रिय रहे अभय अवस्थी याद करते हैं,

“चुनावी रणक्षेत्र में लोहिया जी और नेहरू जी के बीच कड़ा मुकाबला था लेकिन दोनों नेताओं ने इसकी छाया अपने व्यक्तिगत जीवन पर नहीं पड़ने दी. अपना चुनाव प्रचार खत्म करने के बाद डॉ. लोहिया आनंद भवन आया करते थे और दोनों नेता साथ में चाय पिया करते थे.”

1962 का चुनाव जीतने की उम्मीद खुद लोहिया को नहीं थी. नतीजे भी उम्मीद के मुताबिक ही रहे. नेहरू को मिले 1,18,931 के मुकाबले लोहिया 54,360 वोट ही हासिल कर पाए. नेहरू को 1957 के चुनाव के मुकाबले 1,08,517 वोट का घाटा उठाना पड़ा. पूरे संसदीय क्षेत्र में कुल 27 बूथों पर उन्हें डॉ. लोहिया के मुकाबले कम वोट मिले थे. लोहिया कांग्रेस की सबसे मजबूत चट्टान में दरार डालने में कामयाब रहे थे.

नेहरू परिवार की विरासत

अगले चुनाव में नेहरू नाम की चट्टान को लोहिया पूरी तरह से चटका पाते, उससे पहले ही 27 मई, 1964 के दिन वो रेत की दीवार की तरह ढह गई. 27 मई की सुबह 6.30 के करीब नेहरू ने अपने डॉक्टर से पीठ में तेज दर्द की शिकायत की. डॉक्टर कुछ कर पाते, इससे पहले उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया.

नेहरू की मौत के बाद फूलपुर सीट खाली थी. कांग्रेस की तरफ से टिकट दिया गया पंडित नेहरू की बहन विजय लक्ष्मी पंडित को. विजय लक्ष्मी उस समय महाराष्ट्र की गवर्नर हुआ करती थीं. भाई के देहांत के बाद उन्होंने उनकी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने का फैसला किया. अक्टूबर 1964 में हुए उपचुनाव में वो फूलपुर की सीट से बड़ी आसानी से जीतकर आईं.

अपने भाई जवाहर लाल नेहरु के साथ विजय लक्ष्मी पंडित
अपने भाई जवाहर लाल नेहरु के साथ विजय लक्ष्मी पंडित

1967 के लोकसभा चुनाव में विजय लक्ष्मी पंडित एक बार फिर से फूलपुर के चुनावी मैदान में थीं. उनके सामने थे जनेश्वर मिश्र. जनेश्वर यह चुनाव संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर लड़ रहे थे. इस चुनाव में जनेश्वर की उम्मीदवारी भी कम नाटकीय नहीं थी.

इलाहाबाद जंक्शन रेलवे स्टेशन के सामने बना प्रयाग होस्टल उस दौर में समाजवादियों का एक पुराना ठिया हुआ करता था. चुनाव से कुछ रोज पहले की बात है. रात के तकरीबन 10 बज रहे थे. इलाहाबाद में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े तमाम नेता और कार्यकर्ता जुटे हुए थे. ये लोग आने वाले उपचुनाव में अपने उम्मीदवार के नाम पर चर्चा कर रहे थे. अचानक कमरे का दरवाजा खुला और डॉ. राम मनोहर लोहिया सबके सबके सामने नमूदार हुए. उनके इलाहाबाद  आने की सूचना किसी के पास नहीं थी.

डॉ. लोहिया ने वहां मौजूद लोगों से पूछा कि वो इतनी रात गए किस बात पर चर्चा कर रहे हैं. उन्हें बताया गया कि आने वाले चुनाव में उम्मीदवार का चयन किया जा रहा है. मीटिंग में यह तय हो चुका था कि शहर के पुराने समाजवादी नेता सालिगराम जायसवाल इस चुनाव में संसोपा का प्रतिनिधित्व करेंगे. वो आजादी के आंदोलन से जुड़े रहे थे. आजादी से पहले बनी अंतरिम यूनाइटेड प्रोविंस सरकार में वो मंत्री भी रहे थे. फूलपुर का बच्चा-बच्चा उनके नाम से वाकिफ था. ऐसे में वो मौजूदा हालात में सबसे बेहतर उम्मीदवार थे. जवाब में डॉ. लोहिया ने सिर्फ एक लाइन कही और मीटिंग में हुआ फैसला बदल दिया गया. यह लाइन थी,“चुनाव जनेश्वर लड़ेगा.”

जनेश्वर को भी लोहिया की तरह ही मायूस होना पड़ा. जीत गई विजय लक्ष्मी पंडित की झोली में. विजय लक्ष्मी पंडित को मिले 95,306 वोट के मुकाबले छोटे लोहिया महज 59,123 वोट ही हासिल कर पाए. विजय लक्ष्मी की जीत में अहम भूमिका निभाई आर.के.एस. यादव ने. यादव निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर इस चुनाव में खड़े थे. उन्होंने 24,870 वोट हासिल करने में कामयाबी हासिल की थी. जनेश्वर और विजय लक्ष्मी के बीच जीत-हार का अंतर था 36,183 वोट.

1967 के चुनाव में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का मुख्य चुनावी नारा था, “संसोपा ने बांधी गांठ, पिछड़ा पाए सौ में साठ.” आर.के.एस. यादव ने इस सीट पर पिछड़े वोटों में सेंध लगा दी थी. इसका सीधा घाटा जनेश्वर मिश्र को हुआ था. इसके अलावा समाजवादी आंदोलन के ही दूसरे धड़े प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के पी.के. मालवीय फूलपुर के चुनावी मैदान में थे. 8,281 वोट के साथ मालवीय छठे स्थान पर रहे थे. वो खुद तो चुनाव हारे ही लेकिन उन्होंने जनेश्वर का समीकरण भी बिगाड़ दिया.

जनेश्वर का ‘छोटे लोहिया’ बनना

जनेश्वर मिश्र 1967 का चुनाव हार चुके थे लेकिन फूलपुर से नेहरू परिवार की विरासत को खत्म करने के लिए ज्यादा समय तक इंतजार नहीं करना पड़ा. 1968 में विजय लक्ष्मी पंडित को संयुक्त राष्ट्र में भारत का प्रतिनिधि बनाकर भेजा गया. इस सिलसिले में उन्हें देश छोड़ना पड़ा. फूलपुर की सीट एक बार फिर से खाली थी.

केंद्र में इंदिरा गांधी की सरकार थी. 1967 का चुनाव जीतने के बाद इंदिरा का रुख पूरी तरह बदल चुका था. वो खुद को अपने पिता से ज्यादा समाजवादी साबित करने में लगी हुई थीं. बैंको के राष्ट्रीयकरण पर संसद में लगातार बहस जारी थी. इंदिरा गांधी अब ‘लोहिया की गुड़िया’ नहीं रही थीं. इंदिरा के इन तेवरों को गढ़ने में दो लोगों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. पहला परमेश्वर नारायण हक्सर जो कि इंदिरा सरकार में मुख्य सचिव हुआ करते थे और दूसरा केशव देव मालवीय जो कि नेहरू सरकार में खनन मंत्री रह चुके थे. ये दोनों ही लोग नेहरू के जमाने में उनके भरोसेमंद साथी हुआ करते थे.

आखिरकार लोहिया की हार का बदला छोटे लोहिया ने ले लिया
आखिरकार लोहिया की हार का बदला छोटे लोहिया ने ले लिया

1969 के लोकसभा उपचुनाव में इंदिरा ने केडी मालवीय को अपने परिवार की परम्परागत सीट से चुनाव लड़ने के लिए भेजा. मालवीय डुमरियागंज से 1967 का लोकसभा चुनाव भारतीय जनसंघ के एन. एस. शर्मा के हाथों हार चुके थे. इसके बावजूद इंदिरा ने उन्हें अपनी सरकार में पेट्रोलियम जैसा भारी-भरकम महकमा सौंपा था.

1969 में इलाहाबाद में छात्रों का आंदोलन चल रहा था. इस आंदोलन की कमान जनेश्वर मिश्र के हाथो में थी. इंदिरा सरकार ने डिफेंस ऑफ़ इंडिया रूल (डीआईआर) के तहत जनेश्वर को जेल में डाल दिया था. जिस समय उपचुनाव की घोषणा हुई उस समय जनेश्वर आठ महीने से जेल में थे. उन्होंने जेल से ही अपना पर्चा दाखिल किया था.

चुनाव से महज 7 दिन पहले जनेश्वर की रिहाई हो पाई. रिहाई के वक्त हजारों छात्र नैनी जेल के बाहर उनका इंतजार कर रहे थे. जेल के बाहर ‘जनेश्वर मिश्र जिंदाबाद’ के नारे लग रहे थे. जनेश्वर आधा चुनाव नैनी जेल के बाहर खड़े-खड़े जीत गए.

अक्सर जनेश्वर को दूर-दराज के गांवों में जनसभा को संबोधित करने के लिए जाना होता था. उस समय जनेश्वर मिश्र के लिए किराए पर एक खुली छत वाली एक पुरानी ऑस्टिन कार की व्यवस्था की गई थी. यह कार अपनी बदमिज़ाजी के लिए समाजवादी कार्यकर्ताओं के बीच मशहूर हो चुकी थी. चुनाव प्रचार के दौरान अक्सर संसोपा के नौजवान कारकून इस कार को लेकर जनेश्वर मिश्र की चुटकी लिया करते थे. ऐसे ही एक चुनाव प्रचार के दौरान जनेश्वर को इलाहाबाद से 30 किलोमीटर दूर मंसूराबाद के आगे एक गांव में सभा को संबोधित करने जाना था.

मंसूराबाद पहुंचकर कार का मूड खराब हो गया. काफी धक्का देने पर भी उसने चलने से इनकार कर दिया. जनेश्वर कार को उसके ड्राइवर बाबू के हवाले करके सभा को संबोधित करने के लिए चल दिए. जब वापिस लौटे तो कार की नाराजगी जस की तस बनी थी. आखिरकार उन्हें 30 किलोमीटर पैदल सफ़र करके इलाहाबाद लौटना पड़ा.

खराब कार के साथ किया गया जनेश्वर मिश्र का सात दिन का चुनाव प्रचार केन्द्रीय मंत्री पर भारी साबित हुआ. केशव देव मालवीय इस चुनाव में खेत रहे. चुनाव जीतकर जब जनेश्वर पहली मर्तबा सांसद पहुंचे, उस समय उसकी मुलाकात फायरब्रांड समाजवादी नेता राज नारायण से हुई. राजनारायण उस समय राज्यसभा के सांसद हुआ करते थे. इस मुलाकात में राज नारायण ने जनेश्वर को पहली दफा ‘छोटे लोहिया’ कह कर पुकारा था. बाद में यह नाम जनेश्वर की पहचान बन गया.

फ़कीर राजा बनाम छोटे लोहिया

1971 का लोकसभा चुनाव. छोटे लोहिया इस बार संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर अपना गढ़ बचाने के लिए मैदान में उतरे थे. कांग्रेस ने टिकट दिया विश्वनाथ प्रताप सिंह को. वीपी सिंह उस समय फूलपुर में पड़ने वाली सोरांव विधानसभा से विधायक थे. इधर चौधरी चरण सिंह 1967 में कांग्रेस से किनारा कर चुके थे. उन्होंने अपनी नई पार्टी बनाई ‘भारतीय क्रांति दल.’ बीकेडी ने भी इस सीट से अपना उम्मीदवार उतारा था. नाम बीडी सिंह.

चुनाव के नतीजे चौंकाने वाले थे. सोरांव विधायक विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मैदान मार लिया था. उन्हें 1,23,095 वोट हसिल हुए थे. आजादी के बाद फूलपुर से पहली बार कोई गैर-ब्राह्मण प्रत्याशी चुनकर जा रहा था. कुछ साल पहले बनी बीकेडी के बीडी सिंह आश्चर्यजनक तौर पर 56,315 वोट के साथ दूसरे स्थान पर रहे. महज 28,760 वोट के साथ जनेश्वर मिश्र को तीसरे स्थान पर खिसकना पड़ा था.

विश्वनाथ प्रताप सिंह
विश्वनाथ प्रताप सिंह

यह छोटे लोहिया की उस सीट से रुखसती थी, जिसने उन्हें यह नाम दिया था. 1973 में हेमवतीनंदन बहुगुणा के मुख्यमंत्री बनने के बाद बगल की इलाहाबाद सीट खाली हो गई. यहां हुए उपचुनाव ने जनेश्वर के लिए लोकसभा के दरवाजे फिर से खोल दिए. भारतीय क्रांति दल के टिकट पर उन्होंने इलाहाबाद में 1969 का करिश्मा दोहरा दिया.

1973 से 1977 तक वो इलाहाबाद के माननीय सांसद रहे. वही इलाहाबाद, जहां की अदालत का एक फैसला देश में लगे आपातकाल का सबसे बड़ा सूत्रधार रहा. फूलपुर आपातकाल के बाद दिलचस्प सियासी दांव-पेच का अखाड़ा बनना था. एक गुरु और चेले की जोड़ी का दंगल होना अभी बाकी था. अभी बाकी था एक ऐसे सियासी पहलवान का आना, जिसने लगातार तीन दंगल जीतकर नेहरू के रिकॉर्ड की बराबरी की थी. किसी दौर में देश को प्रधानमंत्री देने वाला फूलपुर देश की संसद को सबसे बदनाम सांसद देने जा रहा था. अभी फूलपुर के सियासी चौसर पर कई दिलचस्प बाजियां सजनी थीं. फूलपुर की पूरी कहानी की एक और कड़ी अभी बाकी है….


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एडवेंचर ऑफ टॉर्जन की हिरोइन किमी काटकर अब ऑस्ट्रेलिया में हैं. सीधी सादी लाइफ बिना किसी एडवेंचर के

चाय बनाने को 'जैसे पापात्माओं को नर्क में उबाला जा रहा हो' कौन सी कहानी में कहा है?

चाय बनाने को 'जैसे पापात्माओं को नर्क में उबाला जा रहा हो' कौन सी कहानी में कहा है?

बहुत समय पहले से बहुत समय बाद की बात है. इलाहाबाद में थे. जेब में थे रुपये 20. खरीदी हंस...

सर आजकल मुझे अजीब सा फील होता है क्या करूं?

सर आजकल मुझे अजीब सा फील होता है क्या करूं?

खुड्डी पर बैठा था. ऊपर से हेलिकॉप्टर निकला. मुझे लगा. बाबा ने बांस गहरे बोए होते तो ऊंचे उगते.