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फूलपुर उप-चुनाव: क्या बीजेपी फिर से कमल खिला पाएगी?

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8 मार्च की शाम तकरीबन पांच बजे का वक़्त रहा होगा. 11 मार्च को होने जा रहे मतदान के प्रचार में महज 24 घंटे का वक़्त बाकी था. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ शहर के लेबर चौराहे पर दिन की तीसरी और आखरी सभा को संबोधित करने जा रहे थे. मंच बीजेपी के राज्य नेतृत्व से अटा पड़ा था. सभा स्थल किसी कायदे के मैरिज गार्डन से बड़ा नहीं था. अगर लोगों को ठूंस-ठूंसकर भी भर दिया जाए तो इसकी क्षमता पांच से सात हजार की थी. लोग ठूंस-ठूंसकर भरे भी हुए थे. योगी इस सभा के सबसे बड़े आकर्षण थे, लिहाजा उन्हें सबसे आखिर के लिए बचाकर रख लिया गया. उनसे पहले बोलने का मौक़ा दिया गया 2014 में इसी सीट से सांसद रहे सूबे के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या को.

मौर्या के खड़े होने के साथ ही उनके खिलाफ भीड़ में छिटपुट हूटिंग होना शुरू हो गई. हूटिंग कर रही भीड़ को गौर से देखने पर उसमें सहसो मोड़ चौराहे पर खड़ी पान की दूकान पर दर्ज किया गया बयान खड़ा था. यह बयान किसी पान चबाते हुए मुंह से निकला था, “इस बार अगर बीजेपी केशव प्रसाद मौर्या के घर से किसी को टिकट दे देती तो बीजेपी की जमानत जब्त हो जाती. चार साल से वो इलाहाबाद में दिखाई नहीं दिए हैं.”

इलाहाबाद उत्तर में जनसभा को संबोधित करते हुए केशव प्रसाद मौर्य
इलाहाबाद उत्तर में जनसभा को संबोधित करते हुए केशव प्रसाद मौर्या

मंच पर बैठे दो दर्जन नेताओं और मंच के सामने खड़े दो दर्जन कार्यकर्ताओं को धन्यवाद देने के बाद उप मुख्यमंत्री ने बोलना शुरू किया. वो क्या बोले इससे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि उनके बोलने का भीड़ पर क्या असर हो रहा था. बीच-बीच में किसी चुटीली लाइन पर ताली बजाने के अलावा भीड़ मौर्या के भाषण को एक खानापूर्ति की तरह ले रही थी जिसे योगी के बोलने से पहले पूरा किया जाना जरुरी था. योगी जी को ज्यादा से ज्यादा बोलने का मौका देने की बात कहते हुए उन्होंने अपना आधा घंटा लंबा भाषण खत्म किया.

महंत योगी आदित्यनाथ के खड़े होने के साथ ही भीड़ उत्तेजना से भर गई. चारों तरफ ‘योगी-योगी’ के नारे गूंजने लगे. यह पूरा दृश्य मुझे राजकोट की याद दिला रहा था. तारीख थी 4 दिसंबर 2017. गुजरात चुनाव का प्रचार अपने चरम पर था. प्रधानमंत्री मोदी राजकोट में थे और मुख्यमंत्री विजय रूपाणी की विधानसभा सीट राजकोट वेस्ट में जनसभा को संबोधित करने के लिए पहुंचे हुए थे. रवायत के तौर पर उनसे पहले विजय रूपाणी को बोलने के लिए मौक़ा दिया गया. उस समय रूपाणी के भाषण के प्रति जनता की प्रतिक्रिया बिल्कुल वैसी ही थी जैसी इलाहाबाद में मौर्या के भाषण के लिए थी.

योगी आदित्यनाथ और केशव प्रसाद मौर्य
योगी आदित्यनाथ और केशव प्रसाद मौर्या

तो क्या यह उत्तर प्रदेश में नरेंद्र मोदी के नए संस्करण का उदय था? मार्च महीने के पहले सप्ताह में ही वो दो मर्तबा यह साबित कर चुके थे कि बतौर फायरब्रांड हिंदुत्व नेता उनके तेवर अब भी पहले जैसे ही हैं. पांच मार्च को फूलपुर में एक चुनावी सभा के दौरान उन्होंने शुक्रवार के दिन होली पड़ने का हवाला देते हुए कहा कि साल में 52 दफा जुम्मे आते हैं और होली एक दफा. जुम्मे के लिए होली के जश्न को छोटा नहीं किया जा सकता. इसके दो दिन बाद 7 मार्च के रोज वो विधान में यह बोलते पाए गए,

“हमें हिंदू होने पर गर्व है, लेकिन हम वैसे हिंदू नहीं हैं जो घर में जनेऊ धारण करें और बाहर निकलकर टोपी पहन लें. ऐसा वो लोग करते हैं, जिनके मन में पाप होता है. मैंने तब भी कहा था और आज भी गर्व के साथ कहता हूं कि मैं हिंदू हूं. मैं ईद नहीं मनाता. लेकिन, यदि कोई अपना त्योहार मनाएगा तो सरकार उसमें सहयोग करेगी और साथ ही सुरक्षा भी देगी.”

योगी मोदी के उत्तराधिकारी होंगे यह फिलहाल फखत सियासी कयासबाजी है. लेकिन इस रैली में दो बात ऐसी हैं जो काबिल-ए-गौर हैं. पहली कि योगी आदित्यनाथ अपने भाषण में बाहुबली निर्दलीय उम्मीदवार अतीक अहमद का नाम लेना नहीं भूले. हालांकि यह जिक्र अपराधियों की लगाम कसने के हवाले से था. फूलपुर का बच्चा-बच्चा जानता है कि इस चुनाव में अतीक महज वोट कटाने वाले उम्मीदवार की भूमिका में हैं. योगी के भाषण में अतीक के जिक्र के क्या मायने थे. दरअसल 5 मार्च की अपनी चुनावी सभा में जुम्मे और होली के हवाले से दिए गए बयान से योगी ने साफ़ कर दिया कि वो यह चुनाव भी हिंदुत्व की छतरी के नीचे लड़ने जा रहे हैं. ऐसे में अतीक ध्रुवीकरण की निर्णायक कील हैं जिसके विरोध में वोटों को बटोरा जा सकता है.

इस सभा की दूसरी महत्वपूर्ण बात केशव मौर्या के मुंह से निकली. यह सभा लेबर चौराहे पर हो रही थी जो कि शहर उत्तरी विधानसभा सीट में पड़ता है. केशव मौर्या ने 2004 के लोकसभा चुनाव का हवाला देते हुए कहा,

“बाकी की जगहों पर हम कहते हैं कि सौ में साठ हमारा है बाकी में बंटवारा है लेकिन शहर उत्तरी क्षेत्र में हम कह सकते हैं कि सौ में नब्बे हमारा है बाकी में बंटवारा है. लेकिन आपको याद है ना कि 2004 में राष्ट्रीय स्तर के नेता मुरली मनोहर जोशी इस इलाहाबाद से चुनाव हार गए थे. उस समय शहर उत्तरी ने महज 17 फीसदी मतदान किया था. आपसे तो बस निवेदन इतना सा ही है कि ज्यादा से ज्यादा संख्या में मतदान केंद्र पर पहुंचे और मत डालें. हमें भरोसा है कि शहर उत्तरी का हर वोट भारतीय जनता पार्टी के खाते में जाएगा.”

रैली में आए बीजेपी समर्थक लगतार योगी-योगी के नारे लगा रहे थे
रैली में आए बीजेपी समर्थक लगतार योगी-योगी के नारे लगा रहे थे

2004 तक शहर उत्तरी विधानसभा इलाहाबाद में आती थी. 2009 के परिसीमन के इस सीट को फूलपुर में जोड़ दिया गया. केशव प्रसाद मौर्या की लगातार अपील बेअसर साबित हुई और इस उप-चुनाव में यहां का मतदान प्रतिशत महज 21.65 पर सिमटकर रह गया. इसके अलावा फाफामऊ विधानसभा क्षेत्र में 43, सोरांव में 45, फूलपुर में 46.32, इलाहाबाद पश्चिमी विधानसभा क्षेत्र में 31 फीसद मतदान हुआ. शहरी क्षेत्रों में कम मतदान बीजेपी की चिंता बढ़ा रहा है. गिरते हुए मतदान प्रतिशत से आप किसी नतीजे पर पहुंचे उससे पहले हमें फूलपुर संसदीय क्षेत्र में बीजेपी के संयोजक प्रभा शंकर पांडेय की बात सुन लेनी चाहिए-

“उप-चुनाव में माहौल सामान्य चुनाव जैसा नहीं होता है. क्योंकि सूबे के कुछ हिस्सों में चुनाव होते हैं इसलिए जनता की दिलचस्पी आम चुनाव के मुकाबले कम होती है. इस वजह से मतदान प्रतिशत का कुछ कम होना स्वाभाविक है.”

क्या बसपा का वोट सपा के पाले में जा पाएगा?

2 जून 1995, लखनऊ के गेस्ट हाउस में एक घटना घटी. गेस्ट हाउस कांड.  इसके बाद यह माना जा रहा था कि अब सपा और बसपा के एक परचम के तले आने की संभावना लगभग समाप्त हो गई है. लेकिन ढाई दशक बाद दोनों दल एकजुट होकर बीजेपी के मुकाबिल खड़े हैं. यहां लाख टके का सवाल यह है कि क्या मायावती की अपील से बसपा का परम्परागत दलित वोट सपा के पाले में आ पाएगा?

बसपा का फूलपुर सीट पर ठीक-ठाक वोट बैंक है. 2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा के कपिल मुनि करवरिया को 1,63,710 वोट मिले थे जो कि कुल मतदान के 17 फीसदी थे. 2017 के विधानसभा चुनाव में फाफामऊ सीट पर बसपा को 25.65 फीसदी वोट हासिल हुए. सोराओं सीट जोकि अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है वहां बसपा का स्कोर 28.58 का रहा. फूलपुर विधानसभा में यह आंकड़ा 22.68 है. इलाहाबाद पश्चिम और इलाहाबाद उत्तर में क्रमशः 20.55 और 13.55 फीसदी वोट बसपा के खाते में गए हैं. कुल मिलाकर इलाहाबाद उत्तर को छोड़ कर इस लोकसभा में पड़ने वाली बाकी की चारों सीटों पर बसपा का वोट 20 फीसदी के आस-पास बैठता है. क्या गठबंधन होने के बाद बसपा का यह वोट सपा के खाते में शिफ्ट हो पाएगा?

1993 का विधानसभा चुनाव सपा और बसपा ने साथ लड़ा था.
1993 का विधानसभा चुनाव सपा और बसपा ने साथ लड़ा था.

जब हम लोग सहसों मोड़ से सोराओं की तरफ बढ़ रहे थे तो कलंदरपुर के आस-पास हमें समाजवादी पार्टी का प्रचार कर रहा एक टैम्पो मिला. इसके आगे के हिस्से पर सपा प्रत्याशी नागेंद्र पटेल को वोट देने की अपील करता होर्डिंग मय तस्वीर लगा हुआ था. टैम्पो के पीछे की तरफ दो नीले झंडे कसकर बांधे हुए थे. सपा को पता है कि इस चुनाव में जीत के लिए इन झंडों का मजबूती से बंधा रहना जरुरी है लेकिन वो लोग इस गठबंधन के कितना पक्ष में हैं जो सूबे में तीन दशक से नीला झंडा ढो रहे हैं.

इसका जवाब हमें मिला सराय दत्ते के रहने वाले रमेश कुमार से. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बीए कर रहे रमेश दलित समुदाय से आते हैं और पहली मर्तबा वोट डालने जा रहे हैं. जब उनसे यह पूछा गया कि क्या योगी के करिश्मे के खिलाफ सपा और बसपा का गठबंधन कामयाब हो पाएगा? रमेश का जवाब था-

“नौजवान हाल की मोदी सरकार से बहुत परेशान हैं. रोजगार की भयंकर कमी है. आप एसएससी का मामला तो देख ही रहे हैं. इसके अलावा राशन कार्ड पर मिलने वाले अनाज और कैरोसीन में भी कटौती की गई है. इसका सबसे बुरा प्रभाव दलितों पर पड़ रहा है. उनका वर्तमान सरकार से नाराज होना स्वाभाविक है.

आज तक उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा आमने-सामने लड़ती आई हैं लेकिन अब हालात बदल गए हैं. अगर दोनों साथ मिलकर नहीं लड़े तो दोनों खत्म हो जाएंगे. फूलपुर में पासी समुदाय की तादाद काफी है. अब तक हम लोग बसपा को वोट देते आए हैं. पिछले विधानसभा चुनाव में कुछ वोट छिटका जरुर था लेकिन ज्यादातर वोट बसपा के पाले में गया था. दोनों पार्टी में गठबंधन होने के बाद जिताने की उम्मीद बढ़ी है. ऐसे में दलित वोटों में वैसी टूटन नहीं होनी चाहिए जैसी पिछले विधानसभा चुनाव में देखी गई थी.”

9 जनवरी को चुनाव प्रचार के आखिरी दिन अखिलेश यादव का रोड शो था. 27 किलोमीटर लंबे इस रोड शो को फाफामऊ खत्म होना था. एयरपोर्ट से शुरू हुआ यह रोड शो अपने पीछे धूल का गुबार छोड़ गया. हम इस रोड शो से एक किलोमीटर पीछे रुक गए ताकि गर्द कुछ बैठ जाए. सड़क के किनारे जगह-जगह पर दो कनात और चार तख्तों के दम पर मंच खड़े किए जाए थे. यहां खड़े होकर सपा का स्थानीय नेतृत्व अखिलेश के बसनुमा रथ पर फूल बरसा चुका था. सड़क पर गुलाब की पत्तियां बिखरी हुई थीं और लगातार टायरों के नीचे कुचली जा रही थीं.

रोड शो के दौरान अखिलेश यादव
रोड शो के दौरान अखिलेश यादव

तभी सड़क के किनारे हम महिलाओं की एक गोलबंदी से टकराए. इन महिलाओं ने हाथ में सपा के झंडे ले रखे थे और अखिलेश यादव जिंदाबाद के नारे लगा रही थीं. हालांकि अखिलेश को गुजरे हुए 15 मिनट हो चुके थे. पूछने पर पता चला कि ये महिलाऐं पास ही कि दलित बस्ती की हैं जो सरकारी कागजों में ‘आदर्श कॉलोनी’ के नाम से दर्ज है. बिजली-पानी, राशन-पेंशन की समस्या के हवाले से ये लगातार नई सरकार को कोस रही थीं. जब उनसे पूछा गया कि क्या ये लोग बहन जी के कहने से अखिलेश को वोट देंगी? इनका जवाब था-

“बिल्कुल देंगी. हमें अखिलेश सरकार में इतनी दिक्कतें नहीं होती थीं. क्योंकि हम लोग दलित हैं, बसपा के समर्थक हैं, इस वजह से इस सरकार में हमें ज्यादा परेशान किया जा रहा है.”

दो जगहों पर हुई बातचीत सभी दलित वोटों पर लागू नहीं होती लेकिन ये वोटरों का मिजाज समझाने में मदद तो करती ही है. पिछले दो चुनाव में बीजेपी ने गैर जाटव दलित वोटों में सेंध लगाने में कामयाबी हासिल की है. अगर बीजेपी इस बार भी इस चीज में कामयाब रही तो यह सपा को मुश्किल में डाल सकता है.

वोट कटुआ

प्रचार अभियान खत्म होने के बाद जब हम लोग कांग्रेस कार्यालय पहुंचे तो वहां लगभग सन्नाटा था. गिनकर दर्जनभर लोग भी कार्यालय में मौजूद नहीं थे. इसके बावजूद कांग्रेस के जिलाध्यक्ष अपनी जीत को लेकर उतने ही आश्वस्त थे जितने बीजेपी या सपा के कार्यकर्ता थे. आश्वस्त होना अलग बात है लेकिन नेहरू की इस सीट पर कांग्रेस की हालत पिछले दो दशक से बहुत पतली रही है. 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के खाते में महज 6 फीसदी वोट गए थे. 2009 में यह आंकड़ा साढ़े बारह फीसदी था. 2004 में महज 1.5 फीसदी और 1999 में 4.76 फीसदी रहा वोट कांग्रेस के खाते में गया.

कांग्रेस के प्रत्याशी मनीष मिश्रा
कांग्रेस के प्रत्याशी मनीष मिश्र

इस बार कांग्रेस ने मनीष मिश्र को मैदान में उतारा हैं. वो जगदीश नारायण मिश्र के बेटे हैं. उनके पिता किसी दौर में इंदिरा के निजी सचिव हुआ करते थे. 1984 में वो निर्दलीय चुनाव लड़े थे और 33444 वोट पाकर तीसरे नंबर पर रहे थे. मनीष को टिकट मिलने की दो वजहें हैं. पहला उनकी राजनीतिक विरासत और दूसरा सपा और कांग्रेस गठबंधन का टूट जाना. कांग्रेस उन्हें ब्राह्मण चेहरे की तरह प्रोजेक्ट करने में लगी है. इसके अलावा शहर में कुछ पुराने कांग्रेसी समर्थक भी हैं. ये वोट उनके खाते में जा रहे हैं. कांग्रेस ब्राह्मण वोटों में जितनी भी सेंध लगा पाती है वो सीधे तौर पर बीजेपी के नुकसान की तरह दर्ज किया जाएगा.

इस चुनाव में असल वोट कटुआ हैं अतीक अहमद. अपनी आपराधिक छवि के बावजूद वो इलाके के मुस्लिमों में काफी लोकप्रिय हैं. 2004 में वो इस सीट से सपा के टिकट पर सांसद बन चुके हैं. 2009 में वो प्रतापगढ़ से चुनाव लड़े थे और उनका स्कोर एक लाख से ऊपर था. 2009 का चुनाव वो श्रावस्ती सीट से सपा की टिकट पर लड़े थे और यहां वो 260051 वोट के साथ दूसरे स्थान पर रहे थे.

इस बार अतीक अहमद निर्दलीय प्रत्याशी है और टेलीविजन उनके हिस्से आया चुनाव चिन्ह है
इस बार अतीक अहमद निर्दलीय प्रत्याशी हैं और टेलीविजन उनके हिस्से आया चुनाव चिह्न है

अतीक अहमद शहर पश्चिमी सीट से पांच मर्तबा विधायक रहे हैं. यहां उनकी पकड़ मजबूत है. इस बार शहर पश्चिमी में 31 फीसदी वोटिंग हुई है. इसके अलावा इस संसदीय क्षेत्र में कई जगह पर उनके समर्थक हैं. अतीक अहमद को मिलने वाला हर वोट सपा के यादव-मुस्लिम समीकरण को नुकसान पहुंचाएगा.

अतीक अहमद अब तक दसियों चुनाव लड़ चुके हैं. वो चुनाव लड़ने से पहले पूरी तैयारी के साथ उतरते हैं. 2004 के चुनाव में उन्होंने महीनों पहले माहौल बनाना शुरू कर दिया था. इस बार उनकी उम्मीदवारी नाटकीय रही. उन्होंने आखिरी दो दिन में जेल से पर्चा भरा. प्रचार के लिए उनकी रिहाई भी नहीं हो पाई. उनके भाई और बेटे ने फिलहाल प्रचार की कमान संभाल रखी है. अतीक के समर्थक भी उनकी जीत के दावे करते नहीं थक रहे हैं लेकिन सच्चाई में वो इस बार उनकी भूमिका वोट कटाने तक ही सीमित रहने वाली है. अतीक शहर पश्चिम के अलावा कितने लोगों को अपने पक्ष में लामबंद कर पाएंगे इसका जवाब हमें हनुमानगंज बाजार के साहिल देते हैं-

“2004 में हमने भी अतीक अहमद का समर्थन किया था लेकिन इस बार उनके जीतने की उम्मीद बिल्कुल नहीं है. ऐसे में उनको वोट देने का फायदा क्या है? कुल मिलाकर वो इस चुनाव में सपा को नुकसान ही पहुंचाने जा रहे हैं.”

सपा भी इस बात को जानती है कि अतीक उसको नुकसान पहुंचाने जा रहे हैं. इसके बरक्स उन्होंने बीजेपी प्रत्याशी कौशलेंद्र पटेल के बाहरी होने को मुद्दा बनाया है. कौशलेंद्र बगल के जिले मिर्जापुर के रहने वाले हैं. उनका अबतक का कार्यक्षेत्र बनारस रहा है. कौशलेंद्र यहां योगी के चमत्कार और नाम के अंत में लगे ‘पटेल’ के भरोसे चुनाव लड़ रहे हैं.

अतीक फिलहाल जेल में हैं और प्रचार की कमान उनके बेटे के हाथ में है
अतीक फिलहाल जेल में हैं और प्रचार की कमान उनके बेटे के हाथ में है

14 मार्च को जो भी नतीजे आते हैं उसका भारतीय राजनीति पर असर लंबा रहने वाल है. 2014 में बीजेपी ने सूबे की 80 में 73 सीटों पर जीत दर्ज की थी. यह वो आंकड़ा था जिसने बीजेपी को केंद्र में स्पष्ट बहुमत दिलवाया था. 1984 के बाद ऐसा पहली बार हुआ था. आज बीजेपी 20 राज्यों में सत्ता पर काबिज है. 2019 में बीजेपी के विजय रथ को रोकने के लिए उत्तर प्रदेश बहुत निर्णायक मैदान होगा.इस उप चुनाव में सपा-बसपा का गठबंधन प्रयोग के स्तर पर है. अगर इसे थोड़ी भी सफलता मिलती है तो यह बीजेपी के लिए चिंता का विषय बन जाएगा.


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